हमारे समाज में एक गलत अक़ीदा (धार्मिक धारणा) बहुत फैला हुआ है कि अल्लाह तक पहुँचने के लिए किसी वसीले (साधन/बुजुर्ग/पीर) की ज़रूरत होती है। और Waseela ke Liye Judge wakeel Aur Seerhi ki Misaal दिया जाता है। अक्सर यह सवाल उठता है कि Kya Allah Tak Pahunchne ke Liye Waseela Zaruri hai? क्या बग़ैर वसीला के अल्लाह हमारी नहीं सुनता? और इसके लिए अजीब सी मिसालें भी दी जाती हैं। जैसे सीढ़ी, जज,वकील वगैरह की मिसाल।
Social media पर एक तस्वीर देखने को मिली जिसमें ये दिखाया गया कि:
- वसीला को मानने वाले सुन्नी हैं।
- और वसीला को न मानने वाले वहाबी हैं।
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| Waseela se Mutalliq Ghalt Aqeedah |
ग़लत और गुमराहकुन सोच
यह सोच और यह तस्वीर दोनों गलत और गुमराह करने वाली हैं। इस सोच से ऐसे लोगों की इल्म की काबिलियत समझ में आती है वाकई ये दीन से बहुत दूर हैं। इन्होंने ने न कभी क़ुरआन पढ़ी और समझी होगी और ना ही हदीस का इल्म होगा। हक़ीक़त यह है कि अल्लाह तक पहुँचने के लिए किसी इंसान को ज़रूरी वसीला बनाना कुरआन और सही हदीस के खिलाफ है। और जो जायज़ है वो जिन्दों से मुतल्लिक है।
लोग इसे साबित करने के लिए अजीबो-गरीब यानी Waseela ke Liye Judge wakeel Aur Seerhi ki Misaal देते हैं। जैसे छत पर चढ़ने के लिए सीढ़ी चाहिए, बग़ैर सीढ़ी के कोई छत पर नहीं चढ़ सकता। ये है अकीदह और ईमान आज के मुसलमानों का।
और इसके अलावा अल्लाह तआला के लिए जज, वकील, डीसी या प्रधानमंत्री जैसी मिसालें देते हैं। कहते हैं कि जैसे जज तक पहुंचने के लिए वकील चाहिए, अफसर तक पहुंचने के लिए क्लर्क चाहिए और छत पर चढ़ने के लिए सीढ़ी चाहिए — वैसे ही अल्लाह तक पहुंचने के लिए भी किसी नेक बंदे का "वसीला" ज़रूरी है।
यह बात मेरी समझ से बाहर है कि लोग अपने अक़ीदे (धार्मिक विश्वास) को साबित करने के लिए इतनी बेबुनियाद दलीलें कहाँ से ले आते हैं, कि अल्लाह तक पहुँचने के लिए इंसानों की तरह वसीला चाहिए! (अल्लाह की पनाह)। असल में यह सोच जाहिलियत और गुमराही है। और हैरत की बात है कि क्या इनके अक़्लों पर ताला लगा है कि अल्लाह तक पहुंचने के लिए या अल्लाह को सुनाने के लिए वसीला चाहिए।
और सोचने वाली बात है कि जो कब्रों में दफ़न हैं या हमसे हज़ारों मील दूर हैं ,अल्लाह की बनाई मख़लूक,वो बग़ैर वसीला के direct हमारी बात सुन लेते हैं। ये कैसे मुमकिन है?
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वसीला और झूठी मिसालें – एक हकीकत
इन धर्म बेचने वाले ठेकेदारों के पास बस कुछ न कुछ बेचना होता है, यही उनकी दलील होती है। अगर उन्हें धर्म का ज्ञान होता या उन्होंने कुरआन पढ़ा होता, तो वे जाहिलों की तरह न बात करते और न ऐसी मिसालें देते। क्योंकि कुरआन में अल्लाह का साफ हुक्म है, अल्लाह तआला ने साफ फरमा दिया है:
लोगो! अल्लाह के लिए मिसालें मत दिया करो, क्योंकि अल्लाह जानता है और तुम नहीं जानते।”(सूरह नहल: 74)
और फिर फरमाया:
“उसके जैसा कोई नहीं, और वही सब कुछ सुनने और देखने वाला है।”
(सूरह शूरा: 11)
यानी अल्लाह के लिए मिसालें देना ही ग़लत है, क्योंकि वह अपनी ज़ात और सिफ़ात में अकेला है।जब उसके जैसा कोई है ही नहीं तो फिर मिसाल देना सिवाय जाहिलियत के और कुछ नहीं।
हकीकत क्या है?
जज, वकील, या डीसी को हमारा हाल नहीं मालूम होता, और न ही वे जानते हैं कि हम उनके दरवाजे पर खड़े हैं या नहीं, हम किस मक़्सद के लिए उनके पास आए हैं? इसलिए उन्हें वसीले की जरूरत पड़ती है।
लेकिन अल्लाह तआला सब कुछ जानता है, हमारे दिलों के हाल से भी वाकिफ है। तो उसके दरबार में किसी वसीले या बिचौलिए की ज़रूरत नहीं।
नबी-ए-अकरम ﷺ का फरमान:
अल्लाह का दर मत छोड़िए। उसकी चौखट को इस तरह थाम लीजिए कि आपको उसका बंदा होने का यकीन हो जाए। नबी-ए-अकरम ﷺ ने फरमाया,“इस यकीन के साथ अल्लाह से दुआ मांगो कि वह जरूर कबूल होगी। जान लो कि अल्लाह गाफिल दिल और खेल-तमाशे में लगे इंसान की दुआ को कबूल नहीं करता।”
(जामेअ तिरमिज़ी)
नतीजा
- अल्लाह के लिए मिसालें देना जाहिलियत है।
- अल्लाह तक पहुंचने के लिए कोई वसीला या बिचौलिया नहीं चाहिए।
- उसकी चौखट सीधे पकड़ो, क्योंकि वही सुनने वाला, जानने वाला और कबूल करने वाला है।
अब जिस चीज़ से अल्लाह ने मना कर दिया, हम उसे कैसे जायज़ समझ सकते हैं? वैसे भी ये मिसालें अल्लाह के लायक नहीं हैं, क्योंकि खुद अल्लाह ने फरमाया:
आसमानों और ज़मीन का पैदा करने वाला वही है। उसने तुम्हारे लिए तुम्हारी ही जात से जोड़े बनाए, और जानवरों के भी जोड़े बनाए, और इसी तरीके से तुम्हें फैलाता है। उसके जैसा कोई नहीं, और वह सब कुछ सुनने और देखने वाला है।" (सूरह शूरा: 11
दुनियावी मिसाल का कुरआन से खंडन:
♦️छत पर चढ़ने के लिए सीढ़ी इसलिए जरूरी है क्योंकि छत ऊपर है और मैं यहाँ हूँ। मुझे यहाँ से वहाँ जाना है, और बिना सीढ़ी के नहीं जा सकता क्योंकि छत दूर है।
लेकिन जिस अल्लाह की तुमने छत से मिसाल दी है, वह अल्लाह कहता है कि
"मैं तो तुम्हारी गर्दन की नस से भी ज्यादा करीब हूँ" (सूरत क़: 16)।
♦️डीसी से मिलने के लिए क्लर्क की जरूरत इसलिए पड़ती है क्योंकि डीसी को दरख़्वास्त देने वालों के हालात मालूम नहीं होते।
लेकिन जिस अल्लाह की तुम डीसी से मिसाल दे रहे हो, वह कहता है कि
"हमने इंसान को पैदा किया और उसके दिल में उठने वाले ख्यालात को भी जानते हैं, और हम उसकी गर्दन की नस से भी ज्यादा करीब हैं।"♦️डीसी ने अपने घर के बाहर लिख रखा है, "बिना इजाज़त अंदर आना मना है।"लेकिन अल्लाह का दर तो हर समय खुला हुआ है, कभी बंद ही नहीं होता। डीसी थक जाता है, डीसी सो जाता है, और छत भी एक अस्थाई चीज़ है, कमजोर है। जबकि अल्लाह ने आयतुल-कुर्सी में फरमाया:
📖 अल्लाह थकता या सोता नहीं
कुछ लोग "डीसी और क्लर्क" की मिसाल देते हैं। लेकिन अल्लाह की शक्ति इंसानों जैसी नहीं:
"अल्लाह को न ऊँघ आती है, न नींद। अल्लाह को जाहिर और बातिन सब कुछ मालूम है। अल्लाह कभी थकता नहीं।" (सूरत अल-बक़रह: 255)
यानि जब अल्लाह हर लम्हा,हर पल सब कुछ जानने वाला और सुनने वाला है, तो बीच में वसीला गढ़ने की क्या ज़रूरत?
📖 कुरआन में साफ़ हिदायत: अल्लाह बहुत क़रीब है
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
"نَحْنُ اَقْرَبُ اِلَيْهِ مِنْ حَبْلِ الْوَرِيْدِ"
"हम इंसान की शहरग से भी ज़्यादा क़रीब हैं।"
📚 (सूरह क़, आयत 16)
यानि अल्लाह को पुकारने के लिए किसी वसीले या सीढ़ी की ज़रूरत ही नहीं है वह इतना क़रीब है कि हमारे दिल में उभरते ख्याल को भी जान लेता है।
📖 दुआ और वसीला – कुरआन की तालीम
अल्लाह तआला ने फ़रमाया:
"जब मेरे बन्दे मेरे बारे में आपसे पूछें तो (कह दीजिए कि) मैं क़रीब हूँ। जब भी कोई मुझे पुकारता है तो मैं उसकी दुआ क़ुबूल करता हूँ।"सूरह अल-बक़रह, आयत 186)
यहाँ अल्लाह ने सीधे अपने क़रीब होने की बात कही है। न किसी नबी का ज़िक्र है, न किसी पीर या बुजुर्ग का।
🕌 नबी ﷺ की हिदायत
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
"जब तुम मांगो तो अल्लाह से मांगो, और जब मदद चाहो तो अल्लाह से मदद चाहो।"
📚 (जामिउ तिर्मिज़ी, हदीस 2516)
हदीस बिल्कुल साफ़ है – दुआ और मदद सिर्फ़ अल्लाह से मांगनी चाहिए, न कि वसीलों या बुजुर्गों से।
📚 उलमा का बयान
इब्ने तैमिय्या रहिमहुल्लाह:
"अल्लाह को पुकारने के लिए इंसानों को वसीला बनाना बिदअत और शिर्क का दरवाज़ा खोलना है।"इमाम नववी रहिमहुल्लाह (शरह मुस्लिम):
"अंबिया या औलिया से मदद माँगना जायज़ नहीं, बल्कि सीधा अल्लाह से ही दुआ करनी चाहिए।"वसीला पर ज़िद का नतीजा
जो लोग कहते हैं कि वसीला ज़रूरी है, असल में वे अल्लाह की कुदरत और क़रीबी पर शक कर रहे होते हैं। यह अक़ीदा इंसान को शिर्क के क़रीब ले जाता है। और शिर्क को क़ुरआन में अल्लाह ने बहुत बड़ा ज़ुल्म कहा है और इसका अंजाम सिवाय जहन्नुम के कुछ नहीं।
लिहाज़ा! अपनी ज़िद छोड़ें और आख़िरत का ख़ौफ़ करें कि गुमराही का अंजाम कितना खौफ़नाक है।
नतीजा
- अल्लाह तक पहुँचने के लिए किसी वसीले की ज़रूरत नहीं।
- कुरआन और हदीस यह साफ़ बताते हैं कि अल्लाह हर बंदे के क़रीब है और दुआ उसी से करनी चाहिए।
- वसीले की मिसालें (सीढ़ी या डीसी–क्लर्क) झूठी और गुमराह करने वाली हैं।
- हां! जो बुज़ुर्ग या अल्लाह के नेक बंदे हयात से हैं उनसे दुआ करवाई जा सकती है।
🕋 दुआ
"ऐ अल्लाह! हमें शिर्क और बिदअत और गुमराही वाले रास्ते से बचा, और सीधा रास्ता दिखा।"
आमीन या रब्बल आलमीन।
"کیا اللہ تک پہنچنے کے لیے وسیلہ ضروری ہے؟ قرآن و حدیث کی روشنی میں حقیقت"
ہمارے معاشرے میں بعض لوگ دین کی تعلیمات کو سمجھنے کے بجائے جذباتی اور جھوٹی مثالوں کے ذریعے اپنے عقائد کو درست ثابت کرنے کی کوشش کرتے ہیں۔ ایسی ہی ایک تصویر حال ہی میں وائرل ہوئی جس میں یہ دکھایا گیا کہ:
- وسیلہ ماننے والے اہل سنت ہیں۔
- وسیلہ نہ ماننے والے وہابی ہیں۔
یہ تصویر اور اس جیسی باتیں بالکل لغو اور بے بنیاد ہیں۔ حقیقت یہ ہے کہ اللہ تک پہنچنے کے لیے کسی انسان یا بزرگ کو واسطہ بنانا قرآن و سنت کی تعلیم کے خلاف ہے۔ اس آرٹیکل میں ہم دلائل کے ساتھ اس غلط عقیدے کا رد پیش کریں گے۔
وسیلہ کی بوگس مثالیں – ایک جائزہ
اکثر یہ کہا جاتا ہے کہ:
- "اللہ تک پہنچنے کے لیے سیڑھی کی طرح وسیلہ ضروری ہے۔"
- "جیسے ڈی سی (افسر) تک پہنچنے کے لیے کلرک ضروری ہے، ویسے ہی اللہ تک پہنچنے کے لیے وسیلہ لازمی ہے۔"
یہ دلیلیں بالکل لغو ہیں، کیونکہ:
- چھت اور زمین کے درمیان فاصلہ ہے، لیکن اللہ تو بندے کی شہ رگ سے بھی قریب ہے۔
- ڈی سی انسان ہے جسے حالات کا علم نہیں ہوتا، لیکن اللہ دلوں کے راز جانتا ہے۔
قرآن کا واضح پیغام: اللہ قریب ہے
اللہ نے فرمایا:
"نَحْنُ اَقْرَبُ اِلَیْهِ مِنْ حَبْلِ الْوَرِیْدِ"
(ہم انسان کی شہ رگ سے بھی زیادہ قریب ہیں)
📚 سورۃ ق، آیت 16
یعنی اللہ کو پکارنے کے لیے کسی وسیلے یا سیڑھی کی ضرورت نہیں، وہ تو ہر بندے کے بہت قریب ہے۔
دعا اور وسیلہ – قرآن کی تعلیم
اللہ نے فرمایا:
"وَإِذَا سَأَلَكَ عِبَادِي عَنِّي فَإِنِّي قَرِيبٌ ۖ أُجِيبُ دَعْوَةَ الدَّاعِ إِذَا دَعَانِ"
📚 سورۃ البقرہ، آیت 186
ترجمہ: "جب میرے بندے میرے بارے میں آپ سے پوچھیں تو (کہہ دیجیے کہ) میں قریب ہوں۔ پکارنے والے کی دعا قبول کرتا ہوں جب وہ مجھے پکارتا ہے۔"
یہاں اللہ نے براہِ راست اپنی قربت بیان کی ہے۔ نہ کسی نبی کا ذکر، نہ ولی کا، نہ پیر کا۔
اللہ کو نیند اور تھکن نہیں آتی
بعض لوگ "ڈی سی اور کلرک" کی مثال دیتے ہیں۔ حالانکہ اللہ اپنی قدرت میں کامل ہے:
"لَا تَأْخُذُهُ سِنَةٌ وَلَا نَوْمٌ"
📚 سورۃ البقرہ، آیت 255 (آیت الکرسی)
ترجمہ: "اللہ کو نہ اونگھ آتی ہے اور نہ نیند۔"
جب اللہ خود سب کچھ سننے اور جاننے والا ہے تو پھر بیچ میں وسیلہ گھڑنے کی کیا ضرورت ہے؟
نبی ﷺ کی تعلیمات
رسول اللہ ﷺ نے فرمایا:
"جب تم مانگو تو اللہ سے مانگو، اور جب مدد چاہو تو اللہ سے مدد چاہو۔"
📚 جامع ترمذی، حدیث: 2516
یہ حدیث بالکل واضح ہے کہ دعا اور مدد صرف اللہ سے مانگی جائے، نہ کہ وسیلوں یا بزرگوں سے۔
علماء کا موقف
-
امام ابن تیمیہ رحمہ اللہ:
"اللہ کو پکارنے کے لیے وسیلہ بنانا بدعت اور شرک کا ذریعہ ہے، کیونکہ اللہ خود قریب ہے۔" -
امام نووی رحمہ اللہ (شرح صحیح مسلم):
"انبیاء علیہم السلام کی دعا کرنا یا ان سے حاجت مانگنا جائز نہیں، بلکہ صرف اللہ سے دعا کی جائے۔"
وسیلہ پر اصرار کا انجام
جو لوگ کہتے ہیں کہ وسیلہ لازم ہے، دراصل وہ اللہ کی قدرت اور قربت پر شک کرتے ہیں۔ ایسا عقیدہ قرآن و حدیث کے خلاف ہے اور انسان کو شرک کے قریب لے جاتا ہے۔
نتیجہ
- وسیلہ کے نام پر سیڑھی یا ڈی سی کی مثال دینا بالکل جھوٹ اور لغو ہے۔
- اللہ تک پہنچنے کے لیے کسی واسطے کی ضرورت نہیں۔
- قرآن و حدیث واضح طور پر بتاتے ہیں کہ اللہ ہر بندے کے قریب ہے اور وہی دعا قبول کرتا ہے۔
🕋 دعا
اللہ ہمیں شرک اور بدعات سے بچائے، اور سیدھا راستہ دکھائے۔
آمین یا رب العالمین۔
FAQs (हिंदी + اردو):
नहीं। कुरआन और हदीस से यह साफ़ है कि अल्लाह हर इंसान के बहुत क़रीब है। दुआ और मदद सिर्फ़ उसी से मांगी जाती है।
کیا اللہ تک پہنچنے کے لیے کیسی وسیلے کی ضرورت ہے ؟
نہیں۔ قرآن و حدیث سے یہ بات بالکل واضح ہے کہ اللہ ہر بندے کے بہت قریب ہے۔ دعا اور مدد صرف اللہ ہی سے مانگی جاتی ہے۔
यह एक ग़लत और गढ़ा हुआ अक़ीदा है, जिसे कुछ लोग अपने फायदे के लिए फैलाते हैं। नबी ﷺ ने कभी यह नहीं सिखाया कि दुआ के लिए किसी और को पुकारो।
یہ ایک غلط اور گھڑا ہوا عقیدہ ہے، جسے کچھ لوگ اپنے فائدے کے لئے پھیلاتے ہیں۔ نبی ﷺ نے کبھی یہ نہیں سکھایا کہ دعا کے لئے کسی اور کو پکارو۔
अल्लाह ने फ़रमाया: "जब मेरा बंदा मुझे पुकारता है तो मैं उसकी दुआ क़ुबूल करता हूँ" (सूरह अल-बक़रह 186)। यानी सीधे अल्लाह से दुआ करनी चाहिए।
اللہ نے فرمایا: "جب میرا بندہ مجھے پکارتا ہے تو میں اس کی دعا قبول کرتا ہوں" (سورۃ البقرہ 186)۔ یعنی براہِ راست اللہ سے دعا کرنی چاہیے۔
नहीं। हम नबी ﷺ की शफ़ाअत पर ईमान रखते हैं, लेकिन वो शफ़ाअत अल्लाह की इजाज़त से क़ियामत के दिन होगी, न कि दुनिया में हमारी दुआ पहुँचाने के लिए।
نہیں۔ ہم نبی ﷺ کی شفاعت پر ایمان رکھتے ہیں، لیکن وہ شفاعت اللہ کی اجازت سے قیامت کے دن ہوگی، نہ کہ دنیا میں ہماری دعا پہنچانے کے لئے۔
ये सब झूठी और गुमराह करने वाली मिसालें हैं। अल्लाह इंसानों जैसा नहीं कि उसे किसी सहायक की ज़रूरत हो। वो तो हर जगह हाज़िर और नाज़िर है।
A5 (اردو): یہ سب جھوٹی اور گمراہ کرنے والی مثالیں ہیں۔ اللہ انسانوں جیسا نہیں کہ اسے کسی مددگار کی ضرورت ہو۔ وہ تو ہر جگہ حاضر و ناظر ہے۔
इंसान का ईमान मज़बूत होता है, दुआ जल्दी क़ुबूल होती है और इंसान शिर्क और बिदअत से बचा रहता है।
انسان کا ایمان مضبوط ہوتا ہے، دعا جلد قبول ہوتی ہے اور انسان شرک و بدعت سے محفوظ رہتا ہے۔

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