Faatiha Aur Nazar o Niyaz Kya Hai? | Islam Mein Nazar o Niyaz Ka Sharai Hukm

"नियाज़ करवाना या फातिहा दिलाना जिसमे खाने-पीने की चीज़ों को सामने रखते हैं और सुरह फातिहा और दीगर क़ुरआनी सूरतें और आयतें पढ़ी जाती हैं और फिर आखिरी में बुर्जुगों,पीर-ओ-पैगम्बरों की नज़र की जाती है। इसका शरीअ़त में कोई वजूद नहीं है !"

आज के दौर में Faatiha aur Nazar o Niyaz का मसला मुसलमानों के बीच काफी चर्चा का विषय बना हुआ है। बहुत से लोग इसे सवाब का काम समझते हैं, जबकि कुछ लोग इसे बिदअत (नवाचार) या ग़ैर-शरई अमल मानते हैं।

हमारे समाज में फातिहा और नज़र-ओ-नियाज़ बहुत आम रस्में बन चुकी हैं। अक्सर देखा जाता है कि लोग किसी बुज़ुर्ग या वली के नाम पर खाना बनाते हैं, क़ुरआन की आयतें पढ़ते हैं और उसे “फातिहा” कहते हैं।

लेकिन सवाल यह है:
👉 क्या इन रस्मों की बुनियाद क़ुरआन और सही हदीस से साबित है?
👉 या फिर ये बातें समय के साथ धर्म का हिस्सा समझ ली गई हैं?

✍️ By: Mohib Tahiri | 🕋 islamic article|Shirk o bidat|Nazr o niyaz ki haqeeqat 🕰 अपडेटेड:27 April 2025
Faatiha Aur Nazar o Niyaz Ki Haqeeqat Islam ki Nazar me
Nazar o Niyaz Aur Faatiha Ka Sharai Masla

इस आर्टिकल में हम कुरआन और सहीह हदीस की रौशनी में समझेंगे कि इस्लाम में Nazar o Niyaz ka sharai hukm क्या है, फातिहा का सही तरीका क्या है, फातिहा करना Bidat ya Sunnat है और किन बातों से हमें बचना चाहिए।



    हम और हमारा समाज:

    आज हमारे मआशरे में एक चीज़ जो ख़ास तौर पे बहुत से मुसलमानों के घरों में देखी जा सकती है, वो है Faatiha aur Nazar o niyaz ! नियाज़ करवाना या फातिहा दिलाना जिसमे खाने-पीने की चीज़ों को सामने रखते हैं और सुरह फातिहा और दीगर क़ुरआनी सूरतें और आयतें पढ़ी जाती हैं और फिर आखिरी में बुर्जुगों,पीर-ओ-पैगम्बरों की नज़र की जाती है।
    क्या यह इस्लाम में जायज़ अमल है या फिर बिदअत (नया तरीका) है?
    इस आर्टिकल में हम Islam mein Nazar o Niyaz ka sharai hukm को क़ुरआन और हदीस की रोशनी में समझेंगे।

    फातिहा क्या है?

    फातिहा” शब्द आमतौर पर Surah Al-Fatiha के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह कुरआन की पहली सूरत है और हर नमाज़ में पढ़ी जाती है।

    लेकिन आम बोलचाल में “फातिहा देना” से मुराद यह लिया जाता है कि

    ♦️किसी बुजुर्ग, वली या मरहूम के नाम पर खाना रखकर कुरआन की आयतें पढ़ी जाएँ
    ♦️और सवाब बख्शा जाए।

    क़ुरआन में कहीं भी इस तरह की रस्म का हुक्म नहीं मिलता कि खाने पर फातिहा दिलवाई जाए


    नजर (Nazar) और नियाज़ (Niyaz) क्या है?

    🔹 नजर (Nazar)

    नजर का मतलब है – किसी काम के पूरा होने पर अल्लाह के नाम पर कुछ सदका या खैरात करने की मन्नत मानना।

    🔹 नियाज़ (Niyaz)

    नियाज़ से मुराद है – अल्लाह की रज़ा के लिए खाना पकाकर गरीबों में बाँटना।

    👉 अगर ये दोनों काम सिर्फ अल्लाह की रज़ा के लिए हों, तो यह सदका और खैरात के दायरे में आते हैं।लेकिन अगर किसी और के नाम पर या उनसे मदद की उम्मीद से हो, तो यह शिर्क की तरफ ले जा सकता है।


    फ़ातिहा का शरई हुक्म

    ईसाल-ए-सवाब (सवाब पहुंचाना) के बारे में उलमा के बीच इख्तिलाफ मौजूद है, लेकिन अगर यह अमल शरई दायरे में हो — यानी बिना किसी गैर-शरई रस्म या अकीदे के — तो सदक़ा और दुआ करना जायज़ है।

    📖 नबी ﷺ ने फरमाया:
    “जब इंसान मर जाता है तो उसके अमल बंद हो जाते हैं, सिवाय तीन चीज़ों के: सदक़ा-ए-जारिया, इल्म जिससे फायदा उठाया जाए, और नेक औलाद जो उसके लिए दुआ करे।”
    (सहीह मुस्लिम 1631)
    इस हदीस से पता चलता है कि दुआ और सदक़ा मरहूम को फायदा पहुंचा सकते हैं।

    इस्लाम में नजर का हुक्म

    कुरआन में अल्लाह तआला फरमाते हैं कि जो लोग अपनी नजर पूरी करते हैं, वे नेक बंदे हैं।
    “तुम जो कुछ भी खर्च करते हो या मन्नत मानते हो, अल्लाह उसे जानता है।”
    (सूरह अल-बक़रह 2:270)
    इस आयत से मालूम हुआ कि नज़र और मन्नत सिर्फ अल्लाह के लिए होनी चाहिए।

    लेकिन ध्यान रहे —
    👉नजर सिर्फ अल्लाह के लिए मानी जाएगी।
    👉अगर नजर किसी बुजुर्ग, दरगाह या गैर-अल्लाह के नाम पर मानी जाए, तो यह जायज़ नहीं।
    क्योंकि इबादत का हर अमल सिर्फ अल्लाह के लिए होना चाहिए।

    अल्लाह तआला फरमाता है:
    “तुम नमाज़ पढ़ो और क़ुर्बानी करो सिर्फ अपने रब के लिए।”
    (सूरह अल-कौसर 108:2)
    इस आयत से साफ मालूम होता है कि इबादत और कुर्बानी सिर्फ अल्लाह के लिए होनी चाहिए। किसी और के नाम पर नज़र-ओ-नियाज़ करना दीन की तालीम के खिलाफ है।

    हदीस की रोशनी में

    रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया
    जिसने अल्लाह के अलावा किसी और के लिए नज़र मानी, उसने शिर्क किया।”
    (हदीस का मतलब)
    📌 पैगंबर-ए-इस्लाम ﷺ ने कभी अपने ज़माने में न फातिहा करवाई और न ही सहाबा से ऐसा करने को कहा।


    सहाबा का अमल क्या था?

    नबी ﷺ के बाद सहाबा-ए-किराम ने:
    💠 मरे हुए लोगों के लिए दुआ की
    💠 सदक़ा किया
    💠 नेक अमल किए

    लेकिन कहीं भी खाना रखकर फातिहा दिलाने का तरीका नहीं मिलता।

    क्या मरने वालों को सवाब पहुंचता है?

    जी हां, सवाब पहुंचता है — लेकिन सही तरीके से:
    💠 दुआ करना
    💠 सदक़ा देना
    💠 नेक अमल करना

    👉  लेकिन किसी के नाम पर खाना चढ़ाना या रस्मी फातिहा कराना क़ुरआन और हदीस से साबित नहीं।

    समाज में फैली गलतफहमियां

    ♦️ फातिहा कराने से रूह खुश होती है
    ♦️ दरगाह के नाम की नियाज़ ज़रूरी है
    ♦️ बुज़ुर्ग नाराज़ हो जाते हैं

    👉 ये सारी बातें इस्लामी तालीमात से साबित नहीं।


     सही इस्लामी तरीका क्या है?

    👉 अल्लाह से सीधे दुआ करें
    👉 मरने वालों के लिए सदक़ा करें
    👉 नेक काम करें
    👉 शिर्क और बिदअत से बचें




    क्या ये नज़र-ओ-नियाज़, ये फातिहा दिलाना सही है??

    सबसे पहले हम क़ुरआन और हदीस पे ग़ौर करते हैं :
    अल्लाह तआला क़ुरआन में फरमाता है "हमने तुम्हारे लिए दीन को मुकम्मल कर दिया"
    (सुरह माएदा, आयत नंबर 3)
    (अल्लाह ने जब दीन मुकम्मल कर दिया है तो अब इसमें ज़र्रा बराबर भी कुछ सामिल करने की जरूरत नही)

    Faatiha aur Nazar o niyaz /फातिहा और नज़र ओ नियाज़

    नज़र ओ नियाज़ और फातिहा

    "तुम पे हराम किया गया मुरदार और ख़ून और खिंजीर का गोश्त, और जिस पे अल्लाह के सिवा किसी और का नाम पुकारा गया हो."
    (सुरह बकरा आयत 173, सुरह माएदा 3, सुरह अनाम 145 सुरह नहल 115)

    👉🏻 इस आयत से साफ़ पता चलता है कि अल्लाह के सिवा किसी और की नज़र-ओ-नियाज़ जायज़ नहीं है।

    👉 Video dekhen Khane par fatiha ki daleel bukhari Se,jane Haqeeqat 



    Fatiha khawani halal ya haram


    हज़रते आयशा रजि० से रिवायत है के मुहम्मद स० अलैह० फ़रमाते हैं के
     जिसने हमारे दीन में कुछ ऐसी बात शामिल की जो उसमे से नहीं है तो वो मरदूद है.
    (सहीह बुखारी 2697, सहीह मुस्लिम 1718)

    एक हदीस है के मुहम्मद स० अलैह० फ़रमाते हैं
     " दीन के अंदर नयी नयी चीज़ें दाख़िल करने से बअ़ज़ रहो, बिला शुबहा हर नयी चीज़ बिदअ़त है और हर बिदअ़त गुमराही है और हर गुमराही जहन्नम में ले जाने वाली है."
    (अबु'दाऊद किताब अल सुंनह 7064)

    रसूलल्लाह स० अलैह० ने फ़रमाया
     "सबसे बेहतरीन अमर (अमल करने वाली) अल्लाह की किताब है और सबसे बेहतर तरीका मुहम्मद स० अलैह० का तरीका है, और सबसे बदतरीन काम दीन में नई नई बातें पैदा करना है, और हर नई बात गुमराही है "
    (इबने माजा जिल्द 1 हदीस 45)

    इसके अलावा भी कितनी ही क़ुरआनी आयतें और हदीसें मौजूद हैं जो इस बात की दलील देती हैं के दीन में कोई नयी चीज़ ईजाद न करो और खाने पीने की चीज़ों पे सिर्फ़ अल्लाह का नाम लो ताकि वो तुम्हारे लिए हलाल हो जाये।

    अब ज़रा ग़ौर फ़रमाते हैं नियाज़ फातिहा के तरीक़े और उस से जुड़ी बातों से। देखें यह वीडियो




    नियाज़ फातिहा के ग़लत होने की दलील:-


    1.आपने देखा होगा के नियाज़ फातिहा जब भी होती है तो किसी पीर या बुज़ुर्ग या किसी औलिया-ओ- पैग़म्बर के नाम की होती है, मतलब उनका नाम लिया जाता है बेशक उनके नाम लेने के पहले क़ुरआनी सूरतें और आयतें पढ़ी जाती है मगर जब भी किसी और का नाम आ जाये तो फिर वो खाने की चीज़ हराम हो जाती है. इसलिए नियाज़ फातिहा दिलाना सरासर ग़लत है और गुनाह है।

    2. अगर कुछ लोग इस बात पे बहस करें के अगर हमने सिर्फ़ क़ुरआनी आयतें पढ़ी तो फिर तो वो हलाल हुआ क्यूंकि क़ुरआन अल्लाह का कलाम है...तो ऐसे समझदार लोगों से मैं पूछना चाहता हूँ के क्या किसी हदीस या क़ुरआन से इन्हे ऐसा करने की दलील मिलती है के कभी मुहम्मद रसूलल्लाह स० अलैह० ने या उनके सहबाओं ने ऐसा किया हो के खाने पीने के सामन सामने रख कर क़ुरआन की तिलावत की हो और फिर खाया हो??

    नहीं ऐसी कोई दलील किसी सही हदीस में नहीं है. मतलब साफ़ हुआ के लोगों ने अपनी तरफ से दीन में इस नयी चीज़ का ईजाद किया है, फिर तो ये बिदअत है और हर बिदअत गुमराही है।

    3. कुछ जाहिल लोग ये दलील देते हैं के खाने पे क़ुरआन की तिलावत करने से खाना हराम होता है तो फिर बिस्मिल्लाह कहने से भी खाना हराम हो गया. सबसे पहली बात के क़ुरआन की आयतें तिलावत करने से खाना हराम नहीं होता बल्कि तुम्हारा ये फेल (खाने पे तिलावत करना) बिदअत है क्यूंकि न तो मुहम्मद स० अलैह० ने कभी खाने को सामने रख कर तिलावत की और न ही उनके सहाबियों से कभी सुबूत मिला, हाँ खाने से पहले बिस्मिल्लाह के तमाम सुबूत मौजूद हैं।

    ध्यान दें :- 

    हां ! सही बुखारी,मुस्लिम और कुछ हदीस में ये पाया जाता है और हमारे सुन्नी भाई हदीस से जिन हदीसों का सहारा लेकर फातिहा या नियाज़ साबित करना चाहते हैं उन हदीसों में बेशक नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने खाना रख कर पढ़े हैं लेकिन क्या पढ़ें हैं किसी को पता नहीं !

    सही बुखारी में है की 
    नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सामने खाना रखा गया , उम सलीम राजि़अल्लाह अन्हा ने भेजा था, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने खाना रख के कुछ पढ़ना शुरू किया और दुआ के बाद वो थोड़ा सा खाना जितने सहाबा मौजूद थे सब के लिए काफी हो गया.
    एक और रिवायत में मिलती है की आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने खाने पर दुआ़ की जो कुछ अल्लाह ने चाहा एक और रिवायत में है की दुआ़ की बआ़द आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उस खाने में अपना लआ़ब ए दहन मिलाया.

    👉 अब गौर करने वाली बात है की नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने खाने पर कुछ पढ़ा क्या पढ़ा यह जिक्र नहीं है तो आप को कैसे पता चला की सुराह फातिहा, चारो कुल और दरूद पढ़ना है।  


     दूसरी रिवायत में जिक्र है

    अल्लाह ने जो कुछ भी चाहा आप ने दुआ की यहां भी ये जिक्र नहीं की क्या पढ़ा गया और फिर एक और रिवायत में है की आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपना लआ़ब ए दहन उसमे मिलाया तो आप सुन्नी हजरात भी अपना थूक ए मुबारक उसमे मिलाएं और अवाम को बताएं की हमने अपनी थूक ए मुबारक इसमें मिलाया हैं तो देखिए अवाम क्या करती है आप के साथ !

    अलमुखतसर, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने खाना कम होने की वजह से बरकत के लिए दुआ किए और वो भी अल्लाह ने वो कलिमात बताए और वो कलिमात आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और अल्लाह को मालूम है ! जब किसी सहाबा को नहीं मालूम की क्या पढ़ा गया तो हमे कैसे मालूम की फातिहा में ये सब पढ़ना है! अगर मालूम होता तो सहाबा इस अमल यानी फातिहा से क्यों दूर रहते. सोचिए और गौ़र ओ फ़िक्र कीजिए !

    Niyaz ka khana, khana chahiye ya nahi 




    4. कुछ मौलवी जिन्होंने दीन को अपना कारोबार बन लिया है वो मेरे उन भाइयों को, जिन्हे दीन की समझ कम है ये दलील देते हैं के खाने की चीज़ पे तो हमने क़ुरआन पढ़ी और ये तो और भी अच्छी बात है फिर भी ये लोग ऐतराज़ करते हैं.....

    मैं अपने उन भाइयों को बताना चाहता हूँ के जैसे नमाज़ की एक रकत में सिर्फ दो ही सजदे हैं और अगर तीसरा सजदा किया तो ये गुनाह होगा बेशक सजदे के दौरान हम अल्लाह की तारीफें करें, मगर ये काम गुनाह हो गया क्यूंकि ये बिदअ़त है मतलब दीन-इ-इस्लाम में नयी चीज़ जोड़ी हमने इसलिए ये गुनाह है. उसी तरह से खाने की चीज़ें सामने रख कर क़ुरआन पढ़ें तो ये भी बिदअत हो जाती है क्यूंकि ये किसी हदीस से या क़ुरआन से साबित नहीं है।




    सबसे आख़री बात ,वो ये के क्या दीन का कारोबार चलाने वाले हमारे मौलवियों को लगता है की हमारा दीन मुकम्मल नहीं हुआ,जो वो इसमें नयी चीज़ें जोड़े जा रहे हैं ...जबकि अल्लाह फ़रमाता है के हमने तुम्हारे दीन को मुकम्मल कर दिया।

    मतलब ये अल्लाह के कलाम को ताक पे रख कर (नउज़ुबिल्लाह) अपनी मनमानी करते रह रहे हैं और जिन्हे दीन की सही समझ नहीं है उन्हें भी बहका रहे हैं और न जाने कहाँ कहाँ से झूटी दलीलें दे रहे हैं जबकि हमें तो बस वही काम करनी चाहिए जिसका हुक्म अल्लाह और उसके रसूल ने दिया हो या मुहम्मदुर रसूलल्लाह से साबित हो और सहाबाओं ने किया हो।


    फातिहा करना बिदअ़त में शामिल है इस से खाना हराम नहीं होता है अगर अल्लाह के नाम की हो लेकिन अगर अब्दुल कादिर जिलानी रहमतुल्लाह या ख्वाजा के नाम के फातिहा हो उन को राजी करने के लिए खाने पर फातिहा देना है। उनके नाम से डेग चढ़ाना है। यह फलाने बाबा की डेग है,फलाने बाबा का बकरा है। अगर यह इस तरह का होता है ,उनके नाम पर खाना बना है। यह जायज नहीं होगा ।
     अगर फातिहा पढ़ा है तो खाना हराम नही हो जाता लेकिन उससे बचना अच्छा है ! अगर फातिहा का खाना कोई आदमी खा लेता है और अगर वह गैरुल्लाह के नाम से नहीं है तो खाना हराम नहीं होता है हां अमाल बिदअ़त है और बिदअ़त गुमरही की तरफ ले जाने वाली है !
    अगर कोई आदमी किसी गैरुल्ला के नाम से ही डेग चढ़ाए या कोई जानवर उसके नाम से जिबाह करे या उसकी रजा के लिए करे यानी खाना उसी के लिए हो तो ये खाना हराम है !

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    ✍️ लेखक: Mohib Tahiri

    Conclusion:

    फातिहा और नज़र-ओ-नियाज़ आज समाज में एक रस्म बन चुकी हैं, लेकिन क़ुरआन और सही हदीस से इनका सबूत नहीं मिलता।
    इस्लाम हमें सिखाता है कि इबादत सिर्फ अल्लाह के लिए हो और किसी भी रस्म को दीन का हिस्सा बनाने से पहले उसका सबूत क़ुरआन और सुन्नत से जरूर देखें।

    👉 हमें चाहिए कि हम रस्मों के पीछे नहीं, बल्कि क़ुरआन और सुन्नत के पीछे चलें।
    Faatiha aur Nazar o niyaz  दीन में नयी ईजाद करदा अमल हैं जो की बिदअ़त है और हमे इस गुमराही से बचना चाहिए. बजाये सवाब के हम गुनाह की तरफ जा रहे हैं।और यह अमल अल्लाह की नाराज़गी का सबब बन रहा है तो फिर क्यों ये अमल करें? जब दीन मुकम्मल है तो क्यों अल्लाह की बनाई हद्द से आगे बढ़ें और नुकसान उठाने वालों में शामिल हों ? जो काम सहाबा ने नही किया नबी  ﷺ ने नही बताई भला हम क्यूं करें और अल्लाह का नाराज़ करें !

    अल्लाह तआला से दुआ है के हम तमाम मुसलमान भाइयों को सही दीन पे अमल करने की तौफ़ीक़ अत फरमाए और जो दीन के रास्ते से भटक गए हैं उन्हें रहे रास्त पे ला दें (आमीन)
    Jaiz

    FAQs:

    Que: फातिहा देना कैसा है ?
    Ans: फातिहा देना किसी भी हदीस या क़ुरान से साबित नही है बल्कि ये एक बिदअ़त है दीन में इज़ाफ़ा है ! 

    Que: नियाज़ फातिहा क्या है ?
    Ans: नियाज़ करवाना या फातिहा दिलाना जिसमे खाने-पीने की चीज़ों को सामने रखते हैं और सुरह फातिहा और दीगर क़ुरआनी सूरतें और आयतें पढ़ी जाती हैं और फिर आखिरी में बुर्जुगों,पीर-ओ-पैगम्बरों की नज़र की जाती है। इसका शरीअ़त में कोई वजूद नहीं है !

    Que: क्या इस्लाम में खाने पर फातिहा करने की इजाजत है?
    Ans: नही ! इस्लाम में खाना सामने रख कर उस पर फातिहा पढ़ना या करने की इजाज़त नहीं है ! कोई भी खाना हो उसपर अल्लाह का नाम लेकर यानी बिस्मिल्लाह पढ़ कर खाना चाहिए !

    Que: फातिहा देना क्या हदीस से साबित है?

    Ans: हमारे सुन्नी भाई हदीस से जिन हदीसों का सहारा लेकर फातिहा या नियाज़ साबित करना चाहते हैं उन हदीसों में बेशक नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने खाना रख कर पढ़े हैं लेकिन जो कुछ पढ़े हैं वो तो अल्लाह ने उन्हें बताया किसी को नहीं मालूम की क्या पढ़े ? वो तो अल्लाह और उसके रसूल का मुआमला है लेकिन हमारे नियाज़ी भाइयों को कैसे मालूम हुवा की क्या पढ़ना है !

    Que: क्या कुरान में फातिहा का जिक्र है?
    Ans: क़ुरान में हम जिस तरीक़े से फातिहा करते हैं उसका कोई जिक्र नहीं है बल्कि कुरान की पहली सूरत का नाम अल फातिहा है !

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