Hindu Dharm Aur Islam Me Ek Ishwar Ki Sikhsha | One God Concept Explained

 "न तस्य प्रतिमा अस्ति।" अर्थ: उस ईश्वर की कोई प्रतिमा (मूर्ति) नहीं है।  यह वेद मंत्र स्पष्ट रूप से बताता है कि ईश्वर निराकार है और उसकी कोई भौतिक प्रतिमा नहीं बनाई जा सकती।۔""यजुर्वेद (32.3) ,न तस्य कश्चित् जनिता न चाधिपः।" अर्थ: उस ईश्वर का न कोई जन्मदाता है और न ही कोई उसका स्वामी है।

Hindu Dharm Aur Islam Me Ek Ishwar Ki Sikhsha | One God Concept Explained



हिंदू धर्म और इस्लाम में ईश्वर की समानताएँ – One God in Hinduism and Islam"

Ved aur Quran dono me Ishwar ki ekta aur nirakar swaroop ka spashṭ ullekh hai."

ईश्वर की एकता का सिद्धांत कई धर्मों में प्रमुख रूप से पाया जाता है। Hindu Dharm Aur islam me Ek ishwar ki Sikhsha पाई जाती है। लेकिन जब भी “हिन्दू धर्म” की बात होती है तो एक आम धारणा बन चुकी है कि इसमें अनेक देवी-देवताओं की पूजा की जाती है और मूर्ति पूजा इसका मूल आधार है। परंतु यदि हम हिन्दू धर्म के मूल धर्मग्रंथों – वेद, उपनिषद और भगवद गीता का गहराई से अध्ययन करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हिन्दू धर्म का मूल स्वरूप पूर्णतः एकेश्वरवादी (Monotheistic) है, जिसमें एक निराकार, सर्वव्यापक, अजन्मा और अद्वितीय ईश्वर की उपासना की गई है। 
जैसे हिंदू धर्म में भी एकेश्वरवाद (Monotheism) की मान्यता मौजूद है, जिसका उल्लेख वेद, उपनिषद और भगवद गीता जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। इसी तरह, इस्लाम में तौहीद (एकेश्वरवाद) का सिद्धांत सबसे महत्वपूर्ण है, जो क़ुरआन और हदीस में स्पष्ट रूप से वर्णित है। इस लेख Hindu Dharm Aur islam me Ek ishwar ki Sikhsha  में हम हिंदू धर्म और इस्लाम में ईश्वर की एकता, मान्यता और शिक्षा से मुतल्लिक़ पढ़ेंगे।


भगवद गीता में एक ईश्वर का उल्लेख

भगवद गीता हिंदू धर्म का एक प्रमुख ग्रंथ है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट रूप से ईश्वर की एकता को समझाया है। गीता के श्लोकों में बताया गया है कि ईश्वर एक ही है, लेकिन अज्ञानी लोग अपनी इच्छाओं में फंसकर अन्य देवताओं की पूजा करने लगते हैं।

भगवद गीता से प्रमाण – ईश्वर एक है

1. जो सच्चे ईश्वर को नहीं समझते, वे अन्य देवताओं की पूजा करने लगते हैं
📖 भगवद गीता (7.20) :
"जो लोग इच्छाओं में फंसे हुए हैं, वे अन्य देवताओं की पूजा करते हैं।"
✅ शिक्षा: जो लोग सच्चे ईश्वर के स्वरूप को नहीं समझते, वे भौतिक इच्छाओं में फंसकर अन्य देवी-देवताओं की पूजा करने लगते हैं।

2. ईश्वर अजन्मा और सर्वोच्च भगवान है

📖 भगवद गीता (10.3) :
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्।"
अर्थ: जो मुझे अजन्मा और सर्वोच्च भगवान के रूप में जानता है, वह भ्रम से मुक्त हो जाता है।
✅ शिक्षा: ईश्वर अजन्मा और अनादि (शुरुआत रहित) है। उसे जानने से ही मोक्ष प्राप्त होता है।

 उपनिषदों से प्रमाण – ईश्वर अद्वितीय है

1. ईश्वर का न कोई जन्मदाता है और न ही कोई उसका स्वामी

📖 श्वेताश्वतर उपनिषद (6.9) :
"न तस्य कश्चित् जनिता न चाधिपः।"
अर्थ: उस ईश्वर का न कोई जन्मदाता है और न ही कोई उसका स्वामी है।

✅ शिक्षा: ईश्वर अजन्मा और स्वयंभू (स्वयं उत्पन्न) है, उसका कोई निर्माता या स्वामी नहीं है।


2. ईश्वर अद्वितीय (अद्वैत) है और उसे जानना चाहिए

📖 मांडूक्य उपनिषद (7) :
अद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः।
"अर्थ: वह आत्मा अद्वैत (अद्वितीय) है, जिसे जानना चाहिए।

✅ शिक्षा: ईश्वर अद्वैत (अद्वितीय) है, यानी उसका कोई दूसरा नहीं है। वह अकेला और अपार है।


 निष्कर्ष – हिंदू धर्म में एकेश्वरवाद की पुष्टि

वेदों और उपनिषदों में एक ईश्वर की स्पष्ट शिक्षा दी गई है।
ईश्वर को अद्वितीय (एक), सर्वव्यापी, अजन्मा और निराकार बताया गया है।
ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद में कहा गया है कि ईश्वर की कोई मूर्ति नहीं हो सकती और वह सभी में व्याप्त है।
श्वेताश्वतर और मांडूक्य उपनिषद में बताया गया है कि ईश्वर अद्वैत (अद्वितीय) और अजन्मा है।

📌 हिंदू धर्म का मूल सिद्धांत यह है कि ईश्वर एक ही है, जिसे लोग अलग-अलग नामों से जानते हैं


वेदों में एकेश्वरवाद की शिक्षा

हिंदू धर्म के सबसे प्राचीन ग्रंथ वेद हैं, जिनमें ईश्वर की एकता का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। वेदों में ईश्वर को निराकार, सर्वशक्तिमान और अद्वितीय बताया गया है। वेदों के साथ-साथ उपनिषदों में भी एकेश्वरवाद (मोनोथीज़्म) की पुष्टि की गई है।

Vedon me ek Ishwar ki shiksha – Hinduism Monotheism Vedas"

Ved batate hain ki satya (Ishwar) ek hi hai aur uski koi murti nahi

(क) वेदों से प्रमाण – ईश्वर एक है

1. सत्य एक ही है, लेकिन लोग उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं

📖 ऋग्वेद (1.164.46) : 

एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।"अर्थ:
सत्य (ईश्वर) एक ही है, लेकिन ज्ञानी लोग उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं।

  
✅ शिक्षा: हिंदू धर्म में ईश्वर की एकता को स्वीकार किया गया है, लेकिन लोग उसे विभिन्न नामों से जानते और पूजते हैं।


2. ईश्वर की कोई मूर्ति नहीं है

📖 यजुर्वेद (32.3) :
"न तस्य प्रतिमा अस्ति।"
अर्थ: उस ईश्वर की कोई प्रतिमा (मूर्ति) नहीं है।


✅ शिक्षा: यह वेद मंत्र स्पष्ट रूप से बताता है कि ईश्वर निराकार है और उसकी कोई भौतिक प्रतिमा नहीं बनाई जा सकती।


3. ईश्वर पवित्र, निराकार और सर्वोच्च है

📖 यजुर्वेद (40.8) :
"स अहमस्मि अदित्यो निरंजनः परः।"
अर्थ: वह ईश्वर पवित्र, निराकार और सर्वोच्च है।

✅ शिक्षा: ईश्वर अद्वितीय है और किसी भी भौतिक स्वरूप से परे है।


4. एक ही ईश्वर सभी प्राणियों में व्याप्त है

📖 अथर्ववेद (13.4.16) :
"एको देवः सर्वभूतेषु गूढः।"
अर्थ: एक ही ईश्वर है, जो सभी जीवों में व्याप्त है।

✅ शिक्षा: ईश्वर सर्वव्यापी है, वह सभी प्राणियों में समाया हुआ है और सबका स्वामी है।



हिंदू धर्म में मूर्तिपूजा और एकेश्वरवाद

हिंदू धर्म में कई देवी-देवताओं की पूजा की जाती है, लेकिन इसकी गहरी समझ "एकेश्वरवाद" (Monotheism) और "हिनोथीज़्म" (Henotheism) के सिद्धांतों से जुड़ी है।
➤एकेश्वरवाद: भगवद गीता और वेदों में ईश्वर को एक बताया गया है, जो निराकार और सर्वशक्तिमान है।

➤हिनोथीज़्म: हिंदू धर्म में एक सर्वोच्च ईश्वर की मान्यता है, लेकिन अन्य देवी-देवताओं को उसी ईश्वर की विभिन्न शक्तियों या रूपों के रूप में देखा जाता है।
✅ उदाहरण:
➤शिव, विष्णु, देवी, गणेश, आदि को एक ही ब्रह्म (परमेश्वर) के विभिन्न स्वरूप माना जाता है।

➤भक्त अपनी श्रद्धा और आवश्यकताओं के अनुसार किसी विशेष देवता की पूजा कर सकते हैं, लेकिन अंततः सभी देवता एक ही परमेश्वर के अंग हैं।


(निष्कर्ष)

➤भगवद गीता के अनुसार, ईश्वर केवल एक है, वह अजन्मा और अनादि है।

➤जो लोग सच्चे ईश्वर को नहीं पहचानते, वे भौतिक इच्छाओं में फंसकर अन्य देवताओं की पूजा करने लगते हैं।

➤हिंदू धर्म में मूर्तिपूजा का आधार "हिनोथीज़्म" है, जिसमें एक सर्वोच्च ईश्वर की मान्यता होती है, और अन्य देवी-देवताओं को उसी ईश्वर की शक्तियाँ माना जाता है।
📌 अतः गीता और वेदों के अनुसार, हिंदू धर्म मूल रूप से एकेश्वरवादी है, लेकिन समय के साथ भक्ति परंपराओं के कारण बहुदेववाद की धारणा विकसित हुई।
इस्लामी दृष्टिकोण से अल्लाह की एकता (तौहीद) ही इस्लाम की सबसे बुनियादी और अहम शिक्षा है। कुरआन की आयतें बार‑बार यह बताती हैं कि अल्लाह अकेला है, न उसका कोई जोड़ा है, न बेटा, और न ही कोई उसके समान है।

इस्लाम में एकेश्वरवाद (तौहीद) की शिक्षा

इस्लाम का मूल सिद्धांत "तौहीद" (एकेश्वरवाद) है, जिसका अर्थ है कि केवल एक ही ईश्वर (अल्लाह) की उपासना की जाए। इस्लाम में किसी को भी अल्लाह का भागीदार बनाना सबसे बड़ा पाप (शिर्क) माना जाता है। क़ुरआन और हदीस में तौहीद की स्पष्ट व्याख्या की गई है।


 क़ुरआन से प्रमाण – अल्लाह एक ही है

1. अल्लाह अकेला और अद्वितीय है

📖 सूरह इख़लास (112:1-4) :
"कुल हुवल्लाहु अहद, अल्लाहुस-समद, लम यलिद व लम यूलद, व लम यकुल्लहू क़ुफ़ुवन अहद।"
✅ अर्थ: के कह दो: वह अल्लाह एक है।
  1. अल्लाह बेनियाज़ (न किसी का मोहताज और न किसी पर निर्भर) है।
  2. न उसने किसी को जन्म दिया और न वह स्वयं जन्मा।
  3. और न कोई उसके समान है।
📌 शिक्षा: इस सूरह में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि अल्लाह अकेला, निराकार और सर्वोच्च सत्ता है, जिसका कोई तुल्य नहीं।

2. अल्लाह के अलावा कोई ईश्वर नहीं

📖 सूरह अल-बक़रह (2:255) – आयतुल कुर्सी :
"अल्लाह ही वह है, जिसके सिवा कोई माबूद (पूज्य) नहीं, वह ज़िंदा है, सबको संभालने वाला है..."
✅ शिक्षा: अल्लाह ही सृष्टि का रचनाकार और पालनहार है, और केवल उसी की इबादत की जानी चाहिए।


3. यदि दो ईश्वर होते, तो सृष्टि में अराजकता होती

📖 सूरह अल-अंबिया (21:22) :
"अगर आकाश और धरती में अल्लाह के अलावा और भी ईश्वर होते, तो उनमें बिगाड़ हो जाता।"
✅ शिक्षा: एक से अधिक ईश्वर होने की स्थिति में सृष्टि में अराजकता और टकराव होता, लेकिन चूँकि सृष्टि सुव्यवस्थित है, इसलिए यह प्रमाणित करता है कि केवल एक ही ईश्वर है।


(ख) हदीस से प्रमाण – केवल अल्लाह की इबादत करें

1. अल्लाह का हक़ यह है कि सिर्फ उसी की इबादत की जाए

📖 सहीह बुखारी (हदीस 2856) :
मुआज़ बिन जबल (रज़ि.) से रिवायत है कि मैंने नबी (ﷺ) से पूछा: 'अल्लाह का अपने बंदों पर क्या हक़ है?'
आप (ﷺ) ने फ़रमाया: 'यह कि वे सिर्फ उसी की इबादत करें और उसके साथ किसी को शरीक न करें।

✅ शिक्षा: इस्लाम में केवल अल्लाह की उपासना का आदेश दिया गया है और किसी अन्य को पूजना शिर्क (सबसे बड़ा पाप) है।


2. नबी (ﷺ) ने तौहीद का पैग़ाम दिया

📖 सहीह मुस्लिम (हदीस 30) :
रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फरमाया: 'जो इस बात की गवाही दे कि अल्लाह के अलावा कोई माबूद (ईश्वर) नहीं और मैं उसका रसूल हूँ, वह जन्नत में दाख़िल होगा।'"
✅ शिक्षा: इस्लाम में जन्नत की कुंजी तौहीद है।

3. तौहीद के बिना पर गुनाहों की माफ़ी 

📖सहीह बुख़ारी (हदीस नंबर: 7370)  

अल्लाह फ़रमाता है: आदम के बेटे, अगर तुम धरती भर गुनाह लेकर आओ, लेकिन मेरे साथ किसी को शरीक न ठहराओ, तो मैं तुम्हें उससे भी बड़ी माफ़ी देकर मिलूंगा।"

✅ शिक्षा: जितने भी गुनाह हो अगर तौहीद है , शिर्क न किया हो तो अल्लाह माफ़ कर देगा !


(ग) निष्कर्ष – इस्लाम का मूल संदेश तौहीद है

इस्लाम में "तौहीद" (एकेश्वरवाद) को सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत माना गया है।
क़ुरआन और हदीस में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अल्लाह अकेला, सर्वशक्तिमान और निराकार है।
किसी को भी अल्लाह के बराबर ठहराना (शिर्क) इस्लाम में सबसे बड़ा पाप है।

📌 अतः, इस्लाम का मुख्य संदेश यह है कि केवल एक अल्लाह की उपासना की जाए, क्योंकि वह अकेला, अनादि और सर्वशक्तिमान है।

 वेदों और इस्लाम में समानताएँ

1. ईश्वर की एकता:

वेद: "एको देवः" (एक ही ईश्वर है) – अथर्ववेद (13.4.16)।
इस्लाम: "कुल हुवल्लाहु अहद" (कह दो: वह अल्लाह एक है) – सूरह इख़लास (112:1)।

2. ईश्वर की प्रतिमा नहीं (निराकार ईश्वर):

वेद: "न तस्य प्रतिमा अस्ति" (उस ईश्वर की कोई मूर्ति नहीं) – यजुर्वेद (32.3)।
इस्लाम: "लैस कमिस्लिही शय्युन" (उसके समान कुछ भी नहीं) – सूरह शूरा (42:11)।

3. ईश्वर का जन्म नहीं:

वेद: "न तस्य कश्चित् जनिता न चाधिपः" – श्वेताश्वतर उपनिषद (6.9)।
(उस ईश्वर का न कोई जन्मदाता है और न ही कोई उसका स्वामी है।)
इस्लाम: "लम यलिद व लम यूलद" (न उसने किसी को जन्म दिया और न वह जन्मा) – सूरह इख़लास (112:3)।

4. एकमात्र पूजनीय सत्ता:

वेद: "तमेकं जन्‍यं प्रणिपत्य" (उस एक परमेश्वर को प्रणाम करो) – ऋग्वेद (10.48.5)।
इस्लाम: "वअ'बुदिल्लाह व ला तुशरिक बिही शय्य़ा" (अल्लाह की इबादत करो और उसके साथ किसी को शरीक मत करो) – सूरह निसा (4:36)।

Sach ko pahchane!
👉 हिंदू धर्म और इस्लाम दोनों एक ईश्वर की शिक्षा देते हैं 👉 ईश्वर एक, निराकार, अजन्मा और अद्वितीय है 👉 वेद, उपनिषद, गीता और क़ुरआन — सभी एकेश्वरवाद की पुष्टि करते हैं 👉 मूर्तिपूजा हिंदू धर्म का मूल सिद्धांत नहीं है 👉 इस्लाम ने तौहीद को पूर्ण रूप से सुरक्षित रखा 📌 अंततः सच्चा धर्म वही है जो एक ईश्वर की पहचान और उपासना सिखाए।

 (Conclusion): 

हिंदू धर्म के मूल ग्रंथों (वेदों और उपनिषदों) में एक ईश्वर की स्पष्ट मान्यता है।Hindu Dharm Aur islam me Ek ishwar ki Sikhsha दिया गया है। 
इस्लाम भी एकेश्वरवाद की शिक्षा देता है, जैसा कि क़ुरआन और हदीस से स्पष्ट होता है।
दोनों धर्म सिखाते हैं कि ईश्वर एक है, वह निराकार है, उसका कोई समकक्ष नहीं, और केवल वही पूजनीय है।
इस्लाम में तौहीद (एक ईश्वर की उपासना) को सर्वोच्च दर्जा दिया गया है और इसे जन्नत में जाने की शर्त बताया गया है।
समय के साथ हिंदू धर्म में बहुदेववाद की प्रवृत्ति बढ़ी, जबकि इस्लाम ने तौहीद को स्पष्ट और विशुद्ध रूप में रखा।
अंततः, दोनों धर्मों की मूल शिक्षा एकेश्वरवाद पर आधारित है, और यह सिद्ध करता है कि सच्चे ईश्वर की पहचान और उसकी उपासना ही मोक्ष और उद्धार का मार्ग है।
हिन्दू धर्म की मूल शिक्षाएं -  उपनिषद और भगवद गीता - एक ईश्वर में विश्वास का स्पष्ट समर्थन करती हैं।उस एक निराकार, अजन्मा, अद्वितीय, और प्रतिमा रहित परमात्मा की उपासना करने की शिक्षा दी गई है।

👉 मूर्ति पूजा न तो वेद सम्मत है और न ही उपनिषद या गीता में इसका समर्थन है।
👉 इसका उद्भव एक ऐतिहासिक प्रक्रिया का हिस्सा है, न कि धर्म का मूल तत्व।

🕉️ सच्चा हिन्दू वही है जो वेदों और गीता की शिक्षाओं का पालन करे, न कि अंध परंपरा का।


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Author
इस्लामी ब्लॉगर — अपने अपने धर्म को अच्छी तरह पढ़ें और समझें ताकि सही मार्ग मिल सके नहीं तो आप की जीवन यूंही अंधकार में रहेगी और अंत में नर्क का अजाब तो इंतज़ार तो कर ही रहा है। 



FAQs :अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. क्या हिंदू धर्म और इस्लाम दोनों ही एक ईश्वर में विश्वास रखते हैं?
हां, हिंदू धर्म के वेदों और उपनिषदों में एक ईश्वर की अवधारणा पाई जाती है, जबकि इस्लाम में तौहीद (एकेश्वरवाद) को सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत माना जाता है।
2. क्या हिंदू धर्म में मूर्तिपूजा अनिवार्य है?
हिंदू धर्म के मूल ग्रंथ वेद और उपनिषद मूर्तिपूजा का समर्थन नहीं करते, बल्कि एक निराकार परमेश्वर की उपासना पर जोर देते हैं। हालांकि, समय के साथ मूर्तिपूजा एक परंपरा के रूप में विकसित हुई।
3. इस्लाम में ईश्वर (अल्लाह) के बारे में क्या शिक्षा दी गई है?
इस्लाम सिखाता है कि अल्लाह एक है, निराकार है, उसका कोई समकक्ष नहीं और केवल वही इबादत के योग्य है। यह शिक्षा क़ुरआन और हदीस में स्पष्ट रूप से दी गई है।
4. क्या वेदों में मूर्तिपूजा का खंडन किया गया है?
हां, वेदों में कई श्लोक ऐसे हैं जो स्पष्ट रूप से कहते हैं कि ईश्वर की कोई प्रतिमा या मूर्ति नहीं है, जैसे यजुर्वेद (32.3) में कहा गया है – "न तस्य प्रतिमा अस्ति" (उस ईश्वर की कोई मूर्ति नहीं है)।
5. क्या हिंदू धर्म और इस्लाम के ईश्वर के बीच कोई समानता है?
हां, दोनों धर्मों में ईश्वर को एक, सर्वशक्तिमान, निराकार और अद्वितीय माना गया है। वेद और क़ुरआन दोनों ही कहते हैं कि ईश्वर का कोई जन्म नहीं हुआ और न ही उसकी कोई प्रतिमा बनाई जा सकती है।
6. क्या भगवद गीता में भी एक ईश्वर की बात कही गई है?
हां, भगवद गीता (7.20) में कहा गया है कि जो लोग इच्छाओं में फंसे हुए हैं, वे अन्य देवताओं की पूजा करते हैं। इसका अर्थ है कि वास्तविक ईश्वर एक ही है।
7. इस्लाम में तौहीद का क्या महत्व है?
इस्लाम में तौहीद (अल्लाह की एकता) सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है। इसे मानने वाला व्यक्ति सच्चा मुसलमान कहलाता है, और इसे न मानने वाले को इस्लाम में शिर्क (अल्लाह के साथ किसी को साझी ठहराना) का दोषी माना जाता है।
8. क्या हिंदू धर्म और इस्लाम के मूल ग्रंथ एक ईश्वर की उपासना का आदेश देते हैं?
हां, वेद, उपनिषद और भगवद गीता एक ईश्वर की उपासना पर जोर देते हैं, और इस्लाम में भी एकमात्र अल्लाह की उपासना का आदेश दिया गया है।
9. "काफ़िर" शब्द का क्या अर्थ है और यह इस्लाम में किसके लिए प्रयुक्त होता है?
"काफ़िर" शब्द अरबी भाषा का है, जिसका अर्थ होता है "इनकार करने वाला" या "सत्य को ढंकने वाला"। इस्लाम में यह उन लोगों के लिए प्रयुक्त होता है जो अल्लाह, उसके नबी मुहम्मद (ﷺ) और क़ुरआन को नहीं मानते।
10. क्या हिंदू धर्म में "काफ़िर" शब्द का कोई समानार्थी शब्द है?
हिंदू धर्म में "काफ़िर" शब्द नहीं पाया जाता, लेकिन "नास्तिक", "असुर" और "अधर्मी" शब्दों का प्रयोग उन लोगों के लिए किया जाता है जो वेदों, ईश्वर या धार्मिक सत्य को अस्वीकार करते हैं।
11. हिंदू धर्म में किसे नास्तिक कहा गया है?
हिंदू धर्म में "नास्तिक" उसे कहा गया है जो वेदों और ईश्वर में विश्वास नहीं करता। मनुस्मृति (2.11) में कहा गया है – "नास्तिको वेदनिन्दकः", अर्थात् जो वेदों की निंदा करता है, वह नास्तिक है।
12. इस्लाम और हिंदू धर्म में मूर्तिपूजा पर क्या दृष्टिकोण है?
इस्लाम: मूर्तिपूजा (Idolatry) को "शिर्क" कहा जाता है, जिसे इस्लाम में सबसे बड़ा पाप माना गया है।
हिंदू धर्म: कुछ ग्रंथों में मूर्तिपूजा को धार्मिक उपासना का एक रूप माना गया है, जबकि अन्य ग्रंथों में इसे अस्वीकार किया गया है।
13. इस्लाम में "काफ़िर" और "मुशरिक" में क्या अंतर है?
"काफ़िर" वह व्यक्ति होता है जो इस्लाम के मूल सिद्धांतों को अस्वीकार करता है।
"मुशरिक" वह व्यक्ति होता है जो अल्लाह के साथ किसी और को ईश्वर मानता है या उसकी पूजा करता है।
14. हिंदू धर्म और इस्लाम में काफ़िरों/नास्तिकों के लिए परलोक (आख़िरत) की सज़ा क्या है?
हिंदू धर्म: पुनर्जन्म की अवधारणा के अनुसार, अच्छे कर्म करने वाले को अच्छे जन्म मिलते हैं और पाप करने वाले को निचले योनि में जन्म लेना पड़ता है।
इस्लाम: जो व्यक्ति अल्लाह और उसके नबी को नहीं मानता, वह जहन्नम (नरक) में जाएगा।
15. क्या इस्लाम में काफ़िर के लिए कोई क्षमा (माफी) का प्रावधान है?
हां, अगर कोई व्यक्ति ईमान (इस्लाम) कबूल कर ले, तो उसके पहले के सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं। हदीस में कहा गया है: "अल्लाह फ़रमाता है: अगर तुम धरती भर गुनाह लेकर आओ, लेकिन मेरे साथ किसी को शरीक न ठहराओ, तो मैं तुम्हें उससे भी बड़ी माफ़ी देकर मिलूंगा।" (सहीह बुख़ारी – 7370)
16. हिंदू धर्म और इस्लाम में सत्य के इनकार (काफ़िर/नास्तिक) को लेकर मूलभूत अंतर क्या है?
हिंदू धर्म में सत्य को न मानने वाले को नास्तिक कहा जाता है, लेकिन उसे अलग-अलग संप्रदायों में अलग दृष्टि से देखा जाता है।
इस्लाम में "काफ़िर" उन लोगों के लिए प्रयुक्त होता है जो इस्लाम की मूल शिक्षाओं को अस्वीकार करते हैं, और उनके लिए जहन्नम की चेतावनी दी गई है।
17. क्या हिंदू धर्म और इस्लाम में धार्मिक सहिष्णुता की बातें कही गई हैं?
हिंदू धर्म: "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" (सत्य एक है, लेकिन ज्ञानी लोग उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं) – ऋग्वेद (1.164.46)।
इस्लाम: "ला इकराहा फिद्दीन" (धर्म में कोई बाध्यता नहीं) – सूरह अल-बक़रह (2:256)।
18. क्या दोनों धर्मों में "काफ़िर" या "नास्तिक" के लिए सुधार का कोई मार्ग है?
हिंदू धर्म: नास्तिक व्यक्ति यदि धर्म और ईश्वर में आस्था रखे और अच्छे कर्म करे, तो उसे पुनः धार्मिक व्यक्ति माना जा सकता है।
इस्लाम: अगर कोई काफ़िर तौबा (प्रायश्चित) कर ले और इस्लाम कबूल कर ले, तो उसे क्षमा कर दिया जाता है और जन्नत का पात्र माना जाता है।

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