Qurbani Kya Hai? क्या यह सिर्फ जानवर ज़बह करने का नाम है, या इसके पीछे कोई गहरी रूह और मक़सद भी छुपा है? इस्लाम में कुर्बानी महज़ एक रस्म नहीं, बल्कि अल्लाह की राह में अपने जज़्बात, अपनी चाहत और अपनी मोहब्बत को क़ुर्बान करने का नाम है। यह इबादत हमें हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) और हज़रत इस्माईल (अलैहिस्सलाम) की बेमिसाल आज़माइश और आज्ञाकारिता की याद दिलाती है।
कुर्बानी की असल रूह तक़वा (अल्लाह का डर और परहेज़गारी), इख़लास (खालिस नीयत) और अल्लाह की रज़ा हासिल करना है। क़ुरआन में अल्लाह तआला फरमाता है कि न तो जानवर का गोश्त अल्लाह तक पहुंचता है और न उसका खून, बल्कि उसके पास तुम्हारा तक़वा पहुंचता है। इससे साफ़ होता है कि कुर्बानी का मक़सद दिखावा नहीं, बल्कि दिल की सच्चाई और बंदगी है।
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Qurbani sirf zabah nahi balki ita'at aur taqwa ka izhar hai |
इस लेख Qurbani Kya Hai में हम समझेंगे कि कुर्बानी क्या है, इसकी असल रूह और मक़सद क्या है, और कैसे यह इबादत हमारे ईमान, समाज और अख़लाक़ पर गहरा असर डालती है—ताकि हम कुर्बानी को सिर्फ एक सालाना अमल नहीं, बल्कि अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना सकें।
“कुर्बानी” अरबी शब्द “क़ुर्ब” से निकला है, जिसका मतलब है “क़रीब होना”। यानी ऐसा अमल जो इंसान को अल्लाह के करीब कर दे।
इस्लामी शरीअत में कुर्बानी से मुराद है — अल्लाह की रज़ा के लिए ज़िलहिज्जा की 10, 11 और 12 तारीख को मुक़र्रर जानवर ज़बह करना।
यह अमल हमें हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) और उनके बेटे हज़रत इस्माईल (अलैहिस्सलाम) की उस अज़ीम कुर्बानी की याद दिलाता है, जब उन्होंने अल्लाह के हुक्म पर अपनी सबसे प्यारी चीज़ को भी क़ुर्बान करने में देर न की।
अल्लाह के रसूल ﷺ से सहाबा ने पूछा कि Qurbani Kya hai? आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने जवाब दिया कि तुम्हारे बाप इब्राहीम का तरीक़ा/ सुन्नत है।”
(मुसनद अहमद: 18797, इब्ने माजा: 3127)
कुर्बानी की असल रूह
कुर्बानी की असल रूह तीन अहम बातों में छुपी है:
1. तक़वा (अल्लाह का डर)
अल्लाह सुब्हानहु ने कुरआन में फ़रमाया:-
अल्लाह के पास ना तुम्हारी कुर्बानियों का गोश्त पहुँचता है और ना उनका खून, अल्लाह को सिर्फ़ तुम्हारा तक़वा पहुँचता है” (सूरेह हज: 37)
2. इख़लास (खालिस नीयत)
अगर कुर्बानी सिर्फ लोगों को दिखाने या समाज में नाम कमाने के लिए हो, तो उसका असली मक़सद खत्म हो जाता है।कुर्बानी सिर्फ और सिर्फ अल्लाह की रज़ा के लिए होनी चाहिए।
”कह दो कि मेरी नमाज़ मेरी क़ुरबानी ‘यानि’ मेरा जीना मेरा मरना अल्लाह के लिए है जो सब आलमों का रब है।”(कुरआन 6:162)
3. आज्ञाकारिता (Obedience)
हज़रत इब्राहीम (अ.स.) ने यह साबित कर दिया कि अल्लाह का हुक्म सबसे ऊपर है। कुर्बानी हमें सिखाती है कि हम अपनी इच्छाओं को अल्लाह की मरज़ी पर क़ुर्बान करें।
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कुर्बानी का मक़सद (Purpose of Qurbani)
1. ईमान की मजबूती
कुर्बानी इंसान को यह एहसास दिलाती है कि उसकी हर नेमत अल्लाह की दी हुई है। जब वह अल्लाह के नाम पर जानवर ज़बह करता है, तो उसका ईमान और भरोसा मज़बूत होता है।
2. समाज में बराबरी और भाईचारा
कुर्बानी का गोश्त गरीबों और जरूरतमंदों में बांटा जाता है। इससे समाज में मोहब्बत, हमदर्दी और बराबरी का जज़्बा पैदा होता है।
3. नफ़्स की इस्लाह
कुर्बानी हमें सिखाती है कि हम अपनी लालच, घमंड और स्वार्थ को भी क़ुर्बान करें। असली कुर्बानी सिर्फ जानवर की नहीं, बल्कि अपने अंदर की बुराइयों की है।
कुर्बानी का असल मक़सद
कुर्बानी का खास मक़सद सिर्फ जानवर ज़बह करना नहीं, बल्कि:
✔ अल्लाह को राज़ी करना
✔ उसके हुक्म की तामील करना
✔ तक़वा और इख़लास का इज़हार करना
✔ अपनी सबसे प्यारी चीज़ को भी अल्लाह की राह में देने का जज़्बा पैदा करना
कुर्बानी हमें यह सिखाती है कि असली अहमियत गोश्त या खून की नहीं, बल्कि नीयत और दिल की सच्चाई की है। जब बंदा सच्चे दिल से अल्लाह के लिए कुर्बानी करता है, तो वह उसके करीब हो जाता है।
इसलिए ईद-उल-अज़हा की कुर्बानी सिर्फ एक सालाना रस्म नहीं, बल्कि इबादत, मोहब्बत और आज्ञाकारिता का पैग़ाम है, जो हमें हर हाल में अल्लाह के हुक्म को सबसे ऊपर रखने की सीख देता है। 🌿
क्या कुर्बानी सिर्फ सालाना अमल है?
अगर कुर्बानी को सिर्फ ईद-उल-अज़हा तक सीमित कर दिया जाए, तो हम इसकी असल रूह से दूर हो जाते हैं।
असल में कुर्बानी एक सोच है —
✔ हर वक्त अल्लाह की रज़ा को प्राथमिकता देना
✔ अपने गुनाहों और बुरी आदतों को छोड़ना
✔ जरूरतमंदों का ख्याल रखना
✔ अपने नफ़्स पर काबू पाना
जब यह सोच हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन जाए, तब हम सच्चे मायने में कुर्बानी को समझ पाएंगे।
क़ुरआन में उन बाप बेटों की बात चीत कुछ इस तरह नक़ल हुई है
(इब्राहीम ने कहा:- “ऐ मेरे बेटे मैं ख़्वाब में तुम्हे क़ुर्बान करते हुए देखता हूँ तो तुम बताओ कि इस बारे में तुम्हारी क्या राय है ?)“
बेटे ने जवाब दिया:- “अब्बू जान आप को जो हुक्म दिया जा रहा है उसे ज़रूर पूरा कीजिए, अगर अल्लाह ने चाहा तो आप मुझे सब्र करने वालों में पाएँगे।” (सूरेह साफ्फात: 102)
सच है कि यह जवाब इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के बेटे का ही हो सकता था। इसमें हज़रत इस्माइल (अलैहिस्सलाम) का कमाल यह ही नहीं कि क़ुर्बान होने के लिए तैयार हो गए बल्कि कमाल यह भी है कि अपनी अच्छाई को अल्लाह की तरफ मंसूब किया कि ”अगर अल्लाह ने चाहा तो आप मुझे सब्र करने वालों में पाएँगे”
कुर्बानी के दिनों में इब्ने आदम के लिए खून बहाने ( कुर्बानी करने ) से बढ़कर कोई और काम नहीं है, और वह जानवर कयामत के दिन अपने सींगों, बालों और खुरों के साथ आएगा। कुर्बानी का खून ज़मीन पर पहुँचने से पहले ही क़ुबूलियत की अवस्था में पहुँच जाता है।" (तिर्मिज़ी, इब्नु माजा)
जिसकी कुरबानी करने की हैसियत हो और कुरबानी न करे
जो शख्स कुर्बानी करने की हैसियत रखता हो और कुर्बानी न करे, वो हमारी ईदगाह के क़रीब न आए ! सुन्न इब्न माजा
कुर्बानी करने वाला बाल ,नाखून न कटवाए
जब ज़ुल-हिज्जा का अशरा शुरू हो जाए और तुममें से कोई क़ुरबानी करने का इरादा रखता हो तो वो अपने बालों और जिल्द से कोई चीज़ न उतारे। और एक दूसरी रिवायत में है : वो न अपने बाल कटवाए न नाख़ुन। और एक रिवायत में है : जो शख़्स ज़ुल-हिज्जा का चाँद देख ले और वो क़ुरबानी करने का इरादा रखता हो तो वो अपने न बाल कटवाए न नाख़ुन। (मुस्लिम) मिश्कात:1459
कुर्बानी ईद नमाज़ के बआ़द करें:-
जो आदमी हमारी नमाज़ की तरह नमाज़ पढ़े और हमारे किब्ला की तरफ़ रुख करे और हमारी कुर्बानियों की तरह कुर्बानी करे तो वो ज़िबाह न करे जब तक के वो नमाज़ ए ईद न पढ़ ले ! (सही मुस्लिम :5072)
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया : जो शख़्स नमाज़े-ईद से पहले क़ुरबानी कर ले तो वो उसकीदूसरी क़ुरबानी करे और जो शख़्स नमाज़े-ईद के बाद ज़बह करे तो उसे अल्लाह के नाम पर ज़बह करे। (मुत्तफ़क़ अलैह) मिश्कात अल मसाबीह:1436
जिस शख़्स ने नमाज़े-ईद से पहले ज़बह कर लिया। तो उसने सिर्फ़ अपनी ज़ात की ख़ातिर ज़बह किया और जिसने नमाज़े-ईद के बाद ज़बह किया तो उसकी क़ुरबानी मुकम्मल हुई और उसने मुसलमानों के तरीक़े के मुताबिक़ की। (मुत्तफ़क़ अलैह) (मिश्कात:1437)
जो कुरबानी करने की हैसियत न रखता हो वह क्या करे :-
मुझे हुक्म दिया गया है कि में इस उम्मत के लिये अज़हा के दिन को ईद क़रार दूँ। किसी आदमी ने आप ﷺ ने कहा : अल्लाह के रसूल! मुझे बताएँ अगर में दूध देने वाली बकरी जो कि मुझे किसी ने अतिया की है के सिवा कोई जानवर न पाऊँ तो क्या में उसे ज़बह कर दूँ? फ़रमाया : नहीं लेकिन तुम (ईद के दिन) अपने बाल और नाख़ुन कटाओ मूँछें कतराओ और नाफ़ के नीचे के (नाभि) बाल मूँड लो अल्लाह के यहाँ ये तुम्हारी मुकम्मल क़ुरबानी है। अबू-दाऊद और नसाई
बड़े जानवर में कितने लोगों का हिस्सा?
जानवर ज़ब्ह करते वक़्त — "बिस्मिल्लाही वल्लाहुअकबर"
तस्मियाह (बिस्मिल्लाह पढ़ने) के मसाइल
कुर्बानी या किसी भी हलाल जानवर को ज़ब्ह करते समय तस्मियाह यानी “बिस्मिल्लाही वल्लाहु अकबर” पढ़ना शरीअत का अहम हुक्म है। यह सिर्फ एक जुमला नहीं, बल्कि इस बात का ऐलान है कि हम यह अमल सिर्फ अल्लाह के नाम और उसकी रज़ा के लिए कर रहे हैं।
📖 नबी ﷺ जब जानवर ज़ब्ह करते तो फरमाते:
“बिस्मिल्लाहि वल्लाहु अकबर”
(📙 सहीह बुख़ारी: 5565)
(📘 सहीह मुस्लिम: 1966)
इन अहादीस से साबित होता है कि ज़ब्ह के वक्त तस्मियाह पढ़ना सुन्नत और ज़रूरी अमल है।
तस्मियाह से जुड़े अहम मसाइल
✨ 1. ज़ब्ह करने वाले का बिस्मिल्लाह पढ़ना ज़रूरी है
जो शख्स जानवर ज़ब्ह कर रहा है, उसी पर तस्मियाह पढ़ना लाज़िम है। किसी और का पढ़ना काफी नहीं होगा।
✨ 2. अगर दो आदमी मिलकर ज़ब्ह करें
अगर दो लोग मिलकर एक ही जानवर पर छुरी फेर रहे हों, तो दोनों का “बिस्मिल्लाह” पढ़ना जरूरी होगा।
✨ 3. जानबूझकर तस्मियाह छोड़ना
अगर ज़ब्ह करने वाला जानबूझकर “बिस्मिल्लाह” न पढ़े, तो वह जानवर हलाल नहीं होगा।
✨ 4. भूल से तस्मियाह रह जाए
अगर भूलवश “बिस्मिल्लाह” पढ़ना छूट जाए, तो जानवर हलाल हो जाएगा, क्योंकि यह गलती जानबूझकर नहीं थी।
✨ 5. मुँह साफ़ होना ज़रूरी
अगर ज़ब्ह करने वाले के मुँह में गुटका, पान या कोई चीज़ हो, तो उसे पहले मुँह साफ़ करना चाहिए, ताकि वह साफ़ तौर पर “बिस्मिल्लाह” पढ़ सके।
✨ 6. बिस्मिल्लाह पढ़ने वाला मुसलमान हो
तस्मियाह पढ़ने वाला शख्स मुसलमान होना चाहिए, क्योंकि ज़ब्ह एक इबादत का अमल है।
✨ 7. तस्मियाह के सही अल्फ़ाज़
तस्मियाह के अल्फ़ाज़ यह हैं:
“बिस्मिल्लाही वल्लाहु अकबर”
✨ 8. गर्दन की रगों का कटना
जानवर की गर्दन में मौजूद चार अहम रगों (हल्क़ और नसें) में से कम-अज़कम तीन रगों का कटना जरूरी है, ताकि ज़ब्ह सही तरीके से मुकम्मल हो।
✨ 9. दो बार छुरी फेरनी पड़े
अगर पहली बार छुरी फेरने से कुछ रगें बाकी रह जाएं और दूसरी बार छुरी चलानी पड़े, तो हर बार तस्मियाह पढ़ना जरूरी होगा।
इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि वह ज़ब्ह के मसाइल को सही तरह समझे और सुन्नत के मुताबिक़ अमल करे, ताकि उसकी कुर्बानी और ज़ब्ह अल्लाह के यहाँ कबूल हो। 🌿
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ईद-उल-अज़हा पर कुर्बानी के गोश्त की तकसीम
ईद-उल-अज़हा के मुबारक मौके पर मुसलमान अल्लाह की रज़ा के लिए एक जानवर — बकरी, भेड़, गाय या ऊँट — की कुर्बानी करते हैं। यह अमल हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की सुन्नत की याद और अल्लाह के हुक्म की पैरवी का इज़हार है।
🥩 गोश्त को तीन हिस्सों में बांटना
कुर्बानी के गोश्त को आम तौर पर तीन हिस्सों में तक़सीम करना मुस्तहब (बेहतर) माना गया है:
1️⃣ एक हिस्सा गरीबों और जरूरतमंदों के लिए
ताकि वे भी ईद की खुशियों में शरीक हो सकें और समाज में हमदर्दी व बराबरी का जज़्बा पैदा हो।
2️⃣ एक हिस्सा रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए
इससे आपसी मोहब्बत, रिश्तों की मज़बूती और भाईचारे का पैग़ाम फैलता है।
3️⃣ एक हिस्सा अपने और अपने घर वालों के लिए
ताकि घर वाले भी इस नेमत से फायदा उठाएं और अल्लाह का शुक्र अदा करें।
(Conclusion)
अब यह साफ़ हो गया कि कुर्बानी क्या है और इसकी असल रूह और मक़सद क्या है।
👉 कुर्बानी सिर्फ जानवर ज़बह करना नहीं, बल्कि तक़वा और इख़लास का इज़हार है।
👉 यह हमें अल्लाह के करीब करती है।
👉 यह समाज में मोहब्बत और बराबरी फैलाती है।
👉 यह हमारे नफ़्स की तरबियत करती है।
इसलिए आइए, हम कुर्बानी को सिर्फ एक सालाना रस्म न समझें, बल्कि अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाएं — ताकि हमारा हर अमल अल्लाह की रज़ा के लिए हो और हम सच्चे मोमिन बन सकें। 🌿इस लिए अपनी हैसियत के हिसाब से कुरबानी जरूर किया करें !

1 Comments
Ek sawal hai kya qurbani ke janwar me aqeeqah bhi hota hai kya
ReplyDeleteplease do not enter any spam link in the comment box.thanks