इस्लाम में रिश्तों को बहुत अहमियत दी गई है। मियाँ-बीवी का रिश्ता हो,भाई-बहन का प्यार हो या वालिदैन और औलाद का ताल्लुक—ये सब अल्लाह की नेमतें हैं।लेकिन यही रिश्ते शैतान का सबसे बड़ा निशाना भी होते हैं। Rishton Mein Nafrat Kyun Paida Hoti Hai? आज हम इसी से मुतल्लिक़ पढ़ेंगे।
इस्लाम एक ऐसा दीन है जो सिर्फ़ इबादात ही नहीं, बल्कि इंसानी रिश्तों को भी मज़बूत और पाकीज़ा बनाने की तालीम देता है। मगर आज का सबसे बड़ा अलमिया यह है कि यही रिश्ते नफ़रत، शक، ग़ुस्से और बदगुमानी की वजह से टूटते जा रहे हैं۔
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Rishton ko Mohabbat se bachaya ja sakta hai Nafrat se nahi |
क़ुरआन और सुन्नत हमें बताते हैं कि रिश्तों को तोड़ना शैतान का सबसे पसंदीदा काम है۔ वह इंसान के दिल में धीरे-धीरे ज़हर भरता है، ताकि मोहब्बत दुश्मनी में बदल जाए۔
इस मज़मून Rishton Mein Nafrat Kyun Paida Hoti Hai? में हम जानेंगे कि शैतान रिश्तों को कैसे तोड़ता है और इस्लाम हमें उनसे बचने का क्या तरीका सिखाता है۔
शैतान का असली मक़सद रिश्तों में नफ़रत, शक और जुदाई डालना
शैतान जानता है कि अगर उसने रिश्ते तोड़ दिए, तो इबादतें भी कमज़ोर पड़ जाएँगी और समाज बिखर जाएगा।इसी लिए वह चुपके-चुपके दिलों में शक, ग़ुस्सा, हसद और नफ़रत डालता है।
क़ुरआन साफ़ बताता है:
शैतान तुम लोगों के बीच दुश्मनी और बैर डालना चाहता है।(सूरह अल-माइदा: 91)
शैतान कभी सामने आकर नहीं लड़ता, बल्कि:
💠बातों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है💠छोटी बात को बड़ा झगड़ा बना देता है
💠दिलों में बदगुमानी पैदा करता है
मियाँ-बीवी के रिश्ते को शैतान कैसे बिगाड़ता है?
मियाँ-बीवी का रिश्ता मोहब्बत, एतबार और रहमत पर क़ायम होता है। शैतान इस रिश्ते को एक झटके में नहीं तोड़ता, बल्कि आहिस्ता-आहिस्ता दिलों में दरारें डालता है, ताकि बात बिगड़ते-बिगड़ते नफ़रत और जुदाई तक पहुँच जाए।
छोटी बात को बड़ा बनाकर
जो मसला प्यार, सब्र और एक जुमले से हल हो सकता था, शैतान उसे तकरार और झगड़े में बदल देता है।मिसाल के तौर पर:शौहर का कभी काम की वजह से देर से घर आ जाना
या बीवी का किसी बात में देर कर देना
शैतान दिल में यह बात डाल देता है:
💠“तुम्हें मेरी कोई क़दर ही नहीं”फिर सवालों की बौछार शुरू होती है:
💠किसके साथ थे?
💠अब पहले जैसा ध्यान क्यों नहीं?
बस एक जुमला इधर-उधर हुआ, लहजा सख़्त हुआ और यहीं से झगड़े की चिंगारी भड़क उठती है। शैतान चाहता ही यही है कि बात हल न हो, बढ़ती चली जाए।
शक और बदगुमानी पैदा करके
शैतान का सबसे ख़तरनाक हथियार है शक।
दिल में ख़्याल डालता है:
💠“ज़रूर किसी और से बात कर रहे होंगे”💠“अब मुझसे पहले जैसा प्यार नहीं रहा”
💠“कुछ तो छुपा रहे हैं”
फिर इसका नतीजा:
💠फोन चेक करवाना💠हर बात का ग़लत मतलब निकालना
💠बिना दलील इल्ज़ाम लगाना
जब शक आ जाता है तो:
💠सुकून चला जाता है💠एतबार टूटने लगता है
💠और रिश्ता बोझ बन जाता है
याद रखिए, जिस रिश्ते में भरोसा न रहे, वह ज़िंदा नहीं रहता।
तुलना का ज़हर डालकर
शैतान कभी आपके साथी को बुरा नहीं कहता, बल्कि किसी तीसरे को बेहतर बनाकर पेश करता है।
जैसे:
💠“फलाँ की बीवी तो कितनी समझदार है”💠“फलाँ का शौहर कितना ख्याल रखता है”
💠“देखो वो लोग कितने खुश हैं”
इस तुलना से
:💠नाशुक्री पैदा होती है
💠अपने साथी की अच्छाइयाँ नज़रअंदाज़ हो जाती हैं
💠और दिल में शिकायतें जमा होने लगती हैं
शैतान चाहता है कि इंसान अपने नसीब से खुश न रहे और हर वक़्त दूसरों की ज़िंदगी को आदर्श समझे।
बात को तलाक़ तक पहुँचा देना
जब झगड़ा, शक और तुलना जम जाती है तो शैतान आख़िरी वार करता है:
“छोड़ दो… तलाक़ दे दो…
इस रिश्ते में अब कुछ नहीं रखा”
यहीं पर शैतान सबसे ज़्यादा खुश होता है।
हदीस में आता है:
इब्लीस अपने शैतानों में सबसे ज़्यादा खुश उससे होता है जो मियाँ-बीवी के बीच जुदाई करवा दे।(सहीह मुस्लिम)
आख़िरी नसीहत
हर झगड़ा शैतान की तरफ़ से होता है, हर सुलह अल्लाह की तरफ़ से।
💠ग़ुस्से में ख़ामोशी💠शक की जगह भरोसा
💠और शिकायत की जगह शुक्र
👉🏻 यही वो हथियार हैं जिनसे
शैतान की चाल से मुतल्लिक़ नाकाम हो जाती है
और मियाँ-बीवी का रिश्ता फिर से रहमत बन जाता है।
भाई-भाई और बहन-बहन के रिश्ते शैतान कैसे तोड़ता है?
भाई-बहन का रिश्ता ख़ून, बचपन की यादों और एक ही घर की मोहब्बत से जुड़ा होता है। यह रिश्ता बहुत मज़बूत होता है, लेकिन शैतान इसे भी एक ही झटके में नहीं तोड़ता, बल्कि धीरे-धीरे दिलों में ज़हर भरकर रिश्तों को कमज़ोर कर देता है।
हसद और जलन पैदा करके
शैतान सबसे पहले दिल में हसद (जलन) डालता है, क्योंकि हसद वह आग है जो सबसे पहले इंसान के अपने दिल को जलाती है।वह दिल में यह ख़याल डालता है:
💠“माँ-बाप उसे ज़्यादा चाहते हैं”
💠“हर अच्छी चीज़ उसी को क्यों मिलती है?”
💠“अब्बा-अम्मी उसी को ज़्यादा अहमियत देते हैं”
यही सोच धीरे-धीरे:
💠नाराज़गी में बदल जाती है
💠फिर दिल में कड़वाहट भर जाती है
💠और आख़िरकार भाई-बहन एक-दूसरे से दूर हो जाते हैं
हक़ीक़त में माँ-बाप कभी-कभी किसी बच्चे की तरफ़ ज़्यादा झुकाव दिखा भी दें, मगर शैतान उसी बात को नाइंसाफ़ी बना कर दिलों में दुश्मनी पैदा कर देता है।
चुगली और गलतफहमी फैलाकर
जब दिल में जलन जम जाती है, तो शैतान दूसरा हथियार इस्तेमाल करता है—चुगली।💠किसी की बात को तोड़-मरोड़ कर पहुँचाना
💠आधी बात बताकर पूरी कहानी बदल देना
💠अपनी तरफ़ से झूठी बातें जोड़ देना
जैसे:
“तुम्हें पता है, उसने तुम्हारे बारे में क्या कहा था?”
इससे:
💠शक और बदगुमानी बढ़ती है
💠आपसी बातचीत बंद हो जाती है
💠और गलतफहमियाँ नफ़रत में बदल जाती हैं
शैतान जानता है कि जब लोग आमने-सामने बैठकर बात नहीं करेंगे, तो रिश्ते खुद-ब-खुद टूटने लगेंगे।
माल और विरासत के झगड़े के ज़रिए
शैतान का सबसे खतरनाक दांव माल और विरासत के मामले में होता है।💠थोड़े से पैसे के लिए
💠ज़मीन या जायदाद के लिए
💠दुनिया के फ़ायदे के लिए
भाई, भाई का दुश्मन बन जाता है,और बहनों के हक़ मार लिए जाते हैं।
शैतान इंसान को यह भुला देता है कि:
💠माल यहीं रह जाना है
💠रिश्ते क़ब्र तक साथ नहीं जाते
💠लेकिन रिश्तों के हक़ आख़िरत में ज़रूर पूछे जाएंगे
इसी तरह शैतान माल और हक़ के बहाने ख़ून के रिश्ते तक तोड़ देता है।
आख़िरी नसीहत
भाई-बहन का रिश्ता अल्लाह की बहुत बड़ी नेमत है।💠हसद से बचें
💠चुगली से दूर रहें
💠और हक़ के मामले में अल्लाह से डरें
यही बातें:
शैतान की चालों को नाकाम करती हैं और टूटते रिश्तों को बचा लेती हैं।
औलाद और वालिदैन के रिश्ते में शैतान कैसे घुसता है?
शैतान की चालें
औलाद और माता-पिता का रिश्ता दुनिया के सबसे मुक़द्दस रिश्तों में से है। यह रिश्ता एहसान, क़ुर्बानी और दुआओं पर टिका होता है। मगर शैतान इस रिश्ते को भी बिगाड़ने की पूरी कोशिश करता है, क्योंकि अगर औलाद वालिदैन से कट जाए, तो समाज की जड़ें कमज़ोर हो जाती हैं।
नाफ़रमानी को “आजादी” बनाकर दिखाना
शैतान औलाद के दिल में यह सोच डाल देता है कि माता-पिता की बात मानना पिछड़ापन है।वह कहता है:
💠“अब ज़माना बदल गया है”
💠“हर बात मानना ज़रूरी थोड़ी है”
💠“अपनी ज़िंदगी है, अपनी मर्ज़ी से जियो”
इस तरह शैतान:
💠अदब को गुलामी बना देता है
💠नाफ़रमानी को आज़ादी का नाम दे देता है
💠और धीरे-धीरे औलाद को वालिदैन से दूर कर देता है
जबकि हक़ीक़त यह है कि असल आज़ादी अल्लाह की इताअत में है,न कि वालिदैन की नाफ़रमानी में।
वालिदैन की कमियों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना
शैतान की एक पुरानी चाल यह है कि वह अच्छाइयों को छुपा देता है और कमियों को बड़ा करके दिखाता है।वह औलाद के दिल में यह सोच डालता है:
💠“हमेशा रोकते-टोकते रहते हैं”
💠“कुछ समझते ही नहीं”
💠“दूसरों के माँ-बाप कितने अच्छे हैं”
इस तरह:
💠माँ-बाप की सारी क़ुर्बानियाँ भुला दी जाती हैं
💠उनकी एक-आध बात भारी लगने लगती है
💠और दिल में शिकायतें जमा हो जाती हैं
शैतान चाहता है कि औलाद एहसान देखे ही नहीं, बस कमी ही कमी देखे।
बदतमीज़ी को हक़ समझाना
जब दिल में शिकायत और नाफ़रमानी आ जाती है, तो शैतान अगला क़दम उठाता है—बदतमीज़ी को जायज़ ठहराना।
जैसे:💠माँ-बाप से ऊँची आवाज़ में बात करना
💠ताने देना या पलटकर जवाब देना
💠बुज़ुर्गों को बोझ समझना
औलाद सोचने लगती है:
💠“मेरी भी तो अपनी फ़ीलिंग्स हैं”
💠“मैं भी इंसान हूँ, चुप क्यों रहूँ?”
जबकि अल्लाह का साफ़ हुक्म है:
“और उनसे (मां बाप से)‘उफ़’ तक न कहो।”यानि:
(सूरह अल-इसरा: 23)
💠न आवाज़ ऊँची हो
💠न लहजा सख़्त हो
💠न दिल में तौहीन हो
आख़िरी नसीहत
माँ-बाप का अदब और ख़िदमत अल्लाह की रज़ा तक पहुँचने का सबसे आसान रास्ता है।💠सब्र को अपना हथियार बनाइए
💠शुक्र के साथ रिश्ते निभाइए
जो आज वालिदैन के साथ करेगा, कल वही उसकी औलाद उसके साथ करेगी।
शैतान रिश्ते तोड़ने के लिए कौन-कौन से हथियार इस्तेमाल करता है?
शैतान रिश्ते एक दिन में नहीं तोड़ता, बल्कि छोटे-छोटे हथियारों से दिलों को ज़ख़्मी करता है।(1) ग़ुस्सा
ग़ुस्सा शैतान का सबसे तेज़ हथियार है। ग़ुस्से में इंसान:💠ऐसी बात कह देता है जिसका उसे बाद में पछतावा होता है
💠ऐसे फ़ैसले कर लेता है जो रिश्तों को तोड़ देते हैं
(2) शक
शक रिश्तों की जड़ काट देता है।💠बिना सबूत बुरा गुमान
💠हर बात को नकारात्मक समझना
💠दिल ही दिल में फ़ैसले कर लेना
👉 याद रखें! शैतान जानता है कि जहाँ शक आ गया, वहाँ सुकून चला गया।
(3) हसद (जलन)
हसद वह ज़हर है जो सबसे पहले अपने ही दिल को जलाता है।
💠किसी की ख़ुशी बुरी लगना💠किसी की तरक़्क़ी सहन न होना
💠हसद रिश्तों को दुश्मनी में बदल देता है।
(4) ग़ीबत
पीठ पीछे बुराई करना:💠भरोसा तोड़ती है
💠दिलों में नफ़रत भरती है
💠और झूठी कहानियाँ फैलाती है
शैतान ग़ीबत के ज़रिए एक इंसान को दूसरे की नज़र में गिरा देता है।
(5) ज़ुबान की तल्ख़ी
कड़वे अल्फ़ाज़:💠ताने
💠तंज़
💠ज़ख़्मी जुमले
शैतान जानता है कि तलवार से ज़ख़्म भर जाता है, लेकिन ज़ुबान से दिया ज़ख़्म बरसों नहीं भरता।
(6) सब्र की कमी
सब्र न हो तो:💠छोटी बात बड़ी बन जाती है
💠हर मसला झगड़े में बदल जाता है
शैतान चाहता है कि इंसान,थोड़ा भी ठहर कर न सोचे।
♦️शैतान से रिश्तों को कैसे बचाएँ?
अब सवाल यह है कि आख़िर शैतान की इन चालों से रिश्तों को बचाया कैसे जाए?
(1) हर झगड़े और बेकार बहस में रुक कर सोचें
जब भी बहस या ग़ुस्सा आए, अपने आप से एक सवाल करें:“क्या यह बात अल्लाह को पसंद है?”अगर जवाब नहीं है,तो वहीं रुक जाना ही अक़्लमंदी है।
(2) ग़ुस्से में फ़ैसला न करें, चुप रहना सीखें
ग़ुस्से में लिया गया फ़ैसला अक्सर रिश्तों की क़ब्र बन जाता है।रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“ग़ुस्सा शैतान की तरफ़ से है।”
इसलिए:
ग़ुस्से में चुप रहना सीखिए
जवाब बाद में दीजिए
👉 ख़ामोशी कई रिश्ते बचा लेती है।
(3) दुआ को हथियार बनाएँ
हर झगड़े के वक़्त शैतान से अल्लाह की पनाह माँगिए।पढ़िए:
“अऊज़ु बिल्लाहि मिनश्शैतानिर्रजीम”और रिश्तों की सलामती के लिए रोज़ दुआ करना अपनी आदत बना लें।
(4) एक-दूसरे की नियत को अच्छा समझें (हुस्न-ए-ज़न)
शैतान बदगुमानी चाहता है, इस्लाम हुस्न-ए-ज़न सिखाता है।💠शक छोड़िए
💠नियत को अच्छा समझिए
💠बात साफ़-साफ़ पूछिए
👉 अच्छे गुमान से बड़े-बड़े झगड़े ख़त्म हो जाते हैं।
(5) माफ़ी को कमज़ोरी नहीं, ताक़त समझें
शैतान कहता है:“माफ़ कर दिया तो कमज़ोर समझे जाओगे”
जबकि हक़ीक़त यह है:
💠अल्लाह माफ़ करने वालों को पसंद करता है
💠माफ़ी दिल को हल्का करती है
💠माफ़ी रिश्तों को जोड़ती है
रिश्तों में:
जीत नहीं चाहिए,सलामती चाहिए।
Conclusion:
जहाँ:
💠सब्र होगा
💠दुआ होगी
💠हुस्न-ए-ज़न होगा
💠और माफ़ी होगी
वहाँ शैतान की सारी साज़िशें नाकाम हो जाएँगी।
आइए! हम अपने रिश्तों को बचाने के लिए इस्लामी अख़लाक़ को अपनाएँ, ताकि हमारे घर सुकून का गहवारा बनें और अल्लाह की रहमतें हम पर नाज़िल होती रहें।
✨ आख़िरी बात (दिल से)
शैतान को सबसे से ज़्यादा खुशी टूटे हुए रिश्तों में मिलती है।
और अल्लाह को सबसे ज़्यादा पसंद जुड़े हुए दिल हैं।
FAQs:
1) क्या वाक़ई शैतान रिश्तों को खराब करता है?
हाँ, क़ुरआन साफ़ बताता है कि शैतान इंसानों के बीच दुश्मनी और नफ़रत पैदा करना चाहता है, खासकर करीबी रिश्तों में।
2) शैतान मियाँ-बीवी के रिश्ते पर ज़्यादा हमला क्यों करता है?
क्योंकि पति-पत्नी का रिश्ता परिवार की नींव होता है। अगर यह टूट जाए तो पूरा घर और औलाद प्रभावित होती है।
3) क्या हर झगड़ा शैतान की वजह से होता है?
हर झगड़ा नहीं, लेकिन जब ग़ुस्सा, शक और ज़िद हावी हो जाए तो समझ लें कि शैतान बीच में आ चुका है।
4) भाई-बहन के रिश्ते क्यों बिगड़ जाते हैं?
अक्सर जलन, गलतफहमी, चुगली और माल या विरासत के झगड़े रिश्तों में दरार डाल देते हैं।
5) औलाद वालिदैन की नाफ़रमानी क्यों करने लगती है?
शैतान नाफ़रमानी को “आजादी” का नाम देकर औलाद को बहकाता है और माता-पिता की बातों को बेकार दिखाता है।
6) रिश्तों को शैतान से कैसे बचाया जा सकता है?
अल्लाह को याद रखना, ग़ुस्से पर काबू पाना, अच्छे गुमान रखना और माफ़ करना रिश्तों को बचाने का सबसे अच्छा तरीका है।
7) क्या दुआ से रिश्ते मज़बूत हो सकते हैं?
बिल्कुल! दुआ से दिलों में सुकून आता है और शैतान के वसवसे कमजोर पड़ जाते हैं।

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