Shab e Baraat एक ऐसा नाम है जिसे सुनते ही आम लोगों के ज़हन में हलवा, अच्छे पकवान, रात को जगना, इबादत करना, आतिशबाजी करना और क़ब्रस्तान जाना ये मंज़र घूमने लगता है। लेकिन Shab e Baraat Ki Haqeeqat क्या है इससे इंसानों की अक्सरियत अंजान है। Shab e Baraat Ki Haqeeqat जानने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि “शब-ए-बारात” का अर्थ क्या है और क्या यह नाम क़ुरआन व हदीस में मौजूद है या नहीं।
- शब फ़ारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ रात होता है
- बराअत अरबी भाषा का शब्द है, जिसका क़ुरआनी अर्थ है:
इसलिए “शब-ए-बारात” नाम की कोई रात न क़ुरआन में है और न ही सहीह हदीसों में।
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Shab e Barat – Islam mein haq aur bidat ka wazeh farq |
📖 क़ुरआन में “बराअत” शब्द का अर्थ
क़ुरआन में जहाँ-जहाँ बराअत / तबरा शब्द आया है, वहाँ उसका अर्थ मग़फ़िरत नहीं बल्कि बेज़ारी है:🔹 सूरह तौबह (1)
“अल्लाह और उसके रसूल की ओर से उन मुश्रिकों से बेज़ारी का ऐलान है जिनसे तुमने समझौते किए थे।”🔹 सूरह अल-अनआम (78)
“ऐ मेरी क़ौम! जिन चीज़ों को तुम अल्लाह का साझी ठहराते हो, मैं उनसे बेज़ार हूँ।”🔹 सूरह तौबह (114)
जब इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) पर यह स्पष्ट हो गया कि वह अल्लाह का दुश्मन है, तो वे उससे बेज़ार हो गए।”👉 इससे साफ़ होता है कि बराअत का अर्थ ‘मुक्ति की रात’ नहीं बल्कि ‘बेज़ारी’ है।
हदीसों में इस रात का वास्तविक नाम
हदीसों में “शब-ए-बारात” नाम से कोई ज़िक्र नहीं मिलता।हदीसों में इस रात को कहा गया है:
लैलतुन-निस्फ़ मिन शाबान(यानि शाबान की 15वीं रात)
हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा फ़रमाती हैं:
“मैंने नबी ﷺ को शाबान के अलावा किसी महीने में इतना ज़्यादा रोज़े रखते हुए नहीं देखा। आप ﷺ शाबान के पूरे (अकसर) रोज़े रखते थे।”
📝 वज़ाहत:
इस हदीस से साफ़ मालूम होता है कि नबी ﷺ शाबान में बहुत ज़्यादा नफ़्ली रोज़े रखते थे, ताकि रमज़ान की तैयारी हो सके और इबादत की आदत मज़बूत हो।
नबी ﷺ की सुन्नत पर अमल करते हुए नफ़्ली रोज़े, तौबा, ज़िक्र और रमज़ान की तैयारी करना ही सबसे बेहतर तरीका है।
शिया रावाफ़िज़ की बिदअ़त और ख़ुराफ़ात
इतिहास बताता है कि “शब-ए-बारात” से जुड़ी कई रस्में:- हलवा पकाना
- दीपक जलाना
- आतिशबाज़ी
- कब्रों पर सजावट
- अपने ग़ायब इमाम की पैदाइश का जश्न
📌 पाँचवीं सदी हिजरी से पहले किसी भी भरोसेमंद इस्लामी किताब में “शब-ए-बारात” शब्द नहीं मिलता।
क्या सूरह दुख़ान शब-ए-बारात की दलील है?
अक्सर सूरह दुख़ान (आयत 3-6) पेश की जाती है:बेशक हमने इसे एक बड़ी ख़ैर और बरकतवाली रात में उतारा है, बेशक हम डर सुनाने वाले हैं, इसमें बांट दिया जाता है हर हि़क्मत वाला काम, हमारे पास के हु़क्म से,बेशक हम भेजने वाले वाले हैं,तुम्हारे रब की तरफ से रह़मत,बेशक वही सुनता जानता है ! (सुरत दुखा़न:आयत:3-6)यह तर्जमा अह़मद रज़ा ख़ान बरेलवी का है ताकि शब-ए-बारात मनाने वालों को कोई संदेह, शक न हो।
इन आयतों में 4 बातों का जिक्र किया गया है,
- 1. यह रात बरकत वाली रात है।
- 2. इस मुबारक रात में क़ुरान नाजिल किया गया।
- 3. इस रात में सभी हुकमों का फ़ैसला किया जाता है।
- 4. इस रात में रहमत उतरती है।
🔍 क़ुरआनी तहक़ीक़:
सूरह दुख़ान मक्की है जो मेअ़राज से पहले नाजि़ल हुई।- पांच वक्त की नमाज़ फ़र्ज़ नहीं थी
- 2 हिजरी के बाद रोज़ा फर्ज हूवा
- और ना ही मक्का में बकी़अ नाम का कोई कब्रिस्तान था।
👉इन आयतों का शाबान या कब्रिस्तान से कोई संबंध नहीं
🌙क़ुरआन की वज़ाहत: यह बरकत वाली रात किस महीने में है?
बेशक हमने इसे क़द्र की रात में उतारा है, और क्या आप जानते हैं कि क़द्र की रात क्या है, क़द्र की रात एक हज़ार महीनों से बेहतर है, इसमें फ़रिश्ते और जिब्रील अपने रब के हु़क्म से हर काम के लिए उतरते हैं , वह सलामती है सुबह चमकने तक!(सूरह अल-क़द्र)
इन आयतों में भी इन अमूर या मुद्दों का जिक्र किया गया है.
👉1. इसी रात में कुरान नजिल किया गया👉2. इस रात में सभी मामलों का फैसला किया जाता है।
👉3. इस रात में फ़रिश्ते और जिब्राईल (रहमत) उतरते हैं।
👉4. इस रात में सुबह होने तक रहमत और सलामती का नजूल होता है।
अब जाहिर सी बात है कि ये एक ही रात का ज़िक्र है और कुरान ने ख़ुद बताया है कि ये रात रमजान में आती है.
“रमज़ान का महीना, जिसमें क़ुरआन उतारा गया।”सूरह अल-बक़रह (185)👉 साफ़ साबित हुआ कि सूरह दुख़ान और सूरह क़द्र दोनों लैलतुल-क़द्र की ओर इशारा करती हैं,
जो रमज़ान में आती है, शाबान में नहीं।
📚 निस्फ़े शाबान से संबंधित एक रिवायत की हक़ीक़त
हज़रत आयशा (रज़ि.) फ़रमाती हैं:एक रात मैंने रसूलुल्लाह ﷺ को अपने बिस्तर पर नहीं पाया।यहां तक सभी लोग तिर्मिज़ी की रिवायत बयान करते हैं, लेकिन इसके बाद इमाम तिर्मिज़ी ने जो फैसला सुनाया, उसे "शीर मादर" समझ कर हज़म कर जाते हैं
मैं बाहर निकली तो देखा कि आप जन्नतुल बक़ी़ में हैं।
आपने फ़रमाया:
‘ऐ आयशा! क्या तुम्हें डर हुआ कि अल्लाह और उसका रसूल तुम पर ज़ुल्म करेंगे?’
फिर आपने फ़रमाया:
‘यह शाबान की आधी रात है। अल्लाह तआला इस रात बनी कल्ब की भेड़ों के बालों से ज़्यादा लोगों को माफ़ कर देता है।’” (जामे तिर्मिज़ी, हदीस: 739 | इब्न माजा: 1389)
लेकिन अहम बात:
इमाम तिर्मिज़ी खुद फ़रमाते हैं:“इस बाब में बयान की गई रिवायतें मज़बूत नहीं हैं।”
👉 इसलिए:
- इससे कोई खास नमाज़
- कोई खास रोज़ा
- कोई खास अमल
♦️इब्न अब्बास (रज़ि.) से जो क़ौल बयान किया जाता है:
“फ़ीहा युफ़रकु कुल्लु अम्रिन हकीम…”
🔍 मुहद्दिसीन का फ़ैसला:
इमाम ज़हबी → मुनकर रिवायत
इमाम इब्न अदी → ग़ैर-क़ाबिले-क़ुबूल
👉 इसका इब्न अब्बास (रज़ि.) से कोई सहीह संबंध नहीं।
Conclusion:
शब-ए-बारात न कोई ईद है
न कोई जश्न
न कोई ख़ास इबादत की रात
👉 इबादत और फ़ैसलों की रात लैलतुल-क़द्र है,जो रमज़ान के आख़िरी अशरे में आती है।
अगर सही दीन आम लोगों तक पहुँचा दिया जाए:
न कब्रिस्तान सजेंगे
न हलवा-बिरयानी
न फ़िज़ूल रस्में
Frequently Asked Question:
Faqs: Voice Search)
Q1: क्या शब-ए-बारात की रात क़ुरआन नाज़िल हुआ?
नहीं, क़ुरआन लैलतुल-क़द्र में नाज़िल हुआ जो रमज़ान में होती है।
Q2: क्या इस रात अल्लाह पहले आसमान पर आते हैं?
अल्लाह हर रात पहले आसमान पर नुज़ूल फ़रमाते हैं (बुख़ारी, मुस्लिम)।
Q3: क्या इस रात उम्र, रिज़्क़ और मौत लिखी जाती है?
नहीं, यह फ़ैसले लैलतुल-क़द्र में होते हैं।
Q4: क्या मुर्दों की रूहें इस रात घर आती हैं?
नहीं, क़ुरआन के अनुसार रूहें बरज़ख़ में रहती हैं (सूरह मोमिनून 99-100)।
Q5: क्या कोई खास नमाज़ या रोज़ा है?
नहीं, कोई भी खास अमल सहीह हदीस से साबित नहीं।



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