Bina Hisab Kitab Jannat Mein Jane Wale 70 Hazar Log | Hadith Explanation
रसूलुल्लाह ﷺ ने अपनी उम्मत के 70 हज़ार ऐसे खुशक़िस्मत लोगों का ज़िक्र फ़रमाया है जिनके लिए न हिसाब होगा और न अज़ाब।
आइए क़ुरआन और सहीह हदीस की रोशनी में समझते हैं कि ये Bina Hisab Kitab Jannat Mein Jane Wale 70 Hazar Log कौन हैं, उनकी पहचान क्या है और हम कैसे उनमें शामिल हो सकते हैं।
70 हज़ार लोगों वाली सहीह हदीस
📖 हदीस का हिंदी अनुवाद
मेरे सामने तमाम उम्मतें पेश की गईं। मैंने देखा कि किसी नबी के साथ थोड़े लोग हैं, किसी के साथ एक या दो आदमी हैं और किसी नबी के साथ कोई भी नहीं। फिर मेरे सामने एक बहुत बड़ी जमाअत दिखाई गई। मैंने समझा कि ये मेरी उम्मत है। कहा गया: ये मूसा अलैहिस्सलाम और उनकी क़ौम है। फिर मुझसे कहा गया: आसमान के किनारे की तरफ़ देखो। मैंने देखा तो एक और बड़ी जमाअत थी। कहा गया: ये तुम्हारी उम्मत है, और इनमें से सत्तर हज़ार लोग ऐसे होंगे जो बगैर हिसाब-किताब और बगैर अज़ाब के जन्नत में दाख़िल होंगे।”
📚 हवाला (Reference)
- सहीह अल-बुख़ारी: 5705
- सहीह मुस्लिम: 220
70 हज़ार लोग कौन हैं? (पूरी वजाहत)
रसूलुल्लाह ﷺ ने खुद इन लोगों की चार बड़ी खूबियाँ बयान फ़रमाईं:
📖 दूसरी हदीस«هُمُ الَّذِينَ لَا يَسْتَرْقُونَ، وَلَا يَكْتَوُونَ، وَلَا يَتَطَيَّرُونَ، وَعَلَى رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَ»
अनुवाद:“ये वो लोग होंगे:
1️⃣ जो झाड़-फूंक (रुक़्या) की मांग नहीं करते
2️⃣ जो दाग़ देकर इलाज (कौटरी) नहीं कराते
3️⃣ जो बदशगुनी नहीं लेते
4️⃣ और अपने रब पर पूरा भरोसा (तवक्कुल) रखते हैं।”
📚 (बुख़ारी, मुस्लिम)
✨ संक्षिप्त नसीहत
यह हदीस हमें ख़ालिस तौहीद, मज़बूत तवक्कुल, और शिर्क व वहम से दूरी की दावत देती है। हर मोमिन को चाहिए कि अपने ईमान, अमल और भरोसे को अल्लाह के लिए ख़ालिस करे, ताकि वह भी इन खुशक़िस्मत लोगों में शामिल हो सके।
इन चार बातों की आसान समझ
1️⃣ झाड़-फूंक (रुक़्या) की मांग नहीं करते
बल्कि रुक़्या तो खुद रसूलुल्लाह ﷺ से साबित है, और आप ﷺ ने क़ुरआन की आयतों से दम भी किया और करने की इजाज़त भी दी।👉 असल बात यह है कि ये 70 हज़ार लोग:लोगों के सामने अपनी मजबूरी नहीं रखते,किसी इंसान को “आख़िरी सहारा” नहीं समझते, दुःख या परेशानी में किसी पीर, फ़क़ीर या मज़ार दरगाह पर नहीं जाते
बल्कि दुख व परेशानी में दुआ करते और सीधे अल्लाह से मदद मांगते हैं
ये लोग बीमारी, परेशानी या मुसीबत में यह नहीं कहते:
“फलाँ साहब ही ठीक कर सकते हैं”बल्कि उनका यक़ीन होता है:
“शिफ़ा देने वाला सिर्फ़ अल्लाह है”
📌 खुद रुक़्या पढ़ना जायज़ ही नहीं, बल्कि बेहतर है,
लेकिन हर बात पर दूसरों की तरफ़ भागना तवक्कुल की कमज़ोरी की निशानी है।
📖 क़ुरआन कहता है:
“और हम क़ुरआन में से वह चीज़ नाज़िल करते हैं जो शिफ़ा और रहमत है।”
📚 (सूरह अल-इसरा: 82)
2️⃣ दाग़ देकर इलाज (कौटरी) नहीं कराते
अरबों में आग से दाग़ देकर इलाज आम था और यह शरई तौर पर जायज़ है।खुद रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया कि इसमें शिफ़ा हो सकती है। लेकिन फिर भी आपने ﷺ इसे पसंद नहीं फ़रमाया।👉 ये 70 हज़ार लोग:तकलीफ़ से घबराकर हर सख़्त तरीका नहीं अपनाते बल्कि सब्र और अल्लाह पर भरोसे को तरजीह देते हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि इलाज छोड़ दिया जाए,बल्कि मतलब यह है कि: दिल इलाज पर नहीं, अल्लाह पर टिका होता है
📖 हदीस:रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“अल्लाह ने बीमारी भी उतारी है और उसका इलाज भी।”
📚 (बुख़ारी)
3️⃣ बदशगुनी नहीं लेते
ये लोग न:
तारीख़ों से डरते हैं,न दिन, महीने, साया, बिल्ली, परिंदे या इशारों से
न कहते हैं “आज काम मत करो, दिन अच्छा नहीं”
👉 क्योंकि बदशगुनी:दिल में डर पैदा करती है,अल्लाह पर भरोसे को कमज़ोर करती है और इंसान को वहम का शिकार बना देती है
👉 इसलिए ये लोग हर हाल में कहते हैं:“जो होगा, अल्लाह की तरफ़ से होगा”
बदशगुनी क्या है?
बदशगुनी का मतलब है किसी चीज़, वक़्त, शख़्स, इशारे या वाक़िये को नहूस समझ लेना और यह यक़ीन कर लेना कि इससे नुक़सान या बुराई होगी।जब इंसान किसी काम को सिर्फ़ इस डर से छोड़ दे कि
“शायद इससे कुछ बुरा हो जाएगा”,
तो यही बदशगुनी कहलाती है।
आम ज़िंदगी के उदाहरण
आम लोग बदशगुनी को अक्सर इस तरह अपनाते हैं:- ❌ आज मंगलवार है, आज काम शुरू नहीं करेंगे
- ❌ काली बिल्ली रास्ता काट गई, अब नुकसान होगा
- ❌ आज सफ़र नहीं करेंगे, सपना अच्छा नहीं आया
- ❌ परिंदा दाईं तरफ़ नहीं उड़ा, काम रुक गया
- ❌ किसी ने छींक दी, अब आगे मत जाओ
📖 इस्लाम बदशगुनी के बारे में क्या कहता है?
🕊️ अल्लाह सुब्हान व ताआला क़ुरआन में फरमाता है
उनकी बदशगुनी अल्लाह के पास है, लेकिन ज़्यादातर लोग नहीं जानते।”मतलब यह कि:
📚 (सूरह अल-आ’राफ़: 131)
फ़ायदा और नुक़सान का मालिक सिर्फ़ अल्लाह है,किसी दिन, जानवर या इशारे में खुद से ताक़त नहीं
📜 रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
बदशगुनी शिर्क की एक क़िस्म है।”👉 क्योंकि बदशगुनी में इंसान यह समझने लगता है कि
📚 (अबू दाऊद)
अल्लाह के अलावा कोई चीज़ नुक़सान पहुँचा सकती है।
बदशगुनी क्यों ख़तरनाक है?
♦️ यह अल्लाह पर भरोसे को कमज़ोर करती है♦️ दिल में डर और वहम पैदा करती है
♦️ इंसान को अमल से रोक देती है
♦️ तौहीद में कमी लाती है
इसी लिए इस्लाम ने बदशगुनी से सख़्त मना किया है।
बदशगुनी से कैसे बचें?
“اللهم لا طير إلا طيرك، ولا خير إلا خيرك، ولا إله غيرك”
अर्थ:🤲ऐ अल्लाह! तेरे फ़ैसले के सिवा कोई बदशगुनी नहीं, तेरे सिवा कोई भलाई नहीं और तेरे सिवा कोई माबूद नहीं।”
👉 साथ ही यह यक़ीन रखें: जो कुछ होगा, अल्लाह की इजाज़त से होगा।
ख़ुलासा
बदशगुनी: डर है, वहम है, ग़ैर-इस्लामी सोच हैजबकि एक मोमिन: अल्लाह पर भरोसा करता है, हर हाल में उम्मीद रखता है, फ़ैसला अल्लाह पर छोड़ता है
यही वजह है Bina Hisab Kitab Jannat Mein Jane Wale 70 Hazar Log बदशगुनी नहीं लेते।
4️⃣ अल्लाह पर मुकम्मल तवक्कुल (पूरा भरोसा)
यही इन 70 हज़ार लोगों की सबसे बड़ी पहचान है।👉 तवक्कुल का मतलब यह नहीं कि:हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाएँ
कोशिश ही न करें
बल्कि तवक्कुल का सही मतलब है: कोशिश पूरी,दुआ पूरी, भरोसा सिर्फ़ अल्लाह पर
ये लोग जानते हैं:देने वाला अल्लाह है,रोकने वाला अल्लाह है,नुक़सान और फ़ायदा उसी के हाथ में है
📖 क़ुरआन की साफ़ गवाही:
“और जो अल्लाह पर भरोसा करता है, अल्लाह उसके लिए काफ़ी हो जाता है।”📖 एक और आयत:
📚 (सूरह अत-तलाक़: 3)
“मोमिन वही हैं जिनके दिल अल्लाह के ज़िक्र से काँप जाते हैं।”
📚 (सूरह अल-अनफ़ाल: 2)
ख़ुलासा
इन 70 हज़ार लोगों की ज़िंदगी का उसूल एक ही है:- ✔️ दिल सिर्फ़ अल्लाह से जुड़ा
- ✔️ मदद उसी से
- ✔️ डर उसी का
- ✔️ उम्मीद उसी से
बगैर हिसाब-किताब जन्नत।
📖 70 हज़ार लोगों के समर्थन में क़ुरआनी आयतें और हदीसें
🕊️ तौहीद और तवक्कुल“अगर तुम मोमिन हो तो अल्लाह ही पर भरोसा करो।”
📚 (सूरह अल-माइदा: 23)
🕊️ शिर्क से बचने वालों की फ़ज़ीलत
“यक़ीनन शिर्क बहुत बड़ा ज़ुल्म है।”👉 ये 70 हज़ार लोग ख़ालिस तौहीद वाले हैं।
📚 (सूरह लुक़मान: 13)
🌿 तवक्कुल की मिसाल
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:अगर तुम अल्लाह पर वैसा भरोसा करो जैसा भरोसा करने का हक़ है, तो अल्लाह तुम्हें उसी तरह रिज़्क़ देगा जैसे परिंदों को देता है।”
📚 (तिर्मिज़ी)
क्या सिर्फ़ 70 हज़ार लोग ही होंगे?
एक और हदीस में आता है:👉 हर एक के साथ 70 हज़ार और होंगे।
यानी अल्लाह की रहमत बहुत वसीअ है।
📚 (मुसनद अहमद – सहीह)
🧭 हम कैसे उनमें शामिल हो सकते हैं?
✔️ ख़ालिस तौहीद✔️ शिर्क और बदअक़ीदी से दूरी
✔️ वहम, बदशगुनी और टोने-टोटकों से बचाव
✔️ सब्र और अल्लाह पर मुकम्मल भरोसा
✔️ सुन्नत पर अमल
(Conclusion):
बगैर हिसाब-किताब जन्नत में जाना कोई मामूली बात नहीं,ये उन लोगों का दर्जा है जो दिल से अल्लाह को पकड़ लेते हैं। जन्नत में जाना किसी दावे का नहीं, बल्कि ख़ालिस तौहीद, मज़बूत तवक्कुल और ग़लत अक़ीदों से दूरी का नतीजा है।जो लोग सिर्फ़ अल्लाह पर भरोसा रखते हैं, बदशगुनी और वहम से बचते हैं और सुन्नत के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारते हैं, वही इस बड़ी खुशख़बरी के हक़दार बनते हैं।
🤲अल्लाह हमें भी अपने भरोसे वाले बंदों में शामिल फ़रमाए और बगैर हिसाब हमें भी उन खुशक़िस्मत 70 हज़ार लोगों में शामिल फ़रमाए।
FAQs – Bina Hisab Kitab Jannat Mein Jane Wale 70 Hazar Log
70 हज़ार लोग कौन हैं जो बगैर हिसाब जन्नत में जाएंगे?
ये वो लोग हैं जिनका ईमान बेहद मज़बूत होगा, जो शिर्क, बदशगुनी और वहम से दूर रहेंगे और सिर्फ़ अल्लाह पर पूरा भरोसा (तवक्कुल) रखेंगे।
क्या रुक़्या (झाड़-फूंक) कराना हराम है?
नहीं।
शरई रुक़्या जायज़ है जो सुन्नत से साबित है।
दाग़ देकर इलाज (कौटरी) क्यों नहीं कराते?
दाग़ देकर इलाज जायज़ है,
👉 लेकिन ये लोग सब्र और अल्लाह पर भरोसे को ज़्यादा पसंद करते हैं।
बदशगुनी क्या होती है?
तारीख़, दिन, परिंदे, इशारे या वहम से डरना बदशगुनी कहलाता है।
📖 इस्लाम में बदशगुनी को मना किया गया है।
क्या बदशगुनी शिर्क है?
हदीस के मुताबिक बदशगुनी शिर्क की एक क़िस्म है, क्योंकि इससे अल्लाह पर भरोसा कमज़ोर होता है।
तवक्कुल का सही मतलब क्या है?
कोशिश करना + दुआ करना + नतीजा अल्लाह पर छोड़ देना = तवक्कुल
क्या सिर्फ़ 70 हज़ार ही जन्नत जाएंगे?
नहीं।
एक हदीस में आता है कि हर एक के साथ 70 हज़ार और होंगे।
👉 यानी अल्लाह की रहमत बहुत बड़ी है।
क्या हम भी उन 70 हज़ार में शामिल हो सकते हैं?
हाँ, अगर:
- ख़ालिस तौहीद अपनाएं
- शिर्क और बदअक़ीदी से बचें
- अल्लाह पर मुकम्मल भरोसा रखें
- सुन्नत पर चलें
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