Musalman Aur Naye Saal ki Khurafaat | Islamic Article in Hindi/ Urdu
✍️ By: Mohib Tahiri |🕋 islamic article| Happy New Year| Musalman aur naye saal |New Year khurafaat in Islam🕰 Updt:22 Dec 2025किसी ने क्या खूब कहा है :
♦️एक और ईंट गिर गई दीवार ए हयात से
नादान कह रहे हैं नया साल मुबारक हो
♦️कुछ खुशियों,कुछ ग़मों भरा हाल गया
हर एक परेशानी को रब मेरा टाल गया
जिंदगी मिली है तो यूंही न गंवा मोहिब
कर फ़िक्र ए उक़्बा,एक और सुनहरा साल गया
नादान कह रहे हैं नया साल मुबारक हो
♦️कुछ खुशियों,कुछ ग़मों भरा हाल गया
हर एक परेशानी को रब मेरा टाल गया
जिंदगी मिली है तो यूंही न गंवा मोहिब
कर फ़िक्र ए उक़्बा,एक और सुनहरा साल गया
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इंसान गलतियों का पुतला है, उससे गलतियां तो होंगी ही। किसी गलती का होना बुरा है, लेकिन उससे भी ज्यादा बुरा यह है कि उससे सबक न लिया जाए और वही गलती बार-बार दोहराई जाए।
यह योजना बनाना, चाहे वह धार्मिक मामलों में हो या दुनियावी, दोनों के लिए जरूरी है। जैसा कि हदीस से पता चलता है। पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया:
पांच चीजों को पांच चीजों से पहले ग़नीमत समझो:
- अपनी जवानी को बुढ़ापे से पहले।
- अपनी सेहत को बीमारी से पहले।
- अपनी दौलत को गरीबी से पहले।
- अपने खाली समय को व्यस्तता से पहले।
- अपनी जिंदगी को मौत से पहले।"**
- (मिश्कातुल मसाबिह 2/441, किताबुर-रक़ायक़)
आख़िरत (परलोक) की सफलता और असफलता इसी दुनिया के कर्मों पर निर्भर है। जैसा कि अल्लाह ने फरमाया:
- और इंसान के लिए वही है जो उसने कोशिश की, और उसकी कोशिश जल्द ही देखी जाएगी, फिर उसे पूरा-पूरा बदला दिया जाएगा।"(सूरह नज्म, आयत 39-41)
- मुसलमानों का हर काम अल्लाह और उसके रसूल (ﷺ) के बताए हुए उसूलों के मुताबिक होना चाहिए। लेकिन अफ़सोस की दुनिया की चमक धमक में गुम होते जा रहे हैं और अपने दीन से दिन ब दिन दूर होते जा रहे हैं! और आज Musalman Aur Naye Saal ki Khurafaat को देख कर बहुत अफसोस होता है कि क्या यही वो दीन और मुसलमान हैं जिसे हमारे नबी ﷺ लेकर आये और हमे तालीम दी !
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नए साल,31 दिसंबर की रात
- [यह वह रात है जिसमें हर वो काम किए जाते हैं जिसे इस्लाम ने हराम क़रार दिया है]
- [इस रात को जश्न मनाने से पहले एक बार अपनी कब्र की अंधेरी रात को ज़रूर याद कर लेना]
- उल्टी सीधी हरकतें कर के नाच गाने के साथ दीगर गुनाह करके खुशियां मनाते हैं
- 31 दिसंबर की ये रात जिस में शायद ही कोई गुनाह हो जो इस रात न होता हो
- यह वो रात है जिस में भोली भाली लड़कियों की इज़्ज़त से खेला जाता है
- ये वो रात है जिस में कुछ लोग हैं जो पहली बार शराब को मुंह से लगाते हैं और फिर धीरे धीरे इस के आदि हो जाते हैं
- ये वो रात है जिस में जिस्म फरोशी के बाजार और जीना के दरबार सजाए जाते हैं
- ये वो रात है जिस में बे हयाई,बे शर्म खुले आम की जाती है
- मगर अफसोस के आज के कुछ मुसलमान इस को जश्न के तौर पर बड़ी फख्र से मनाते हैं
ए अल्लाह! तू हर मुसलमान भाई बहनों को इस बे हयाई और be धर्मी वाली रात में गुनाहों से बचा, ए अल्लाह ! हमें हिदायत दे, जो काम तेरी नाराज़गी का सबब बने हमे उन कामों से बचाए रख. आमीन
नया साल और इस्लामी कैलेंडर:
हमारा इस्लामी कैलेंडर चाँद के हिसाब से चलता है, और इसका पहला महीना मुहर्रम है। नए साल के जश्न का जो तरीका आज अपनाया जाता है, वह इस्लामी नहीं बल्कि पश्चिमी और गैर-इस्लामी तहज़ीब का हिस्सा है। इस्लाम ने हमें यह सिखाया है कि हम अपने मौकों को अल्लाह की याद और शुक्रगुज़ारी के साथ मनाएँ, न कि फुज़ूल खर्ची, गुनाहों और बेहूदगी में।
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कभी हमने यह सोचा कि हम इस्लामी साल के आगाज़ (मुहर्रम) पर ऐसा जश्न क्यों नहीं मनाते? क्योंकि हमारा मक़सद दुनिया की नक़ल करना नहीं, बल्कि अपने दीन को समझना और उस पर अमल करना है।
नए साल के मौके पर जो काम आम तौर पर होते हैं, जैसे नाच-गाना, शराबखोरी, गैर-महरम का आपस में मिलना-जुलना, और दूसरी बेहूदगियाँ, ये तमाम चीजें इस्लाम में हराम हैं। यह सब कुछ अल्लाह और उसके रसूल (ﷺ) की नाफरमानी के दायरे में आता है।
"गैर-मुस्लिमों के त्यौहार और रस्मों में शरीक होना, चाहे वह नए साल का जश्न हो या कोई और दिन, मुसलमान के लिए हराम है। क्योंकि यह न सिर्फ उनकी तहज़ीब को अपनाने जैसा है, बल्कि इस्लाम की तालीमात से सरासर खिलाफ भी है।"
"नए साल का जश्न मनाना या इसमें किसी भी तरह शरीक होना इस्लाम में हराम है। यह अल्लाह की शरीअत और रसूलुल्लाह (ﷺ) की सुन्नत के खिलाफ है। मुसलमान को चाहिए कि वह अपने दीन और पहचान पर कायम रहे।"(फ़तावा इब्न उथैमीन, जिल्द 3)
> "गैर-मुस्लिमों की तहज़ीब और उनके त्यौहारों को अपनाना इस्लामी समाज को कमजोर करता है। यह न सिर्फ उनके तौर-तरीकों को मानने जैसा है, बल्कि उनकी नकल से मुसलमानों की पहचान मिटने लगती है।"
"नए साल के जश्न में शरीक होना या इस मौके पर किसी तरह का खुशी का इज़हार करना गैर-इस्लामी रवायत को अपनाने के बराबर है। यह फुज़ूलखर्ची और गैर-महसूसी तौर पर दूसरे मज़ाहिब की नक़ल करने जैसा है, जो बिल्कुल नाजायज़ है।"
"मुसलमान को चाहिए कि वह गैर-मुस्लिमों के त्यौहारों और रस्मों से पूरी तरह अलग रहे। नए साल का जश्न, जो ईसाई कलेंडर पर आधारित है, हमारी इस्लामी तहज़ीब और पहचान के खिलाफ है।"
"मुसलमानों के लिए गैर-इस्लामी रस्मों और त्यौहारों में शरीक होना जायज़ नहीं है। यह इस्लामी तहज़ीब के कमजोर होने और गैर-मुस्लिम कल्चर की ताईद करने का जरिया बनता है।"
"नए साल का जश्न मनाना गैर-मुस्लिमों की पहचान और उनकी रवायत को अपनाने जैसा है। मुसलमानों को चाहिए कि वह ऐसे हर मौके से दूर रहें, जो उनके ईमान और इस्लामी तालीमात को कमजोर कर सकता है।"
मुसलमानों को चाहिए कि वह उलमा की इन नसीहतों को समझें और अमल में लाएँ। नए साल के जश्न से बचकर, इस मौके को अल्लाह की याद, तौबा, और नेक इरादों के साथ गुजारें। यही इस्लामी रवैया है।
गैर-मुस्लिम रिवाजों की नक़ल
नए साल का जश्न ईसाई तहज़ीब और पश्चिमी कल्चर का हिस्सा है, जो उनकी तारीख और रस्मों से जुड़ा हुआ है। इस्लाम हमें अपनी तहज़ीब और मज़हब की पहचान पर गर्व करने की सीख देता है। अल्लाह तआला क़ुरान में फरमाते हैं:और तुम उनकी तरह मत बनो जिन्होंने अपने पैग़ाम को भुला दिया और अल्लाह ने उनके दिलों को सख्त कर दिया।"(सूरह अल-हदीद: 16)अगर हम नए साल के जश्न में शरीक होते हैं या उसकी नक़ल करते हैं, तो हम इस्लामी उसूलों से हटकर दूसरों की रिवायतों को अपनाने की गलती कर रहे होते हैं।
हदीस में रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फरमाया:
"जो शख्स किसी कौम की नक़ल करेगा, वह उन्हीं में से होगा।" (अबू दाऊद)
इस्लामी साल की अहमियत को भूलना
हमारा अपना इस्लामी कैलेंडर चाँद के हिसाब से चलता है, जो हिजरत की बुनियाद पर तय हुआ। इस्लामी तारीख़ का पहला महीना मुहर्रम है, जो खुद बहुत फज़ीलत और बरकत वाला महीना है। लेकिन नए साल का जश्न मनाने का मतलब यह होगा कि हम अपनी तारीखों और मजहबी शऊर को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं।कभी हमने यह सोचा कि हम इस्लामी साल के आगाज़ (मुहर्रम) पर ऐसा जश्न क्यों नहीं मनाते? क्योंकि हमारा मक़सद दुनिया की नक़ल करना नहीं, बल्कि अपने दीन को समझना और उस पर अमल करना है।
फिजूलखर्ची और इस्लाम का नजरिया
नए साल के जश्न में अक्सर बेहिसाब फिजूलखर्ची होती है, चाहे वह आतिशबाजी हो, पार्टियों पर खर्च हो, या दूसरी गैर-जरूरी चीज़ें। इस्लाम हमें फिजूलखर्ची से बचने की तालीम देता है। अल्लाह तआला फरमाते हैं:और (खर्च करने में) बेवजह हाथ मत खोलो, और न ही इतना कंजूस बनो कि खुद को तकलीफ हो।"(सूरह इसरा: 29)
नए साल के जश्न में शिरकत करना न सिर्फ हमारी दौलत की बर्बादी है, बल्कि यह अल्लाह की दी हुई नेमतों की नाशुक्री भी है।
गुनाह और अल्लाह की नाफरमानी
रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फरमाया:
"जो शख्स किसी चीज़ को अल्लाह की नाफरमानी में बिताए, वह वक्त उस पर गुनाह बन जाएगा।" (मुसनद अहमद)
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क्या करें नए साल पर:
वक्त की एहमियत:
इस्लाम में वक्त को बहुत कीमती माना गया है। हर नई घड़ी, हर नया दिन, और हर नया साल हमारे लिए तौबा, इबादत, और नेकियों का मौका है। लेकिन नए साल के जश्न में वक्त को फुज़ूल और गुनाह में बर्बाद करना अल्लाह की इस नेमत को जाया करने जैसा है।
इस्लाम हमें सिखाता है कि वक्त अल्लाह की नेमत है। इसे फुज़ूल कामों में बर्बाद करना और बेकार चीज़ों में लगाना जायज़ नहीं है।
हज़रत मुहम्मद (ﷺ) ने फरमाया:"दो नेमतें ऐसी हैं, जिनकी लोग कदर नहीं करते: सेहत और फुर्सत का वक्त।"(सहीह बुखारी)रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फरमाया:"कयामत के दिन इंसान से चार चीजों के बारे में पूछा जाएगा: उसने अपनी ज़िंदगी कैसे गुज़ारी, अपनी जवानी कैसे खर्च की, अपने माल को कहाँ से कमाया और कहाँ खर्च किया, और अपने इल्म पर कितना अमल किया।"(सहीह तिर्मिज़ी)
अपनी पहचान कायम रखें:
नए साल के जश्न में शरीक होना एक तरह से गैर-इस्लामी रस्मों को अपनाने जैसा है। अल्लाह ने हमें गैर-कौमों की नक़ल करने से मना किया है। हदीस में आता है:
"जो शख्स किसी कौम की नक़ल करता है, वह उसी का हिस्सा बन जाता है।" (अबू दाऊद)
इस्लामी तरीके से अपने साल का आगाज़ करें:
एक बात याद रखें कि मुसलमानों के लिए इस्लामी महीना का आग़ाज़ मुहर्रम से होता है लेकिन अगर कुछ करना है जैसे कुरान की तिलावत, नफ़्ल नमाज़, और अपने पिछले गुनाहों पर तौबा कीजिए लेकिन इस अमल को नए साल से हरगिज़ न जोड़ें बल्कि ये अमल तो हर मुसलमान को हर रोज करना चाहिए!
नए साल के मौके पर दुआ करें कि अल्लाह हमें नेकियों और अपनी राह पर चलने की तौफीक़ दे की हमारी जिंदगी के एक साल और कम हो गए और आगे की जिंदगी में और ज़्यादा नेकी करने और नेकी पर चलने की तौफीक़ आता फरमाए!
नए साल के मौके पर दुआ करें कि अल्लाह हमें नेकियों और अपनी राह पर चलने की तौफीक़ दे की हमारी जिंदगी के एक साल और कम हो गए और आगे की जिंदगी में और ज़्यादा नेकी करने और नेकी पर चलने की तौफीक़ आता फरमाए!
फुज़ूल खर्ची और बेहूदा हरकतों से दूर रहें:
अपने घर और बच्चों को दीन और तहज़ीब के साथ जोड़ें ताकि वह भी इन खुराफातों से बच सकें। और फ़िज़ूल खर्च,बेहूदा हरकत से मुतल्लिक़ उन्हें नबी ﷺ के फ़रमान और अल्लाह के कलाम सुनाएं ताकि उल्टी सीधी हरकतें ,गैर शरई रस्म ओ रिवाज को करने और अपनाने से बचे रहें!
खुदा की नाफरमानी से बचना:
नए साल के नाम पर होने वाली पार्टियों और जश्न में अक्सर नाच-गाना, शराब, और दूसरी हराम चीज़ें शामिल होती हैं। ये सब चीज़ें न सिर्फ अल्लाह की नाफरमानी है बल्कि मुसलमानों की इज़्ज़त और पहचान को भी नुकसान पहुंचाती हैं। क़ुरान कहता है:
"और जिन लोगों ने जिहालत की वजह से गुनाह किए, फिर तौबा कर ली और अल्लाह की तरफ रुझू किया, तो यक़ीनन अल्लाह उनको माफ़ कर देगा।" (सूरह अन-निसा: 17)
"और जिन लोगों ने जिहालत की वजह से गुनाह किए, फिर तौबा कर ली और अल्लाह की तरफ रुझू किया, तो यक़ीनन अल्लाह उनको माफ़ कर देगा।" (सूरह अन-निसा: 17)
नए साल को लेकर जश्न
इस्लाम में खुशी मनाना हराम नहीं है, लेकिन इसका तरीका इस्लामी उसूलों के मुताबिक होना चाहिए। अगर नए साल के मौके पर कोई मुसलमान:
दुआ करता हैअपने पिछले साल के आमाल का जायज़ा लेता हैअगले साल के लिए नेक इरादे करता हैतो इसमें कोई बुराई नहीं है।हालांकि, ऐसे तरीके अपनाना जो गैर-इस्लामी तहज़ीब से जुड़े हों, जैसे आतिशबाज़ी, फिजूलखर्ची, या नाच-गाना, इस्लाम में जायज़ नहीं हैं।क़ुरान में अल्लाह तआला फरमाते हैं:"إن المبذرين كانوا إخوان الشياطين"(बेशक फिजूलखर्च लोग शैतान के भाई हैं)।(सूरह अल-इसरा: 27)
इसलिए, मुसलमानों को ऐसी खुशी मनाने के तरीके अपनाने चाहिए या ऐसे अमल करना चाहिए जो दीन और शरीयत के खिलाफ न हो।
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उलमा ए कराम के फ़त्वे:
नए साल की खुराफात और इस्लामी उसूलों के खिलाफ होने के बारे में कई उलमा-ए-किराम फ़तवे दिए हैं। यहां कुछ नामचीन उलमा के बयानात दिए जा रहे हैं:
1. शेख अब्दुल अजीज बिन बाज (रहमतुल्लाह अलैह)
सऊदी अरब के मशहूर मुफ्ती-ए-आज़म शेख बिन बाज (रह.) ने कहा:"गैर-मुस्लिमों के त्यौहार और रस्मों में शरीक होना, चाहे वह नए साल का जश्न हो या कोई और दिन, मुसलमान के लिए हराम है। क्योंकि यह न सिर्फ उनकी तहज़ीब को अपनाने जैसा है, बल्कि इस्लाम की तालीमात से सरासर खिलाफ भी है।"
2. शेख इब्न उथैमीन (रहमतुल्लाह अलैह)
शेख इब्न उथैमीन ने नए साल और दूसरे गैर-इस्लामी त्यौहारों के बारे में फरमाया:"नए साल का जश्न मनाना या इसमें किसी भी तरह शरीक होना इस्लाम में हराम है। यह अल्लाह की शरीअत और रसूलुल्लाह (ﷺ) की सुन्नत के खिलाफ है। मुसलमान को चाहिए कि वह अपने दीन और पहचान पर कायम रहे।"(फ़तावा इब्न उथैमीन, जिल्द 3)
3. इमाम इब्न तैमिय्या (रहमतुल्लाह अलैह)
इमाम इब्न तैमिय्या ने अपनी किताब "इक़्तिज़ा अस-सिरात अल-मुस्तक़ीम" में लिखा:> "गैर-मुस्लिमों की तहज़ीब और उनके त्यौहारों को अपनाना इस्लामी समाज को कमजोर करता है। यह न सिर्फ उनके तौर-तरीकों को मानने जैसा है, बल्कि उनकी नकल से मुसलमानों की पहचान मिटने लगती है।"
4. दारुल उलूम देवबंद (भारत)
दारुल उलूम देवबंद के फतवे में कहा गया है:"नए साल के जश्न में शरीक होना या इस मौके पर किसी तरह का खुशी का इज़हार करना गैर-इस्लामी रवायत को अपनाने के बराबर है। यह फुज़ूलखर्ची और गैर-महसूसी तौर पर दूसरे मज़ाहिब की नक़ल करने जैसा है, जो बिल्कुल नाजायज़ है।"
5. जमीयत उलमा-ए-हिंद
जमीयत उलमा-ए-हिंद के उलमा ने कहा:"मुसलमान को चाहिए कि वह गैर-मुस्लिमों के त्यौहारों और रस्मों से पूरी तरह अलग रहे। नए साल का जश्न, जो ईसाई कलेंडर पर आधारित है, हमारी इस्लामी तहज़ीब और पहचान के खिलाफ है।"
6. मुफ्ती मुहम्मद शफी (रहमतुल्लाह अलैह)
मुफ्ती शफी (रह.) ने अपनी किताब "मआरिक अल-फिक़्ह" में लिखा है:"मुसलमानों के लिए गैर-इस्लामी रस्मों और त्यौहारों में शरीक होना जायज़ नहीं है। यह इस्लामी तहज़ीब के कमजोर होने और गैर-मुस्लिम कल्चर की ताईद करने का जरिया बनता है।"
7. शेख सालेह अल-फौज़ान
शेख सालेह अल-फौज़ान ने फरमाया:"नए साल का जश्न मनाना गैर-मुस्लिमों की पहचान और उनकी रवायत को अपनाने जैसा है। मुसलमानों को चाहिए कि वह ऐसे हर मौके से दूर रहें, जो उनके ईमान और इस्लामी तालीमात को कमजोर कर सकता है।"
अहम नुक्ता व नसीहत:
उलमा-ए-किराम ने हमेशा इस बात पर ज़ोर दिया है कि मुसलमानों को अपने दीन, तहज़ीब, और पहचान पर फख्र करना चाहिए। गैर-इस्लामी रस्मों और जश्नों में शरीक होना न सिर्फ अल्लाह की नाराज़गी का सबब बनता है, बल्कि यह मुसलमानों को उनकी असलियत से भी दूर करता है।मुसलमानों को चाहिए कि वह उलमा की इन नसीहतों को समझें और अमल में लाएँ। नए साल के जश्न से बचकर, इस मौके को अल्लाह की याद, तौबा, और नेक इरादों के साथ गुजारें। यही इस्लामी रवैया है।
Conclusion:
तो यह है Musalman Aur Naye Saal ki Khurafaat ! एक बात अच्छी तरह याद कर लें,हर नया साल, खुशी के बजाय एक सच्चे मोमिन को बेचैन कर देता है, क्योंकि उसे यह एहसास होता है कि उसकी उम्र धीरे-धीरे कम हो रही है और बर्फ की तरह पिघल रही है। वह किस बात पर खुशी मनाए? बल्कि, इससे पहले कि जिंदगी का सूरज हमेशा के लिए डूब जाए, कुछ कर लेने की तमन्ना उसे बेचैन कर देती है। उसके पास समय कम और काम ज्यादा होता है। आप खुद के बारे में सोचें कि आप क्या कर रहे हैं?
हमारे लिए नया साल सिर्फ मौज-मस्ती का समय नहीं है, बल्कि बीते समय की कद्र करते हुए आने वाले पलों का सही इस्तेमाल करने का संकल्प लेने का मौका है। यह अपने इरादों को फिर से मजबूत करने और हौसले बुलंद करने का समय है।
नए साल की खुराफात और गैर-इस्लामी रवायतों से दूर रहना हमारी पहचान और ईमान का तकाज़ा है। यह वक्त हमें अल्लाह से तौबा करने, अपने ईमान को मजबूत करने, और नेकियों की राह पर चलने का मौका देता है। मुसलमानों को चाहिए कि वह अपने वक्त, माल और इज्जत को फुज़ूल कामों में जाया करने के बजाय इसे अल्लाह की राह में लगाएँ। यही असली कामयाबी है।
मुसलमानों को चाहिए कि वह अपनी तहज़ीब और इस्लामी पहचान को कायम रखें। नए साल के मौके पर खुशी मनाना हराम नहीं, लेकिन इसे इस्लामी अंदाज़ में मनाना ज़रूरी है। गैर-इस्लामी रिवाजों को अपनाने के बजाय अल्लाह की तरफ रुझू करें और अपनी ज़िंदगी में दीन की रौशनी फैलाएँ।
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FAQs:
सवाल 1: क्या मुसलमान नए साल का जश्न मना सकते हैं?
जवाब: नहीं, मुसलमानों को नए साल का जश्न मनाने से बचना चाहिए। यह जश्न गैर-इस्लामी तहज़ीब का हिस्सा है और इसमें शरीक होना इस्लामिक पहचान और तालीमात के खिलाफ है। मुसलमानों को अपनी तहज़ीब और इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक अपनी ज़िंदगी गुजारनी चाहिए।
सवाल 2: अगर कोई मुसलमान सिर्फ खुशी के तौर पर नए साल का जश्न मनाए, तो क्या यह जायज़ है?
जवाब: नए साल का जश्न, चाहे वह सिर्फ खुशी के इज़हार के लिए हो, इस्लामी उसूलों के खिलाफ है। इस तरह की रस्में और तहवार गैर-मुस्लिमों से जुड़ी हैं, और हदीस में रसूलुल्लाह (ﷺ) ने गैर-कौमों की नक़ल करने से मना फरमाया है। (अबू दाऊद)
सवाल 3: क्या नए साल के दिन दुआ करना या नेक इरादे करना जायज़ है?
जवाब: दुआ करना या नेक इरादे करना हर वक्त जायज़ और पसंदीदा है, लेकिन इसे नए साल से जोड़ना सही नहीं है। हमें हर दिन, हर वक्त अपने अमल की इस्लाह और तौबा का इरादा करना चाहिए, न कि किसी खास दिन पर गैर-इस्लामी रस्मों की नक़ल में।
सवाल 4: क्या इस्लामी तारीख़ का नया साल मनाना जायज़ है?
जवाब: इस्लामी तारीख़ के नए साल (मुहर्रम) के आगाज़ पर खुशी जाहिर करना, नेकियों का इरादा करना और अल्लाह से दुआ करना जायज़ है। लेकिन इसमें भी गैर-इस्लामी तरीके जैसे फुज़ूलखर्ची, नाच-गाना, या बेहूदा हरकतों से बचना चाहिए।
सवाल 5: क्या गैर-मुस्लिम दोस्तों को नए साल की मुबारकबाद देना जायज़ है?
जवाब: गैर-मुस्लिम दोस्तों को नए साल की मुबारकबाद देना एक ऐसा मामला है, जिसमें उलमा के बीच इख्तिलाफ है। कुछ उलमा इसे गैर-इस्लामी रस्मों को अपनाने जैसा मानते हैं और इसे नाजायज़ करार देते हैं। वहीं, कुछ इसे सिर्फ तहज़ीब का मामला मानते हैं। लेकिन बेहतर यह है कि मुसलमान अपनी तहज़ीब और मजहब पर कायम रहते हुए इस तरह की मुबारकबाद से परहेज़ करें।
सवाल 6: क्या नए साल के मौके पर पार्टियों में शरीक होना जायज़ है, अगर उसमें कोई हराम काम न हो?
जवाब: नए साल की पार्टियों में शरीक होना भी सही नहीं है, भले ही उसमें कोई हराम काम न हो। क्योंकि यह गैर-मुस्लिम तहवारों का हिस्सा है, और इसमें शरीक होना इस्लामी तालीमात और पहचान के खिलाफ है। मुसलमान को चाहिए कि वह हर ऐसी चीज़ से दूर रहे, जो उसे उसके दीन और ईमान से दूर कर सके।
सवाल 7: नए साल के जश्न को बच्चों के लिए मनोरंजन के तौर पर मनाना कैसा है?
जवाब: बच्चों को गैर-इस्लामी रवायतों से जोड़ना उनकी इस्लामी तरबियत को नुकसान पहुँचाता है। बच्चों को इस्लामिक तरीकों से खुशी और मनोरंजन सिखाना चाहिए, ताकि वह अपनी पहचान पर गर्व करें। उन्हें गैर-इस्लामी जश्नों में शरीक करना उनकी गलत सोच और आदतों को बढ़ावा देता है।
सवाल 8: क्या मुसलमानों का नया साल भी 1 जनवरी से शुरू होता है?
जवाब: मुसलमानों का नया साल इस्लामी कैलेंडर (हिजरी कैलेंडर) के मुताबिक मुहर्रम से शुरू होता है। 1 जनवरी का नया साल ईसाई ग्रेगोरियन कैलेंडर का हिस्सा है, जो मुसलमानों का नहीं है। हमें अपनी इस्लामी तारीखों और कैलेंडर को अपनाने पर जोर देना चाहिए।
सवाल 9: क्या नए साल पर फिजूल खर्च करना इस्लाम में जायज़ है?
जवाब: इस्लाम में हर तरह की फिजूलखर्ची हराम है। अल्लाह तआला ने कुरान में फिजूलखर्ची करने वालों को "शैतान के भाई" करार दिया है। (सूरह इसरा: 27) नए साल के नाम पर फिजूलखर्ची और गुनाह करना इस्लाम में बिल्कुल नाजायज़ है।
सवाल 10: अगर कोई यह कहे कि नए साल पर खुशी मनाने से क्या फर्क पड़ता है, यह तो सिर्फ एक दिन है?
जवाब: इस्लाम में हर काम नीयत और तरीका दोनों के मुताबिक होना चाहिए। नए साल पर खुशी मनाना गैर-इस्लामी तहवारों और तहज़ीब को अपनाने जैसा है। यह "सिर्फ एक दिन" नहीं है, बल्कि यह मुसलमान की पहचान और उसकी तहज़ीब पर सवाल खड़ा करता है। हदीस में रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फरमाया: "तुम उनकी तरह मत बनो, जो अपने तौर-तरीकों में अल्लाह को भुला चुके हैं।" (सही बुखारी)
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Musalman Aur Naye Saal ki Khurafaat /مسلمان اور نیا سال
Musalman Aur Naye Saal ki Khurafaat پر ایک بہترین آرٹیکل اور ایک اسلامی نقطہ نظر ،دنیا بھر میں ہر سال کے آغاز پر مختلف ثقافتوں اور معاشروں میں نئے سال کا جشن منایا جاتا ہے۔ یہ جشن مختلف طریقوں سے منایا جاتا ہے، جن میں آتشبازی، رقص، موسیقی، اور مختلف تقریبات شامل ہیں۔ لیکن ایک مسلمان کے لیے یہ ضروری ہے کہ وہ اپنی زندگی کے ہر پہلو میں اسلامی تعلیمات کو مدنظر رکھے۔ اسلامی تعلیمات کی روشنی میں، ہر عمل کو اللہ کی رضا کے مطابق ہونا چاہیے۔ دنیاوی تہواروں اور رسومات کے پیچھے اکثر ایسے عقائد اور اعمال ہوتے ہیں جو اسلام کے اصولوں سے متصادم ہیں۔ نئے سال کا جشن بھی ان میں سے ایک ہے،اس پوسٹ میں ہم Musalman Aur Naye Saal ki Khurafaat اور اس میں ہونے والے خرافات اور غیر شرعی اعمال پر اور اسلامی نقطہ نظر پر روشنی ڈالیں گے۔
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کُچّھ خوشیوں,کُچّھ غموں بھرا حال گیاکسی نے کیا خوب کہا ہے:ایک اور اینٹ گر گئی دیوارِ حیات سےنادان کہہ رہے ہیں نیا سال مبارک ہو
ہر ایک پریشانی کو ربّ میرا ٹال گیا
زندگی ملی ہے تو یونہی نہ گنواں محب
کر فکرِ عقبہ ,ایک اور سنہرا سال گیا
انسان غلطی کا پتلا ہے اس سے غلطیاں تو ہوں گی ہی ، کسی غلطی کا ارتکاب تو برا ہے ہی اس سے بھی زیادہ برا یہ ہے کہ اس سے سبق حاصل نہ کیا جائے اور اسی کا ارتکاب کیا جاتا رہے۔
یہ منصوبہ بندی دینی اور دنیوی دونوں معاملات میں ہو جیساکہ حدیث سے معلوم ہوتاہے۔ نبی کریم صلی اللہ علیہ وسلم کا ارشاد ہے: ”اِغْتَنِمْ خَمْسًا قَبْلَ خَمْسٍ شَبَابَکَ قَبْلَ ھَرَمِکَ ، وَصِحَّتَکَ قَبْلَ سَقَمِکَ، وَغِنَاکَ قَبْلَ فَقْرِکَ، وَفَرَاغَکَ قَبْلَ شُغْلِکَ ، وَحَیَاتَکَ قَبْلَ مَوْتِکَ“۔ (مشکاة المصابیح ۲/۴۴۱ کتاب الرقاق)
ترجمہ: پانچ چیزوں سے پہلے پانچ چیزوں کو غنیمت جان لو (۱) اپنی جوانی کو بڑھاپے سے پہلے (۲) اپنی صحت و تندرستی کو بیماری سے پہلے (۳) اپنی مالداری کو فقروفاقے سے پہلے (۴) اپنے خالی اوقات کو مشغولیت سے پہلے (۵) اپنی زندگی کو موت سے پہلے۔
آخرت کی زندگی کی کامیابی اور ناکامی کا دارومدار اسی دنیا کے اعمال پر منحصر ہے۔ جیساکہ ارشاد ربانی ہے:” وَأنْ لَیْسَ لِلإنْسَانِ إلاَّ مَاسَعٰی، وَأنَّ سَعْیَہ سَوْفَ یُرٰی، ثُمَّ یُجْزَاہُ الْجَزَاءَ الأوْفیٰ“۔ (سورہٴ نجم، آیت/ ۳۹،۴۰،۴۱)
ترجمہ: اور ہر انسان کے لیے صرف وہی ہے جس کی کوشش خود اس نے کی، اور بیشک اس کی کوشش عنقریب دیکھی جائے گی، پھر اسے پورا پورا بدلہ دیا جائے گا۔
نئے سال کی حقیقت:
نیا سال ایک عیسوی کیلنڈر کا حصہ ہے، جو حضرت عیسیٰ علیہ السلام کی پیدائش سے منسلک ہے۔ اسلامی کیلنڈر قمری نظام پر مبنی ہے، اور اس کا آغاز محرم الحرام سے ہوتا ہے۔ مسلمانوں کے لیے ہجری کیلنڈر زیادہ اہمیت رکھتا ہے، کیونکہ یہ ہمارے دینی معاملات، روزے، حج، اور دیگر عبادات کے لیے بنیاد فراہم کرتا ہے۔نئے سال کی تقریبات بنیادی طور پر مغربی تہذیب کا حصہ ہیں۔ یہ جشن عیسوی کیلنڈر کے آغاز پر منایا جاتا ہے، جو مسیحی عقائد اور تہذیب سے جڑا ہوا ہے۔ مسلمانوں کے لیے ضروری ہے کہ وہ اپنی دینی شناخت کو برقرار رکھیں اور کسی بھی غیر اسلامی رسم کو بلا سوچے سمجھے اپنانے سے گریز کریں۔
رسول اللہ ﷺ نے فرمایا:"من تشبه بقوم فهو منهم"
(جو کسی قوم کی مشابہت اختیار کرے، وہ انہی میں سے ہے)۔(سنن ابوداؤد، حدیث 4031)
اس حدیث کی روشنی میں مسلمانوں کو ایسی تقریبات سے دور رہنا چاہیے جو اسلامی تعلیمات سے مطابقت نہیں رکھتیں۔
نئے سال کی خرافات:
نئے سال کے جشن کے دوران کئی خرافات عام ہیں:آتشبازی اور فضول خرچی:
نئے سال کی رات آتشبازی کا خاص رجحان پایا جاتا ہے، جس کے منفی اثرات درج ذیل ہیں:ماحولیاتی نقصان: آتشبازی سے دھواں اور زہریلی گیسیں خارج ہوتی ہیں، جو ماحولیاتی آلودگی کا باعث بنتی ہیں۔مالی نقصان: یہ عمل فضول خرچی ہے، جو اسلام میں ممنوع ہے۔ذہنی سکون کا خاتمہ: آتشبازی سے شور اور بے سکونی پیدا ہوتی ہے، جو انسانوں اور جانوروں کے لیے نقصان دہ ہے۔نئے سال کے جشن میں آتشبازی پر لاکھوں روپے خرچ کیے جاتے ہیں، جو نہ صرف وسائل کا ضیاع ہے بلکہ ماحولیاتی آلودگی کا سبب بھی بنتا ہے۔
رات بھر بے مقصد جشن:
کئی لوگ رات بھر جاگ کر ناچ گانے اور بے مقصد سرگرمیوں میں مشغول رہتے ہیں،جو نہ صرف وقت کا ضیاع ہے بلکہ اسلامی تعلیمات کے خلاف بھی ہے۔ رات بھر جاگ کر موسیقی، رقص، اور دیگر غیر اخلاقی سرگرمیوں میں ملوث ہونا اسلام کے اس اصول کے خلاف ہے کہ انسان کو اپنی زندگی کا ہر لمحہ کارآمد اور نیک اعمال میں صرف کرنا چاہیے۔ اللہ تعالیٰ نے قرآن میں فرمایا:"ولا تبذر تبذيرا، إن المبذرين كانوا إخوان الشياطين"(اور فضول خرچی نہ کرو، بے شک فضول خرچ لوگ شیطان کے بھائی ہیں)۔(سورۃ الإسراء: 26-27)
شراب نوشی اور غیر اخلاقی اعمال:
کچھ لوگ اس موقع پر حرام سرگرمیوں میں ملوث ہو جاتے ہیں، جیسے شراب نوشی اور دیگر غیر اخلاقی کام، جو کہ واضح طور پر شریعت کے خلاف ہیں۔جن چیزوں کو شریعت نے حرام قرار دیا ہے اسی میں آج اکثریت ملوث ہے
نئے سال کی رات:
مگر افسوس کہ آج کے کچھ مسلمان اسے جشن کے طور پر بڑے فخر سے مناتے ہیں۔اے اللہ! تُو ہر مسلمان بھائی بہن کو اس بے حیائی اور بے دینی والی رات میں گناہوں سے بچا۔اے اللہ! ہمیں ہدایت دے اور ان کاموں سے محفوظ رکھ جو تیری ناراضگی کا سبب بنتے ہیں۔آمین۔
- یہ وہ رات ہے جس میں ہر وہ کام کیے جاتے ہیں جنہیں اسلام نے حرام قرار دیا ہے۔
- اس رات کو جشن منانے سے پہلے ایک بار اپنی قبر کی اندھیری رات کو ضرور یاد کر لینا۔
- الٹی سیدھی حرکتیں کر کے، ناچ گانے کے ساتھ دیگر گناہ کر کے خوشیاں منائی جاتی ہیں۔
- 31 دسمبر کی یہ رات، جس میں شاید ہی کوئی گناہ ہو جو اس رات نہ کیا جاتا ہو۔
- یہ وہ رات ہے جس میں معصوم لڑکیوں کی عزت سے کھیلا جاتا ہے۔
- یہ وہ رات ہے جس میں کچھ لوگ پہلی بار شراب کو ہاتھ لگاتے ہیں اور پھر آہستہ آہستہ اس کے عادی ہو جاتے ہیں۔
- یہ وہ رات ہے جس میں جسم فروشی کے بازار اور زنا کے اڈے سجائے جاتے ہیں۔
- یہ وہ رات ہے جس میں بے حیائی اور بے شرمی کھلے عام کی جاتی ہے۔
کیا کریں نئے سال پر:
اپنی پہچان قائم رکھیں:
نئے سال کے جشن میں شریک ہونا ایک طرح سے غیر اسلامی رسموں کو اپنانے جیسا ہے. نبی کریم ﷺ نے ہمیں غیر قوموں کی نقل کرنے سے منع فرمایا ہے. نبی کریم ﷺ نے فرمایا:جو شخص کسی قوم کی نقل کرتا ہے وہ اسی کا حصہ بن جاتا ہے . ابو داؤد.لہٰذا! آپ مسلمان ہیں اور اپنی پہچان کو برقرار رکھیں اور نبی کریم ﷺ کی نا فرمانی نہ کریں.
وقت کی قدر
اللہ تعالیٰ نے قرآن میں وقت کی قسم کھائی ہے:
"والعصر، إن الإنسان لفي خسر" (العصر: 1-2)
وقت ایک عظیم نعمت ہے اور اس کا ضیاع ایک مسلمان کے شایانِ شان نہیں۔
فضول خرچی سے اجتناب:
قرآن مجید میں اللہ تعالیٰ فرماتے ہیں:
"إن المبذرين كانوا إخوان الشياطين" (الإسراء: 27)
فضول خرچی کرنے والے شیطان کے بھائی ہیں۔ آتشبازی اور غیر ضروری خرچ اس آیت کی خلاف ورزی ہے۔
حلال اور حرام کی تمیز:
ایک مسلمان کو ہر وقت یہ دیکھنا چاہیے کہ وہ کیا کر رہا ہے اور اس کا عمل اللہ کی رضا کے مطابق ہے یا نہیں۔ حرام سرگرمیوں میں ملوث ہونا ہمیں اللہ کے قریب کرنے کے بجائے اس کی ناراضگی کا باعث بنتا ہے۔
نئے سال کو مثبت انداز میں منائیں:
اگرچہ نئے سال کا جشن منانا اسلامی طور پر جائز نہیں، لیکن اس موقع کو مثبت انداز میں استعمال کیا جا سکتا ہے:خود احتسابی: اپنی پچھلی زندگی کا جائزہ لیں اور آنے والے وقت کے لیے بہتر ارادے کریں۔
نیک اعمال کا آغاز: قرآن کی تلاوت کریں، دعا کریں، اور اللہ سے ہدایت طلب کریں۔
غریبوں کی مدد: اپنے وسائل کو ضائع کرنے کے بجائے ضرورت مندوں کی مدد کریں۔اور یہ عمل صرف نئے سال پر ہی نہیں بلکہ ہماری روزمرہ کی زندگی میں ہونا چاہیے
اسلامی تہذیب کو اپنانا:
اسلام ہمیں سادگی، شکرگزاری، اور مقصدیت کی تعلیم دیتا ہے۔ ایک مسلمان کو دنیاوی تہواروں کی تقلید کرنے کے بجائے اپنی دینی شناخت کو مضبوط کرنا چاہیے۔ رسول اللہ ﷺ نے فرمایا:"أفضل الناس من طال عمره وحسن عمله"(سب سے بہترین انسان وہ ہے جس کی عمر طویل ہو اور اس کے اعمال اچھے ہوں)۔(ترمذی، حدیث 2330)
علماء کرام کے فتاویٰ:
نئے سال کی خرافات اور اسلامی اصولوں کے خلاف ہونے کے بارے میں کئی علماء کرام نے فتاویٰ جاری کیے ہیں۔ یہاں چند مشہور علماء کے اقوال درج کیے جا رہے ہیں:1. شیخ عبدالعزیز بن باز (رحمۃ اللہ علیہ)
سعودی عرب کے مشہور مفتی اعظم شیخ بن باز (رحمۃ اللہ علیہ) نے فرمایا:
"غیر مسلموں کے تہواروں اور رسومات میں شریک ہونا، چاہے وہ نئے سال کا جشن ہو یا کوئی اور موقع، مسلمانوں کے لیے حرام ہے۔ یہ نہ صرف ان کی تہذیب کو اپنانے کے مترادف ہے بلکہ اسلامی تعلیمات کے سراسر خلاف بھی ہے۔"
2. شیخ ابن عثیمین (رحمۃ اللہ علیہ)
شیخ ابن عثیمین نے نئے سال اور دیگر غیر اسلامی تہواروں کے بارے میں فرمایا:
"نئے سال کا جشن منانا یا اس میں کسی بھی طرح شریک ہونا اسلام میں حرام ہے۔ یہ اللہ کی شریعت اور رسول اللہ ﷺ کی سنت کے خلاف ہے۔ مسلمان کو چاہیے کہ وہ اپنے دین اور شناخت پر قائم رہے۔"
(فتاویٰ ابن عثیمین، جلد 3)
3. امام ابن تیمیہ (رحمۃ اللہ علیہ)
امام ابن تیمیہ نے اپنی کتاب "اقتضاء الصراط المستقیم" میں لکھا:
"غیر مسلموں کی تہذیب اور ان کے تہواروں کو اپنانا اسلامی معاشرے کو کمزور کرتا ہے۔ یہ نہ صرف ان کے طور طریقوں کو ماننے جیسا ہے بلکہ ان کی نقالی مسلمانوں کی شناخت کو مٹانے کا سبب بنتی ہے۔"
4. دارالعلوم دیوبند (ہندوستان)
دارالعلوم دیوبند کے فتوے میں کہا گیا ہے:
"نئے سال کے جشن میں شریک ہونا یا اس موقع پر کسی طرح کی خوشی کا اظہار کرنا غیر اسلامی روایت کو اپنانے کے مترادف ہے۔ یہ فضول خرچی اور غیر محسوس طریقے سے دوسرے مذاہب کی نقل کرنے جیسا ہے، جو بالکل ناجائز ہے۔"
5. جمعیت علماء ہند
جمعیت علماء ہند کے علماء نے فرمایا:
"مسلمان کو چاہیے کہ وہ غیر مسلموں کے تہواروں اور رسومات سے مکمل طور پر الگ رہے۔ نئے سال کا جشن، جو عیسائی کیلنڈر پر مبنی ہے، ہماری اسلامی تہذیب اور شناخت کے خلاف ہے۔"
6. مفتی محمد شفیع (رحمۃ اللہ علیہ)
مفتی شفیع (رحمۃ اللہ علیہ) نے اپنی کتاب "معارف الفقہ" میں لکھا:
"مسلمانوں کے لیے غیر اسلامی رسومات اور تہواروں میں شریک ہونا جائز نہیں ہے۔ یہ اسلامی تہذیب کے کمزور ہونے اور غیر مسلم کلچر کی حمایت کرنے کا ذریعہ بنتا ہے۔"
7. شیخ صالح الفوزان
شیخ صالح الفوزان نے فرمایا:
"نئے سال کا جشن منانا غیر مسلموں کی شناخت اور ان کی روایت کو اپنانے جیسا ہے۔ مسلمانوں کو چاہیے کہ وہ ایسے ہر موقع سے دور رہیں جو ان کے ایمان اور اسلامی تعلیمات کو کمزور کر سکتا ہے۔"
اہم نکتہ و نصیحت:
علماء کرام نے ہمیشہ اس بات پر زور دیا ہے کہ مسلمانوں کو اپنے دین، تہذیب، اور شناخت پر فخر کرنا چاہیے۔ غیر اسلامی رسومات اور جشن میں شریک ہونا نہ صرف اللہ کی ناراضگی کا سبب بنتا ہے بلکہ یہ مسلمانوں کو ان کی اصل سے بھی دور کر دیتا ہے۔
مسلمانوں کو چاہیے کہ وہ علماء کی ان نصیحتوں کو سمجھیں اور ان پر عمل کریں۔ نئے سال کے جشن سے اجتناب کرتے ہوئے اس موقع کو اللہ کی یاد، توبہ، اور نیک ارادوں کے ساتھ گزاریں۔ یہی اسلامی طرز عمل ہے.
Conclusion:
Musalman Aur Naye Saal ki Khurafaat اِس تحریر کو پڑھنے کے بعد سمجھ میں آ گیا ہوگا کہ مسلمان کے لیے ضروری ہے کہ وہ اپنی زندگی کو اسلامی اصولوں کے مطابق گزارے۔ نئے سال کے جشن کی خرافات میں شامل ہونے کے بجائے، اس وقت کو خود احتسابی، عبادت، اور نیک ارادے کرنے میں صرف کیا جائے۔یہ موقع ہمیں یاد دلاتا ہے کہ دنیاوی زندگی عارضی ہے اور ہمیں اپنی آخرت کی تیاری کرنی چاہیے۔
ہر نیا سال خوشی کے بجائے ایک سچے مومن کو بےچین کر دیتا ہے، کیونکہ اسے یہ احساس ہوتا ہے کہ اس کی عمر آہستہ آہستہ کم ہو رہی ہے اور برف کی طرح پگھل رہی ہے۔ وہ کس بات پر خوشی منائے؟ بلکہ، اس سے پہلے کہ زندگی کا سورج ہمیشہ کے لیے غروب ہو جائے، کچھ کر گزرنے کی خواہش اسے بےچین کر دیتی ہے۔ اس کے پاس وقت کم اور کام زیادہ ہوتا ہے۔
ہمارے لیے نیا سال صرف موج مستی کا وقت نہیں ہے، بلکہ گزرتے وقت کی قدر کرتے ہوئے آنے والے لمحات کا صحیح استعمال کرنے کا عہد کرنے کا موقع ہے۔ یہ اپنے ارادوں کو دوبارہ مضبوط کرنے اور حوصلے بلند کرنے کا وقت ہے۔نئے سال کی خرافات اور غیر اسلامی روایات سے دور رہنا ہماری شناخت اور ایمان کا تقاضا ہے۔ یہ وقت ہمیں اللہ سے توبہ کرنے، اپنے ایمان کو مضبوط کرنے، اور نیکیوں کی راہ پر چلنے کا موقع دیتا ہے۔ مسلمانوں کو چاہیے کہ وہ اپنے وقت، مال اور عزت کو فضول کاموں میں ضائع کرنے کے بجائے اسے اللہ کی راہ میں لگائیں۔ یہی اصل کامیابی ہے۔
مسلمانوں کو چاہیے کہ وہ اپنی تہذیب اور اسلامی شناخت کو برقرار رکھیں۔ نئے سال کے موقع پر خوشی منانا حرام نہیں، لیکن اسے اسلامی انداز میں منانا ضروری ہے۔ غیر اسلامی رسومات کو اپنانے کے بجائے اللہ کی طرف رجوع کریں اور اپنی زندگی میں دین کی روشنی پھیلائیں۔
اللہ تعالیٰ ہمیں ہدایت عطا فرمائے اور ہمیں اپنی زندگی کو اس کے احکامات کے مطابق گزارنے کی توفیق دے۔ آمین۔
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