Bidat ki Shuruaat kaise hoti hai? | Andhi Taqleed se Bidat Tak(Hindi/Urdu)
बिदअत की शुरुआत अक्सर मामूली सी अमल से तब होती है जब लोग बग़ैर सोचे समझें उस पर अमल शुरू कर देते हैं, और आगे चलकर वही मामूली बात एक बिदाअत, बड़ा फितना बन जाती है। नीचे दी गई यह हिकायत इसी सच्चाई को बेनक़ाब करती है।
अंधी तक़लीद यानी बिना सोचे-समझे बाप-दादाओं के दीन को अपनाने का नतीजा — मेहमान और डंडा
कहते हैं कि एक बहुत दूर के गाँव में एक इज़्ज़तदार मेहमान आया।गाँव वालों ने उसकी बड़ी खातिरदारी की। पूरा गाँव उसकी सेवा में लग गया। जब खाने का समय आया तो तरह-तरह के स्वादिष्ट पकवान उसके सामने परोस दिए गए।लेकिन खाने के साथ-साथ एक बड़ी थाली में एक लंबा और मोटा डंडा भी रख दिया गया।
मेहमान खाना देखकर तो खुश हो गया,लेकिन डंडा देखकर डर गया।
डरते-डरते उसने पूछा:
“आप लोग यह डंडा क्यों लाए हैं?”
मेज़बानों ने जवाब दिया:
“यह हमारी पुरानी रस्म है। हमारे बुज़ुर्गों के ज़माने से चली आ रही है। जब भी कोई मेहमान आता है, तो हम उसके सामने खाने के साथ डंडा भी रखते हैं।”
यह सुनकर मेहमान को तसल्ली नहीं हुई। उसे डर लगने लगा कि कहीं ऐसा न हो कि खाना खिलाने के बाद इसी डंडे से उसकी खातिरदारी की जाए।
मेहमान की पूछताछ
मेहमान ने फिर सवाल किया:फिर भी इसका कोई न कोई मक़सद तो होगा। किसी काम में तो आता होगा।
आख़िर यह डंडा सिर्फ़ मेहमान के सामने ही क्यों रखा जाता है?”
मेज़बानों में से एक ने कहा:
“ऐ इज़्ज़तदार मेहमान! हमें न इसका मक़सद पता है, न इसका कोई इस्तेमाल।
बस यह हमारे बुज़ुर्गों की चली आ रही एक रस्म है।
आप बेफ़िक्र होकर खाना खाइए।”
मेहमान ने मन ही मन सोचा:
“बेफ़िक्र कैसे खाऊँ?
ख़तरा तो सामने ही रखा हुआ है।”
फिर उसने साफ़-साफ़ कह दिया:
“जब तक आप लोग यह नहीं बताएँगे कि आपके यहाँ पुराने ज़माने से मेहमान के खाने के सामने यह डंडा क्यों रखा जाता है,मैं क़सम खाकर कहता हूँ कि आपका एक निवाला भी नहीं खाऊँगा।”
अब तो पूरे गाँव में हलचल मच गई, क्योंकि मेहमान ने खाना खाने से इंकार कर दिया था।
बिदअत का सफर — तिनके से डंडे तक
अरे नासमझो! इतना बड़ा डंडा क्यों रख दिया? इसे छोटा करो।
हमारे बुज़ुर्ग मेहमान के सामने इतना बड़ा डंडा नहीं रखते थे।”
फ़ौरन आरी मँगाई गई और डंडे को काटकर दो-तीन फ़ुट छोटा कर दिया गया। लेकिन इसके बाद भी मेहमान संतुष्ट नहीं हुआ।उसे अपने सवाल का सही जवाब चाहिए था।
अब एक और, उनसे ज़्यादा उम्र वाले बुज़ुर्ग को बुलाया गया।
उन्होंने भी पूरी बात सुनी, डंडे को ध्यान से देखा और नापकर बोले:
“यह डंडा अब भी बड़ा है।
हमारे बुज़ुर्ग तो मेहमान के सामने एक छोटी और पतली सी डंडी रखते थे।”
उनकी बात मानकर बचे हुए डंडे को और काटा गया और घिसकर एक छोटी सी पतली डंडी बना दी गई। अब डंडे का आकार तो ख़तरे वाला नहीं रहा, लेकिन मेहमान का डर अब भी बना रहा।
क्योंकि अब तक जितने भी बुज़ुर्ग आए थे,उन्होंने सिर्फ़ डंडे का आकार छोटा किया था,
लेकिन यह क्यों रखा जाता है, इसका मक़सद क्या है—
यह बात कोई भी नहीं बता सका था।
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गांव के सबसे बड़े बुजुर्ग और डंडे की हकीकत
मेहमान अब भी खाना खाने को तैयार नहीं हुआ।अब गाँव वाले ढूँढ–ढूँढ कर एक ऐसे बहुत बूढ़े बुज़ुर्ग को लाए, जिनके सिर के बाल ही नहीं बल्कि भौंहें तक सफ़ेद हो चुकी थीं। अंदाज़ा लगाया जाए तो उनकी उम्र 99 साल से भी ज़्यादा लगती थी। आँखों से भी ठीक से दिखाई नहीं देता था।
जब उन्हें डंडे की शक्ल, उसका आकार और सारी बात विस्तार से बताई गई, तो वे ग़ुस्से में आ गए और अपनी लाठी खोजने लगे। ज़ोर से बोले:
अरे नासमझो! हमारे ज़माने में मेहमान के सामने एक छोटी सी कटोरी में बस एक छोटा सा तिनका रखा जाता था, ताकि अगर खाने के बाद दाँतों में मांस का कोई रेशा फँस जाए, तो वह उससे साफ़ कर सके।”
ज़िंदगी के किसी भी मामले में, चाहे वह दीन का हो या दुनिया का,हर नई बात और हर बिदअत की शुरुआत एक छोटे से तिनके से ही होती है,
लेकिन बाद में उसके मानने वाले उसी तिनके को बढ़ाकर लंबा और मोटा डंडा बना देते हैं,
और फिर भी उन्हें तसल्ली नहीं होती।
आज यही हाल अंधी तक़लीद करने वालों और बिदअत अपनाने वालों का है।
बिदअत की असल हक़ीक़त
शुरुआत: एक मामूली सा तिनका
🔹 बाद में: डंडा
🔹 फिर: बिना मक़सद की रस्म
🔹 आख़िरकार: दीन पर बोझ
यही है बिदअत का सफ़र।
आज भी हर बिदअत की शुरुआत एक छोटे से अमल से होती है, जिसे लोग “नियत अच्छी है” या “बुज़ुर्ग करते थे” कहकर अपनाते हैं।
फिर वही चीज़ बढ़ते-बढ़ते दीन का हिस्सा समझी जाने लगती है।
अंधी तक़लीद से मुतल्लिक़ अल्लाह का फरमान
📖 क़ुरआन कहता है:
और जब उनसे कहा जाता है कि अल्लाह ने जो नाज़िल किया है उसकी पैरवी करो, तो कहते हैं: नहीं! हम तो उसी पर चलेंगे जिस पर हमने अपने बाप-दादाओं को पाया। (सुरह अल बक़रह:170)
📜 हदीस-ए-नबी ﷺ:
जिसने हमारे इस दीन में कोई नई बात इजाद की जो उसमें से नहीं है, वह रद्द है।
(बुख़ारी, मुस्लिम)
आज के बिदअती और अंधे मुक़ल्लिद
आज का मुसलमान भी उसी गाँव वालों की तरह है:
- सवाल नहीं करता
- दलील नहीं मांगता
- बस कह देता है: “हमारे यहाँ तो यही होता है”
यही सोच धीरे-धीरे सुन्नत को पीछे और बिदअत को आगे कर देती है।
बिदअत कैसे पैदा होती है?
बिदअत आम तौर पर इन चरणों से होकर गुजरती है:
- एक जायज़ या मामूली अमल से शुरुआत होती है
- उसे ही दीन समझ लिया जाता है
- बिना किसी दलील के उसे अपनाया जाने लगता है
- बुज़ुर्गों के नाम पर उसे ज़रूरी और लाज़िमी ठहरा दिया जाता है
- जो उस पर सवाल करे, उसे गुमराह कहा जाता है
अंधी तक़लीद — अक़्ल का क़त्ल
इस्लाम हमें यह नहीं सिखाता कि हम आँखें बंद करके किसी की पैरवी करें।क़ुरआन बार-बार इंसान से सवाल करता है:
"क्या तुम अक़्ल से काम नहीं लेते?"
(أَفَلَا تَعْقِلُونَ)
अंधी तक़लीद इंसान को इस हाल तक पहुँचा देती है कि वह डंडे को भी दीन समझने लगता है,
सिर्फ़ इसलिए कि
"हमारे बुज़ुर्ग ऐसा करते थे।"
आज के दौर में बिदअत की शक्लें
आज भी हालात कुछ ऐसे ही हैं:
- ऐसे अमल जिनकी न क़ुरआन में कोई दलील न हदीस में कोई सबूत
- अगर ग़ौर करें तो ये ईद मिलाद, शब ए बारात, मुहर्रम, तीजा, चालीसवां की शक्ल में हैं।
- लेकिन फिर भी उन्हें दीन का लाज़िमी हिस्सा बना दिया जाता है
- सवाल करने वाला "गुस्ताख़" कहलाता है
- दलील माँगने वाला "गुमराह" ठहरा दिया जाता है
(Conclusion):
बिदअत कभी भी एक बड़े गुनाह से शुरू नहीं होती, बल्कि एक छोटे से, मामूली और कभी-कभी सही लगने वाले काम से जन्म लेती है। लेकिन जब उस काम को बिना दलील के दीन समझ लिया जाए, और सिर्फ़ इस वजह से अपनाया जाए कि “हमारे बुज़ुर्ग ऐसा करते थे”, तो वही काम धीरे-धीरे दीन पर बोझ बन जाता है।
इस्लाम हमें अंधी तक़लीद नहीं, बल्कि समझदारी, सोच और क़ुरआन व सुन्नत की रोशनी में चलने की दावत देता है। सवाल करना, दलील माँगना और सच तक पहुँचना गुमराही नहीं, बल्कि ईमान की मज़बूती की निशानी है।
अगर हम हर अमल को अपनाने से पहले यह पूछ लें कि इसका मक़सद क्या है और इसकी दलील क्या है, तो न तिनका डंडा बनेगा और न ही दीन रस्मों में दबेगा।
यही रास्ता हमें बिदअत से बचाकर सुन्नत की सीधी राह पर रखता है।
दीन-ए-इस्लाम तिनकों का नहीं, दलीलों का दीन है।
जो अमल कुरआन और सुन्नत से साबित न हो, चाहे वह कितना ही खूबसूरत क्यों न लगे — वह बिदअत है।
💠 🤲🔸 या अल्लाह हमें और सुन्नत की सच्ची पैरवी की तौफ़ीक़ अता फ़रमा۔ आमीन
FAQs (हिन्दी में)
1. बिदअत क्या होती है?
बिदअत उस काम को कहते हैं जिसे दीन का हिस्सा बना दिया जाए, जबकि उसका कोई साफ़ सबूत क़ुरआन और हदीस में मौजूद न हो।
2. बिदअत की शुरुआत कैसे होती है?
बिदअत अक्सर एक छोटे और मामूली अमल से शुरू होती है, जिसे धीरे-धीरे दीन समझ लिया जाता है और बाद में वही रस्म बन जाती है।
3. अंधी तक़लीद क्या है?
बिना सोचे-समझे, बिना दलील के सिर्फ़ बाप-दादाओं या बुज़ुर्गों के तरीके को अपनाना अंधी तक़लीद कहलाता है।
4. हर पुरानी रस्म बिदअत होती है क्या?
नहीं। जो रस्म क़ुरआन और सुन्नत के ख़िलाफ़ न हो, वह बिदअत नहीं होती। बिदअत वही है जिसे दीन का ज़रूरी हिस्सा बना दिया जाए।
5. बिदअत से दीन को क्या नुकसान होता है?
बिदअत दीन की असली शक्ल को बिगाड़ देती है और सुन्नत को पीछे कर देती है।
6. क्या बिदअत पर सवाल करना गुनाह है?
नहीं। दीन में सवाल करना और दलील माँगना गलत नहीं, बल्कि समझदारी की निशानी है।
7. इस कहानी में डंडे की मिसाल क्या समझाती है?
यह मिसाल बताती है कि कैसे एक छोटा-सा जायज़ काम समय के साथ बढ़कर बेवजह और नुकसानदेह रस्म बन जाता है अगर उसकी असल को बिना सोचे समझे अमल किया जाए तो।
8. मुसलमान को बिदअत से कैसे बचना चाहिए?
हर अमल को क़ुरआन और सुन्नत की कसौटी पर परखना चाहिए और अंधी तक़लीद से बचना चाहिए।
بدعت کی شروعات کیسے ہوتی ہے؟بدعت کی شروعات، اندھی تقلید، اور انجام
اندھی تقلید کی تمثیل — مہمان اور ڈنڈا
مہمان کا سوال
بدعت کا سفر — تنکے سے ڈنڈے تک
گاؤں کے سب سے بڑے بُزرگ اور ڈنڈے کی حقیقت
یہی بدعت کی حقیقت ہے
اس تمثیل میں ایک گہرا سبق پوشیدہ ہے:
- ابتدا تنکے سے ہوئی
- پھر ڈنڈی بنی
- پھر موٹا ڈنڈا بن گیا
- مقصد ختم ہو گیا، رسم باقی رہ گئی
- عقل غائب، تقلید حاضر
بالکل یہی حال بدعت کا ہے۔
اندھی تقلید کے بارے میں اللہ کا فرمان
📖 قرآنِ مجید میں ارشادِ باری تعالیٰ ہے:
“اور جب ان سے کہا جاتا ہے کہ اللہ نے جو نازل فرمایا ہے اُس کی پیروی کرو، تو کہتے ہیں: نہیں! ہم تو اسی راستے پر چلیں گے جس پر ہم نے اپنے باپ دادا کو پایا ہے۔”
(سورۃ البقرہ: 170)
حدیثِ نبوی ﷺ
“جس شخص نے ہمارے اس دین میں کوئی ایسی نئی بات ایجاد کی جو اس میں سے نہیں ہے، وہ مردود ہے۔”(بخاری، مسلم)
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بدعت کیسے پیدا ہوتی ہے؟
بدعت عام طور پر ان مراحل سے گزرتی ہے:
- ایک جائز یا معمولی عمل
- اسے دین سمجھ لینا
- دلیل کے بغیر اپنانا
- بزرگوں کے نام پر اسے لازم قرار دینا
- اس پر سوال کرنے والوں کو گمراہ کہنا
اندھی تقلید — عقل کا قتل
اسلام ہمیں یہ نہیں سکھاتا کہ ہم آنکھیں بند کر کے کسی کی پیروی کریں۔
قرآن بار بار سوال کرتا ہے:
"کیا تم عقل سے کام نہیں لیتے؟"(أَفَلَا تَعْقِلُونَ)
اندھی تقلید انسان کو اس مقام پر پہنچا دیتی ہے جہاں وہ ڈنڈے کو بھی دین سمجھنے لگتا ہے، بس اس لیے کہ "یہ ہمارے بزرگ کرتے تھے"۔
آج کے دور میں بدعت کی شکلیں
آج بھی یہی ہو رہا ہے:
- ایسے اعمال جن کی نہ قرآن میں دلیل
- نہ حدیث میں ثبوت
- مگر انہیں دین کا لازمی حصہ بنا دیا گیا
- سوال کرنے والا "گستاخ"
- دلیل مانگنے والا "گمراہ"
یہی بدعت کا انجام ہے۔
سبق
زندگی کے کسی بھی شعبے میں، خاص طور پر دین میں:
- ہر عمل کا مقصد ہونا چاہیے
- ہر عبادت کی دلیل ہونی چاہیے
- ہر روایت کو قرآن و سنت پر پرکھنا ضروری ہے
ورنہ تنکا، ڈنڈا بن جاتا ہے
اور ڈنڈا — دین پر حملہ۔
آخری بات
بدعت کی شروعات ہمیشہ چھوٹی ہوتی ہے،
مگر انجام بہت بڑا فتنہ بن جاتا ہے۔
اللہ ہمیں حق کو پہچاننے، سوال کرنے اور سنت کو مضبوطی سے تھامنے کی توفیق عطا فرمائے۔
آمین 🤲
Conclusion:
اس کہانی Bidat ki Shuruaat kaise hoti hai? | Andhi Taqleed se Bidat Tak کا خلاصہ بالکل واضح ہے —
بدعت کبھی کسی بڑے گناہ سے شروع نہیں ہوتی، بلکہ ایک چھوٹے، معمولی اور بظاہر درست نظر آنے والے عمل سے جنم لیتی ہے۔ مگر جب اسی عمل کو بغیر دلیل دین کا حصہ بنا لیا جائے، اور صرف اس لیے اپنایا جائے کہ “ہمارے بزرگ ایسا کرتے تھے”، تو وہی عمل آہستہ آہستہ دین پر بوجھ بن جاتا ہے۔
اسلام اندھی تقلید کی نہیں بلکہ عقل، فہم اور قرآن و سنت کی روشنی میں چلنے کی تعلیم دیتا ہے۔ سوال کرنا، دلیل طلب کرنا اور حق کی تلاش گمراہی نہیں بلکہ ایمان کی پختگی کی علامت ہے۔
اگر ہم ہر عمل کو اختیار کرنے سے پہلے یہ سوچ لیں کہ اس کا مقصد کیا ہے اور اس کی شرعی دلیل کیا ہے، تو نہ تنکا ڈنڈا بنے گا اور نہ دین رسومات کی نذر ہوگا۔
یہی راستہ ہمیں بدعت سے بچا کر سنت کی سیدھی راہ پر قائم رکھتا ہے۔
FAQs (اردو میں)
1. بدعت کیا ہے؟
بدعت اس عمل کو کہتے ہیں جسے دین کا حصہ بنا دیا جائے، حالانکہ اس کی کوئی واضح دلیل قرآن و حدیث میں موجود نہ ہو۔
2. بدعت کی شروعات کیسے ہوتی ہے؟
بدعت اکثر ایک چھوٹے اور معمولی عمل سے شروع ہوتی ہے، پھر آہستہ آہستہ اسے دین سمجھ لیا جاتا ہے۔
3. اندھی تقلید کیا ہوتی ہے؟
بغیر سوچے سمجھے، بغیر دلیل کے صرف باپ داداؤں یا بزرگوں کی پیروی کرنا اندھی تقلید کہلاتا ہے۔
4. کیا ہر پرانی رسم بدعت ہوتی ہے؟
نہیں۔ جو رسم قرآن و سنت کے خلاف نہ ہو، وہ بدعت نہیں ہوتی۔ بدعت وہ ہے جسے دین کا لازمی حصہ بنا دیا جائے۔
5. بدعت دین کو کیا نقصان پہنچاتی ہے؟
بدعت دین کی اصل صورت کو بگاڑ دیتی ہے اور سنت کو پسِ پشت ڈال دیتی ہے۔
6. کیا بدعت پر سوال کرنا گناہ ہے؟
نہیں۔ دین میں سوال کرنا اور دلیل طلب کرنا گناہ نہیں بلکہ فہم و بصیرت کی علامت ہے۔
7. اس کہانی میں ڈنڈے کی مثال کیا بتاتی ہے؟
یہ مثال واضح کرتی ہے کہ کس طرح ایک چھوٹا سا جائز عمل وقت کے ساتھ بڑھ کر ایک بے مقصد اور نقصان دہ رسم بن جاتا ہے۔
8. مسلمان کو بدعت سے کیسے بچنا چاہیے؟
ہر عمل کو قرآن و سنت کے معیار پر پرکھنا چاہیے اور اندھی تقلید سے بچنا چاہیے۔


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