Kya islam Talwar ke Zor se Phaila | Tareekhi Haqeeqat Aur Daleel

"इस्लाम महज़ एक मज़हब नहीं, बल्कि एक मुकम्मल निज़ाम-ए-ज़िंदगी है जो इंसान को अमन, अद्ल और रहमत का रास्ता दिखाता है और सलामती का पैग़ाम देता है तो यह कैसे हो सकता है कि इस्लाम तलवार के ज़ोर से फैला "इस्लाम" का लफ़्ज़ ही "सलामती" और "तस्लीम" से निकला है—यानी अल्लाह के हुक्म के सामने सर झुका देना और दूसरों के लिए अमन व शांति का पैग़ाम देना।

दुनिया के सबसे तेज़ी से फैलते हुए मज़हब "इस्लाम" को लेकर बहुत सी ग़लतफहमियाँ फैलायी जाती हैं, जिस के बारे में अक्सर एक सवाल उठाया जाता है:
"Kya islam Talwar ke Zor se Faila hai?"

यह इल्ज़ाम ना सिर्फ़ इस्लाम की सच्ची तालीमात को गलत पेश करता है, बल्कि तारीख़ और दीन-ए-इस्लाम की रूह के खिलाफ़ भी है। इस आर्टिकल में हम इस सवाल का जायज़ा लेंगे !इस इल्ज़ाम का जवाब तालीमी, सीरती और तारीखी रौशनी में बेहद वाज़ेह है। 
✍️ लेखक: Mohib Tahiri | 🕋 islamic article|islam aur talwa| islam se mutalliq ghalt fahmi🕰 अपडेटेड:18 May 2025
islam ek aman ka mazhab hai aur Talwar se nahi Akhlaq se Phaila
Kya islam Talwar ke Zor se Faila hai ?

📖 Table of Contents

    इस लेख "Kya islam Talwar ke Zor se Phaila"में हम क़ुरआन, हदीस, उलमा-ए-किराम के अक़वाल और ठोस तारीखी हवालों के साथ यह साबित करेंगे कि इस्लाम का फैलाव तलवार नहीं, बल्कि दावत, अख़लाक़ और हिकमत की वजह से हुआ।मक़सद है सच को सामने लाना और ग़लतफहमियों का इज़ाला करना।

    अगर इस्लाम तलवार के ज़ोर से फैलता, तो आज भारत, स्पेन, चीन और रूस जैसे मुल्कों में करोड़ों मुसलमान न होते। क्योंकि वहाँ मुसलमान हुकूमतों के ज़माने गुजरने के बावजूद, इस्लाम क़ायम रहा – वो भी सिर्फ़ दावत और अच्छे अख़लाक़ की वजह से।

    इस्लाम का असल पैग़ाम


    इस्लाम महज़ एक मज़हब नहीं, बल्कि एक मुकम्मल निज़ाम-ए-ज़िंदगी है जो इंसान को अमन, अद्ल और रहमत का रास्ता दिखाता है और सलामती का पैग़ाम देता है। 
    "इस्लाम" का लफ़्ज़ ही "सलामती" और "तस्लीम" से निकला है—यानी अल्लाह के हुक्म के सामने सर झुका देना और दूसरों के लिए अमन व शांति का पैग़ाम बन जाना।
    नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पूरी ज़िंदगी इस बात की मिसाल है कि इस्लाम तलवार से नहीं, बल्के रहमत, इंसाफ़ और करम से दिलों में उतरा।

    आईए कुछ दलील देखें:

    और (ऐ नबी) हम ने तुम्हें सारी दुनिया के लिए रहमत बना कर भेजा।”
    — सूरह अल-अंबिया, आयत 107

    इस आयत में अल्लाह तआला अपने प्यारे रसूल हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को "रहमत-लिल-आलमीन" यानी सारी दुनिया के लिए रहमत (दयालुता, करुणा और भलाई का स्रोत) बताता है। यह बताता है कि नबी की तालीमात सिर्फ मुसलमानों तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत, जानवरों, पर्यावरण और हर जीव के लिए लाभदायक हैं। उनका मिशन दुनिया में अमन, इंसाफ़ और इंसानियत का पैग़ाम देना था।


    “मैं रहमत बनाकर भेजा गया हूँ, लानत करने वाला नहीं।”
    सहीह मुस्लिम, हदीस: 2599

    यह हदीस नबी (स.अ.) के उस व्यवहार को दर्शाती है जो दया, सहनशीलता और क्षमा से भरा हुआ था। यह स्पष्ट करता है कि इस्लाम का संदेश बदला लेने या किसी को नीचा दिखाने का नहीं, बल्कि नर्मी, मोहब्बत और इंसाफ का है। नबी (स.अ.) ने अपने दुश्मनों के साथ भी करुणा का व्यवहार किया और हमेशा बदले में दुआ देना पसंद किया।


    “जो लोगों पर रहम नहीं करता, अल्लाह उस पर रहम नहीं करता।”
    — सहीह बुख़ारी, हदीस: 6013

    यह हदीस इंसानों के बीच रहम-दिली की बुनियादी अहमियत को उजागर करती है। इस्लाम में यह शिक्षा दी गई है कि जो इंसान दूसरों के साथ नरमी और दया से पेश नहीं आता, वो खुद अल्लाह की रहमत से महरूम हो सकता है। इसीलिए मुसलमान से उम्मीद की जाती है कि वह अपने अंदर रहम, इंसानियत और हमदर्दी के जज़्बे को ज़िंदा रखे — चाहें सामने वाला कोई भी हो।

    इन नबवी फ़रमूदात और क़ुरआनी हिदायतों से साफ़ ज़ाहिर होता है कि इस्लाम का असल मक़सद इंसानियत की भलाई, सलामती और अल्लाह की इताअत (आज्ञापालन) है—न ज़बरदस्ती, न तलवार, न जब्र।
    इस्लाम एक दावत है, दबाव नहीं। यह रहमत का पैग़ाम है, ख़ौफ़ का नहीं। जो इसे समझेगा, वही दिल से इसे अपनाएगा।

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    अमन और दावत

    क़ुरआन फरमाता है:

    “ला इक्राहा फ़िद्दीन”
    "दीन में कोई ज़बरदस्ती नहीं है।"
    — (सूरह अल-बक़रह, आयत 256)

    "क्या आप लोगों पर ज़बरदस्ती करना चाहते हैं कि वो क्यूं ईमान नहीं लाते ?"(सूरा यूनुस:99) 

    यह आयत इस्लाम की बुनियादी तालीमात को वाज़ेह कर देती है कि इस्लाम में किसी को मजबूर करके दीन में दाख़िल करवाने की कोई गुंजाइश नहीं है। लेकिन फिर भी अक्सर यह सवाल उठता है कि Kya islam Talwar ke Zor se Faila hai?



    रसूलुल्लाह (स.) की सीरत से हकीकत

    रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सीरत से भी ये वाज़ेह होता है कि इस्लाम की तबलीग अमन, सब्र और हुस्न-ए-अख़लाक़ के साथ हुई।
    नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मक्का में 13 साल तक शिद्दत की तकलीफ़ें उठाईं लेकिन कभी भी अपने दुश्मनों के लिए बद्दुआ तक नहीं की। जब मदीना में इस्लामी हुकूमत क़ायम हुई तब भी यहूदियों, ईसाइयों और दूसरे मज़हब वालों को पूरा हक़ दिया गया कि वो अपने मज़हब पर क़ायम रहें।

    हुदैबिया का सुलह और फत्ह मक्का जैसे वाक़ियात इस बात का सुबूत हैं कि रसूलुल्लाह (स.) ने जंग से ज़्यादा अमन को तरजीह दी। फत्ह मक्का के वक़्त जब नबी (स.) ने अपने दुश्मनों से फ़रमाया:
    जाओ, तुम सब आज़ाद हो।”
    (सीरत-ए-नबवी से मवाक़ेअ


    दीन में कोई ज़बरदस्ती नहीं होती।"

    सय्यदना उमर रज़ियल्लाहु अन्हु जिस रौब, शान-ओ-शौकत और असरदार हुकूमत के मालिक थे, वह किसी से छुपी हुई नहीं। आपके यहाँ एक नौकर था जिसका नाम असबक़ था—वह एक ईसाई था। असबक़ एक समझदार और होशियार इंसान था, इसलिए सय्यदना उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने उससे फरमाया:
    "अगर तुम इस्लाम कबूल कर लो, तो हम तुम्हें मुसलमानों की खिदमत में अहम जिम्मेदारी सौंपेंगे।"

    यह एक साफ़ इशारा था कि आप उसे कोई ऊँचा ओहदा देना चाहते थे। लेकिन जब भी आप इस्लाम की दावत देते, वह इंकार कर देता। इस पर आप सिर्फ़ यह कह कर ख़ामोश हो जाते:

    "لَا إِكْرَاهَ فِي الدِّينِ"
    "दीन में कोई ज़बरदस्ती नहीं है।"

    (सूरह अल-बक़रह, आयत 256)


    यह वाक़िआ इस बात की ज़िंदा मिसाल है कि जब सय्यदना उमर रज़ियल्लाहु अन्हु अपने एक ग़ुलाम को भी तलवार या दबाव से मुसलमान नहीं बना सके, तो यह मान लेना कि उन्होंने अपनी फतह की गई वसी' व अरीज़ सरज़मीनों (व्यापक जीते हुए क्षेत्रों) में लोगों को ज़बरदस्ती इस्लाम में दाख़िल किया होगा—अक़्ल और हकीकत दोनों के खिलाफ़ है।

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    हिंदुस्तान में इस्लाम की आमद मोहम्मद बिन क़ासिम (711 ई.) के ज़माने से पहले ही अरब ताजिरों के ज़रिए हो चुकी थी। खासतौर पर मलाबार, केरल और तटीय इलाक़ों में मुसलमान ताजिरों ने अपने अख़लाक़ और ईमानदारी से लोगों को मुतास्सिर किया। यानी इस्लाम मलाबार और गुजरात में अरब ताजिरों और बुर्जुगों की वजह से फैला।



    "इस्लाम तलवार से नहीं, हक़ से फैला


    इस बात को मान लेना कि इस्लाम तलवार के ज़ोर पर फैला, न सिर्फ़ ग़लत है, बल्कि यह तवारीखी हक़ीक़तों से सीधा टकराता है। अगर यह नज़रिया (theory) स्वीकार कर लिया जाए, तो नीचे दिए गए सवालात हर ज़हीन (सोचने वाले) इंसान के ज़ेहन में उठते हैं:

    1️⃣ मक्की दौर के मुसलमान कौन सी तलवार से मुसलमान हुए थे?
    शुरुआती दौर में जो लोग मुसलमान हुए और 13 वर्षों तक मक्का में ज़ुल्म व सितम सहते रहे, उन्हें किसने ज़बरदस्ती मुसलमान बनाया? वहाँ तो तलवार चलाने की इजाज़त ही नहीं थी।

    2️⃣ मदीना में दुश्मन ज़्यादा, मुसलमान कमज़ोर — फिर इस्लाम कैसे फैला?
    मदीना में मुसलमानों के मुक़ाबिल चार तरह के दुश्मन थे: क़ुरैश-ए-मक्का, यहूदी, मुनाफ़िक़ीन और अरब के मुशरिक क़बाइल। बावजूद इसके, ग़ज़्वा-ए-बद्र में 313 मुसलमान थे, और सिर्फ़ एक साल बाद जंग-ए-उहद में उनकी संख्या बढ़कर 700 हो गई। यह तेज़ी किस तलवार का नतीजा थी?

    3️⃣ जंग-ए-ख़ंदक़ में चार गुना इज़ाफ़ा कैसे हुआ?
    दो साल बाद जंग-ए-ख़ंदक़ में मुसलमानों की तादाद 3,000 तक पहुँच गई। उस दौर में उनके पास कौन सी सैन्य ताक़त थी जो लोगों को इस्लाम की तरफ़ खींच रही थी?

    4️⃣ सुल्ह-ए-हुदैबिया में तलवार नहीं, लेकिन लोग मुसलमान कैसे हो गए?
    सुलह-ए-हुदैबिया में कोई जंग नहीं हुई, कोई तलवार नहीं चली। फिर क्या वजह थी कि इस संधि के बाद बड़ी तादाद में लोग इस्लाम में दाख़िल होने लगे?

    5️⃣ फ़त्ह-ए-मक्का: बग़ैर जंग, बग़ैर तलवार
    जब मक्का फ़तह हुआ, तो तलवारें मयान में रहीं और सबको आम मुआफ़ी दी गई। फिर भी लोग जुक-कर इस्लाम कबूल करने लगे। अगर डर होता, तो इस्लाम अपनाते ही क्यों?

    6️⃣ यहूद से जंगों के बाद कौन मुसलमान हुआ?
    कई यहूदी क़बीलों से जंगें हुईं, मगर क्या इनमें से कोई बड़ी यहूदी आबादी मुसलमान हुई? तारीख़ गवाह है कि नहीं।

    7️⃣ अहल-ए-ताइफ़ का इस्लाम कबूल करना दबाव था या दलील?
    जब ताइफ़ का मुहासरा (घेराबंदी) खत्म कर दिया गया, तब ताइफ़ के लोग खुद-ब-खुद इस्लाम में दाख़िल हो गए। अगर तलवार दबाव बनाती, तो यह तब होता जब वो घिरे हुए थे, न कि बाद में।


    नतीजा:
    इन सवालों से साफ़ होता है कि इस्लाम तलवार या दबाव से नहीं, बल्कि हक़, इंसाफ़ और सच्चाई की बुनियाद पर फैला। जबरदस्ती नहीं, बल्कि दिलों पर हुकूमत इस्लाम का असल तरीका रहा है।


    उलमा का नज़रिया

    इस्लाम की तारीख़ और उसके महान उलमा इस बात पर मुत्तफ़िक़ हैं कि किसी को इस्लाम कबूल करने पर मजबूर नहीं किया जा सकता। इस्लाम की बुनियाद दलील, हिकमत और अख़लाक़ी असर पर है—not तलवार या जब्र।


    इमाम अबू हनीफा रह., इमाम मालिक रह. और इमाम ग़ज़ाली रह. जैसे बड़े मसलकी इमामों का इत्तेफ़ाक़ है कि इस्लाम में इकराह (ज़बरदस्ती) की कोई गुंजाइश नहीं।


    शैख़ुल इस्लाम इब्न तैमिया रह. फ़रमाते हैं:

    “इस्लाम की दावत दलील से दी जाती है, न कि तलवार से। जिहाद का मक़सद दावत के रास्ते की रुकावटें हटाना है, न कि लोगों को जबरदस्ती मुसलमान बनाना।”
    — (अस्सारिम अल-मस्लूल)


    इमाम ग़ज़ाली रह. लिखते हैं:

    “इस्लाम का असल मक़सद यह है कि दलील और दावत के ज़रिए लोगों के दिलों को रोशन किया जाए, न कि तलवार से दबाव डालकर।”
    — (इहया उलूमुद्दीन, जिल्द 1)


    शैख़ इब्न तैमिया रह. एक और जगह फ़रमाते हैं:

    “इस्लाम में तलवार का इस्तेमाल सिर्फ़ हिफाज़त के लिए है, दावत के लिए नहीं।”


    नतीजा:
    बड़े-बड़े इस्लामी मुफक्किर और आलिम इस बात पर यक़ीन रखते हैं कि इस्लाम की तालीमात जब्र पर नहीं, बल्के दलील, रहमत और अख़लाक़ पर क़ायम हैं। तलवार इस्लाम का औज़ार नहीं, बल्कि हिफाज़त का ज़रिया है।




    क्या इस्लाम तलवार के ज़ोर से फैला है? (Historical Facts)

    1. हिंदुस्तान में इस्लाम का फैलाव :

    अगर इस्लाम तलवार के ज़ोर से फैलता, तो आज भारत, स्पेन, चीन और रूस जैसे मुल्कों में करोड़ों मुसलमान न होते। क्योंकि वहाँ मुसलमान हुकूमतों के ज़माने गुजरने के बावजूद, इस्लाम क़ायम रहा – वो भी सिर्फ़ दावत और अच्छे अख़लाक़ की वजह से।
    हिंदुस्तान में इस्लाम की आमद मोहम्मद बिन क़ासिम (711 ई.) के ज़माने से पहले ही अरब ताजिरों के ज़रिए हो चुकी थी। खासतौर पर मलाबार, केरल और तटीय इलाक़ों में मुसलमान ताजिरों ने अपने अख़लाक़ और ईमानदारी से लोगों को मुतास्सिर किया। यानी इस्लाम मलाबार और गुजरात में अरब ताजिरों और बुर्जुगों की वजह से फैला।

    "A History of South India" – के. ए. नीलकंठ शास्त्री
    "Muslim Contribution to Indian Culture" – S. M. Ikram

    2. स्पेन (अंदालुस) की मिसाल – एक ग़ैर-मजबूरी वाला दौर

    स्पेन में मुसलमानों ने 711 ई. में अमन के साथ हुकूमत क़ायम की। 711 ई. में तारिक़ बिन ज़ियाद ने अंदालुस फतह किया, मगर यहूदियों और ईसाइयों को दीन में मजबूर नहीं किया गया। ईसाइयों और यहूदियों को उनके मज़हब पर बाक़ी रहने की आज़ादी दी गई। यहां तक कि मुसलमानों के दौर को "Golden Age of Jews in Spain" कहा गया, जिसमें यहूदी उलेमा और दार्शनिकों ने बेमिसाल तरक्की की।

    "Legacy of Islam" – Sir Thomas Arnold
    "The Myth of the Muslim Tide" – Doug Saunders

    3. इंडोनेशिया – सबसे बड़ा मुस्लिम मुल्क, बिना तलवार के

    इंडोनेशिया, जो आज दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम मुल्क है, वहां इस्लाम ना तलवार से फैला, ना फौज से। बल्कि अरब ताजिरों, बुजुर्गान ए दीन और मुअल्लिमों की वजह से वहां इस्लाम फैला। आज भी इंडोनेशिया में इस्लाम की रूहानियत और अमन की झलक देखी जा सकती है।
    दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम मुल्क बिना किसी जंग के मुसलमान बना।

    "Islam in Indonesia" – Howard Federspiel
    "The Spread of Islam in Southeast Asia" – A.H. Johns

    4. अफ्रीका में इस्लाम – अद्ल व इंसाफ़ की वजह से

    मिस्र, सूडान, माली, और नाइजीरिया जैसे अफ्रीकी मुल्कों में इस्लाम मुसलमान ताजिरों और बुजुर्गान ए दीन के ज़रिए फैला। माली के हुक्मरान मनसा मूसा ने इस्लामी अद्ल व इंसाफ़ के ज़रिए एक नायाब तहज़ीब की बुनियाद रखी।
    मनसा मूसा (1312-1337) ने इस्लाम को अमन व अद्ल के साथ फैलाया। कोई जबरदस्ती नहीं की गई।

    "West Africa Before the Colonial Era" – Basil Davidson
    "History of Africa" – Kevin Shillington

    5. सलूक और तालीम का असर

    क़ुरआन की तालीम और नबी (स.) का किरदार, जैसे कि "फत्ह मक्का" में आम माफ़ी का एलान, दुश्मनों को भी मुसलमान बना गया। तलवार से नहीं, बल्कि अख़लाक़ और इंसाफ़ से दिलों को फ़त्ह किया गया।
    फत्ह मक्का के दिन नबी (स.) ने माफ़ी का एलान किया:

    "जाओ, तुम सब आज़ाद हो"
    — (सिरा इब्न हिशाम)

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    इस्लाम और जिहाद की असल हकीकत


    जिहाद का मक़सद “लोगों पर जबरदस्ती” नहीं, बल्कि “जुल्म और फसाद को खत्म करना” होता है। क़ुरआन में फरमाया गया:

    “और उनसे लड़ो जो तुमसे लड़ते हैं, मगर हद से न बढ़ो। अल्लाह हद से बढ़ने वालों को पसंद नहीं करता।”
    — (सूरह अल-बक़रह: 190)

    मोहम्मद बिन क़ासिम और सिंध — तलवार नहीं, किरदार की फ़तह

    मोहम्मद बिन क़ासिम, एक बहादुर और कामयाब सेनापति होने के साथ-साथ एक बेमिसाल इंसानी किरदार और इंसाफ़-पसंद हुक्मरान भी थे। उन्होंने सिंध और मुल्तान के इलाक़ों में थोड़े ही वक़्त तक हुकूमत की, लेकिन अपनी मज़हबी रवादारी, इंसाफ़, और रहमत से भरी हिकमत के ज़रिए वहाँ के बाशिंदों के दिलों में गहरी जगह बना ली।


    तारीख़-ए-इस्लाम (हमीद उद्दीन, पेज 308) के मुताबिक़:

    "जब मोहम्मद बिन क़ासिम सिंध से गया तो सिंधी उसकी तस्वीर बना कर अपने पास रखते थे। वो उसे 'रहमत का फ़रिश्ता' समझते थे। जब उनकी दर्दनाक मौत की ख़बर पहुँची, तो पूरे मुल्क ने सोग मनाया।"


    ख़ास बात यह है:
    उस वक़्त के सिंधी लोग अब तक मुसलमान नहीं हुए थे। फिर आख़िर क्या था वो जज़्बा, जो उन्हें मोहम्मद बिन क़ासिम से इस क़दर महब्बत करने पर मजबूर कर रहा था?

    • क्या उसने तलवार चलाई? नहीं।
      क्या उसने जबर किया? बिल्कुल नहीं।
      क्या उसने दावत दी? नहीं, सीधा इस्लाम पेश भी नहीं किया।
      फिर? उसके अख़लाक़, इंसाफ़, और हुस्न-ए-मुआमलात (उत्तम व्यवहार) ने सिंधी दिलों को जीता।

    और नतीजा?
    थोड़े ही अर्से में ये लोग अपने आप इस्लाम की तरफ़ झुकने लगे और फिर बड़ी तादाद में मुसलमान हो गए—बग़ैर किसी तलवार, बग़ैर किसी ज़बरदस्ती।

    क्या यह भी तलवार का करिश्मा था? नहीं, यह किरदार का असर था।



    Conclusion:

    इस्लाम एक रोशन दीन है, जो दावत, अख़लाक़, इंसाफ़ और रहमत के ज़रिए फैला। तो सवाल ही नहीं उठता कि Kya islam Talwar ke Zor se Phaila? तलवार से कभी भी किसी के दिल में ईमान नहीं उतरता। ईमान दिल की गहराई से आता है, और वो सिर्फ़ अल्लाह की हिदायत से होता है।

    इस्लाम का पैग़ाम तलवार नहीं, बल्कि तालीम, हिकमत और अख़लाक़ है। नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़िन्दगी, क़ुरआनी आयात और उलमा की तफसीरात इस बात का साफ़ सुबूत हैं कि इस्लाम में कोई जबरदस्ती नहीं। तलवार से जिस्म झुकाया जा सकता है, मगर दिल नहीं बदला जा सकता — और ईमान का ताल्लुक़ दिल से है, तलवार से नहीं।

    इस्लाम का फैलाव तलवार से नहीं, बल्कि किरदार, दावत और अद्ल से हुआ। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने रहमत, माफ़ी और इंसाफ़ की ऐसी मिसालें पेश कीं जो दिलों को जीत गईं।
    अगर इस्लाम तलवार से फैलता, तो स्पेन, भारत और इंडोनेशिया जैसे इलाक़े मुसलमान न रहते। बल्कि, इस्लाम की ताक़त उसकी हिकमत, इंसानियत और अल्लाह की हिदायत है।

    हमें चाहिए कि हम इस्लाम की असल तस्वीर को इल्म, दावत और अच्छे किरदार के ज़रिये पेश करें, ताकि दुनिया जाने कि इस्लाम रहमत और अमन का दीन है।

    आइए, हम इस्लाम की सही तस्वीर दुनिया के सामने पेश करें — तलवार नहीं, तालीम और तमीज़ से।
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    Author
    इस्लामी ब्लॉगर — सही दीन और इल्म को आम करने की कोशिश।


    FAQs:


    Q1: क्या क़ुरआन में तलवार से इस्लाम फैलाने का हुक्म है?
    A: नहीं, क़ुरआन साफ़ तौर पर कहता है "दीन में कोई ज़बरदस्ती नहीं है" (सूरह बक़रह: 256)। इस्लाम दलील और रहमत के साथ फैलता है, तलवार के ज़ोर से नहीं।

    Q2: फिर जिहाद का क्या मतलब है?
    A: जिहाद का मतलब सिर्फ़ जंग नहीं है। यह हर उस कोशिश का नाम है जो अल्लाह की राह में हो — चाहे वो नफ़्स से हो, कलम से हो या ज़ुल्म के खिलाफ़ हो। जंग सिर्फ़ उस वक़्त होती है जब मज़लूमों की हिफ़ाज़त ज़रूरी हो।

    Q3: क्या इस्लाम की शुरुआत तलवार से हुई थी?
    A: नहीं। इस्लाम की शुरुआत मक्का में हुई जहाँ नबी (स.) ने 13 साल तक बेहद सब्र और अम्न के साथ दावत दी, जबकि मुसलमानों को शदीद सताया गया।

    Q4: क्या मुसलमान हुक्मरानों ने जबरदस्ती इस्लाम फैलाया?
    A: बहुत से गैर-मुस्लिम तारीख़दानों (जैसे वॉशिंगटन इरविंग, दे लॉसी ओ'लेरी) ने लिखा है कि मुसलमान हुक्मरानों ने अक्सर दूसरे मज़ाहिब वालों को अपने मज़हब पर बाक़ी रहने की पूरी इजाज़त दी। इस्लाम ज़्यादातर इलाकों में ताजिरों, सूफ़ियों और दावत देने वालों के ज़रिये फैला।

    Q5: क्या इस्लाम तलवार से फैलाया गया?
    A: नहीं। क़ुरआन व हदीस इसकी मुख़ालिफ़त करते हैं और इतिहास इस पर गवाही देता है।

    Q6: जिहाद का मतलब क्या है?
    A: जिहाद का मतलब "कोशिश" है – यह नफ़्स, कलम, और ज़ुल्म के खिलाफ़ अमन से किया जाने वाला संघर्ष है।

    Q7: क्या इस्लामी हुक्मरानों ने ज़बरदस्ती इस्लाम फैलाया?
    A: ज्यादातर जगहों पर गैर-मुस्लिमों को उनके मज़हब पर बाक़ी रहने की इजाज़त थी। तलवार सिर्फ़ जंगी हालात में इस्तेमाल हुई।

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