इस्लाम ने समाज में बराबरी, रहम और मदद का जो बेहतरीन निज़ाम दिया है, उसका अहम हिस्सा Zakaat Aur Sadqa e Fitr हैं। ये दोनों सिर्फ़ ग़रीबों की मदद, दिलों की सफ़ाई और समाज की इस्लाह का ज़रिया हैं। जिसके तहत अपने जमा किए हुवे माल का एक ख़ास हिस्सा गरीबों और मिस्किनों की मदद के लिए निकाला हर साहब ए निसाब पर फर्ज़ होता है ! और सदका ए फि़तर रोजे़दार को बेहूदगी और बेहयाई बातों से पाक करने के लिए और मोहताजों के खाने का इंतज़ाम करने के लिए फर्ज़ किया गया!
इस लेख में हम क़ुरआन और सहीह हदीस की रोशनी में आसान हिंदी में जानेंगे:
- ज़कात और सदक़ा‑ए‑फ़ित्र क्या है
- ज़कात का निसाब और शर्तें
- सदक़ा‑ए‑फ़ित्र के अहकाम
- आम मसाइल और ग़लतफ़हमियाँ
ज़कात क्या है? (Zakaat Kya Hai)
ज़कात इस्लाम का तीसरा स्तंभ है। हर उस मुसलमान पर ज़कात फ़र्ज़ है जो निसाब का मालिक हो।क़ुरआन से दलील
“नमाज़ क़ायम करो और ज़कात अदा करो।”
📚 (सूरह अल‑बक़रा: 43)
ज़कात का मतलब है माल को पाक करना और अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ उसका एक हिस्सा ज़रूरतमंदों तक पहुँचाना।
💰 ज़कात का निसाब क्या है? (Nisab of Zakaat)
निसाब की मात्रा
- सोना: 7.5 तोला (87.48 ग्राम)
- चाँदी: 52.5 तोला (612.36 ग्राम)
- नक़द, व्यापार का माल: चाँदी के निसाब के हिसाब से
🕰️ ज़कात फ़र्ज़ होने की शर्तें
- ✔ मुसलमान होना
- ✔ आज़ाद होना
- ✔ निसाब का मालिक होना
- ✔ एक साल (हौल) पूरा होना
👥 ज़कात किन्हें दी जा सकती है?
क़ुरआन में ज़कात के हक़दारों का ज़िक्र बड़े वाज़ेह अंदाज़ में किया गया है। ज़कात का सबसे पहला और अहम हक़ सगे संबंधियों का है, उसके बाद समाज के दूसरे ज़रूरतमंद तबक़े आते हैं।
🔹 ज़कात पर पहला हक – सगे संबंधियों का
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
“नेकी यह नहीं कि तुम अपने चेहरे पूरब या पश्चिम की ओर फेर लो, बल्कि नेकी यह है कि आदमी अल्लाह पर, आख़िरत के दिन पर… और माल को उसकी मुहब्बत के बावजूद रिश्तेदारों, यतीमों, मिस्कीनों, मुसाफ़िरों, सवाल करने वालों और ग़ुलामों को छुड़ाने में ख़र्च करे…”
📚 (सूरह अल-बक़रह: 177)
इस आयत से मालूम होता है कि ज़कात और ख़ैरात में क़रीबी रिश्तेदार, पड़ोसी और ज़रूरतमंद दोस्त सबसे ज़्यादा हक़दार हैं।
🔹 ज़कात के दूसरे हक़दार
ज़कात तो सिर्फ़ फ़क़ीरों, मिस्कीनों, ज़कात वसूल करने वालों, दिल जोड़ने के लिए, ग़ुलामों को आज़ाद कराने, क़र्ज़दारों, अल्लाह के रास्ते में और मुसाफ़िरों के लिए है।”
📚 (सूरह तौबा: 60)
एक अहम सामाजिक मसला – गरीब रिश्तेदारों की ग़ैरत
इस्लामी हिकमत भरा तरीक़ा
- अपने गरीब रिश्तेदारों से रमज़ान के अलावा भी संपर्क रखें
- साल के बाक़ी 11 महीनों में उनसे मिलते रहें
- उनकी ज़रूरतों को समझकर सीधे उनकी मदद करें
मदद के कुछ तरीक़े:
- उनकी देनदारी चुका देना
- बच्चों की पढ़ाई की ज़िम्मेदारी उठाना
- बेटी की शादी में सहयोग करना
- मकान की मरम्मत या ज़रूरी काम करा देना
🕊️ यही इस्लाम की खूबसूरती और समाजी इंसाफ़ है।
ज़कात किन्हें नहीं दी जा सकती?
❌ माँ‑बाप, दादा‑दादी
❌ औलाद और पोते‑पोतियाँ
❌ शौहर‑बीवी एक‑दूसरे को
❌ मालदार व्यक्ति
जकात न देने वालों का अंजान
अबू हुरैरा रजी: अल्लाहू अन्हु से रिवायत है की:रसूल-अल्लाह सललल्लाहू अलैही वसल्लम ने फ़रमाया की जिसे अल्लाह ने माल दिया और उसने उसकी ज़कात अदा नही की तो क़यामत के दिन उसका माल निहायत ज़हरीले गंजे साँप की शकल इखतरियर कर लेगा उसकी आँखों के पास दो सियाह नुक़ते होंगे जैसे साँप के होते हैं फिर वो साँप उसके दोनो जबड़ो से उसे पकड़ लेगा और कहेगा की मैं तेरा माल और ख़ज़ाना हूँ👉 क़ुरआन में शब्द "ज़कात" 33 बार इस्तेमाल हुआ है और ज़्यादातर नमाज़ के साथ साथ
(सही बुखारी जिल्द 2, हदीस 1403)
ज़कात का ज़िक्र हुआ है।
🌾 सदक़ा‑ए‑फ़ित्र क्या है?
सदक़ा‑ए‑फ़ित्र वह सदक़ा है जो रमज़ान के आख़िर में हर मुसलमान पर वाजिब होता है, ताकि रोज़ों की कमियों की भरपाई हो और ग़रीब भी ईद की ख़ुशी में शामिल हो सकें।सदका ए फि़तर रोज़ादार को बेहूदगी और बेहयाई बातों से पाक करने के लिए और मोहताजों के खाने का इंतज़ाम करने के लिए फर्ज़ किया गया। जो ईद की नमाज़ से पहले सदका़ करे तो ये मकबूल सदका़ ए फि़तर है और जो नमाज़ के बआ़द करे वो आ़म सदका़ होगा। (अबु दाऊद; 1611)
⚖️ सदक़ा‑ए‑फ़ित्र की मात्रा (Nisab of Fitr)
- गेहूँ: लगभग 1.75 किलो
- जौ / खजूर / किशमिश: लगभग 3.5 किलो
- या इसकी क़ीमत नक़द
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आ़म सदका से मुतल्लिक़
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायामिस्कीन यानी ग़रीब गुरबा को सदका़ देना सिर्फ सदका़ है और रिश्तेदार को सदका़ देने में दो भलाइयां हैं। यह सदका़ भी है और सिला रहमी भी। (तिर्मज़ी :658)एक और हदीस में है की
नबी ने फ़रमाया अल्लाह उसका सदका़ कबूल नहीं फ़रमाता जिसके रिश्तेदार को उसकी हाजत हो और वो उन्हें छोड़ कर औरों को सदका़ दे। कसम उस जात की जिसके हाथ में मेरी जान है , अल्लाह कयामत के दिन उसपर नज़र न फ़रमाये (मजमूल ज़वाइद लिल्हैसीमी :1335)क़ुरान अल करीम में अल्लाह सुबहा़न व तआ़ला का फ़रमान है:
ये सदक़े तो अस्ल में फ़क़ीरों और मिसकीनों के लिये हैं और उन लोगों के लिये जो सदक़ों के काम पर मुक़र्रर हो और उनके लिये जिनका मन मोहना हो साथ ही ये गरदनों के छुड़ाने और क़र्ज़दारों की मदद करने में और अल्लाह के रास्ते में और मुसाफ़िर की मदद में इस्तेमाल करने के लिये हैं। एक फ़रीज़ा है अल्लाह की तरफ़ से, और अल्लाह सब कुछ जाननेवाला और गहरी हिक्मत वाला है ! (सुरह तौबा:60)
ज़कात किसे दें और किसे नहीं – नबी ﷺ की रहनुमाई में मुख़्तसर वाज़ेह बात
ज़कात किसे देनी चाहिए?
भीख माँगने के बजाय मेहनत की तालीम
नबी करीम ﷺ ने एक भिखारी को भीख देने के बजाय कमाने की तरबियत दी। उसके पास मौजूद मामूली सामान बिकवाकर उससे मेहनत करवाई, ताकि वह सवाल करने से बच जाए। फिर फ़रमाया कि मेहनत से कमाना, भीख माँगने से बेहतर है।
📚 (इब्ने माजाह: 2198)
हमारी ज़िम्मेदारी क्या है?
हमें अपनी ज़कात और सदक़ात से पेशेवर भिखारियों की तादाद बढ़ाने के बजाय लोगों को आत्मनिर्भर बनाना चाहिए। अंधाधुंध भीख देने से समाज में भिखारियों की भीड़ बढ़ती है और इस्लाम की छवि को नुक़सान पहुँचता है।
सही तरीक़ा
- ज़कात ऐसे ज़रूरतमंदों को दें जिन्हें आप जानते हों
- मदद को इज़्ज़त और हिकमत के साथ दें
- क़र्ज़ चुकाने, पढ़ाई, इलाज या रोज़गार में सहायता करें
- भीख की आदत को बढ़ावा न दें
👉 ज़कात और सदक़ा का मक़सद लोगों को मज़बूत बनाना है, भिखारी बनाना नहीं।
अगर हम समझदारी से ज़कात दें, तो हमारा समाज ग़ुरबत और भिखारियों की ज़िल्लत से पाक हो सकता है।
🕊️ आइए, इस पैग़ाम को आम करें और समाज में सही इस्लाही सोच पैदा करें।
निष्कर्ष (Conclusion)
ज़कात और सदक़ा‑ए‑फ़ित्र सिर्फ़ माल देने का नाम नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने और समाज को पाक करने का अमल है। जो मुसलमान इन अहकाम को सही तरीक़े से अदा करता है, वह अल्लाह की रहमत और समाज की दुआओं का हक़दार बनता है।
🕊️ माल की पाकीज़गी और समाज की ख़ुशहाली का रास्ता — ज़कात और सदक़ा‑ए‑फ़ित्र।
FAQs:
Que: ज़कात और फि़तरा में क्या अंतर है ?
Ans: ज़कात इस्लाम के ख़ास फर्ज़ों में से एक अहम फ़र्ज़ है जिसके तहत अपने जमा किए हुवे माल का एक खास हिस्सा गरीबों और मिस्किनों की मदद के लिए निकाला फ़र्ज़ है ! और सदका ए फि़तर रोजे़दार को बेहूदगी और बेहयाई बातों से पाक करने के लिए और मोहताजों के खाने का इंतज़ाम करने के लिए फर्ज़ किया गयाQue: एक आदमी का फितरा कितना होता है?
Ans: एक आदमी का फि़तरा तक़रीबन 2.5 किलोग्राम होता है और जो अनाज आप खाते है वैसा ही अनाज दिया जाता है !Que: कौनसा सदका सबसे अफ़ज़ल है ?
Ans: नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया मिस्कीन यानी ग़रीब गुरबा को सदका़ देना सिर्फ सदका़ है और रिश्तेदार को सदका़ देने में दो भलाइयां हैं। यह सदका़ भी है और सिला रह़मी भी।Que: कौनसा सदका़ कबूल है ?
Ans: जो कोई ईद की नमाज़ से पहले सदका़ करे तो ये मक़बूल सदका़ ए फि़तर है और जो नमाज़ के बआ़द करे वो आ़म सदका़ होगा।Que: ज़कात कब फर्ज है?
Ans: ज़कात हर साहिबे निसाब पर फ़र्ज़ है, जिसके पास साढ़े बावन तोला चांदी या साढ़े सात तोला सोना या इतनी रक़म हो उसे ज़कात देना ज़रूरी है !Que: मुस्लिम लोग ज़कात क्यों देते हैं?
Ans: क्योंकि ज़कात फ़र्ज़ है जो ज़कात न देगा ज़कात अदा नही करेगा तो क़यामत के दिन उसका माल निहायत ज़हरीले गंजे साँप की शकल इख़्तियार कर लेगा और उसे डसेगाQue: ज़कात कैसे निकाला जाता है?
Que: हम फि़तरा क्यों देते हैं?
Ans: फि़तर का मकसद रोज़े की हालत में सरज़द होने वाले गुनाहों और कमी कोताही से ख़ुद को पाक करना होता है इसी लिए फितरा देना चाहिए!Que. क्या ज़कात नक़द दी जा सकती है?
जवाब: हाँ, ज़कात नक़द देना जायज़ है, बल्कि कई बार ज़्यादा फ़ायदेमंद होता है।
Que. क्या सदक़ा‑ए‑फ़ित्र बच्चों पर भी है?
जवाब: हाँ, नाबालिग बच्चों की तरफ़ से उनके वालिद अदा करेंगे।
Que. क्या रिश्तेदारों को ज़कात दी जा सकती है?
जवाब: हाँ, ग़रीब रिश्तेदारों को ज़कात देना ज़्यादा सवाब का काम है।


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