Isra aur Mi‘raj Allah ki qudrat ka azeem mu‘jiza — jo imaan ko roshan karta hai
✍️ By: Mohib Tahiri | 🕋 Islamic Articles| isra miraj ka waqia | meraj ki raat masjid e aqsa ki ahmiyat | meraj ka haqeeqi safar 🕰 Updated:14 Jan 2026
यह वाक़िया Isra aur Mi‘raj Allah ki qudrat ka azeem mu‘jiza है और यह केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि ईमान, अकीदे और नमाज़ की फ़र्ज़ियत की बुनियाद भी है। इस वाक़िये को समझना ईमान का हिस्सा है, लेकिन अफ़सोस कि इससे संबंधित कई ग़लत धारणाएँ और बिद‘अती अमल समाज में फैल चुके हैं, जिनका क़ुरआन व सुन्नत से कोई प्रमाण नहीं मिलता।
इसरा और मेराज क्या है?
🔹 इसरा क्या है?
इसरा का अर्थ है:
रात के समय मस्जिदे हराम (मक्का) से मस्जिदे अक़्सा (बैतुल मुक़द्दस) तक का सफ़र।
🔹 मेराज क्या है?
मेराज से अभिप्राय है:👉 ये दोनों सफ़र एक ही रात में अल्लाह के हुक्म से हुए।
मस्जिदे अक़्सा से आसमानों तक, सिदरतुल मुन्तहा तक का सफ़र और अल्लाह तआला से क़रीबी मुलाक़ात।
इसरा का प्रमाण – क़ुरआन से
अल्लाह तआला क़ुरआन मजीद में फ़रमाता है:“पाक है वह ज़ात जो अपने बंदे को रात ही रात मस्जिदे हराम से मस्जिदे अक़्सा तक ले गई, जिसके चारों ओर हमने बरकत रखी है।”👉 यह आयत साफ़ तौर पर साबित करती है कि इसरा का वाक़िया हक़ीक़ी और जismi था, कोई ख्वाब नहीं।
(सूरह अल-इसरा 17:1)
मेराज का ज़िक्र – क़ुरआन से
सूरह अन-नज्म में मेराज की ओर संकेत मिलता है:
“फिर वह क़रीब हुआ और और भी क़रीब हो गया, यहाँ तक कि दो धनुषों के बराबर या उससे भी कम फ़ासला रह गया।”इससे स्पष्ट होता है कि नबी ﷺ अल्लाह की क़ुर्बत के ऐसे मक़ाम तक पहुँचे, जहाँ तक किसी मख़लूक़ की रसाई नहीं हुई।
(सूरह अन-नज्म 53:8–9)
इसरा और मेराज – हदीस की रोशनी में
हज़रत अनस बिन मालिक رضي الله عنه से रिवायत है:रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:बुराक़ के ज़रिए नबी ﷺ को मस्जिदे अक़्सा ले जाया गया, जहाँ तमाम अंबिया (अलैहिमुस्सलाम) ने आपकी इमामत में नमाज़ अदा की।
“मैं बुराक़ पर सवार हुआ, जो सफ़ेद रंग का जानवर था…”
(सहीह बुख़ारी 3207, सहीह मुस्लिम 162)
आसमानों का सफ़र और अंबिया से मुलाक़ात
मेराज के दौरान नबी ﷺ की मुलाक़ात हुई:- पहले आसमान पर: हज़रत आदम (अ.स.)
- दूसरे पर: हज़रत ईसा और यह्या (अ.स.)
- तीसरे पर: हज़रत यूसुफ़ (अ.स.)
- चौथे पर: हज़रत इदरीस (अ.स.)
- पाँचवें पर: हज़रत हारून (अ.स.)
- छठे पर: हज़रत मूसा (अ.स.)
- सातवें पर: हज़रत इब्राहीम (अ.स.)
👉 यह नबी ﷺ की श्रेष्ठता का स्पष्ट प्रमाण है।
🔹 सिदरतुल मुन्तहा
यहाँ तक पहुँचकर हज़रत जिब्रील (अ.स.) भी आगे बढ़ने से रुक गए।(सहीह मुस्लिम 164)
👉 यह मक़ाम केवल नबी ﷺ को ही प्राप्त हुआ।
नमाज़ का तोहफ़ा
मेराज का सबसे महान तोहफ़ा नमाज़ है।
मेराज का सबसे अज़ीम तोहफ़ा नमाज़ का है।
पहले 50 नमाज़ें फ़र्ज़ की गईं,हज़रत मूसा (अ.स.) की सलाह पर कम होकर 5 रह गईं,लेकिन सवाब 50 का ही रहा(सहीह बुख़ारी 349; सहीह मुस्लिम 162)
👉 यह नमाज़ की अहमियत की सबसे बड़ी दलील है।
जन्नत और जहन्नम का मुशाहिदा
मेराज के दौरान नबी ﷺ को:- जन्नत की नेमतें
- जहन्नम के अज़ाब
- गुनाहों के बुरे अंजाम
क्या इसरा और मेराज केवल ख़्वाब था?
नहीं। इसरा और मेराज ख़्वाब नहीं, बल्कि जिस्म और रूह दोनों के साथ, जागते हुए हुआ हक़ीक़ी सफ़र था।क़ुरआन में “अब्दिही” (अपने बंदे) का शब्द आया है, और बंदा जिस्म व रूह दोनों का नाम है। अगर यह केवल रूहानी ख़्वाब होता, तो यह शब्द इस्तेमाल न किया जाता।
हदीसों में बुराक़ पर सवारी और अलग-अलग मंज़िलों का ज़िक्र भी जिस्मानी सफ़र की स्पष्ट दलील है। साथ ही मुश्रिकों का मज़ाक़ उड़ाना और कुछ लोगों का इम्तिहान में पड़ जाना भी इस बात का सबूत है कि यह कोई मामूली सपना नहीं था।
इसरा और मेराज से मिलने वाले अहम पैग़ाम
- नमाज़ मोमिन की मेराज है
- अल्लाह की क़ुदरत बेइंतिहा है
- नबी ﷺ का मक़ाम सबसे बुलंद है
- ग़ैब पर ईमान का इम्तिहान
- मस्जिदे अक़्सा की अहमियत
इसरा और मेराज का इनकार
सहाबा किराम ने बिना किसी शक़ के इस वाक़िये पर ईमान रखा।हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ رضي الله عنه ने फ़रमाया:
“अगर मुहम्मद ﷺ ने कहा है, तो बिल्कुल सच कहा है।”
👉 इसलिए इसका इनकार ईमान के लिए ख़तरनाक है।
आज के दौर में हमारी ज़िम्मेदारी
- नमाज़ की पाबंदी
- मस्जिदे अक़्सा से मोहब्बत
- सुन्नत-ए-रसूल ﷺ पर अमल
- इसरा और मेराज का सही पैग़ाम फैलाना
बिद‘अती अमल का रद्द (संक्षेप)
❌ 27 रजब की रात को ख़ास नमाज़, रोज़ा या महफ़िल❌ इस रात को ईद बनाना
❌ झूठे क़िस्से और अफ़साने
नबी ﷺ ने फ़रमाया:
“जो हमारे दीन में ऐसी चीज़ दाख़िल करे जो उसमें से नहीं, वह रद्द है।”
(सहीह बुख़ारी 2697; सहीह मुस्लिम 1718)
निष्कर्ष (Conclusion)
इसरा और मेराज केवल एक चमत्कार नहीं, बल्कि ईमान को मज़बूत करने, नमाज़ की अहमियत समझाने और नबी ﷺ के बुलंद मक़ाम को बयान करने वाला महान वाक़िया है। Isra aur Mi‘raj Allah ki qudrat ka azeem mu‘jiza है। हर मुसलमान को चाहिए कि इससे सबक़ ले और अपनी ज़िंदगी को क़ुरआन व सुन्नत के अनुसार ढाले।🤲 अल्लाह तआला हमें क़ुरआन और सुन्नत पर क़ायम रहने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।
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इस्लामी ब्लॉगर — सही दीन और इल्म को आम करने की कोशिश।
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Short Hindi Version FAQ:
इसरा और मेराज क्या है?
इसरा मक्का से मस्जिदे अक़्सा तक रात का सफ़र है और मेराज मस्जिदे अक़्सा से आसमानों तक अल्लाह से क़रीबी मुलाक़ात का सफ़र है।
क्या इसरा और मेराज ख़्वाब था?
नहीं, यह जिस्म और रूह दोनों के साथ जागते हुए हुआ हक़ीक़ी सफ़र था।
इसरा का प्रमाण कहाँ है?
क़ुरआन की सूरह अल-इसरा (17:1) में इसरा का स्पष्ट उल्लेख है।
मेराज की सबसे बड़ी नेमत क्या है?
मेराज की रात पाँच वक्त की नमाज़ फ़र्ज़ हुई।
क्या मेराज की रात कोई ख़ास इबादत साबित है?
नहीं, किसी सहीह हदीस से 27 रजब की रात को ख़ास इबादत साबित नहीं है।

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