ग़लत अकीदह मदद से मुतल्लिक़
लेकिन इसी आयत को लेकर कुछ फिरक़े — ख़ासकर बरैलवी मसलक से ताल्लुक रखने वाले — इसका ग़लत मतलब लेते हैं और इसको "औलिया-ए-किराम" या "कब्रों में मौजूद बुज़ुर्गों" से मदद लेने को जायज़ होने की दलील बना लेते हैं।
इस पोस्ट में हम:
- इस आयत का सही मफ़हूम समझेंगे,
- उसकी तफ़सीर को बयान करेंगे,
- और इस आयत से निकाले गए ग़लत अकीदे का इल्मी व मंतक़ी रद्द भी पेश करेंगे इन शा अल्लाह।
📖 आयत नाज़िल करने का ख़ास मक़सद:
"आइए सबसे पहले उस आयत से मुतल्लिक समझें कि इस आयत के नाज़िल करने का ख़ास मक़सद क्या था,किस मौक़ा पर ये आयत नाज़िल हुई ताकि इससे निकाले गए ग़लत अकीदे और अवामुन नास में फैलाई गई शिर्क और गुमराही से बाहर निकल सकें। आयत मुलाहिजा फरमाएं:
اِنۡ تَتُوۡبَاۤ اِلَى اللّٰهِ فَقَدۡ صَغَتۡ قُلُوۡبُكُمَاؕ وَ اِنۡ تَظَاهَرَا عَلَيۡهِ فَاِنَّ اللّٰهَ هُوَ مَوۡلٰٮهُ وَ جِبۡرِيۡلُ وَ صَالِحُ الۡمُؤۡمِنِيۡنَؕ وَ الۡمَلٰٓئِكَةُ بَعۡدَ ذٰلِكَ ظَهِيۡرٌ
इस आयत में 4 मददगारों का ज़िक्र है:
- अल्लाह – सबसे बड़ा मददगार
- जिब्रील (अलैहिस्सलाम) – अल्लाह के सबसे अज़ीज़ फरिश्ते
- सालिहुल मोमिनीन – नेक ईमान वाले (सहाबा वगैरह)
- मलाइका (फरिश्ते) – जो अल्लाह के हुक्म से मदद करते हैं
आयत का सियाक व सबाक़, मफ़हूम:
आयत में दो मुख्य मुद्दों पर बात की गई है:
- तौबा (पश्चाताप): इस्लामी दृष्टिकोण में किसी भी गलती के बाद तौबा करना बहुत अहम है। इस आयत में अल्लाह ने कहा कि यदि वे अपनी गलती से तौबा करती हैं, तो अल्लाह उनके दिलों को सीधा कर देगा।
- मददगारों का उल्लेख: अगर वे रसूल ﷺ के खिलाफ एक-दूसरे की मदद करती हैं, तो अल्लाह उनकी मदद से इनकार करेगा, लेकिन रसूल ﷺ की मदद करने वालों में अल्लाह, जिब्रील (अलैहिस्सलाम), नेक मोमिन (सहाबा) और फरिश्ते उनके मददगार होंगे।
तफ़सीर (विस्तार):
1.इन् त्तूबा इलल्लाहि फ़क़द् सागत् क़ुलूबुकुमा"
- इसका मतलब है कि यदि तुम दोनों (हज़रत आयशा रज़ी अल्लाहु अन्हा और हज़रत हफ़सा रज़ी अल्लाहु अन्हा) अल्लाह से तौबा करती हो, तो तुम्हारे दिलों को अल्लाह सच्ची तौबा से बदल देगा।
- यह तौबा केवल शब्दों से नहीं बल्कि दिल से होने वाली एक सच्ची वापसी है।
2.वइन् तज़ाहिरा अलैह"
- अगर तुम दोनों (बीवियाँ) रसूल अल्लाह ﷺ के खिलाफ एक-दूसरे का साथ देती हो, तो फिर इसका मतलब है कि तुम खुद को अल्लाह के हुक्म से दूर कर रही हो।
- यह एक चेतावनी है कि रसूल ﷺ के खिलाफ कोई भी कार्य या कदम न उठाया जाए।
3.फइन्नल लाह हू मोलाहु"
- इसका मतलब है कि अल्लाह ही उनके (रसूल ﷺ के) मददगार हैं। अल्लाह तआला ने अपनी मदद और समर्थन से नबी ﷺ को हमेशा सक्षम और मजबूत रखा है।
- अल्लाह की मदद में कोई कमी नहीं होती, और उनका दीन हमेशा जीतता है। यह इस बात का संकेत है कि अगर कोई भी इस्लाम या रसूल ﷺ के खिलाफ खड़ा हो, तो अल्लाह की मदद हमेशा होगी।
4.व जिब्रीलु"
- जिब्रील (अलैहिस्सलाम) का नाम इस आयत में लिया गया है। वह अल्लाह के सबसे बड़े फरिश्ते हैं और हमेशा नबी ﷺ के साथ रहे हैं, चाहे वह प्रेरणा लाने का समय हो या अन्य मुश्किलात में मदद देने का। यह बताता है कि अल्लाह का फरिश्ता भी रसूल ﷺ की मदद करता है।
- सालिहुल मोमिनीन से मतलब है कि नेक ईमान वाले, जैसे सहाबा, जो हमेशा नबी ﷺ के साथ खड़े रहते हैं। यह आयत हमें यह सिखाती है कि ईमानदार और नेक लोग हमेशा नबी ﷺ की मदद करेंगे, चाहे उनका कोई विरोधी क्यों न हो।
6.वल-मलाइकातु बादःजालिका जज़ीरू"
- फरिश्ते: अल्लाह के द्वारा भेजे गए फरिश्ते, जो नबी ﷺ की मदद के लिए तैयार रहते हैं। यह भी एक संकेत है कि अल्लाह अपने नेक पैगंबर ﷺ की मदद के लिए फरिश्तों को भेजता है, जो उनका मार्गदर्शन और रक्षा करते हैं।
Note:
अकीदे की ग़लत ताबीर, उसकी हक़ीक़त, गलतफहमी का इल्मी और दलील से रद्द:
🔉बरेलवी दावा:
वे इस आयत को अपनी बातों के लिए इस्तिमाल करते हैं और कहते हैं:“इस आयत में मददगारों में जिस तरह जिब्रील, नेक मोमिन और फरिश्ते का ज़िक्र है कि वे रसूल ﷺ के मददगार हैं, वैसे ही हमारे पीर, औलिया और बुज़ुर्ग भी हमारी मदद कर सकते हैं, चाहे उनकी वफ़ात हो चुकी हो।"
✅ जवाब:
यह गलतफहमी कुरआन, सुन्नत और सही अक़ीदे की बुनियाद को तोड़ने की कोशिश है। इसका इल्मी रद्द नीचे पेश है
➡️ किसी पीर बुजुर्ग ,औलिया या कब्रों में दफन शुदाह को मदद के लिए पुकारना या "या रसूलल्लाह मदद!" कहना, नबी ﷺ को अल-आलिम, अल-शाफ़ी, अल-मुज़ीर समझना — ये अल्लाह के हुकूक़ में शिर्क करना है— गुमराही है।
💠ध्यान दें और ग़ौर व फ़िक्र की ज़रूरत
अब मिसाल के तौर पर वह आयत लीजिए जिसमें मददगारों का ज़िक्र है। कुछ लोग इसका मतलब यह लेते हैं कि उनके पीर, बुज़ुर्ग और बाबा मददगार हैं, और वे उनकी पुकार सुनकर जवाब देते हैं।
अच्छा! अगर मान भी लिया जाए कि उनका यह मतलब सही है, तो सवाल यह है कि उस आयत में सिर्फ़ बुज़ुर्गों का ज़िक्र नहीं बल्कि हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम और दूसरे फ़रिश्तों का भी ज़िक्र आया है, जो मोमिनों की मदद पर मुकर्रर किए गए हैं। तो फिर उनसे क्यों मदद नहीं मांगी जाती? क्या किसी ने कभी कहा:
"या जिब्रील अल मदद!"
"ऐ फ़रिश्तों अल मदद!"
अगर उनका उसूल सच में सही होता तो उन्हें फ़रिश्तों को भी मदद के लिए पुकारना चाहिए था, क्योंकि आयत में उनका ज़िक्र साफ़ तौर पर मौजूद है।
इसके अलावा, अल्लाह तआला ने दुनिया के अलग-अलग कामों के लिए अलग-अलग फ़रिश्तों को ज़िम्मेदारी दी है। जैसे कि बारिश बरसाने के लिए एक ख़ास फ़रिश्ता मुक़र्रर है। तो अगर वाकई ग़ैर-अल्लाह से मदद मांगना जायज़ होता, तो बारिश न होने पर उस फ़रिश्ते से क्यों नहीं कहा जाता:
"ऐ फ़रिश्ते! आज बहुत गर्मी है, ज़रा बारिश कर दीजिए।"
ये सवालात अक़्ल रखने वालों के सामने एक साफ़ हक़ीक़त को ज़ाहिर करते हैं कि उनका दावा बिल्कुल बेबुनियाद है। असल सच्चाई यह है कि अल्लाह के सिवा किसी और को पुकारना और मदद के लिए बुलाना अक़ीदे की ग़लती और तौहीद के ख़िलाफ़ है। क़ुरआन करीम बार-बार यही तालीम देता है कि असली मददगार सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह है।
इसलिए मिसालें तो बहुत दी जा सकती हैं, लेकिन अक़्ल वालों के लिए इतनी ही वाज़ेह बात काफी है। जो इंसान इंसाफ़ और तदब्बुर (गंभीरता) से सोचेगा वह तुरंत समझ जाएगा कि असल हक़ीक़त क्या है।
Note 2: एक और अहम बात यह है कि जब इन लोगों को समझाने के लिए, या शिर्क व बिदअत से रोकने के लिए कोई क़ुरआन की आयत पेश की जाती है तो वे तुरंत यह ऐतराज़ करते हैं कि:
"यह आयत तो काफ़िरों और मुश्रिकों के बारे में नाज़िल हुई है, आप इसे मोमिनों पर लागू कर रहे हैं!"लेकिन सवाल यह है कि अगर यही उसूल है, तो फिर ये लोग ख़ुद क्या कर रहे हैं?
क़ुरआन मजीद में एक जगह नबी ﷺ की अज़वाज मुताहरात (बीवियों) के लिए नसीहत के तौर पर आयतें नाज़िल हुईं। ये आयतें साफ़ तौर पर उम्महातुल मोमिनीन के लिए थीं। मगर यही लोग उन आयतों को अपने बाबाओं, पीरों और बुज़ुर्गों पर लागू कर देते हैं। आखिर कोई बताए कि ऐसा क्यों?
यानि जब आयत मुशरिकों और काफ़िरों के बारे में हो तो कहते हैं: "यह तो मोमिनों पर फिट नहीं होती"। लेकिन जब वही आयत नबी ﷺ की अज़वाज मुताहरात के बारे में हो तो उसे अपने पीरों और बाबाओं पर फिट कर देते हैं। यह खुला हुआ विरोधाभास(Contradiction:बात और अमल में फ़र्क) और दोहरा मापदंड((Double Standards) नहीं तो और क्या है?
आयत में रसूल ﷺ मददगार नहीं, रसूल ﷺ के मददगारों का ज़िक्र है
➡️ आयत का पूरा सियाक देखें:- फइन्न अल्लाह हुवा मौलाहु व जिब्रीलु व सालिहुल मोमिनीन व अल-मलाइका
- मतलब: "अल्लाह ही रसूल के मददगार हैं — और उनके साथ जिब्रील, नेक मोमिन और फरिश्ते हैं।"
- यहाँ रसूल ﷺ को मदद की ज़रूरत पड़ी, और अल्लाह अपने फरिश्तों और मोमिनों के ज़रिए मदद करवा रहा है।
- इससे ये साबित होता है कि रसूल मददगार नहीं, बल्कि जिनकी मदद की गई — वो खुद हैं।
आयत में मदद का संदर्भ रसूल ﷺ की ज़िंदगी के दौरान है — न कि वफात के बाद
✅ यानी:
- जिब्रील अलैहिस्सलाम— अभी ज़िंदा हैं, जो अल्लाह के हुक्म से नाज़िल होते हैं।
- सालिह मोमिन (सहाबा) — नबी के साथ थे,नबी की ज़िंदगी में हाज़िर थे, जिंदा थे, मदद कर सकते थे।
- फरिश्ते —अल्लाह के हुक्म से हर वक्त फराएज़ अंजाम देते हैं।
इसमें किसी भी वफात पा चुके इंसान, पीर औलिया की मदद का कोई ज़िक्र नहीं।
वली या पीर की वफात के बाद मदद करना — शरीअत में इसका कोई सुबूत नहीं
कब्र में सोया हुआ इंसान:
- न खुद को हिला सकता है
- न किसी की आवाज़ सुन सकता है
- न किसी को मदद दे सकता है
وَمَا أَنتَ بِمُسْمِعٍ مَّن فِي ٱلْقُبُورِ"
"तुम कब्रों में पड़े हुए लोगों को नहीं सुना सकते।"
📕 [सूरह फातिर: 22]
- मरे हुए न तो पुकार सुन सकते हैं, न मदद कर सकते हैं।
- औलिया अल्लाह के नेक बंदे हैं, लेकिन अल्लाह के इख़्तियार के बिना कुछ भी नहीं कर सकते।
औलिया सिर्फ़ अल्लाह की इज्ज़त वाले बंदे हैं, लेकिन खुदा नहीं
औलिया, बुज़ुर्ग और पीर अल्लाह के नेक बंदे हो सकते हैं — लेकिन वो:
- ना हर जगह मौजूद हैं
- ना हर बात सुनते हैं
- ना किसी की तकलीफ़ दूर कर सकते हैं
- यहां तक कि उनके हयात में अगर दूर से कोई आवाज़ दे तो उसे भी नहीं सुन सकते हैं
➡️ कुरआन साफ़ कहता है:
"قُلْ إِنِّى لَآ أَمْلِكُ لَكُمْ ضَرًّۭا وَلَا رَشَدًۭا"
"कहो (ऐ रसूल), मैं तुम्हारे लिए ना नुक़सान का इख़्तियार रखता हूं, ना फायदा देने का।"
📕 [सूरह जिन्न: 21]
अगर खुद नबी ﷺ ये कहें कि मैं कुछ भी इख़्तियार नहीं रखता, तो औलिया की क्या हैसियत?
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कब्र वालों ,औलिया या बुज़ुर्ग की वफ़ात के बाद मदद के लिए पुकारना — शिर्क है
"या ग़ौस! या ख़्वाजा! या अली! मदद करो!"– ये अल्फ़ाज़ शिर्क के करीब हैं।"إِيَّاكَ نَعْبُدُ وَإِيَّاكَ نَسْتَعِينُ"
"हम तेरी ही इबादत करते हैं और सिर्फ़ तुझी से मदद माँगते हैं।"📕 [सूरह फातिहा: 5]
इसका मतलब है:
- ना नबी से,
- ना वली से,
- ना पीर से
- सिर्फ़ अल्लाह से मदद माँगनी चाहिए।
सहीह हदीस से भी रद्द:
रसूलुल्लाह ﷺ ने एक सहाबी को देखा कि वो कह रहा था:" जो अल्लाह चाहे और आप चाहें "
"क्या तुमने मुझे अल्लाह का शरीक बना दिया? सिर्फ़ कहो: माशा-अल्लाह।" यानी जो अल्लाह चाहे।
📕 [मुस्नद अहमद, हसन]
यहां नबी ﷺ ने खुद को अल्लाह के साथ शरीक करने से मना कर दिए, तो औलिया,पीर बुजुर्ग को अल्लाह के बराबर कैसे ठहराया जा सकता है या मदद की उम्मीद की जा सकती है।
रसूलुल्लाह ﷺ ने भी किसी को अल्लाह के अलावा मददगार नहीं ठहराया
➡️ क़ुरआन कहता है:
("अगर अल्लाह तुझे तकलीफ़ दे, तो उसके सिवा कोई नहीं जो हटाए")
📕 [सूरह अंआम: 17]
📌 अल्लाह ही मदद करने वाला है। नबी, वली, या फरिश्ते खुद अल्लाह के हुक्म के बिना कुछ भी नहीं कर सकते।
सही अक़ीदा क्या है?
अल्लाह से दुआ में वसीला जायज़ है (जैसे: "ऐ अल्लाह, तुझे अपने नबियों और रसूलों से जो मुहब्बत है उस मुहब्बत के सदक़े में मेरी दुआ क़ुबूल कर")
औलिया को मदद के लिए पुकारना शिर्क है (जैसे: "या ग़ौस! मेरी मदद कर!")
औलिया की दुआ या इल्म से फायदा लेना जायज़ है, जब वो ज़िंदा हों, वफ़ात के बाद नहीं।
🛑 Conclusion:
📢 नतीजा: इस आयत से तौहीद मज़बूत होती है — न कि वसीला-पुकार की दलील
- इस आयत से यह साबित नहीं होता कि रसूल से मदद माँगना जायज़ है।
- बल्कि यह साबित होता है कि अल्लाह ही मददगार है, और रसूल की मदद के लिए सारे आसमानी ज़रिए जुटते हैं।
- रसूल अल्लाह की मदद के मोहताज थे, अल्लाह की मदद के बग़ैर खुद की मदद नहीं कर सकते थे।
सूरह तहरीम आयत 4 में रसूल की मदद करने वालों का ज़िक्र है — ना कि कब्रों में सोए औलिया की मदद का।
इस आयत को औलिया की मदद पर लागू करना आयत की तहरीफ़ (तोड़-मरोड़) है, और तौहीद के खिलाफ़ है
📢 पाठकों के लिए पैग़ाम
- इस्लाम की असल तालीम तौहीद है: सिर्फ़ अल्लाह से मदद माँगना।
- नबी ﷺ, फरिश्ते, वली — सब अल्लाह के बंदे हैं।
- मदद सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह से मांगो — यही नबी की भी तालीम है।
- अल्लाह को छोड़ कर किसी से मदद माँगना ना सिर्फ़ गुमराही है, बल्कि तौहीद से हटकर शिर्क का रास्ता है
- औलिया को इज़्ज़त दो, प्यार करो, उनकी दुआओं और इल्म से फायदा उठाओ — लेकिन मदद मांगने का हक़ सिर्फ़ अल्लाह को दो।
- अल्लाह को छोड़ कर किसी से मदद माँगना ना सिर्फ़ गुमराही है, बल्कि तौहीद से हटकर शिर्क का रास्ता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
इस आयत (66:4) में "मददगार" से क्या मतलब है?
इसका मतलब है कि अल्लाह, जिब्रील, नेक मोमिन और फरिश्ते नबी ﷺ के साथ खड़े रहते हैं। यानी रसूल ﷺ की मदद और हिफ़ाज़त अल्लाह के हुक्म से होती है।
क्या इस आयत से औलिया या कब्र में सोए बुज़ुर्गों से मदद लेना साबित होता है?
बिल्कुल नहीं। इस आयत में सिर्फ जिंदा और अल्लाह के हुक्म से काम करने वाले मददगारों का ज़िक्र है, न कि मरने वालों का।
"सालिहुल मोमिनीन" से कौन लोग मुराद हैं?
सहाबा-ए-किराम (رضي الله عنهم) और वो नेक ईमान वाले लोग जो नबी ﷺ के जमाने में उनके साथ खड़े रहे।
क्या मर चुके लोग हमारी मदद कर सकते हैं?
कुरान साफ कहता है कि "तुम कब्र वालों को नहीं सुना सकते" (सूरह फ़ातिर: 22)। इसलिए मर चुके लोग किसी की मदद नहीं कर सकते।
इस आयत से हमें क्या सबक मिलता है?
असली मददगार सिर्फ अल्लाह है। बाक़ी जिब्रील, सहाबा और फरिश्ते भी अल्लाह के हुक्म से मददगार हैं। हमें मदद सिर्फ अल्लाह से मांगनी चाहिए।


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