Deewaron Par Baap Ke Haath – Mohabbat Aur Qurbani Ki Nishaniyan

"समय रहते रिश्तों को संभाल लो, वरना पछतावे की दीवारें बहुत ऊँची होती हैं।जिस बाप ने बचपन में तुम्हे सहारा दिया बुढ़ापे में उसका सहारा बनें। "पिता की चुप्पी को समझना सीखो, वरना एक दिन सिर्फ उनकी यादें बोलेंगी।"۔


Deewaron Par Baap Ke Haath एक बहुत बड़ी सीख है उनके लिए जो बुढ़ापे में अपने मां बाप की क़दर नहीं करते। हमारी ज़िंदगी में अक्सर ऐसी छोटी बातें होती हैं जो हमें महसूस तक नहीं होतीं, लेकिन बाद में वही बातें गहरी कसक और पछतावे की वजह बन जाती हैं। घर के बूढ़े लोग — चाहे वो माँ हों या पिता — जब कमजोर हो जाते हैं तो हमें उनका सहारा बनना चाहिए, लेकिन अफ़सोस कि बहुत बार हम ऐसा नहीं करते। 

✍️ लेखक: Mohib Tahiri | 🕋 motivational article|Rishton ki ahmiyat|Baap ki qadar| 🕰 अपडेटेड:30 July 2025
Deewaron par baap ki mehnat ke nishan
Baap ki qurbaniyon aur jazbaat ko samajhna zaroori hai 

आज की कहानी “Deewaron par Baap ke Haathon ke Nishaan ” एक बेटे की गलती, उसके पछतावे और अगली पीढ़ी की संवेदनशीलता की ऐसी मिसाल है जो हर इंसान को सोचने पर मजबूर कर देगी।


👴जब बाप बूढ़ा हो गया:


अब्बा जी बूढ़े हो गए थे। उन्हें चलने में दिक्कत होती थी, इसलिए अक्सर घर की दीवारों का सहारा लेकर चलते थे। धीरे-धीरे दीवारों पर उनके हाथों और उंगलियों के निशान पड़ गए। जहाँ-जहाँ वो छूते, दीवारें धुंधली और गंदी सी दिखने लगतीं।

बीवी को ये बातें पसंद नहीं आईं। वह बार-बार शिकायत करने लगीं कि दीवारें खराब हो रही हैं। एक दिन अब्बा ने मेरे सिर में तेल लगाया और चलते हुए दीवार पर तैलीय दाग बन गए। बीवी तो गुस्से में चीख पड़ी और मैंने भी आपा खो दिया। मैं अपने पिता से रूखे लहजे में बोला — “अब्बा, प्लीज़ दीवारों को मत छुआ कीजिए।”

अब्बा जी ने कुछ नहीं कहा। मगर उनकी आँखों में उदासी साफ़ झलक रही थी। मैं जानता था कि मैंने गलत किया, लेकिन उस वक़्त चुप रहा।

इसके बाद अब्बा जी ने दीवारों का सहारा लेना छोड़ दिया — और एक दिन वे गिर गए। वो बिस्तर पर पड़े रह गए, और वही बिस्तर उनका बिस्तर-ए-मर्ग बन गया। कुछ ही दिनों में वो दुनिया से चले गए।
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💔 एक बेटे का पछतावा

अब्बा के इंतकाल के बाद मेरे दिल में एक बोझ सा था — एक अपराध-बोध। मैं अपने व्यवहार को कभी माफ नहीं कर पाया। मैं अक्सर उनकी आँखों के उदास भाव याद करता और खुद से सवाल करता — क्या मैं उनके साथ ऐसा ही बर्ताव करने के लिए बेटा बना था?

फिर एक दिन हमने घर की पुताई करानी चाही। पेंटर आए और दीवारों पर पड़े अब्बा के हाथों के निशानों को मिटाने लगे। तभी मेरा बेटा, जो अपने दादा से बहुत मोहब्बत करता था, दौड़कर आया और बोला:
“प्लीज़ इन निशानों को मत मिटाइए! ये दादू की यादें हैं।”
पेंटर समझदार था। उसने कहा, “हम इन निशानों को मिटाएंगे नहीं, बल्कि इनके चारों ओर एक खूबसूरत डिज़ाइन बनाएंगे।”

वाकई, वो डिज़ाइन बहुत सुंदर बना। अब वो हाथों के निशान हमारे घर की एक खास पहचान बन गए। जो भी मेहमान आता, उन डिज़ाइनों की तारीफ करता।


 🔁 वक़्त का पहिया घूमता है


वक़्त गुज़रा और अब मैं खुद बूढ़ा होने लगा। एक दिन चलने में मुश्किल हो रही थी तो मैंने कोशिश की दीवार का सहारा न लेने की — काश मैं खुद को साबित कर पाता कि अब्बा सही थे।

तभी मेरा बेटा दौड़ा आया और बोला,
“अब्बा, दीवार पकड़ लीजिए! आप गिर सकते हैं।”
फिर मेरी पोती आगे बढ़ी, उसने मेरा हाथ पकड़ा और अपने कंधे पर रख लिया। मैं चुपचाप रो पड़ा। काश मैंने भी अपने अब्बा के साथ यही किया होता।
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🎨 पोती की मासूम मोहब्बत


फिर मेरी पोती अपनी ड्रॉइंग बुक लेकर आई। उसमें दीवार पर बने दादा के हाथों के निशानों की तस्वीर थी। उसकी टीचर ने लिखा था:
काश हर बच्चा बड़ों से यूँ ही प्यार करे।"
मैं अपने कमरे में गया और अब्बा की याद में फूट-फूट कर रोने लगा।
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बड़े बुजुर्गों के स्पर्श से दीवारें गन्दी नहीं होती बल्कि दीवारों में जान आती हैं। पछतावा दिल को तो सुकून दे सकता है, लेकिन खोए हुए रिश्तों की भरपाई नहीं कर सकता। इसलिए समय रहते उनसे मोहब्बत और क़दर करें

✅ निष्कर्ष (Conclusion)

हम सब एक दिन बूढ़े हो जाते हैं। हमें यह याद रखना चाहिए कि हमारे माँ-बाप की थकान, उनके झुकते कदम और दीवार पर पड़े हाथों के निशान — कोई बोझ नहीं, बल्कि मोहब्बत की मूरत हैं।

घर की दीवारें बार-बार रंगी जा सकती हैं, लेकिन अपनों की यादें दोबारा नहीं मिलतीं।

आइए, हम अपने बुज़ुर्गों का सम्मान करें और अपने बच्चों को भी यही सिखाएं — कि असली दौलत दीवारें नहीं, उन दीवारों को छूने वाले हाथ हैं।
(Copy from telegram channel: Urdu naseehaten)

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