Ayat Waseela Talaash karo | Galt aqeede ka Radd

सूरह अल-मायदा : आयत 35 में लफ्ज़ वसीला को, कुछ गुमराह लोग, जैसे कब्रों और पीरों को मानने वाले, इस शब्द का गलत इस्तेमाल करते हैं। वे इसके सही अर्थ और महत्व से भटका कर लोगों को गुमराही और शिर्क की ओर ले जाते हैं। अल्लाह की मस्जिद और दर से दूर कर, पीर और मजार पर लगा देते हैं।"

Ayat Waseela Talaash karo|Galt aqeede ka Radd 

✍️ By: Mohib Tahiri | 🕋 islamic article|Waseela Aur Tawassul| Ghalt Aqeede ka Radd|Waseela aur Shirk🕰 अपडेटेड:18 Jan 2026
Waseela Aur Tawassul Ka saheeh Matlab Jane aur gumrahi se bachen
Ayat 35,Surah AlMaida,Waseela AurTawassul

आज के दौर में बहुत से लोग "वसीला" के मसले में गुमराही का शिकार हैं। कुछ लोग यह समझते हैं कि औलिया और पीरों को दुआ में पुकारना, उनका वसीला लेना या उनकी क़ब्रों से मदद मांगना जायज़ है। वे इसका सहारा इस Ayat "Waseela Talaash karo" (Galt aqeede ka Radd) से लेते हैं:

ऐ ईमान वालो! अल्लाह से डरो और उसका क़ुर्ब (नज़दीकी) तलाश करो और उसकी राह में जिहाद करो, ताकि तुम कामयाब हो जाओ।"[सूरह अल-मायदा : आयत 35]

इस आर्टिकल Ayat "Waseela Talaash karo" Galt aqeede ka Radd में हम इस आयत की सही तफ्सीर पेश करेंगे, ग़लत अकीदे का रद्द करेंगे, और वसीला का हक़ीक़ी मतलब कुरआन व सुन्नत की रोशनी में पेश करने की कोशिश करेंगे। क़ुरआन की कई आयतें और अहादीस हैं जो इस अक़ीदे के रद में हैं उन में कुछ का हवाला दिया जा रहा है ! 

"यह अच्छी तरह समझने वाली बात है कि कुरान की इस आयत में "वसीला" का मतलब किसी गुजर चुके नबी, वली या शहीद का जरिया नहीं है। क्योंकि कुरान और हदीस में इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता। कुरान और हदीस में वसीले का मतलब कुछ और है,

आयत की तफ्सीर व वजाहत:

इस आयत में तीन अहम बातें हुक्म के तौर पर कही गई हैं:

1. अल्लाह से डरना यानी हर उस चीज़ से बचना जो अल्लाह की नाराज़गी का सबब बने और अल्लाह के हुक्मों पर अमल करना।

2. अल्लाह का क़ुर्ब तलाश करना (وَابْتَغُوا إِلَيْهِ الْوَسِيلَةَ): वसीला का मतलब है "वह ज़रिया जिससे अल्लाह की रज़ा और क़ुर्ब हासिल किया जाए।"
यह वसीला नेक आमाल हैं, जैसे नमाज़, रोज़ा, तौबा, दुआ वगैरह। मुफस्सिरीन (तफ्सीर करने वाले) में से इब्न कसीर, इमाम तबरी वगैरह ने भी वसीला का यही मतलब लिया है।

3. अल्लाह की राह में जद्दोजहद (जिहाद) करना: यानी दीन की हिफाज़त,अपनी जान, माल और क़लम वगैरह से अल्लाह के दीन की सरबलंदी के लिए मेहनत करना।

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"वसीला" का सही मतलब क्या है?

1. अपने नेक आमाल (नमाज़, तौबा, दुआ वगैरह)का वसीला (तीन आदमियों की गुफा वाली हदीस (सहीह बुखारी) में हर शख़्स ने अपने नेक अमल का वसीला दे कर दुआ की — किसी ने भी नबी, पीर या फौत शुदाह को नहीं पुकारा।
2. अल्लाह की खूबियों और अच्छे नामों का वसीला।
3. जिंदा नेक इंसान की दुआ का वसीला।

बरेलवी अकीदे का रद्द:

बरेलवी फिरक़ा इस आयत के "وَابْتَغُوا إِلَيْهِ الْوَسِيلَةَ" (उसके क़ुर्ब का वसीला तलाश करो) से यह गुमराह कुन बात निकालते हैं कि:

> "वसीला" का मतलब पैग़म्बरों, औलिया, पीरों को अल्लाह से दुआ के लिए ज़रिया बनाना है, यहाँ तक कि कब्रों से मांगा जाना भी जायज़ है।
 

 यह अकीदा कई वजहों से कुरआन और सुन्नत के खिलाफ़ है:

ताबेईन के नज़दीक वसीला का मतलब:

कई ताबेईन ने (وَابْتَغُوا إلَـيْهِ الوَسِيـلَةَ) का मतलब नेक अमल करके अल्लाह तआला की नजदीकी हासिल करना लिया है।

(1) इब्ने जरी तबरी रह0 ने कहा (और उसका क़ुर्ब तलाश करो) इसका मतलब अल्लाह से नजदीकी हाशिल करो अमल करके जो उसे पसंद है

(2) अबु वाईल शक़ीक़ बिन सलमा रह0 (तबाई) इस आयत की तफ़्सीर में कहते हैं
अल्लाह की नजदीकी हाशिल करो नेक अमल करके

(3) आता बिन अबी रबाह रह0 मशहूर (तबाई) इस आयत की तफ़्सीर में कहते हैं
अल्लाह का क़ुर्ब तलाश करो

(4) हज़रत मोजाहिद रह0 (तबाई) इस आयत की तफ़्सीर में कहते हैं
अल्लाह का क़ुर्ब तलाश करो

(5) अब्दुल्लाह बिन कसीर रह0 (तबाई) इस आयत की तफ़्सीर में कहते हैं
अल्लाह का क़ुर्ब तलाश करो
(तफ़्सीर तबरी जिल्द 8 सफा नंबर 403),(तफ़्सीर तबरी जिल्द 4 सफा नंबर 404)

और अल्लाह तआला का क़ुर्ब कैसे हासिल करना है यह बात हदीस-ए-क़ुदसि में अल्लाह तआला ने खुद बता दिया है की अल्लाह का बन्दा फ़र्ज़ अदा करने के बाद नफ्ली इबादत करके अल्लाह का क़ुर्ब हाशिल करता है

हदीस
नबी करीम ﷺ ने फरमाया अल्लाह सुब्हानहु व तआला फरमाता है मेरा बन्दा जिन जिन इबादतों से मेरा क़ुर्ब हाशिल करता है और कोई इबादत मुझको उससे ज्यादा पसंद नहीं है जो मैंने उसपर फ़र्ज़ की है (यानी फ़राइज़ मुझको बहुत पसंद है जैसे नमाज़, रोज़ा, ज़कात, हज) और मेरा बन्दा फ़र्ज़ अदा करने के बाद नफ्ली इबादत करके मुझसे इतना नजदीक हो जाता है की मैं उससे मोहब्बत करने लग जाता हूँ
(सहीह बुखारी हदीस नंबर 6502)

अल्लाह तआला क़ुरआन में फरमाते हैं

आगाह रहो कि इबादत तो ख़ास खुदा ही के लिए है और जिन लोगों ने खुदा के सिवा (औरों को अपना) सरपरस्त बना रखा है और कहते हैं कि हम तो उनकी परसतिश सिर्फ़ इसलिए करते हैं कि ये लोग खुदा की बारगाह में हमारा तक़र्रब बढ़ा देगें इसमें शक नहीं कि जिस बात में ये लोग झगड़ते हैं (क़यामत के दिन) खुदा उनके दरमियान इसमें फैसला कर देगा बेशक खुदा झूठे नाशुक्रे को मंज़िले मक़सूद तक नहीं पहुँचाया करता(अल क़ुरआन सूरह 39 आयत 3)

🔘और मस्जिदें अल्लाह ही के लिए हैं, लिहाज़ा अल्लाह के साथ किसी और को न पुकारो।[सूरह जिन्न (72): आयत 18]
🔘उससे बढ़कर गुमराह कौन है जो अल्लाह को छोड़कर ऐसे को पुकारे जो क़यामत तक उसे जवाब नहीं दे सकते?[सूरह अहक़ाफ़ (46): आयत 5]
🔘और सूरह फ़ातिर (35:22) में अल्लाह फरमाता है कि "और तुम उन्हें नहीं सुना सकते जो कब्रों में हैं।
इन आयात से वाज़ेह है कि वसीला का मतलब फ्राइज़ और नेक अमाल के ज़रिए अल्लाह का कुर्ब हासिल करना है और दुआ सिर्फ़ अल्लाह से करनी है, किसी और को पुकारना शिर्क है।
"लोगों! अल्लाह से बात करना सीखो। वह ताकतवर है, मजबूर नहीं। वह तुम्हारी गर्दन की नस से भी ज़्यादा क़रीब है, दूर नहीं। उसका इल्म पूरा है, अधूरा नहीं। उसे न कमज़ोरी है, न मौत। वह हमेशा ज़िंदा है। उसके सिवा कोई इबादत के क़ाबिल नहीं है। बस उसी को खालिस करके पुकारो और उसी की इबादत करो। सारी तारीफें उसी अल्लाह के लिए हैं, जो सारे जहान का परवरदिगार है। (सूरा मोमिन: 65)


सहाबा का अमल:

रसूलुल्लाह (सलल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने सहाबा को यही तालीम दी के: "दुआ अल्लाह से करो, अल्लाह ही है जो देता है।"

रसूलुल्लाह (स.अ.) ने फरमाया:
"जब तुम अल्लाह से दुआ करो तो यक़ीन के साथ करो..."
— (सुनन तिर्मिज़ी, हदीस नं: 3479)

एक जगह और फरमाए:"दुआ इबादत ही है।"
— (सुनन अबू दाऊद: 1479, तिर्मिज़ी: 2969, इब्ने माजह: 3828)
 

इससे साबित होता है कि दुआ एक इबादत है और इबादत सिर्फ अल्लाह के लिए होती है। जब कोई ज़रूरत होती तो सहाबा क्या करते? नबी (स.अ.) की ज़िंदगी में भी सीधा अल्लाह से मांगते या अल्लाह के नबी ﷺ से दुआ करवाते थे। लेकिन नबी ﷺ के वफ़ात के बाद किसी भी सहाबी ने ऐसा नहीं किया!
आइए इसे एक हदीस से समझें:

सहिह बुखारी में है कि उमर (रज़ि.) के दौर में जब क़हत पड़ा तो उन्होंने अब्बास (रज़ि.) से दुआ करवाई, न कि नबी (स.अ.) की कब्र पर जाकर या उनको पुकार कर। इससे साफ़ होता है कि वसीला का मतलब जिंदा नेक लोगों से दुआ कराना या अपने आमाल से तवस्सुल करना है — ना कि फौत शुदाह को पुकारना।
सहिह बुखारी, हदीस नं: 1010, किताबुल इस्तिस्क़ा)

यानी उनका अकीदः और अमल देखें कि क़हत के दौरान उमर (रज़ि.) ने नबी (स.अ.) की कब्र पर जा कर दुआ नहीं मांगी, बल्कि अब्बास (रज़ि.) से दुआ करवाई। अगर वो चाहते तो नबी ﷺ की वसीला से दुआ कर सकते थे लेकिन ऐसा नहीं किए!
सहाबा कभी भी नबी (स.अ.) या किसी वली को मौत के बाद नहीं पुकारते या वसीला लेते थे।


🌿 नबी ﷺ के हयात में वसीला 

एक अंधे साहाबी नबी ﷺ की ख़िदमत में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया:“ऐ अल्लाह के रसूल ﷺ! मैं चाहता हूँ कि अल्लाह मुझ पर रहम करे और मेरी नज़र लौटा दे।

रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
“अगर तुम सब्र करो तो ये तुम्हारे लिए बेहतर है, और अगर चाहो तो मैं तुम्हारे लिए दुआ कर दूँ।”
उन्होंने कहा:“ऐ अल्लाह के रसूल ﷺ! आप मेरे लिए दुआ कर दीजिए।”

तब नबी ﷺ ने उन्हें एक दुआ सिखाई:

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ وَأَتَوَجَّهُ إِلَيْكَ بِنَبِيِّكَ مُحَمَّدٍ نَبِيِّ الرَّحْمَةِ، إِنِّي تَوَجَّهْتُ بِكَ إِلَى رَبِّي فِي حَاجَتِي هَذِهِ لِتُقْضَى لِي، اللَّهُمَّ فَشَفِّعْهُ فِيَّ

तरजुमा:
“ऐ अल्लाह! मैं तुझ से सवाल करता हूँ और तुझ की तरफ़ तवज्जो करता हूँ अपने नबी मुहम्मद ﷺ के वसीले से — जो रहमत के पैग़ंबर हैं। ऐ अल्लाह! मैं अपने नबी ﷺ के वसीले से तेरी तरफ़ तवज्जो करता हूँ कि मेरी ये हाजत पूरी कर दे। ऐ अल्लाह! उन्हें मेरे हक में शफ़ीअ (सिफ़ारिश करने वाला) बना दे।”

📘 (सुनन तिर्मिज़ी, हदीस: 3578 | इमाम नसाई | इमाम अहमद)
इमाम तिर्मिज़ी ने कहा: “हदीस हसन सहीह है।”
 

🔍 गलतफहमी कहाँ से होती है:

यह वही मशहूर हदीस है जिससे कुछ लोग यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि पैग़ंबरों या औलिया (अल्लाह के नेक बंदों) की ज़ात (व्यक्तित्व) के वसीले से दुआ माँगना जायज़ है।

लेकिन —
कुछ हदीस के विद्वानों ने कहा कि यह हदीस कमज़ोर (ज़ईफ़) है या इसकी सच्चाई पर शक है।और जो विद्वान इसे सहीह (सही) मानते हैं, उनमें से भी कई सलफी विचारधारा वाले बड़े आलिम जैसे
👉 इमाम इब्न तैमिया और
👉 अलबानी
ने इस हदीस की सही व्याख्या (तफ्सीर) बताई है।


🌿 उन्होंने क्या कहा?
उन्होंने कहा कि उस अंधे आदमी को नबी ﷺ ने अपनी ज़ात (शख्सियत) का वसीला नहीं बताया था,
बल्कि नबी ﷺ ने उसे दुआ करने का तरीका सिखाया था —
कि वो अल्लाह से ही माँगे, लेकिन कहे:
“ऐ अल्लाह! अपने नबी मुहम्मद ﷺ की बरकत से मेरी दुआ कबूल कर।”

यानी —

वो नबी ﷺ से नहीं माँग रहा था, बल्कि अल्लाह से माँग रहा था और नबी ﷺ की दुआ का ज़रिया (वसीला) बना रहा था।

🌾 इसके बाद क्या हुआ?

नबी ﷺ की वफ़ात (इंतिकाल) के बाद सहाबा (रज़ि.अन्हुम) ने कभी ऐसा नहीं किया कि वे नबी ﷺ की क़ब्र के पास जाकर उनसे दुआ माँगें।
जैसे:

जब हज़रत उमर رضي الله عنه के ज़माने में क़हत (बारिश न आने) की हालत आई,
तो उन्होंने नबी ﷺ की क़ब्र पर जाकर दुआ नहीं माँगी,बल्कि नबी ﷺ के चाचा हज़रत अब्बास  रज़ी अल्लाह अन्हू से कहा:“आप दुआ कीजिए, ताकि अल्लाह हम पर रहम करे।”

और सभी सहाबा ने इस बात पर सहमति जताई —किसी ने यह नहीं कहा कि
“क्यों न हम नबी ﷺ से ही दुआ की दरख़्वास्त करें जैसे अंधे सहाबी ने की थी।”

🌼 नतीजा

👉 नबी ﷺ के ज़माने में, जब वे ज़िंदा थे,
उनसे दुआ करवाना या उनकी दुआ का वसीला लेना सही था।

👉 लेकिन नबी ﷺ की वफ़ात के बाद
सीधे उनसे दुआ माँगना या उनकी ज़ात को पुकारना सही नहीं है —
क्योंकि ऐसा न तो किसी सहाबी ने किया,
और न किसी ने इसकी सलाह दी।



"इससे यह सिद्ध होता है कि नबी (स.अ.व.) के इंतेकाल के बाद सहाबा ने कभी उन्हें वसीला नहीं बनाया। वे ज़िंदा और नेक इंसान से ही दुआ करवाते थे। इसलिए, किसी मृत व्यक्ति का वसीला लेना शरीअत में सही नहीं है और इसे हराम और नाजायज़ माना गया है।

Conclusion :

इस आयत का सही मतलब यही है कि इंसान अपने नेक आमाल, तौबा, और अल्लाह की राह में मेहनत के ज़रिए उसका क़ुर्ब हासिल करे।ना कि कबरों में दफ़न हैं उन से मदद मांगना या उन्हें पुकारना। कोई भी हाजात या ज़रूरियात हो अल्लाह से ही मांगे या दुआ करे। 

औलिया, पीरों या रसूल (स.अ.) को मौत के बाद पुकारना शिर्क है और इससे बचना फ़र्ज़ है। सही वसीला वही है जो कुरआन और सुन्नत से साबित हो।
जो लोग इस आयत से औलिया की फरियादी बनने का जवाज़ निकालते हैं, वो कुरआन और सुन्नत की रूह के खिलाफ़ जा रहे हैं। वो अल्लाह और अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के नाफरमानी कर रहे हैं! यह लेख Ayat "Waseela Talaash karo" Galt aqeede ka Radd कैसा लगा अपनी राय ज़रूर दें। 
"ऐ अल्लाह! हमें तौहीद की समझ अता फ़रमा, और हमें गुमराही से बचा।"आमीन या रब
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इस्लामी ब्लॉगर और दीन की बातों को आम करने में मदद करें। मक़सद है सही दीन और इल्म को लोगों तक पहुंचाना

"अल्लाह का दर मत छोड़िए। उसकी चौखट को इस तरह थाम लीजिए कि आपको उसका बंदा होने का यकीन हो जाए। नबी-ए-अकरम ﷺ ने फरमाया, "इस यकीन के साथ अल्लाह से दुआ माँगो कि वह जरूर कबूल होगी। जान लो कि अल्लाह गाफिल (बेखबर) दिल और खेल-तमाशे में लगे इंसान की दुआ को कबूल नहीं करता।" (जामेअ-उत-तिरमिज़ी)

FAQs: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1.  क्या हम नबी (स.अ.) को वसीला बना सकते हैं?
नबी (स.अ.) की ज़िंदगी में आपसे दुआ की दरख्वास्त करना जायज़ था, लेकिन वफ़ात के बाद उन्हें पुकारना या मदद मांगना शिर्क के ज़ुमरे में आता है।
2.  क्या क़ब्रों से दुआ मांगना जायज़ है?
नहीं, दुआ सिर्फ़ अल्लाह से मांगना वाजिब है। क़ब्र वाले सुन भी नहीं सकते, और सुनें तो जवाब नहीं दे सकते।
3. : क्या नेक आमाल का वसीला देना सुन्नत है?
 जी हां, बिल्कुल। गुफा वाली हदीस इसकी सबसे उम्दा मिसाल है।जब तीन शख़्स गुफ़ा में फंस गए तो उन्होंने अपने नेक अमल का वसीला पेश किया और अल्लाह ने उनकी दुआ क़बूल की। 
4. क्या सहाबा ए कराम ने नबी ﷺ के क़बर पर जा कर वसीला से दुआ की?
कभी नहीं की, बल्कि  उमर (रज़ि.) के दौर में जब क़हत पड़ा तो उन्होंने अब्बास (रज़ि.) से दुआ करवाई, न कि नबी (स.अ.) की कब्र पर जाकर या उनको पुकार कर। इससे साफ़ होता है कि वसीला का मतलब जिंदा नेक लोगों से दुआ कराना या अपने आमाल से तवस्सुल करना है — ना कि मुर्दों को पुकारना।
सहिह बुखारी, हदीस नं: 1010, किताबुल इस्तिस्क़ा)
5. सूरह अल-मायदा में वसीला से मतलब क्या है ?
वसीला से मुराद अल्लाह का क़ुर्ब और ज़रिया है यानी ऐसे नेक अमाल जैसे नमाज़, रोज़ा, तौबा, दुआ वगैरह जिसके ज़रिया एक बंदा अल्लाह के नज़दीक हो सकता है
"अच्छे काम और दुआ से बढ़कर कोई वसीला नहीं है। आप कैसे सोच सकते हैं कि अगर आप अल्लाह के आज्ञाकारी बनें, उसके हुक्मों का पालन करें, उससे मुहब्बत करें, तो वह आपकी नहीं सुनेगा? अल्लाह आपको बर्बाद करने के लिए छोड़ देगा (मआज़ अल्लाह)? ऐसी सोच रखना भी बड़ा गुनाह है। बस हमें अपनी गलतियों और गुनाहों से भरी ज़िंदगी को छोड़कर उस एक अल्लाह को पुकारना चाहिए।


سورۃ المائدہ:آیت 35 "وَابْتَغُوا إِلَيْهِ الْوَسِيلَةَ" – میں لفظِ "وسیلہ" کا غلط استعمال اور گمراہ عقائد کا ردّ

✍️ مصنف: محمد محب طاہِری | 🕋 اسلامی آرٹیکل | وسیلہ اور توسل | غلط عقیدے کا رد | وسیلہ اور شرک 🕰 تازہ کاری: 23 اگست 2025

عنوان: آیت "وسیلہ تلاش کرو" — غلط عقیدے کا رد

آج کل بہت سے لوگ "وسیلہ" کے معاملے میں گمراہی کا شکار ہیں۔ کچھ لوگ یہ سمجھتے ہیں کہ اولیا اور پیروں کو دعا میں پکارنا، ان کو وسِیلہ ماننا یا ان کی قبروں سے مدد مانگنا جائز ہے۔ وہ اس کی تحصیل کے لیے اس آیت "وسیلہ تلاش کرو" کا حوالہ دیتے ہیں:

اے ایمان والو! اللہ سے ڈرو اور اس کا قرب تلاش کرو اور اس کی راہ میں جہاد کرو، تاکہ تم کامیاب ہو جاؤ۔" — (سورۃ المائدہ: آیت 35)

اس آرٹیکل میں ہم اس آیت کی صحیح تفسیر پیش کریں گے، غلط عقیدے کا رد کریں گے، اور وسیلہ کا حقیقی مطلب قرآن و سنت کی روشنی میں بیان کرنے کی کوشش کریں گے۔ قرآن کی متعدد آیات اور احادیث ہیں جو اس عقیدے کے رد میں دلائل فراہم کرتی ہیں؛ ان میں سے چند احوال ذِکر کیے جا رہے ہیں۔

آیت کا مفہوم — وضاحت اور تفسیر

اس آیت میں تین اہم احکام بیان ہوئے ہیں:

1️⃣ اللہ سے ڈرنا: یعنی ہر اس چیز سے بچنا جو اللہ کی ناراضگی کا باعث ہو۔
2️⃣ وسیلہ تلاش کرنا: یعنی وہ ذریعہ جس سے اللہ کی رضا اور قرب حاصل ہو۔
3️⃣ اللہ کی راہ میں جہاد: یعنی دین کی حفاظت اور بلندی کے لیے کوشش کرنا۔

یہ بات واضح ہے کہ قرآن کی اس آیت میں "وسیلہ" کا مفہوم کسی گزر جانے والے نبی، ولی یا شہید کے ذریعے کی جانے والی وسِیلہ نہیں ہے، کیونکہ قرآن و حدیث میں اس معنی کا کوئی ثبوت موجود نہیں۔ قرآن و حدیث میں وسیلے کا مطلب کچھ اور ہے۔وسیلہ کا مطلب وہ ذریعہ ہے جس سے اللہ کی رضا اور قرب حاصل کیا جائے۔ یہ وسیلہ نیک اعمال ہیں، جیسے نماز، روزہ، توبہ، دعا وغیرہ۔ مفسرین جیسے ابن کثیر، امام طبری وغیرہ نے بھی وسیلہ کا یہی مفہوم بیان کیا ہے۔

وسیلہ کا صحیح مطلب کیا ہے؟

وسیلہ" کا مطلب کسی فوت شدہ نبی، ولی یا پیر کا واسطہ نہیں ہے!قرآن و سنت میں "وسیلہ" سے مراد ہے:

1. نیک اعمال کا وسیلہ: نماز، روزہ، توبہ، دعا وغیرہ۔(حدیثِ صحیح بخاری: تین آدمیوں کی غار والی روایت) ہر شخص نے اپنے نیک عمل کو وسیلہ بنا کر دعا کی — کسی نے نبی، پیر یا فوت شدگان کو پکارا نہیں۔
2. اللہ کے صفاتی ناموں کا وسیلہ: جیسے "یا رحمن، یا رحیم" کہہ کر دعا کرنا۔
3. زندہ نیک شخص کی دعا کا وسیلہ: جیسا کہ صحابہ کرام نبی ﷺ سے دعا کرواتے تھے۔


بریلوی عقیدے کا رد

بعض بریلوی حلقے اس آیت "وَابْتَغُوا إِلَيْهِ الْوَسِيلَةَ" سے یہ غلط نتیجہ نکالتے ہیں کہ:

وسیلہ کا مطلب پیغمبروں، اولیاء، پیروں وغیرہ کو اللہ کے نزدیک دعا کے لیے ذریعہ بنانا ہے، حتیٰ کہ قبروں سے مانگنا بھی جائز ہے۔

یہ عقیدہ کئی وجوہات کی بنا پر قرآن و سنت کے خلاف ہے:

تابعین اور مفسرین کا موقف

کئی تابعین نے (وَابْتَغُوا إِلَيْهِ الْوَسِيلَةَ) کا مطلب نیک اعمال کرکے اللہ تعالیٰ کے قریب ہونا سمجھا ہے:

🛑 ابن جریر طبری نے کہا: "اور اس کا قرب تلاش کرو" یعنی وہ اعمال اختیار کرو جو اللہ کو پسند ہوں۔(تفسیر طبری جلد 8، صفحہ 403)
🛑 ابو وائل شقیق بن سلمہ (تابعی) نے کہا: اللہ کی قربت نیکی کے ذریعے حاصل کرو۔
🛑 عطاء بن ابی رباح (تابعی)، مجاہد (تابعی)، عبداللہ بن کثیر (تابعی) وغیرہ نے بھی یہی تفسیر نقل کی۔ (تفسیر طبری حوالہ جات: جلد 8 صفحہ 403؛ جلد 4 صفحہ 404)
اور اللہ تعالیٰ نے خود حدیثِ قدسی میں فرمایا کہ بندہ فرض فرائض کے بعد نفلی عبادت کر کے میرے قریب آ جاتا ہے، یعنی نیکی و عبادت وسیلہ بنتی ہے۔

حدیثِ قدسی رسول اکرم ﷺ نے فرمایا:

اللہ سبحانہ وتعالیٰ فرماتا ہے: "میرا بندہ وہ عمل جس سے میرا قرب حاصل کرتا ہے، کرتا ہے؛ اور کوئی عمل میرے نزدیک اس سے بہتر نہیں جسے میں نے فرض کیا ہے۔ اور میرا بندہ فرض ادا کرنے کے بعد نوافل کے ذریعہ مجھ سے اتنا قریب ہو جاتا ہے کہ میں اسے محبوب کر لیتا ہوں۔"(صحیح بخاری، حدیث نمبر 6502)


قرآن و دیگر دلائل

اور اللہ تعالیٰ فرماتا ہے:
یاد رکھو کہ عبادت تو خاص اللہ کے لیے ہے، اور جن لوگوں نے اللہ کے سوا کوئی سرپرست بنا رکھا ہے اور کہتے ہیں کہ ہم تو انہیں صرف اس لیے سجاتے ہیں کہ وہ ہمیں اللہ کے نزدیک قریب کرا دیں…" — (القرآن)

مزید آیات:
🔘"مساجد اللہ ہی کے لیے ہیں، لہٰذا اللہ کے ساتھ کسی کو نہ پکارو۔" — (سورہ الجن 72:18)
🔘"ان سے زیادہ کون گمراہ ہے جو اللہ کو چھوڑ کر ایسے لوگوں کو پکارے جو قیامت تک انہیں جواب نہیں دے سکتے؟" — (سورہ احقاف 46:5)
🔘سورہ فصلّت/فاطر میں بھی ذکر ہے کہ تم مرے ہوئے لوگوں کو نہیں سنا سکتے۔ (فاطر: 35:22 )
🔘ہم تو ان (ولیوں) کی عبادت صرف اس لیے کرتے ہیں تاکہ یہ ہمیں اللہ سے قریب کر دیں۔"
(سورۃ الزمر: 3)

ان آیات سے واضح ہے کہ دعا صرف اللہ سے مانگنا جائز ہے، قبروں سے مانگنا شرک ہے۔ وسیلہ کا مراد نیک اعمال اور دعا کے ذریعے اللہ کا قرب حاصل کرنا ہے اور دعا صرف اللہ سے کرنی چاہیے؛ کسی مخلوق کو پکارنا شرک و گمراہی ہے۔

لوگوں کو نصیحت

لوگو! اللہ سے باتیں کرنا سیکھو۔ وہ قادر ہے، محتاج نہیں۔ وہ تمہارے بہت قریب ہے،دور نہیں۔  اس کا علم مکمل ہے۔ اسے نہ موت آتی ہے نہ کمزوری ہوتی ہے۔ بس اسے خالص کرکے پکارو اور اسی کی عبادت کرو۔ تمام تعریفیں اسی اللہ کے لیے ہیں جو سارے جہان کا پروردگار ہے۔


صحابہ کا عمل

رسول اللہ ﷺ نے صحابہ کو یہی سکھایا کہ دعا اللہ سے کرو؛ اللہ ہی دیتا ہے۔

رسول اللہ ﷺ نے فرمایا: "جب تم اللہ سے دعا کرو تو یقین کے ساتھ کرو…" — (سنن ترمذی : 3479)
اور فرمایا: "دعا عبادت ہی ہے۔" — (سنن ابوداؤد: 1479؛ ترمذی: 2969؛ ابن ماجہ: 3828)

اس سے ثابت ہوتا ہے کہ دعا عبادت ہے اور عبادت تو صرف اللہ ہی کے لیے ہے۔ جب ضرورت پیش آتی تھی تو صحابہ سیدھے اللہ سے مانگتے یا نبی ﷺ سے دعا کروا لیتے تھے، مگر نبی ﷺ کی وفات کے بعد کسی صحابی نے نبی ﷺ کو پکارنے یا قبر پر جا کر ان کے وسیلے سے دُعا مانگنے کا عمل اختیار نہیں کیا۔

 رسول ﷺ کی زندگی میں صحابہ ان سے دعا کرواتے تھے، لیکن وفات کے بعد کبھی کسی نے نبی ﷺ کو پکارا یا وسیلہ نہیں بنایا۔
مثال کے طور پر:

قحط کے دوران حضرت عمرؓ نے نبی ﷺ کی قبر پر جا کر دعا نہیں مانگی،بلکہ حضرت عباسؓ (نبی کے چچا) سے دعا کروائی۔(صحیح بخاری: حدیث 1010، کتاب الاستسقاء)
یعنی صحیح بخاری کی حدیث سے معلوم ہوتا ہے کہ جب عمر رضی اللہ عنہ کے دور میں قحط آیا تو انہوں نے عباس رضی اللہ عنہ سے دعا کروائی، نہ کہ نبی ﷺ کی قبر پر جا کر یا قبر سے مانگ کر — یہ صاف ظاہر کرتا ہے کہ وسیلہ کا اصل مفہوم زندہ نیک لوگوں سے دعا کروانا یا اپنے اعمال سے توسل کرنا ہے، نہ کہ فوت شدہ کو پکارنا۔


نبی ﷺ کے حیات میں وسیلہ

ایک اندھے صحابی نے حضور ﷺ کی خدمت میں آ کر عرض کیا کہ:

وہ چاہتا ہے کہ اللہ اس پر رحم کرے اور اس کی بینائی بحال کرے۔ نبی ﷺ نے فرمایا: "اگر تم صبر کرو تو تمہارے لیے بہتر ہے، اور اگر چاہو تو میں تمہارے لیے دعا کروں گا۔" صحابی نے عرض کی: "یا رسول اللہ ﷺ! آپ میرے لیے دعا فرمائیے۔"

پھر نبی ﷺ نے اسے ایک دعا سکھائی:

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ وَأَتَوَجَّهُ إِلَيْكَ بِنَبِيِّكَ مُحَمَّدٍ نَبِيِّ الرَّحْمَةِ، إِنِّي تَوَجَّهْتُ بِكَ إِلَى رَبِّي فِي حَاجَتِي هَذِهِ لِتُقْضَى لِي، اللَّهُمَّ فَشَفِّعْهُ فِيَّ
( ترجمہ:) "اے اللہ! میں تجھ سے سوال کرتا ہوں اور تیری طرف اپنے نبی محمد ﷺ کی وسِیلے کے ساتھ رجوع کرتا ہوں — جو رحمت کے نبی ہیں۔ میں نے تیرے نزدیک اپنی حاجت اس واسطے پیش کی ہے کہ تو اسے میرے لیے پورا فرما دے۔ اے اللہ! انہیں میری طرف شَفِیع بنا دے۔"
(سنن ترمذی، حدیث: 3578؛ امام نسائی؛ امام احمد) — امام ترمذی نے کہا: "حدیث حسن صحیح ہے۔"
 

غلط فہمی کہاں سے پیدا ہوتی ہے؟

سنن ترمذی کی یہی مشہور حدیث ہے جس سے بعض لوگ یہ ثابت کرنے کی کوشش کرتے ہیں کہ پیغمبروں یا اولیا کی ذات کے وسیلے سے دعا مانگنا جائز ہے۔ تاہم: بعض محدثین نے کہا کہ یہ حدیث ضعیف ہے یا اس کی حقیقت پر شبہ ہے۔

جو علماء اسے صحیح تسلیم کرتے ہیں، ان میں سے کئی (خاص طور پر اہلِ تحقیقِ سلفی) نے اس حدیث کی صحیح تشریح بتائی: کہ نبی ﷺ نے اندھے شخص کو اپنی ذات کا وسیلہ بتایا نہیں بلکہ دعا کا طریقہ سکھایا — یعنی اس نے اللہ سے مانگا مگر کہا کہ "یا اللہ! اپنی رحمت کے نبی ﷺ کی طرف سے میری دعا قبول فرما"۔ اس میں دعا کا مرکز اللہ ہے، نہ کہ نبی ﷺ کو مخاطب کرنا۔


بعد ازِ وفات نبی ﷺ — صحابہ کا عمل اور نتیجہ

نبی ﷺ کے انتقال کے بعد صحابہ نے کبھی بھی نبی ﷺ یا کسی ولی کو مر کر واسطہ بنا کر نہیں پکارا۔ جیسا کہ اوپر ذکر ہوا، جب عمرؓ کے دور میں قحط آیا تو انہوں نے نبی ﷺ کی قبر پر جا کر دعا نہیں مانگی بلکہ عباسؓ سے دعا کروائی۔ اگر صحابہ چاہتے تو نبی ﷺ کی قبر پر جا کر دعا مانگ سکتے تھے مگر انہوں نے ایسا نہیں کیا۔ اس سے نتیجہ اخذ کیا جاتا ہے:

نبی ﷺ کے زمانے میں، جب وہ زندہ تھے، ان سے دعا کروانا یا ان کی شفاعت طلب کرنا جائز تھا (یعنی ان کی دعا کو وسیلہ جانا)۔
مگر نبی ﷺ کی وفات کے بعد انہیں پکارنا یا مر کر ان سے مدد مانگنا شرعی طور پر درست نہیں ہے — کیونکہ نہ تو کسی صحابی نے ایسا کیا اور نہ ہی کوئی اس کی حوصلہ افزائی کرتا رہا۔


خلاصہ اور نتیجہ :

اس آیت کا صحیح مفہوم یہی ہے کہ انسان اپنے نیک اعمال، توبہ اور اللہ کی راہ میں کوشش کے ذریعے اللہ کا قرب حاصل کرے — نہ کہ قبروں میں دفن افراد سے مدد مانگے یا انہیں پکارے۔ ہر حاجت یا ضرورت ہو تو اللہ سے ہی مانگو۔ اولیا، پیروں یا رسول ﷺ کو موت کے بعد پکارنا شرک میں شمار ہوتا ہے اور اس سے بچنا فرض ہے۔ صحیح وسیلہ وہ ہے جو قرآن و سنت سے ثابت ہو۔
جو لوگ اس آیت سے اولیاء کی فریادی بننے کا جواز نکالتے ہیں، وہ دراصل قرآن و سنت کی روح کے خلاف جا رہے ہیں اور اللہ و اس کے نبی ﷺ کی نافرمانی میں داخل ہو رہے ہیں۔
وسیلہ کا صحیح مطلب ہے نیک اعمال کے ذریعے اللہ کا قرب حاصل کرنا۔قبروں یا فوت شدہ سے دعا مانگنا شرک ہے۔
"اے اللہ! ہمیں توحید کی سمجھ عطا فرما اور ہمیں شرک و گمراہی سے محفوظ رکھ۔"
آمین یا رب العالمین


اللہ کا در مت چھوڑو۔ اس کی درگاہ کو اس طرح تھام لو کہ تمہیں اپنے اس کا بندہ ہونے کا یقین ہو۔ نبیِ اکرم ﷺ نے فرمایا: 'اس یقین کے ساتھ اللہ سے دعا مانگو کہ وہ ضرور قبول فرمائے۔ جان لو کہ اللہ غافل دل اور کھیل تماشے میں مصروف انسان کی دعا قبول نہیں کرتا۔' " — (جامع الترمذی)

اکثر پوچھے جانے والے سوالات (FAQs)

کیا ہم نبی ﷺ کو وسیلہ بنا سکتے ہیں؟
نبی ﷺ کی زندگی میں ان سے دعا کروانا جائز تھا، مگر وفات کے بعد انہیں پکارنا یا مر کر ان سے مدد مانگنا شرک کے زمرے میں آتا ہے۔

کیا قبروں سے دعا مانگنا جائز ہے؟
نہیں؛ دعا صرف اللہ سے مانگنی واجب ہے۔ قبر والے نہ تو سن سکتے ہیں اور نہ ہی جواب دے سکتے ہیں۔

کیا نیک اعمال کو وسیلہ بنانا سنت ہے؟
جی ہاں۔ گُفہ والی حدیث اس کا بہترین نمونہ ہے: جب تین شخص غار میں پھنس گئے تو انہوں نے اپنے نیک اعمال کو وسیلہ بنایا اور اللہ نے ان کی دعا قبول فرمائی۔

کیا صحابہ کرام نے نبی ﷺ کی قبر پر جا کر وسیلہ سے دعا کی؟
نہیں؛ کبھی نہیں۔ مثال کے طور پر، جب عمر رضی اللہ عنہ کے دور میں قحط آیا تو انہوں نے عباس رضی اللہ عنہ سے دعا کروائی، نہ کہ نبی ﷺ کی قبر پر جا کر یا قبر سے مانگ کر۔ (صحیح بخاری، حدیث نمبر: 1010، کتاب الاستسقاء)

سورۃ المائدہ میں وسیلہ سے کیا مراد ہے؟
وسیلہ سے مراد اللہ کا قرب اور ذریعہ ہے — یعنی نیک اعمال جیسے نماز، روزہ، توبہ، دعا وغیرہ جن کے ذریعے بندہ اللہ کے قریب ہو سکتا ہے۔



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