क्या आपने कभी सोचा है कि पूरी धरती पर ऐसा भी एक दौर आया था जब चारों तरफ़ सिर्फ़ पानी ही पानी था, और इंसानों की पूरी एक क़ौम अपने कुफ़्र और सरकशी की वजह से तबाह कर दी गई? यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि क़ुरआन और सहीह इस्लामी रिवायतों से साबित एक अज़ीम वाक़िआ है।
हज़रत नूह़ (अलैहिस्सलाम) की कश्ती का वाक़िआ हमें बताता है कि जब इंसान अल्लाह की नाफ़रमानी, शिर्क और गुनाहों में हद से आगे बढ़ जाता है और रसूल की दावत को ठुकरा देता है, तो अल्लाह का अज़ाब आ सकता है। वहीं जो लोग ईमान, सब्र और अल्लाह पर भरोसा करते हैं, अल्लाह उनके लिए निजात के रास्ते खोल देता है।
✍️ By: Mohib Tahiri | 🕋 Islamic Articles | Kashti e Nooh|Prophet Story|Na-farmani ka Anjam| 🕰 Updated:13 July 2026
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| Hazrat Nooh Alaihissalam ki kashti, toofan e azeem aur momineen ki nijaat ka manzar |
इस लेख "Kashti e Nooh A.s Ka Mukammal Waqiya"से मुतल्लिक़ हम क़ुरआन की आयतों और सहीह अहादीस की रौशनी में जानेंगे। साथ ही यह भी समझेंगे कि इस महान घटना से आज के मुसलमान क्या सबक सीख सकते हैं और क्यों यह वाक़िआ क़यामत तक आने वाली पूरी इंसानियत के लिए इबरत और नसीहत का ज़रिया है।
कश्ती-ए-नूह़ का वाक़िआ इंसानी तारीख़ के सबसे बड़े और इबरतनाक वाक़िआत में से एक है। इसका ज़िक्र क़ुरआन मजीद की कई सूरतों में तफ़सील से आया है, खास तौर पर की सूरह हूद, सूरह नूह़, सूरह अल-क़मर, सूरह अल-मोमिनून और सूरह अल-अनकबूत में।
हज़रत नूह़ (अलैहिस्सलाम) की क़ौम की गुमराही
अल्लाह तआला ने हज़रत नूह़ (अलैहिस्सलाम को उनकी क़ौम की तरफ़ रसूल बनाकर भेजा। उस वक्त उनकी क़ौम शिर्क, बुतपरस्ती और गुनाहों में डूबी हुई थी।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:"और हमने नूह़ को उनकी क़ौम की तरफ़ भेजा, तो वह उनके बीच एक हज़ार साल में से पचास साल कम (950 साल) रहे।"(सूरह अल-अनकबूत 29:14)
नूह़ (अलैहिस्सलाम) ने दिन-रात अपनी क़ौम को तौहीद की दावत दी, मगर बहुत कम लोग ईमान लाए।
क़ौम का मज़ाक़ उड़ाना
जब क़ौम ने लगातार इनकार किया तो अल्लाह ने नूह़ (अलैहिस्सलाम) को कश्ती बनाने का हुक्म दिया।
अल्लाह फ़रमाता है:"और हमारी निगरानी और हमारी वह्य के मुताबिक़ कश्ती बनाओ।"
(सूरह हूद 11:37)
नूह़ (अलैहिस्सलाम) सूखी ज़मीन पर कश्ती बना रहे थे। उनकी क़ौम उन्हें देखकर हँसती और मज़ाक़ उड़ाती थी।
क़ुरआन कहता है:"जब भी उनकी क़ौम के सरदार उनके पास से गुज़रते तो उनका मज़ाक़ उड़ाते।"(सूरह हूद 11:38)
कश्ती में कौन-कौन सवार हुआ?
जब अल्लाह का अज़ाब आने का वक़्त क़रीब आ गया तो हुक्म हुआ:
"हर क़िस्म के जानवरों का एक-एक जोड़ा और अपने घर वालों को तथा ईमान वालों को कश्ती में सवार कर लो।"
(सूरह हूद 11:40)
क़ुरआन बताता है कि ईमान लाने वाले बहुत कम थे।
"और उनके साथ बहुत कम लोग ईमान लाए थे।"
(सूरह हूद 11:40)
तूफ़ान और ज़मीन से पानी का फूटना
फिर अल्लाह का अज़ाब आया। आसमान से मूसलाधार बारिश बरसी और ज़मीन से पानी उबल पड़ा।
अल्लाह फ़रमाता है:
"तो हमने आसमान के दरवाज़े खोल दिए और ज़ोरदार पानी बरसाया। और ज़मीन से चश्मे फोड़ दिए।"
(सूरह अल-क़मर 54:11-12)
पूरा इलाक़ा पानी में डूब गया और एक महान तूफ़ान आ गया।
नूह़ (अलैहिस्सलाम) का बेटा
नूह़ (अलैहिस्सलाम) का एक बेटा काफ़िर था। उन्होंने उसे भी कश्ती में आने की दावत दी।
अल्लाह फ़रमाता है:"ऐ मेरे बेटे! हमारे साथ सवार हो जाओ और काफ़िरों के साथ न रहो।"
(सूरह हूद 11:42)
लेकिन उसने जवाब दिया:
"मैं किसी पहाड़ पर चढ़ जाऊँगा जो मुझे पानी से बचा लेगा।"
(सूरह हूद 11:43)
मगर एक लहर उनके बीच आ गई और वह डूबने वालों में शामिल हो गया।
कश्ती का सफ़र
कश्ती अल्लाह की हिफ़ाज़त में ऊँची-ऊँची लहरों के बीच चलती रही।
अल्लाह फ़रमाता है:"और वह उन्हें पहाड़ों जैसी लहरों में लेकर चल रही थी।"
(सूरह हूद 11:42)
तूफ़ान का ख़ात्मा
जब अल्लाह ने चाहा तो पानी को रुक जाने का हुक्म दिया।
अल्लाह फ़रमाता है:"ऐ ज़मीन! अपना पानी निगल जा और ऐ आसमान! रुक जा। फिर पानी घट गया और फैसला पूरा कर दिया गया।"इसके बाद कश्ती जूदी नामक पहाड़ पर ठहर गई।
(सूरह हूद 11:44)
"और कश्ती जूदी पर ठहर गई।"
(सूरह हूद 11:44)
इस वाक़िए से मिलने वाली सीख
1. तौहीद की दावत सबसे बड़ा काम है
नूह़ (अलैहिस्सलाम) ने 950 साल तक सब्र के साथ दावत दी।
2. हक़ पर चलने वालों की तादाद कम हो सकती है
क़ुरआन बताता है कि बहुत कम लोग ईमान लाए।
3. रिश्तेदारी नहीं, ईमान काम आता है
नूह़ (अलैहिस्सलाम) का अपना बेटा भी कुफ़्र की वजह से बच न सका।
4. अल्लाह जब अज़ाब का फैसला कर ले तो कोई बचा नहीं सकता
न पहाड़, न दौलत और न ताक़त।
5. मोमिनों के लिए निजात है
जो लोग अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाए, वही कश्ती में सवार होकर बच गए।
हदीस से दलील
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:"नूह़ (अलैहिस्सलाम) जब दुनिया से जाने लगे तो अपने बेटे को नसीहत की..."
मुस्नद अहमद (हदीस: 6583), शैख अल्बानी ने इसे हसन कहा है।
Conclusion:
कश्ती-ए-नूह़ का वाक़िआ सिर्फ़ एक तारीखी घटना नहीं बल्कि पूरी इंसानियत के लिए एक बड़ी इबरत है। इसमें सब्र, तौहीद, अल्लाह पर भरोसा, रसूलों की इताअत और गुनाहों से बचने का पैग़ाम मौजूद है। जो क़ौमें अल्लाह के अहकाम से मुंह मोड़ती हैं, उनका अंजाम नूह़ (अलैहिस्सलाम) की क़ौम जैसा हो सकता है, जबकि ईमान वाले आख़िरकार अल्लाह की मदद और निजात पाते हैं।
FAQs (Frequently Asked Questions)
1. हज़रत नूह़ (अलैहिस्सलाम) कितने साल अपनी क़ौम में रहे?
क़ुरआन के अनुसार हज़रत नूह़ (अलैहिस्सलाम) अपनी क़ौम में 950 साल रहे और उन्हें अल्लाह की तरफ़ बुलाते रहे।
दलील: सूरह अल-अनकबूत 29:14
2. क्या कश्ती-ए-नूह़ में सभी जानवर सवार हुए थे?
क़ुरआन के अनुसार अल्लाह ने हज़रत नूह़ (अलैहिस्सलाम) को हर क़िस्म के जानवरों का एक-एक जोड़ा कश्ती में लेने का हुक्म दिया था।
दलील: सूरह हूद 11:40
3. क्या हज़रत नूह़ (अलैहिस्सलाम) का बेटा भी कश्ती में सवार हुआ था?
नहीं, उनका एक बेटा ईमान नहीं लाया और कश्ती में सवार होने से इंकार कर दिया, इसलिए वह तूफ़ान में डूब गया।
दलील: सूरह हूद 11:42-43
4. कश्ती किस पहाड़ पर जाकर ठहरी थी?
क़ुरआन के अनुसार कश्ती "जूदी" पहाड़ पर जाकर ठहरी थी।
दलील: सूरह हूद 11:44
5. हज़रत नूह़ (अलैहिस्सलाम) की क़ौम पर अज़ाब क्यों आया?
उन्होंने लंबे समय तक शिर्क, बुतपरस्ती और अल्लाह के रसूल की नाफ़रमानी की, इसलिए उन पर तूफ़ान का अज़ाब आया।
दलील: सूरह नूह़ 71:21-25
6. कश्ती-ए-नूह़ के वाक़िए से हमें क्या सबक मिलता है?
इस वाक़िए से तौहीद, सब्र, अल्लाह पर भरोसा, रसूलों की इताअत और गुनाहों से बचने की अहमियत मालूम होती है।

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