Namaz Mein Rafa al-Yadain | Haath Uthane Ka Sunnat Tariqa Aur Daleel

"सुन्नत के खिलाफ़ कोई भी अमल कबूल नहीं होता है! अब जो लोग अपने अकाबिरों के कहने पर चल कर कुरान और हदीस को छोड़ कर अमल करेंगें तो वह सब का सब बर्बाद है"

नमाज़ इस्लाम का सबसे अहम स्तंभ है। नमाज़ का हर अमल हमें उसी तरीके से अदा करना चाहिए जैसा कि अल्लाह के रसूल ﷺ ने सिखाया। इन्हीं मसाइल में एक अहम मसला है Namaz Mein Rafa al-Yadain — यानी नमाज़ में दोनों हाथ उठाना।

कुछ लोग इस सुन्नत को अपनाते हैं और कुछ इसे छोड़ देते हैं, बल्कि कुछ लोग इसका मज़ाक भी उड़ाते हैं। इस लेख में हम कुरआन और सही हदीस की रोशनी में इस मसले को समझेंगे और “बगलों में जूते रखने” वाली मशहूर मनगढ़ंत रिवायत की हक़ीक़त भी जानेंगे।
 
Namaz me haath uthane ka sunnat tareeqa
Nabi ﷺ ka sikhaya tareeqa Rafa al yadain 

हर मुस्लमान रफअ़ अल यदेन के साथ नमाज़ पढ़े
सारे मुहद्दिसीन 
रफअ़ अल यदैन किया करते थे किसी को इस सुन्नत से इख़्तिलाफ़ नहीं था। 




रफ़ा अल-यदैन क्या है?

“रफ़ा” का मतलब है उठाना और “अल-यदैन” का मतलब है दोनों हाथ।
यानी नमाज़ में खास मौकों पर दोनों हाथ उठाना।

हदीस से रफ़ा अल-यदैन की दलील

1️⃣ तकबीर-ए-तहरीमा के वक्त

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ि.) बयान करते हैं:
“नबी ﷺ नमाज़ शुरू करते समय अपने दोनों हाथ कंधों तक उठाते थे।”
📚 (सहीह बुखारी: 735, सहीह मुस्लिम: 390)

2️⃣ रुकू में जाने से पहले

“और जब रुकू के लिए तकबीर कहते तो भी हाथ उठाते थे।”
📚 (सहीह बुखारी: 735)

3️⃣ रुकू से उठते समय

और जब ‘समीअल्लाहु लिमन हमिदह’ कहते तो भी हाथ उठाते थे।”
📚 (सहीह बुखारी: 735)
इन हदीसों से साफ साबित होता है कि रफ़ा अल-यदैन नबी ﷺ की सुन्नत है।

क्या रफ़ा अल-यदैन मंसूख हो चुका है?

कुछ लोग कहते हैं कि बाद में यह अमल छोड़ दिया गया था।लेकिन हदीसों से यह साबित है कि नबी ﷺ ने अपनी आखिरी ज़िंदगी तक यह अमल किया।

इमाम बुखारी (रह.) ने इस विषय पर एक अलग किताब लिखी:
“जुज़ रफ़ा अल-यदैन”
जो इस बात की मजबूत दलील है कि यह अमल सुन्नत से साबित है।

नबी ﷺ की वफ़ात के 34 साल बाद भी रफ़अ़ अल-यदैन का सबूत 

यह दावा अक्सर किया जाता है कि रफ़अ़ अल-यदैन बाद के दौर में छोड़ दिया गया था, या यह अमल कुछ समय बाद समाप्त हो गया। लेकिन इतिहास, हदीस और ताबेईन के अमल से यह दावा पूरी तरह ग़लत साबित होता है।

आइए नबी ﷺ की वफ़ात के लगभग 34 वर्ष बाद नमाज़ की वास्तविक स्थिति को देखते हैं — क्या उस समय भी रफ़अ़ अल-यदैन किया जाता था या नहीं?


ताबेईन का अमल — ज़िंदा सुन्नत की गवाही

नाफ़े़ (رحمه الله) एक प्रसिद्ध ताबेई थे और हज़रत अब्दुल्ला बिन उमर (रज़ि.) के ख़ास शागिर्द थे।
उन्होंने इस्लाम क़बूल किया और सहाबा से सीधे इल्म हासिल किया।

ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार:
  • नाफ़े़ ताबेई नबी ﷺ की वफ़ात के क़रीब चौंतीस वर्ष बाद जीवित थे।
  • उनकी जीवनी का उल्लेख तारीख़ खलीफ़ा बिन ख़य्यात,
  • तारीख़ अल-इस्लाम (ज़हबी)
  • और अन्य प्रामाणिक किताबों में मिलता है।

 नाफ़े़ ताबेई की गवाही (सहीह बुख़ारी से)

नाफ़े़ ताबेई बयान करते हैं:

अब्दुल्ला बिन उमर जब नमाज़ शुरू करते, तो तकबीर कहते और अपने दोनों हाथ उठाते थे।
जब रुकू के लिए झुकते, तो भी हाथ उठाते थे।
और जब ‘समीअल्लाहु लिमन हमीदह’ कहते, तो उस समय भी हाथ उठाते थे।
और अब्दुल्ला बिन उमर इस अमल को नबी ﷺ की तरफ़ मंसूब करते थे।”

📚 सहीह बुख़ारी, खंड 1
(तफ़हीमुल बुख़ारी, खंड 1, पृष्ठ 376 भी देखें)

👉 इसका साफ़ मतलब है की नबी ﷺ की वफ़ात के 34 साल बाद भी सहाबी अब्दुल्ला बिन उमर (रज़ि. और उनके शागिर्द ताबेई नाफ़े़ (رحمه الله) रफ़अ़ अल-यदैन पर अमल कर रहे थे।अगर यह अमल मंसूख़ (रद्द) हो चुका होता,तो सहाबी और ताबेई — दोनों इसे जारी न रखते।

यह साफ़ सबूत है कि:
रफ़अ़ अल-यदैन कभी छोड़ा ही नहीं गया।


👉 Nikaah ko Aasan banayen mushkil nahi Yahan Padhen nikaah ke Sunnat Tareeqe se Mutalliq 


Note: सुन्नत के ख़िलाफ़ कोई अमल क़बूल नहीं

दीन में असली कसौटी क़ुरआन और सहीह हदीस है।
किसी बड़े का कहना, किसी मज़हब या परंपरा का हवाला —
अगर वह सुन्नत के ख़िलाफ़ हो, तो वह क़बूल योग्य नहीं।

जो लोग केवल अपने अकाबिर (बड़ों) की बात मानकर
क़ुरआन और सहीह हदीस को छोड़ देते हैं,
वे हक़ से दूर हो जाते हैं — चाहे उनका इरादा कितना ही अच्छा क्यों न हो।

🛑 अब इन हज़रत को देखें तमाम मुहद्दिसीन और शेख़ अब्दुल कादिर जिलानी से रफ़ा अल यादेन साबित करने के बआ़द भी रफ़ा अल यादेन नही करते!👇


 बगलों में बुत रखने” वाली मनगढ़ंत रिवायत की सच्चाई

रफ़अ़ अल-यदैन के बारे में जितनी भी हदीसें मौजूद हैं, वे सभी सहीह हैं। इसके विपरीत, रफ़अ़ अल-यदैन न करने के समर्थन में जो कुछ गिनी-चुनी रिवायतें पेश की जाती हैं, वे या तो ज़ईफ़ हैं या उन पर मुहद्दिसीन ने स्पष्ट रूप से कलाम किया है।
इसके बावजूद, कुछ लोग सच्चाई से हटकर यह दावा कर देते हैं कि सहाबा बगलों के नीचे बुत रखा करते थे, और उन्हीं बुतों के गिरने से बचाने के लिए रफ़अ़ अल-यदैन शुरू हुआ। यह बात न सिर्फ़ बेबुनियाद है, बल्कि अक़्ल और इतिहास — दोनों के ख़िलाफ़ है।

ऐतिहासिक सच्चाई

नमाज़ जमाअत के साथ मदीना मुनव्वरा में फ़र्ज़ हुई, जबकि बुत-परस्ती मक्का में थी।
जहाँ जमाअत से नमाज़ फ़र्ज़ हुई, वहाँ बुत मौजूद ही नहीं थे।
और जहाँ बुत-परस्ती थी, वहाँ अभी जमाअत से नमाज़ फ़र्ज़ ही नहीं हुई थी।

तो फिर यह दावा कैसे सही हो सकता है कि मदीना में जमाअत के दौरान लोग बगलों में बुत रखकर नमाज़ पढ़ते थे?

तर्क की कसौटी पर दावा

मान लीजिए — तर्क के लिए — कि कोई व्यक्ति बगलों में बुत रखता भी था, तो सोचने की बात यह है कि जब वह पहली बार तकबीर-ए-तहरीमा कहते हुए रफ़अ़ अल-यदैन करता, उसी समय वे बुत नीचे गिर क्यों नहीं जाते?

सहीह बुख़ारी की हदीस में आता है कि नबी ﷺ कंधों के बराबर हाथ उठाते थे।
और जो लोग रफ़अ़ अल-यदैन के इंकारी हैं, वे भी कम से कम कानों की लो तक हाथ उठाते हैं।

तो जब पहली बार हाथ उठाए जाते हैं, तब वे कथित बुत साफ़ तौर पर नीचे गिर जाने चाहिए थे।
यह मानना भी तर्कसंगत नहीं कि लोग नमाज़ के लिए आते समय किसी चीज़ से बुतों को चिपकाकर रखते थे।

अहम सवाल

अगर आज यह कहा जाता है कि बुत अब ख़त्म हो चुके हैं, तो फिर तकबीर-ए-तहरीमा में रफ़अ़ अल-यदैन क्यों किया जाता है?
यदि रफ़अ़ अल-यदैन का कारण बुत थे, तो इस पहली तकबीर में भी हाथ उठाना छोड़ देना चाहिए — जबकि कोई ऐसा नहीं कहता।

👉 “बगलों में बुत रखने” वाली बात न तो किसी सहीह हदीस से साबित है,न इतिहास से,न ही अक़्ल और तर्क से।यह सिर्फ़ एक मनगढ़ंत कहानी है, जिसे रफ़अ़ अल-यदैन जैसी साबितशुदा सुन्नत का मज़ाक उड़ाने या उसे कमज़ोर दिखाने के लिए गढ़ा गया है।

दीन का मामला मज़ाक या अफ़वाहों से नहीं, बल्कि कुरआन, सहीह हदीस और ठोस दलील से तय किया जाता है।

बगल में बुत रखने की कहानी:

 

🔎 तहक़ीक़ (जांच):

यह अल्फाज़ किसी भी सहीह हदीस की किताब (बुखारी, मुस्लिम, अबू दाऊद, तिर्मिज़ी आदि) में मौजूद नहीं।
यह रिवायत कमज़ोर (ज़ईफ़) या मनगढ़ंत बताई गई है।
इस तरह की बातें सुन्नत का मज़ाक उड़ाने के लिए फैलायी जाती हैं।

अल्लाह तआला फरमाता है:
“क्या तुम अल्लाह और उसके रसूल का मज़ाक उड़ाते हो?”
📖 (सूरह तौबा: 65-66)
इसलिए हमें चाहिए कि हम सिर्फ सही दलील को अपनाएँ और सुन्नत का सम्मान करें।

 सहाबा का अमल

हज़रत इब्न उमर (रज़ि.) समेत कई सहाबा रफ़ा अल-यदैन करते थे।
इमाम शाफ़ई, इमाम अहमद बिन हम्बल , इमाम बुखारी, इमाम मुस्लिम और बहुत से मुहद्दिसीन ने भी इस सुन्नत को सही माना है। यहां तक के शेख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी भी रफ़ा अल यदैन करते थे दलील देखें।

हज़रत शेख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहिम. का फ़तवा

۞ "हज़रत पीर जिलानी रहीम. फ़र्माते है की तकबीर उला के वक़्त और रूकू में जाते वक़्त और रूकू से उठते वक़्त रफअ़ अल्यदैन करना चाहिए।"

(गुनयतुल तालिबीन)

हज़रत शाह वली उल्लाह साहब रह. फ़र्माते है की "जब रूकू करने का इरादा करे तो रफअ़ अल्यदैन  करे और जब रूकू से सर उठाए, उस वक़्त भी रफअ़ अल्यदैन  करे। मै रफअ़ अल्यदैन  करने वालो को न करने वालो से अच्छा समझता हु क्योंकि रफअ़ अल्यदैन  करने की हदीसें बहुत ज़्यादा है और बहुत सही है।"

(हुज्जतुल्लाहिलबालग़ा भाग-2)


🤲 रफ़ा अल-यदैन का सही तरीका

हाथ कंधों या कानों तक उठाए जाएँ
✔ उंगलियाँ सीधी और क़िबला की तरफ हों
✔ हाथ उठाते समय तकबीर कही जाए

यह तरीका नमाज़ को सुन्नत के अनुसार खूबसूरत बनाता है।


⚖ मतभेद को झगड़ा न बनाएं

यह एक फिकही (इज्तिहादी) मसला है।

जो रफ़ा अल-यदैन करता है वह भी सुन्नत पर है, और जो नहीं करता उसकी नमाज़ भी सही है।

लेकिन किसी सुन्नत का मज़ाक उड़ाना या उसे झुठलाना सही नहीं।



रफ़अ़ अल-यदैन न करने वालों से कुछ आसान सवाल

कुछ लोग कहते हैं कि रफ़अ़ अल-यदैन इसलिए शुरू हुआ क्योंकि लोग बग़लों में बुत रखते थे।
यह बात न अक़्ल से सही लगती है, न इतिहास से।

👉 अगर कोई बुत लाता भी था, तो उसे जेब में रख सकता था।
बग़ल में रखने की क्या ज़रूरत थी कि वह गिर जाए?

👉 अब सवाल यह है कि बुत लाता कौन था?
क्या सहाबा लाते थे? — नउज़ुबिल्लाह, ऐसा कहना मुमकिन ही नहीं।
क्या मुनाफ़िक़ लाते थे?
तो मुनाफ़िक़ तो अपनी हक़ीक़त छुपाना चाहता है,
वह क्यों चाहेगा कि नमाज़ में उसका बुत गिर जाए और सबके सामने राज़ खुल जाए?

इसलिए यह सारी बात मन-घड़ंत और बेबुनियाद है।

📌 अब कुछ सीधे और सच्चे सवाल

1️⃣ रफ़अ़ अल-यदैन न करने के लिए कौन-सी सहीह हदीस आपके पास है?
ज़रा पेश कीजिए।

2️⃣ आप कहते हैं कि यह अमल मंसूख़ है —
तो बताइए, किस सन हिजरी में मंसूख़ हुआ?

3️⃣ किस नमाज़ में मंसूख़ हुआ?
फ़ज्र, ज़ुहर, अस्र, मग़रिब या ईशा?

4️⃣ मक्का में मंसूख़ हुआ या मदीना में?
और किसने कहा कि यह मंसूख़ है —
अल्लाह ने या रसूलुल्लाह ﷺ ने?

5️⃣ अगर रफ़अ़ अल-यदैन मंसूख़ है,
तो ईद की नमाज़ में रफ़अ़ अल-यदैन क्यों किया जाता है?
और वित्र की नमाज़ में क्यों किया जाता है?

6️⃣ अगर कोई नसल्ख़ (मंसूख़ होने) का दावा करता है,
तो उसे यह बात इमाम अबू हनीफ़ा (रह.) या उनके शागिर्दों से साबित करनी चाहिए।
सिर्फ़ दावा काफी नहीं।

7️⃣ और याद रखिए —
ज़ईफ़ रिवायत, सहीह सुन्नत को मंसूख़ नहीं कर सकती।


🗣️आख़िरी बात:

क़ुरआन, सहीह हदीस और सलफ़ —सब रफ़अ़ अल-यदैन के साथ हैं।अगर यह अमल वाक़ई मंसूख़ होता,तो इमाम अहमद, इमाम मालिक,इमाम बुख़ारी, इमाम अबू दाऊद,और इमाम नसाई — सब इसे मंसूख़ कहते।जब किसी ने नहीं कहा,तो साफ़ साबित हुआ कि:

👉 रफ़अ़ अल-यदैन मंसूख़ नहीं है।

वल्लाहु आलम।


Conclusion:

रफ़ा अल-यदैन सही हदीस से साबित सुन्नत है।
इसे करना बेहतर और सुन्नत के करीब है।
इसे छोड़ना नमाज़ को अमान्य नहीं करता, लेकिन सुन्नत का इनकार या मज़ाक करना गलत है।
हमें चाहिए कि हम अपनी नमाज़ को नबी ﷺ के तरीके के अनुसार अदा करें और हर मसले में सही दलील को अपनाएँ।

रफअ़ अल्यदैन  से महरूम भाई बहनो से बड़ी मुहब्बत और नेक नियत से अर्ज़ है की वे प्यारे नबी (ﷺ) की इस प्यारी सुन्नत को ज़रूर अपनाएं, अ़मल में लाएं और किसी के कहने सुनने से इस नेअ़मत से महरूम न रहें।
🤲 अल्लाह तआ़ला हम सभी को रसूलुल्लाह (ﷺ) की सुन्नतों पर अ़मल करने की 
तौफीक़ दे। आमीन।

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Author
इस्लामी ब्लॉगर — सही दीन और इल्म को आम करने की कोशिश।


FAQs:

Que: रफा अल्यदैन क्या है?
Ans: रफ़ा अल यदैन यानी दोनो हाथों को कंधों या कानों के लौ तक उठाना है! नमाज़ में रफ़ा अल यदैन तकबीर ए तहरीमा के वक्त, रुकुअ़ जाते वक्त और रूकुअ़ से उठते वक्त और दो रकअ़त के बआ़द तीसरी रकअ़त के लिए उठते वक्त रफ़ा अल यदैन करना सुन्नत से साबित है !

Que: शेख़ अब्दुल कादिर की नमाज़ कैसी थी ?
Ans:  शेख़ अब्दुल कादिर की नमाज़ सुन्नत के मुताबिक थी ! वह तकबीर उला के वक़्त और रूकू में जाते वक़्त और रूकू से उठते वक़्त रफअ़ अल्यदैन करते थे।

Que: क्या रफ़ा अल यदैन मनसूख है?
Ans: नही ! रफ़ा अल यदैन कभी मंसूख हवा ही नहीं! नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपनी आखरी वक्त तक इसपर अमल किए और आप के बाद भी सहाबा और ताबेयीन से रफ़ा अल यादैन साबित है !

Voice Search FAQs

प्रश्न 1: क्या रफ़ा अल-यदैन फ़र्ज़ है?
नहीं, यह सुन्नत है।

प्रश्न 2: क्या सिर्फ नमाज़ की शुरुआत में हाथ उठाना चाहिए?
सही हदीस के अनुसार रुकू से पहले और बाद में भी हाथ उठाना सुन्नत है।

प्रश्न 3: क्या रफ़ा अल-यदैन मंसूख हो चुका है?
सही हदीस से यह मंसूख साबित नहीं होता।


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