आज एक बड़ा सवाल हमारे सामने खड़ा है —
अगर Mazaar par haazri se mushkil ka hal नहीं होता, तो वहां इतनी भीड़ क्यों होती है?
लोगों का यह मानना है कि मजार पर जाने, चादर चढ़ाने या मन्नत मांगने से उनकी दुआ कबूल होती है। बेशक कबूल होती है, वरना इतनी बड़ी भीड़ नहीं होती यहाँ। लेकिन क्या यह अकीदा कुरान और सुन्नत से साबित है?
आख़िर क्या वजह है कि Mazaar par haazri se mushkil ka hal हो जाता हैं ? क्या आप ने इस पर कभी ग़ौर ओ फ़िक्र किया है?
मज़ारों और दरगाहों पर उमड़ती भीड़ एक बड़ा सवाल खड़ा करती है – क्या वाक़ई वहाँ जाने से मुश्किलें हल हो जाती हैं और हो जाती भी हैं तो कैसे?
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| Mazaar par haazri ko mushkil ka hal samajhna Islam ki taleem ke khilaf hai. |
जब इंसान परेशान होता है
इंसान जब परेशानियों में घिर जाता है, तो उसकी नज़रें किसी सहारे की तलाश करती हैं। बहुत से लोग यह समझते हैं कि मज़ारों पर हाज़िरी देने , मज़ार पर जाने,मज़ार पर मन्नत माँगने से उनकी दुआ कबूल होती है और समस्याओं का हल निकलता है। लेकिन इस सोच ने इंसान को तौहीद (एक अल्लाह पर ईमान) से दूर कर दिया और उसे ऐसे रास्ते पर डाल दिया जो सीधा शिर्क तक पहुँचा देता है।
असल हक़ीक़त यह है कि खुशी हो या ग़म, बीमारी हो या शिफ़ा, ताक़त हो या कमजोरी – सब कुछ सिर्फ़ अल्लाह के हाथ में है। अगर वाकई Mazaar par haazri se mushkil ka hal होता तो सबसे पहले नबी ﷺ के क़ब्र-ए-मुबारक पर ऐसा अमल सहाबा करते, क्यूंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के क़बर ए मुबारक से बढ़ कर दुनिया में कोई क़बर नही है और न ही आप ﷺ से बढ़ कर दुनिया में कोई मोअ़ज्जी़ज़ और फ़जी़लत वाली जा़त है! लेकिन पूरी हदीस और इस्लामी इतिहास इसका कोई सबूत पेश नहीं करता।
- 🛑 जब ऐसे मुबारक जगह पर ऐसा करने का सहाबा या हदीस की किताबों से कोई सबूत नहीं मिलता तो फिर आ़म कब्रों और मजा़रों की क्या हैसीयत !!!!!
एक मोमिन का सही अकीदा क्या है?
एक सच्चा मोमिन यह मानता है:खुशी और ग़म, बीमारी और शिफ़ा, तंगी और आसानी — सब कुछ सिर्फ़ अल्लाह के हाथ में है किसी पीर, बुज़ुर्ग के पास या Mazaar par haazri se mushkil ka hal नहीं होता है।
📖 सूरह अल-नम्ल (27:62)
“कौन है जो बेकरार की पुकार सुनता है और उसकी तकलीफ दूर करता है?”
📖 सूरह अश-शूरा (42:30)
“जो मुसीबत तुम्हें पहुँचती है वह तुम्हारे अपने हाथों का किया हुआ है।”
📖 सूरह अश-शुअरा (26:80)
“और जब मैं बीमार होता हूँ तो वही मुझे शिफा देता है।”
मजारों की भीड़ की असली वजह क्या है? आइए समझें!
इंसान जब भी परेशान होता है तो किसी न किसी सहारे की तलाश ज़रूर करता है।और ऐसे में अपनी परेशानियों से निजात के लिए मजारों, दरबारों और पीर बुर्जुगों की तरफ़ रुख़ करता है औरशैतान इसी कमजोरी का फायदा उठाता है।
📖 सूरह अल-आराफ (7:16-17)जब इंसान अल्लाह को छोड़कर गैर-अल्लाह से उम्मीद जोड़ता है, तो यहीं से शिर्क की शुरुआत होती है।
शैतान ने कहा: “मैं तेरे सीधे रास्ते पर बैठूँगा और आगे-पीछे, दाएं-बाएं से आऊंगा।”
शैतान का इंसानों का गुमराह करना
जब शैतान को जन्नत से निकला गया तो उसने इंसान को गुमराह करने की ठान ली। क्या कहा उसने इसको ग़ौर से पढ़ें और समझें।
- उसने कहाः अगर तू मुझको क़यामत के दिन तक मोहलत दे तो मैं थोड़े लोगों के सिवा उसकी तमाम औलाद को तेरे रास्ते से भटकाऊंगा!
- अल्लाह ने फ़रमाया, “अच्छा तो जा, इनमें से जो भी तेरी पैरवी करें, तुझ समेत उन सबके लिये जहन्नम ही भरपूर बदला है!
- उन में से जिस किसी पर तेरा बस चले उस के क़दम अपनी आवाज़ से उखाड़ दे उन्हें बहका दे। और उन पर अपने सवार और अपने प्यादे (पैदल सेना) चढ़ा ला। और माल और सन्तान में भी उन के साथ साझा लगा। और उन से वादे कर!"
फ़िर अल्लाह फरमाता है !
निश्चय ही जो मेरे (सच्चे) बन्दे हैं उन पर तेरा कुछ भी ज़ोर नहीं चल सकता।" तुम्हारा रब इस के लिए काफ़ी है कि अपना मामला उसी को सौंप दिया जाए!(Surah Bani israeel Ayat 62 se 65)
👉 और आज इंसानों की अक्सरियत गुनाहों में डूबी हुई है और शैतान के बहकावे पर हर बुराई में डूबी हुई है और इन तमाम बुराईयों या गुनाहों में सबसे बड़ी गुनाह अल्लाह के साथ किसी और को साझा करना या शिर्क करना है जिसकी माआ़फ़ी नही और अगर इंसान बिना तौबह किए मार गया तो सीधा जहन्नम/नर्क में जायेगा!
सही राह छोड़ने वालों को अल्लाह का पैग़ाम
मगर जो शख़्स रसूल की मुख़ालिफ़त करेगा हालाँकि उस पर राह वाज़ेह हो चुकी है और ईमान वालों के रास्ते के सिवा किसी और रास्ते पर चलेगा तो हम उसको उसी तरफ़ चलाएंगे जिधर वह ख़ुद फिर गया और उसको जहन्नम में दाख़िल करेंगे और वह बुरा ठिकाना है।!(सूरह अल-निसा: 115)
👉 यह हक़ीक़त में ईमान की परीक्षा है और यह एक ऐसा मुआ़मला है जो गुमराह होने वाले की रस्सी को ढीला कर देता है। अल्लाह उन्हें गुमराही में खुला छोड़ देता है और वे उसी राह में गुमराह हो जाते हैं।
शैतान कैसे गुमराह करता है?
और जब अल्लाह किसी को छोड़ दे तो वह अल्लाह का बंदा कहां रहा, वह शैतान के हमराह हो जाता है। और जब इंसान शैतान के बहकावे में होता है तो शैतान कैसे गुमराह करता है आइए एक हदीस से समझें
हज़रत खालिद बिन वलीद (रजी़ः) की घटना इसका खुला सबूत है:
जब वह नबी (ﷺ) के आदेश से ताईफ़ के मशहूर आस्ताने 'उज्जा़' को ध्वस्त कर के और उसके तीन पेड़ों को काट कर वापस आए। तब नबी (ﷺ) ने कहा: "ऐ खालिद! तुम फिर से जाओ तुमने अभी तक कुछ भी नहीं किया है। हजरत खालिद (आरए) फिर से तलवार लेकर गए तो आस्ताने के स्थान पर , उन्होंने ने एक महिला को नंगे और बिखरे हुए बालों के साथ देखा। जो अपने सिर पर मिट्टी डाल रही थी, तो हज़रत खालिद (R.A.) ने तलवार के वार से उसे दो टुकड़ों में काट दिया। फिर नबी (ﷺ) को आ कर यह घटना बताई, तो उन्होंने (S.A.W.) ने कहा: "यह महिला (शैतान) उज़्ज़ा है, जो लोगों की इच्छाओं को पूरा करती है !(तफ़सीर इब्न कथिर)
एक और मिसाल हदीस से
हज़रत अब्दुल्ला बिन मसूद की पत्नी सैय्यदा ज़ैनब की आंख में दर्द था, और वह एक यहूदी से दम यानी झाड़ फूंक करवाती तो ठीक हो जातीं।" जब हज़रत अब्दुल्ला को पता चला, तो उन्होंने कहा, "यह शैतान की करतूत है। जब तू यहूदी से दम करवाती है तो वह आँख को तकलीफ़ नही पहुंचाता और जब दम करवाना छोड़ देती है तो वह आँख को छू कर दर्द पैदा करता है। इसलिए, इसे यहूदी से दम करवाने के बजाय, मसनून दम किया करो
सोचने वाली बात है की:
Note:
अल्लाह सुबहा़न व तआ़ला की तरफ़ से हर बीमारी की शिफा और मुुश्किल का हल है
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Dua sirf Allah se maangi jati hai, qabr se madad talab karna shirk ka sabab ban sakta hai |
तौहीद इस्लाम की बुनियाद है और शिर्क सबसे बड़ा गुनाह।
इस्लाम हमें साफ़ तौर पर सिखाता है कि शिफ़ा देने वाला, मुश्किलें दूर करने वाला और हालात बदलने वाला सिर्फ़ अल्लाह सुब्हानहु व तआला है।
लेकिन अफ़सोस की बात है कि कुछ लोग यह समझ लेते हैं कि मज़ार पर हाज़िरी से मुश्किल का हल हो जाता है, या वहाँ मन्नत मांगने से बीमारी की शिफ़ा मिलती है। इसी ग़लत सोच की वजह से इंसान धीरे-धीरे शिर्क अकबर में फँस जाता है।
एक सच्चा मोमिन यह यक़ीन रखता है कि अल्लाह सुबहा़न व तआ़ला की तरफ़ से हर बीमारी की शिफा और मुुश्किल का हल है —सब कुछ अल्लाह ही के हाथ में है।
बीमारी दूर करने वाला, परेशानियों से निकालने वाला और ज़रूरतें पूरी करने वाला कोई और नहीं, सिर्फ़ अल्लाह है। बस सबर कीजिए हर चीज़ का वक्त है, वक्त पर सब कुछ होता है हमारे चाहने से सब नहीं होगा।
👉 अब ज़रा सोचिए और ग़ौर कीजिए:जो लोग सिर्फ़ अल्लाह से माँगते हैं, जो मज़ारों और दरगाहों पर जाकर मन्नत नहीं मानते —
- क्या वे भूखे सोते हैं?
- क्या वे बेऔलाद ही मर जाते हैं?
- क्या उन्हें कभी बीमारी से शिफ़ा नहीं मिलती?
- क्या वे ज़िंदगी की ज़रूरतें पूरी नहीं कर पाते?
क्योंकि देने वाला एक ही है — अल्लाह।
जब मज़ारों पर हाज़िरी देने वालों और न देने वालों के हालात में कोई बुनियादी फ़र्क़ नहीं है,तो फिर क्यों अल्लाह की कमज़ोर मख़लूक़ को शरीक ठहराकर
अपनी आख़िरत को ख़तरे में डाला जाए?
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: अल्लाह सुबहा़न व तआ़ला ने कोई ऐसी बीमारी नाजिल नही फरमाई जिसकी शिफा न उतारी हो? (बुखारी हदीसः 5678)
📌 निजात तौहीद में है, और सलामती सिर्फ़ अल्लाह से माँगने में।
🕌 मंदिरों में भी मांगने वालों की मुरादें पूरी होती हैं — क्यों?
किसी जगह पर मुराद का पूरा हो जाना, उस जगह के मुक़द्दस या बरकत वाला होने की दलील नहीं बनता।
📖 सूरह अल-बक़रह: 102 में अल्लाह फरमाता है
और वे उस चीज़ के पीछे पड़ गए जो शैतानों ने सुलैमान के राज में पढ़ा था… और वे जादू सीखते थे…और उन्होंने जान लिया था कि जो इसे खरीदेगा, उसके लिए आख़िरत में कोई हिस्सा नहीं है…”
नबी ﷺ ने फ़रमाया:
सात तबाह करने वाले गुनाहों से बचो।”सहाबा ने पूछा: वे क्या हैं?
आपने फ़रमाया:
अल्लाह के साथ शिर्क करना, जादू करना…”
(सहीह बुख़ारी: 2766, सहीह मुस्लिम: 89)
इस आयत से साफ़ साबित होता है कि
✔ जादू शैतानी अमल है
✔ जादू सीखना और करना आख़िरत की तबाही का सबब है
✔ जादू से नुक़सान या फ़ायदा होना, उसके जायज़ होने की दलील नहीं
जादू से फ़ायदा मिल जाना — दलील नहीं
वे उससे लोगों के बीच जुदाई पैदा करते थे…और वे अल्लाह के हुक्म के बग़ैर किसी को नुक़सान नहीं पहुँचा सकते थे।”📌 सबक़:
(सूरह अल-बक़रह: 102)
अगर जादू से कभी कोई असर दिख भी जाए,तो वह अल्लाह की इजाज़त से इम्तिहान होता है,ना कि जादू के सही होने की दलील।
तौहीद और शिर्क के बीच फ़र्क़ न कर पाना:
इसी तरह किसी काम से फ़ायदा मिल जाना, उसे सही साबित नहीं करता। लोगों का अच्छा गुमान, भावना या तजुर्बा — हराम को हलाल और कुफ़्र को ईमान नहीं बना सकता।
इसी हक़ीक़त को क़ुरआन यूँ बयान करता है:
कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अल्लाह के सिवा दूसरों को उसका साझी बना लेते हैं और उनसे वैसी ही मोहब्बत करते हैं जैसी मोहब्बत अल्लाह से होनी चाहिए। जबकि ईमान वाले अल्लाह से सबसे ज़्यादा मोहब्बत करते हैं…”अगर मजारों पर हाज़िरी देकर मुश्किलों का हल मिलना दीन का अहम हिस्सा होता, तो इतनी बड़ी बात क़ुरआन में साफ़ तौर पर बयान की जाती। मगर पूरे क़ुरआन में कहीं भी क़ब्रों से फ़ैज़, शिफ़ा या मदद माँगने का कोई सबूत मौजूद नहीं है।
(सूरह अल-बक़रह: 165)
तो फिर सवाल यह है:
जब क़ुरआन और सुन्नत से इसकी कोई दलील नहीं मिलती, तो इसका स्रोत क्या है?
🤲 अल्लाह सुब्हानहु वा तआला से दुआ है कि वह हमें सही अकी़दे की समझ अता फरमाए, तौहीद पर साबित क़दम रखे, शिर्क और बिदअत से बचाए और हमारी आख़िरत को सँवार दे।
आमीन या रब्बुल आलमीन।
Conclusion:
अल्लाह ने इंसान को आज़माइश के लिए पैदा किया है।सबसे बड़ी परीक्षा यह है:
क्या इंसान तौहीद पर कायम रहता है या शिर्क की तरफ झुक जाता है?
याद रखिए —
- न मजार शिफा देता है
- न दरगाह मुसीबत टालती है
- देने वाला सिर्फ़ अल्लाह है
🤲 या अल्लाह हमें शिर्क और बिदअत से बचा और सही राह पर चलने की तौफीक़ आता फरमा।
आमीन या रब अल आलेमीन।
FAQ:
Ques: 1-मजार या दरगाह पर जाना कैसा है ?
Ques: 2-मजार पर दुआ मांगना !
Ques: 3-वसीला क्या है या वसीले से दुआ मांगना ?




1 Comments
Masha Allah
ReplyDeleteplease do not enter any spam link in the comment box.thanks