Libas pahan kar bhi nangi — is behayayi ka zimmedar Kaun?

आज के दौर में इंसान ने तरक्की की बुलंदियाँ छू ली हैं — मगर हया और शर्म का पर्दा उठता जा रहा है। अक्सर औरतें आज Libas pahan kar bhi nangi नज़र आ रही हैं। आख़िर इस बेहयाई के ज़िम्मेदार कौन हैं?
जहाँ कभी लिबास इंसान की पहचान और इज़्ज़त की निशानी हुआ करता था, वहीं आज वही लिबास फ़ितने और दिखावे का ज़रिया बन गया है।
फैशन, ग्लैमर और सोशल मीडिया के इस तूफ़ान में “Libas pahan kar bhi nangi ” औरतें — रसूलुल्लाह ﷺ की उस सदीयों पुरानी भविष्यवाणी को हक़ीक़त में बदल चुकी हैं
यह हदीस हमें न सिर्फ़ एक डरा देने वाली तस्वीर दिखाती है, बल्कि इस्लामी समाज के गिरते हुए उसूलों पर एक गहरी चोट करती है।

✍️ By: Mohib Tahiri | 🕋 islamic article|Haya aur Pardah in islam|Fashion Aur Behayaai 🕰 Updated:23 Aug 2025

Aaj ka samaj behayayi ko fashion ka Naam deta hai
Haya aur fashion ke beech jung 



क्या यह वह दौर नहीं जिसके बारे में नबी ﷺ ने पहले ही आगाह किया था? क्या यह वह फ़ितना नहीं जिससे हमें अपनी बेटियों, बहनों और पूरे समाज को बचाना चाहिए? आइए पहले वो हदीस मुलाहिज़ा फरमाएं!


हदीस का मतलब और तफ़सीर:

हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि०) बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

दो किस्म के लोग जहन्नमी हैं जिन्हें मैंने अभी तक नहीं देखा —
  • (1) वो लोग जिनके पास गाय की दुमों जैसे कोड़े होंगे, जिनसे वो लोगों को मारेंगे।
  • (2) और वो औरतें जो कपड़े पहनकर भी नंगी होंगी, मटकने वाली, लोगों को अपनी ओर खींचने वाली होंगी, उनके सर ऊँटों की झुकी हुई कोहानों जैसे होंगे।
ये दोनों जन्नत में नहीं जाएँगी, बल्कि उसकी खुशबू तक नहीं पाएँगी, जबकि उसकी खुशबू बहुत दूर तक पहुँचती है।”(सहीह मुस्लिम, मिश्कात अल-मसाबिह #3524)

रसूलुल्लाह ﷺ की इस हदीस में क़यामत के करीब फैलने वाली दो बड़ी बुराइयों का ज़िक्र है 

1️⃣ ज़ुल्म और जबर की आदत (लोगों पर कोड़े बरसाना)।

2️⃣ और औरतों की बेहयाई, खुलापन और अदाओं के ज़रिए फ़ितना फैलाना।



आज का दौर और इस हदीस की हकीकत

रसूलुल्लाह ﷺ की यह भविष्यवाणी आज पूरी तरह हकीकत बन चुकी है।

👉एक तरफ़ तो ज़ुल्म और जबर का सिस्टम दिन-ब-दिन मज़बूत होता जा रहा है। क़ानून की कोई अहमियत ही नहीं रह गई है।
🔹 आज ऐसे लोग हुकूमत और ताक़त के मालिक हैं जो अपने “कोड़ों” यानी कानून, ताक़त और डर के ज़रिए कमज़ोरों पर ज़ुल्म ढाते हैं।
🔹 इंसाफ़ के नाम पर जुल्म, अमन के नाम पर डर — यही “गाय की दुम जैसे कोड़े” का असली मतलब है।

👉तो दूसरी तरफ़ कपड़ों में बेहयाई, जिस्म की नुमाइश और दिखावे की दौड़ ने समाज की रूह से हया छीन ली है —
🔹 औरतों की दुनिया में “फ़ैशन” और “मॉडर्निटी” के नाम पर हया का गला घोंटा जा रहा है।
🔹 सोशल मीडिया पर “modesty” के नाम पर भी आवाज़, अंदाज़ और अदाओं का प्रदर्शन आम हो चुका है।
• यानी ऐसे कपड़े पहनना जो तन को तो ढँकें, लेकिन हया को नहीं ढँकते।
• पतले, तंग या छोटे कपड़े जो जिस्म का नक्शा दिखाते हैं।
• ऐसे फैशन जो नाम के लिए इस्लामी हों लेकिन हकीक़त में नग्नता की तरफ़ ले जाएँ।
यह वही दो गरोह हैं जिनकी तरफ़ नबी ﷺ ने इशारा किया था —
एक ज़ालिम हुक्मरान और ताक़त के घमंडी लोग, और दूसरे लिबास पहनकर भी नंगी औरतें।दोनों अपनी अपनी जगह समाज को बरबादी की तरफ़ ले जा रहे हैं।

1.ज़ालिम हुक्मरान — ज़ुल्म, जबर और नाइंसाफ़ी

आज के दौर में ये साफ़ नज़र आ रहा है कि ज़ुल्म और नाइंसाफी हर जगह बढ़ गई है। 
रसूलुल्लाह ﷺ के इस फ़रमान का पहला हिस्सा उन लोगों के बारे में है जिनके हाथों में “गाय की दुमों जैसे कोड़े” होंगे — यानी ऐसे हुक्मरान, अफ़सर या हाकिम जो अपने मातहतों पर ज़ुल्म, जबर और नाइंसाफ़ी करेंगे। ये वो लोग होंगे जो अपनी ताक़त और ओहदे का इस्तेमाल रहमत या इनसाफ़ के बजाय डर और अत्याचार फैलाने के लिए करेंगे। हदीस हमें यह सिखाती है कि हुकूमत और ताक़त अमानत है, न कि दूसरों को सताने का ज़रिया।
 ऐसे ज़ालिम लोग आखिरत में अल्लाह के ग़ज़ब के हक़दार बनेंगे, क्योंकि उन्होंने अपने ओहदे से इंसाफ़ नहीं किया बल्कि उसे ज़ुल्म का औज़ार बना लिया। 



2.🧕 लिबास पहनकर भी नंगी — समाज में फैलती बेहयाई और फ़ितना

रसूलुल्लाह ﷺ की यह बात आज बिल्कुल हकीकत का रूप ले चुकी है। 
आज की औरतें कपड़े तो पहनती हैं, मगर वो कपड़े हया नहीं बल्कि दिखावे का ज़रिया बन चुके हैं। तंग, पारदर्शी और जिस्म को उभारने वाले लिबास “फ़ैशन” के नाम पर आम हो गए हैं। सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीरें, अदाएं और वीडियो दिखाना मॉडर्निटी नहीं बल्कि हया से दूरी की निशानी है। नबी ﷺ ने ऐसी औरतों को “कपड़े पहनकर भी नंगी” कहा और आगाह किया कि उनका जन्नत में दाख़िला नहीं होगा, बल्कि उसकी खुशबू तक नहीं पाएँगी। सोचिए! जब जन्नत की खुशबू भी उनसे दूर कर दी जाएगी तो उनके अंजाम का क्या होगा? इस हदीस में औरत को शर्म, इज़्ज़त और हया का सबक़ दिया गया है — ताकि वह अपने लिबास और चाल-ढाल से समाज में फ़ितने की नहीं, रहमत की वजह बने।

👩‍🦰 औरतों से मुतल्लिक ख़ास नसीहत

इस हदीस में औरतों को बहुत खास अंदाज़ में आगाह किया गया है —

रसूलुल्लाह ﷺ ने औरतों को हया की रूह के साथ जन्नत का रास्ता बताया है।हया सिर्फ़ लिबास नहीं, बल्कि नज़र, चाल, बोल और सोशल बर्ताव में भी होती है।
✦ याद रखें:
हया ईमान का हिस्सा है, और जिसमें हया नहीं, उसमें ईमान नहीं।
(हदीस: अल-बुख़ारी)

इसलिए मुस्लिम औरत को चाहिए कि वह
• फ़ैशन के पीछे न भागे,
• सोशल मीडिया पर अपनी अदाओं का प्रदर्शन न करे,
• और अपने लिबास को “हिजाब” का नाम देकर हया की हदें न तोड़े।


इस बेहयाई का ज़िम्मेदार कौन? — समाज, मीडिया या हम खुद?

बेहयाई का फैलाव सिर्फ़ औरतों का कसूर नहीं —बल्कि इसके कई ज़िम्मेदार हैं। आज की बेहयाई सिर्फ़ एक वर्ग की गलती नहीं बल्कि पूरा समाज इसकी जड़ में शामिल है।

🔵 मीडिया और फ़िल्म इंडस्ट्री:

  मीडिया और फ़िल्म इंडस्ट्री ने “फ़ैशन” और “ग्लैमर” के नाम पर हया को मज़ाक बना दिया, सोशल प्लेटफ़ॉर्म्स ने शर्म को शोहरत से बदल दिया, और हम सबने ख़ामोशी से इसे देखने और स्वीकार करने की आदत डाल ली।

🔵 सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स:

 सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स: जहाँ “likes & followers” के लालच में शर्म और पर्दा कुर्बान किया जा रहा है। जहां शोहरत और पैसे पाने के लिए आधे कपड़ों में लड़कियां नज़र आती हैं। 

 🔵 मर्द समाज:

मर्द अपनी ज़िम्मेदारी भूलकर औरतों की अदाओं से मनोरंजन लेता है,जो औरतों को दुनियावी शोहरत और कमाई के लिए इस्तेमाल करता है,फिर वही उन्हें बेहयाई के मैदान में धकेल देता है।

🔵 माएँ-बाप और भाई:

माँ-बाप अपनी बेटियों को दीन और पर्दे की तालीम देने के बजाय दुनिया की चमक में खो देते हैं, और जो अपनी बेटियों और बहनों को बचपन से हया और इस्लामी लिबास की तालीम नहीं देते।और औरतें खुद यह समझ बैठी हैं कि “आज़ादी” का मतलब लिबास और अदाओं का प्रदर्शन है। जबकि असल आज़ादी यह है कि औरत अल्लाह की बंदी होकर अपने किरदार, हया और इज़्ज़त की हिफ़ाज़त करे।
👉🏻 जब तक समाज, मीडिया और हम खुद अपने रवैये नहीं बदलेंगे — तब तक यह बेहयाई बढ़ती ही जाएगी और अल्लाह का ग़ज़ब समाज पर उतरता रहेगा।

रौशनी की तरफ़ कदम — हया और इस्लामी लिबास की बहाली

अंधकार चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, रौशनी की एक किरण सब कुछ बदल सकती है। आज अगर औरतें फिर से हया, इफ़्फ़त और इस्लामी लिबास को अपनाएँ, तो यही समाज फिर से नूर और बरकत से भर सकता है। हया और पर्दा किसी कैद का नाम नहीं, बल्कि अल्लाह की रहमत और इज़्ज़त की ढाल है। जब औरत अपने लिबास में हया को ज़िंदा करती है, तो वह अपनी ज़ात ही नहीं बल्कि पूरे समाज की पाकीज़गी की हिफ़ाज़त करती है। मुसलमान औरत अगर अपने किरदार और पहनावे से कुरआन और सुन्नत का पैग़ाम पेश करे, तो वह दुनिया के हर फ़ितने का जवाब बन सकती है। यही असली आज़ादी है — अल्लाह की बंदगी में सुकून, हया में सुंदरता, और पर्दे में इज़्ज़त।

♦️ अगर आज की मुस्लिम औरत हया और हिजाब को अपनाए,अपने अंदरूनी सौंदर्य को अल्लाह की रज़ा के लिए सँवारे,तो वही औरत समाज की सबसे खूबसूरत पहचान बन सकती है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
“ऐ नबी! अपनी बीवियों, बेटियों और ईमान वाली औरतों से कह दो कि वो अपने ऊपर अपनी चादरें लटका लिया करें।”(सूरह अल-अहज़ाब 33:59)


🌷 नसीहत का ख़ुलासा

लिबास हया का पैग़ाम बने, न कि फ़ितना का ज़रिया।
औरतें अपने जिस्म को नहीं, अपनी शख़्सियत को पेश करें।
मर्द अपनी औरतों की हिफ़ाज़त करें, उन्हें इस फ़ितने से बचाएँ।
मीडिया और समाज की इस लहर को “ला इलाहा इल्लल्लाह” की ताक़त से रोकें।

🕊️ अल्लाह से दुआ है:


“ऐ अल्लाह! हमें हया, इफ़्फ़त और इस्लामी लिबास की रहमत अता फ़रमा,
हमारी बेटियों और बहनों की हिफ़ाज़त फ़रमा,
और हमें इस बेहयाई के दौर में भी अपने दीन पर क़ायम रहने की तौफ़ीक़ दे।”
आमीन। 🤲 

🌷 Conclusion:

आज के इस फ़ितना के दौर में हर जगह ही Libas pahan kar bhi nangi औरतें नज़र आ रही हैं और हया से दूर होती जा रही हैं जबकि रसूलुल्लाह ﷺ ने हमें हया को ईमान का हिस्सा बताया —
क्योंकि हया ही वह खूबसूरती है जो औरत को जन्नत का रास्ता दिखाती है।
जब लिबास हया से खाली हो जाए, तो ज़िंदगी बेनूर और समाज बेअमान हो जाता है।

आज ज़रूरत है कि हम हया, पर्दा और इस्लामी लिबास की उस असली रूह को फिर से जिंदा करें —
अपने घरों में, अपनी बेटियों की परवरिश में और अपने डिजिटल व्यवहार में भी।

✨ हया कोई रुकावट नहीं, बल्कि जन्नत का दरवाज़ा है।
जो इस दरवाज़े की हिफ़ाज़त करेगा, अल्लाह उसकी इज़्ज़त और रौशनी दोनों बढ़ा देगा।

आइए आज से इरादा करें कि हम इस बेहयाई की लहर में खुद को नहीं बहने देंगे,
बल्कि कुरआन और हदीस की रौशनी में अपने समाज को हया की राह पर लाएँगे।
अल्लाह हमें इस ज़माने के फ़ितनों से महफूज़ रखे — आमीन 🤲



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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

इसका मतलब है कि कुछ कपड़े पहनने के बावजूद हया और इज़्ज़त का पालन न करना। तंग, पारदर्शी या शरीर को उभारने वाले कपड़े, जो फ़ितने और दिखावे का कारण बनें,जो लोगों को अपनी तरफ़ आकर्षित करे“लिबास पहनकर भी नंगी” कहलाने जैसा है।
हाँ, हदीस में स्पष्ट है कि जिन महिलाओं का हुलिया हया और शरम के खिलाफ़ होगा, वे जन्नत में प्रवेश नहीं पाएँगी और उसकी खुशबू भी महसूस नहीं कर सकेंगी।बल्कि वो जहन्नमी हैं। 
जिम्मेदार सिर्फ़ महिलाएं नहीं हैं। समाज، मीडिया، सोशल प्लेटफ़ॉर्म और पुरुषों की भी भूमिका अहम है।  माता-पिता और भाइयों की सही इस्लामी शिक्षा न देना और समाज की निगरानी भी जिम्मेदारी में शामिल है।
महिलाओं को हया, इफ़्फ़त वाली लिबास अपनानी चाहिए، अपने आप को सिर्फ़ अपने शौहर के लिए संवारना चाहिए، और अपने व्यवहार व लिबास के ज़रिए मुआशरा में फ़ितने और बेहयाई फैलाने से रोकना चाहिए। 
यह उन ज़ालिम हुक्मरानों या अफ़सरों के लिए है जो अपनी ताक़त दूसरों पर ज़ुल्म करने के लिए इस्तेमाल करते हैं۔ ये लोग अपनी ताक़त का इस्तेमाल इंसाफ़ के बजाय डर और ज़ुल्म करने के लिए करते हैं।

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🌸 لباس پہن کر بھی ننگی — بےحیائی اور اُس کا خوفناک انجام

آج کے دور میں انسان نے ترقی کی بلندیوں کو چھو لیا ہے، مگر حیا اور شرم کا پردہ اٹھتا جا رہا ہے۔آخر اِس بےحیائی کے ذمےدار کون ہیں؟ جہاں کبھی لباس انسان کی پہچان، وقار اور عزت کی علامت ہوا کرتا تھا، آج وہی لباس فتنے اور دکھاوا کا ذریعہ بن چکا ہے۔ فیشن، گلیمر اور سوشل میڈیا کے اس طوفان میں، لباس پہن کر بھی ننگی خواتین — رسول اللہ ﷺ کی اُس صدیوں پرانی پیشگوئی کو حقیقت میں بدل چکی ہیں۔
یہ حدیث نہ صرف ایک خوفناک منظر پیش کرتی ہے بلکہ اسلامی معاشرے کے گرتے ہوئے اصولوں پر بھی روشنی ڈالتی ہے۔ کیا یہ وہ دور نہیں جس کے بارے میں نبی ﷺ نے پہلے ہی خبردار کیا تھا؟ کیا یہ وہ فتنے نہیں جن سے ہمیں اپنی بیٹیوں، بہنوں اور پورے معاشرے کو بچانا چاہیے؟آئیے پہلے وہ حدیث ملاحظہ فرمائیں۔


📜 حدیث کا بیان

حضرت ابو ہریرہ رضی اللہ عنہ سے روایت ہے کہ رسولُ اللہ ﷺ نے فرمایا:
“دوزخیوں کی دو قسمیں ایسی ہیں جنہیں میں نے ابھی تک نہیں دیکھا —
  • (1) وہ لوگ جن کے ہاتھوں میں گائے کی دُموں جیسے کوڑے ہوں گے جن سے وہ لوگوں کو ماریں گے۔
  • (2) اور وہ عورتیں جو کپڑے پہن کر بھی ننگی ہوں گی، اَدا سے چلنے والی، دوسروں کو اپنی طرف مائل کرنے والی ہوں گی،
اُن کے سر اونٹ کی کوہان کی طرح اونچے ہوں گے۔
وہ جنت میں داخل نہیں ہوں گی بلکہ اُس کی خوشبو تک نہیں پائیں گی،
حالانکہ اُس کی خوشبو بہت دور تک محسوس کی جاتی ہے۔”
(صحیح مسلم، مشکوٰۃ المصابیح #3524)

حدیث کی وضاحت اور تفسیر

رسول اللہ ﷺ کی اس حدیث میں قیامت کے قریب پھیلنے والی دو بڑی برائیاں بیان کی گئی ہیں:

1️⃣ ظلم اور جبر کی عادت — لوگ دوسروں پر کوڑے یا ظلم کے ذریعے برتری حاصل کریں۔
2️⃣ عورتوں کی بے حیائی، کھلے لباس اور ادواؤں کے ذریعے فتنہ پیدا کرنا۔

➤ “لباس پہن کر بھی ننگی” کا مطلب:

ایسے کپڑے جو جسم کو تو ڈھانپتے ہیں مگر حیا نہیں چھپاتے۔
پتلے، تنگ یا چھوٹے کپڑے جو جسم کی شکل دکھائیں۔
فیشن کے نام پر ایسے لباس جو شرم و حیا کی حدوں کو پامال کریں۔

ظالم حکمران اور حدیث کی وضاحت

حدیث کے پہلے حصے میں ان لوگوں کا ذکر ہے جن کے پاس “گائے کی دموں جیسے کوڑے” ہوں — یعنی ایسے حکمران یا افسر جو اپنی طاقت کا استعمال رحمت یا انصاف کے بجائے ظلم اور خوف پیدا کرنے کے لیے کرتے ہیں۔ یہ ہمیں سکھاتی ہے کہ حکومت اور طاقت امانت ہیں، سزا دینے کا ذریعہ نہیں۔ ایسے ظالم لوگ آخرت میں اللہ کے غضب کے مستحق ہوں گے کیونکہ انہوں نے انصاف کو چھوڑ کر ظلم کو اختیار کیا۔

🧕 لباس پہن کر بھی ننگی — عورتوں میں پھیلتی بے حیائی اور اس کا انجام

رسول اللہ ﷺ کی یہ بات آج حقیقت کا روپ دھار چکی ہے۔ آج کی خواتین لباس پہنتی ہیں مگر وہ لباس حیا کا نہیں بلکہ دکھاوا کا ذریعہ بن چکا ہے۔ تنگ، شفاف یا جسم کو ابھارنے والے لباس فیشن کے نام پر عام ہو گئے ہیں۔ سوشل میڈیا پر اپنی تصاویر، حرکات اور ویڈیوز دکھانا جدت یا آزادی نہیں بلکہ حیا سے دوری کی نشانی ہے۔
نبی ﷺ نے ایسی عورتوں کو “لباس پہن کر بھی ننگی” کہا اور خبردار کیا کہ وہ جنت میں نہیں جائیں گی اور خوشبو تک نہیں پا سکیں گی۔ جب جنت کی خوشبو بھی ان سے دور کر دی جائے تو ان کا انجام کتنا خوفناک ہوگا! یہ حدیث عورت کو شرم، عزت اور حیا کی تعلیم دیتی ہے تاکہ وہ اپنے لباس اور حرکتوں سے معاشرے میں فتنے کی نہیں بلکہ رحمت کی وجہ بنے۔

اس بے حیائی کا ذمہ دار کون؟ — معاشرہ، میڈیا یا ہم خود؟

آج کی بے حیائی صرف ایک طبقے کی غلطی نہیں بلکہ پورا معاشرہ اس میں شامل ہے۔ میڈیا نے “فیشن” اور “گلیمر” کے نام پر حیا کو مذاق بنا دیا، سوشل پلیٹ فارمز نے شرم کو شہرت میں بدل دیا، اور ہم سب نے خاموشی سے اسے قبول کر لیا۔ مرد اپنی ذمہ داری بھول کر عورتوں کی حرکات سے تفریح حاصل کرتے ہیں، والدین اپنی بیٹیوں کو دین اور پردے کی تعلیم دینے کے بجائے دنیا کی چمک میں کھو دیتے ہیں، اور خواتین خود سمجھ بیٹھی ہیں کہ آزادی کا مطلب لباس اور حرکات کا مظاہرہ ہے۔
جب تک معاشرہ، میڈیا اور ہم خود رویے نہیں بدلیں گے — یہ بے حیائی بڑھتی رہے گی اور اللہ کا غضب معاشرے پر نازل ہوگا۔


روشنی کی طرف قدم — حیا اور اسلامی لباس کی بحالی

اندھیرا چاہے کتنا ہی گہرا کیوں نہ ہو، روشنی کی ایک کرن سب کچھ بدل سکتی ہے۔ اگر خواتین دوبارہ حیا، عفت اور اسلامی لباس کو اپنائیں، تو یہ معاشرہ دوبارہ نور اور برکت سے بھر سکتا ہے۔ حیا اور پردہ کسی قید کا نام نہیں بلکہ اللہ کی رحمت اور عزت کی ڈھال ہے۔
جب عورت اپنے لباس میں حیا کو زندہ رکھتی ہے، تو وہ اپنی ذات کے ساتھ ساتھ پورے معاشرے کی پاکیزگی کی حفاظت کرتی ہے۔ مسلمان عورت اگر اپنے کردار اور لباس سے قرآن اور سنت کا پیغام پیش کرے، تو وہ دنیا کے ہر فتنے کا جواب بن سکتی ہے۔ یہی اصل آزادی ہے — اللہ کی بندگی میں سکون، حیا میں خوبصورتی، اور پردے میں عزت۔

اختتامی نصیحت

حیا صرف لباس کا نام نہیں، بلکہ جنت کا دروازہ ہے۔
جو اپنی حیا کو بچائے گا، اللہ اسے دنیوی شہرت اور آخرت کی روشنی دونوں دے گا۔
آج سے عزم کریں — اپنی اور اپنی بیٹیوں کی حفاظت حیا اور اسلامی لباس کے ساتھ کریں، اور معاشرے میں فتنے کی جگہ رحمت پھیلائیں۔”


آج کا دور اور اس حدیث کی حقیقت

رسولُ اللہ ﷺ کی یہ پیشین گوئی آج بالکل حقیقت بن چکی ہے۔

👉 ایک طرف ظلم و جبر، ناانصافی اور قانون سے کھیلنے کا دور ہے —
طاقتور اپنے “کوڑوں” یعنی اختیارات، قانون اور خوف کے ذریعے
کمزوروں کو کچلتے جا رہے ہیں۔
عدل کے نام پر ظلم، اور امن کے نام پر خوف —
یہی “گائے کی دُم جیسے کوڑے” کا مطلب ہے۔

👉 دوسری طرف عورتوں کے لباس میں بے حیائی،
جسم کی نمائش اور فیشن کی دوڑ نے حیا کی روح چھین لی ہے۔
“پہن کر بھی ننگی” عورتیں وہی ہیں جو
تنگ، باریک یا چھوٹے کپڑے پہنتی ہیں،
جو جسم کو تو ڈھانک دیتے ہیں مگر حیا کو نہیں۔
یہی وہ فتنہ ہے جس کی پیشین گوئی نبی ﷺ نے فرمائی تھی۔


1. ظالم حکمران — ظلم، جبر اور ناانصافی

آج دنیا بھر میں ظلم عام ہے، انصاف نایاب۔
حدیث کا پہلا حصہ ان لوگوں کی طرف اشارہ کرتا ہے
جو اپنے ہاتھوں میں “کوڑے” لیے ہوئے ہیں —
یعنی وہ حکمران، افسر، یا طاقتور طبقہ
جو عدل کے بجائے ظلم کا سہارا لیتا ہے۔

حکومت اور طاقت امانت ہے، مگر جب اسے
خوف اور جبر کا ذریعہ بنا لیا جائے،
تو ایسے لوگ اللہ کے غضب کے مستحق ہو جاتے ہیں۔
یہ ہمیں یاد دلاتی ہے کہ قیادت عبادت ہے،
ظلم کا آلہ نہیں۔


2. لباس پہن کر بھی ننگی — معاشرتی بے حیائی اور فتنہ

نبی ﷺ کی یہ بات آج کے دور میں لفظ بہ لفظ پوری ہو رہی ہے۔
آج عورتیں لباس پہنتی ہیں مگر
وہ لباس پردے اور حیا کے بجائے
نمائش اور کشش کا ذریعہ بن چکا ہے۔

فیشن، اسٹیج، ایڈورٹائزمنٹ، اور سوشل میڈیا پر
عورت کے جسم کو “برانڈ” بنا دیا گیا ہے۔
یہ وہی “کاسیات عاریات” ہیں
جن کے بارے میں نبی ﷺ نے فرمایا:

“وہ جنت میں داخل نہ ہوں گی،
بلکہ اُس کی خوشبو تک نہیں پائیں گی۔”

سوچئے! جب جنت کی خوشبو بھی ان سے روک دی جائے گی،
تو ان کا انجام کیا ہوگا؟

اسلام عورت کو شرم، وقار اور عزت کی علامت بناتا ہے،
نہ کہ فتنہ اور نمائش کا ذریعہ۔


👩‍🦰 عورتوں کے لیے خاص نصیحت

رسولُ اللہ ﷺ نے فرمایا:

“حیا ایمان کا ایک حصہ ہے،
اور جس میں حیا نہیں، اُس میں ایمان نہیں۔” (بخاری)

حیا صرف لباس میں نہیں بلکہ نظر، گفتار، چلنے، اور سوشل برتاؤ میں بھی ہوتی ہے۔

مسلمان عورت کو چاہیے کہ:
• فیشن کی اندھی دوڑ میں نہ پڑے۔
• سوشل میڈیا پر اپنی اداؤں اور تصاویر کی نمائش نہ کرے۔
• “اسلامی فیشن” کے نام پر حیا کی حدود نہ توڑے۔

کیونکہ حیا ہی وہ زینت ہے جو عورت کو
اللہ کے نزدیک محبوب بناتی ہے۔


اس بے حیائی کا ذمّے دار کون؟ — ہم، معاشرہ یا میڈیا؟

یہ صرف عورتوں کا قصور نہیں —
بلکہ پورا معاشرہ اس فساد میں شامل ہے۔

🔹 میڈیا اور فلم انڈسٹری:

انہوں نے “فیشن” اور “گلیمر” کے نام پر
شرم و حیا کو مذاق بنا دیا۔
شہرت کے نام پر عریانی کو عام کر دیا۔

🔹 سوشل میڈیا:

جہاں “لائکس” اور “فالوورز” کے لالچ میں
شرم و پردہ قربان کیا جا رہا ہے۔

🔹 مرد معاشرہ:

جو عورت کو تفریح کا ذریعہ سمجھتا ہے،
اور اس کی نمائش سے لذت لیتا ہے۔

🔹 والدین:

جو اپنی بیٹیوں کو دینی تربیت دینے کے بجائے
دنیاوی فیشن اور آزادی کا سبق دیتے ہیں۔

جب تک ہم سب اپنا رویہ نہیں بدلیں گے،
یہ بے حیائی بڑھتی رہے گی،
اور اللہ کا غضب معاشرے پر نازل ہوتا رہے گا۔


روشنی کی طرف قدم — حیا اور اسلامی لباس کی بحالی

اندھیرا کتنا ہی گہرا کیوں نہ ہو،
روشنی کی ایک کرن سب کچھ بدل سکتی ہے۔

اگر آج مسلمان عورتیں حیا، عفت اور اسلامی لباس اپنائیں،
تو یہ معاشرہ دوبارہ نور اور برکت سے بھر جائے گا۔

قرآن کہتا ہے:

“اے نبی ﷺ! اپنی بیویوں، بیٹیوں اور مومن عورتوں سے کہہ دو
کہ وہ اپنے اوپر اپنی چادریں لٹکا لیا کریں۔”
(سورہ الاحزاب 33:59)

پردہ قید نہیں، بلکہ عزت اور تحفظ کا ہتھیار ہے۔
جب عورت حیا کے لباس سے اپنے آپ کو ڈھانپتی ہے،
تو وہ صرف اپنے آپ کو نہیں بلکہ
پورے معاشرے کی پاکیزگی کی حفاظت کرتی ہے۔


نصیحت کا خلاصہ

لباس حیا کا پیغام بنے، فتنہ کا ذریعہ نہیں۔
عورت اپنے جسم کو نہیں، بلکہ کردار اور وقار کو پیش کرے۔
مرد اپنی عورتوں کی حفاظت کریں، ان کے غیرت کے نگہبان بنیں۔

میڈیا کی گندگی کو “لَا إِلٰهَ إِلَّا اللّٰهُ” کی روشنی سے مٹائیں۔


🕊️ دعا

“اے اللہ! ہمیں حیا، عفت اور اسلامی لباس کی برکت عطا فرما،
ہماری بیٹیوں اور بہنوں کی حفاظت فرما،
اور ہمیں اس بے حیائی کے دور میں بھی
اپنے دین پر قائم رہنے کی توفیق دے۔ آمین 🤲”


اختتامیہ (Conclusion)

رسولُ اللہ ﷺ نے فرمایا:

“حیا ایمان کا حصہ ہے، اور جس میں حیا نہیں، اُس میں ایمان نہیں۔”

جب لباس سے حیا نکل جائے،
تو زندگی بےنور اور معاشرہ بےامان ہو جاتا ہے۔

آج ضرورت ہے کہ ہم حیا، پردہ اور اسلامی لباس کی
اصل روح کو دوبارہ زندہ کریں —
اپنے گھروں میں، اپنی تربیت میں،
اور اپنے ڈیجیٹل رویّے میں بھی۔

حیا کوئی رکاوٹ نہیں، بلکہ جنت کا دروازہ ہے۔
جو اس دروازے کی حفاظت کرے گا،
اللہ اُس کی عزت اور نور دونوں بڑھا دے گا۔

آئیے آج سے عہد کریں کہ ہم اس بے حیائی کی لہر میں
خود کو نہیں بہنے دیں گے،
بلکہ قرآن و سنت کی روشنی میں
اپنے معاشرے کو حیا کی راہ دکھائیں گے۔

🤲 اللّٰہم آمین۔



"آج کا دن اصلاح کا دن ہے، کل تو صرف حساب ہوگا۔"

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اکثر پوچھے جانے والے سوالات (FAQ)

اس کا مطلب ہے کہ عورت لباس تو پہنتی ہے مگر حیا اور عزت کا خیال نہیں رکھتی۔ تنگ، شفاف یا جسم کو نمایاں کرنے والے کپڑے جو فتنہ اور دکھاوا پیدا کریں، انہیں "لباس پہن کر بھی ننگی" کہا جاتا ہے۔
جی ہاں، حدیث میں واضح ہے کہ جو خواتین حیا اور شرم کے خلاف اپنا لباس اور رویہ اپنائیں گی، وہ جنت میں داخل نہیں ہوں گی اور خوشبو تک محسوس نہیں کر سکیں گی۔
ذمہ دار صرف خواتین نہیں بلکہ معاشرہ، میڈیا، سوشل پلیٹ فارم اور مرد بھی شامل ہیں۔ والدین کی تعلیم اور نگرانی بھی اس ذمہ داری میں شامل ہے۔
خواتین کو چاہیے کہ وہ حیا، عفت اور اسلامی لباس اپنائیں، اپنی ذات کو اللہ کی رضا کے لیے سنواریں، اور اپنے رویے اور لباس سے معاشرے میں فتنے کی بجائے رحمت پھیلائیں۔
یہ ان ظالم حکمرانوں یا افسران کے لیے ہے جو اپنی طاقت دوسروں پر ظلم کرنے کے لیے استعمال کرتے ہیں۔ یہ لوگ انصاف کے بجائے خوف اور ظلم کے لیے اپنی طاقت استعمال کرتے ہیں۔

🌟 قیامت کے دن کی تیاری آج کی جائے، کل صرف حسرت ہوگی۔ 🌟

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