Muharram,Eid Milad ke Naam Par Badhti Shirk,Bidat Aur Khurafat | Kaun hai Zimmedar - islahi Article

आज जब हम अपने समाज पर नज़र डालते हैं तो Muharram,Eid Milad ke Naam Par Badhti Shirk,Bidat Aur Khurafat को देख कर दिल दर्द से भर जाता है। जिस दीन को अल्लाह तआला ने मुकम्मल कर दिया, उसी दीन में आज इंसानों ने अपनी तरफ़ से ऐसी-ऐसी रस्में, जश्न, ख़ुराफ़ात और इबादतें शामिल कर दी हैं जिनका न क़ुरआन में कोई सबूत है और न सही हदीस में।

सबसे दुख की बात यह है कि यह सब नबी ﷺ और अहले-बैत से इश्क़ और ग़म मनाने और दीन-ए-इस्लाम के नाम पर किया जा रहा है।

अगर यही सिलसिला चलता रहा, तो हमारी आने वाली नस्लें शायद इस्लाम और रस्मों के बीच फ़र्क़ ही भूल जाएँगी।और इसका असर आज नज़र भी आ रहा है।अब सवाल उठता है कि कौन है इसका ज़िम्मेदार?

Deen mein Bid'at aur Khurafat ka muqabla Qur'an aur Sunnat se | Muharram aur Eid Milad-un-Nabi ki haqeeqat
Sacha Deen wahi hai jo Nabi ﷺ chhor kar gaye

ये आर्टिकल "Muharram,Eid Milad ke Naam Par Badhti Shirk,Bidat Aur Khurafat" इसलाह के लिए है,किसी को ग़लत साबित करने या तंज़ करने के लिए नहीं है। लिहाजा! गौर से पढ़ें ,दीन को समझें और आने वाली नस्लों को इनसे बचाएं। 

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    क्या नबी ﷺ ने अधूरा दीन छोड़ा था?

    अगर मुहर्रम के जुलूस, ताज़ियादारी, सीना-कोबी, मन्नतें, नज़रें, अलम, सबीलों के साथ धार्मिक रस्में, या ईद मीलादुन्नबी के नाम पर जुलूस, डीजे, आतिशबाज़ी, क़ियाम, नई-नई महफ़िलें और तरह-तरह की रस्में दीन होतीं, तो क्या नबी ﷺ इन्हें अपनी उम्मत को न सिखाते?

    दीन मुकम्मल था, फिर नया दीन किसने बना दिया?

    दीन कब मुकम्मल हुआ?

    अल्लाह तआला ने फ़रमाया:

    आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मुकम्मल कर दिया, तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी और तुम्हारे लिए इस्लाम को दीन के तौर पर पसंद कर लिया।
    (सूरह अल-माइदा : 3)

    जब अल्लाह ने खुद ऐलान कर दिया कि दीन मुकम्मल हो चुका है, तो फिर सवाल पैदा होता है—

    आप खुद से एक सवाल करो को मुकम्मल का मतलब क्या है! आप खुद जवाब दीजिएगा की मुकम्मल यानी अब इसमें कुछ कमी बेसी की जरूरत नहीं। 

    तो आज जो नई-नई दीन के नाम पर रस्में, जुलूस, मातम, सजावट, आतिशबाज़ी और दूसरी ख़ुराफ़ात हो रही हैं, क्या वे दीन का हिस्सा हैं?चूंकि दीन तो मुकम्मल है। 

    अगर ये दीन होतीं तो क्या नबी ﷺ इन्हें अपनी उम्मत को न सिखाते?

    👉 Baap dada ya bade Buzurgon ke Deen ya tareeqe par chalna kaisa hai? Padhen Yahan Quran aur sunnat ki roshani me aur gumrahi se bachen


    क्या सहाबा ने ऐसा किया?

    ज़रा ईमानदारी से सोचिए... नबी ﷺ से सबसे ज़्यादा मोहब्बत किसे थी? सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम को।

    लेकिन क्या उन्होंने कभी—

    • मुहर्रम में ताज़िया निकाला?
    • जुलूस निकाले?
    • सीना-कोबी की?
    • ज़ंजीरों से मातम किया?
    • अलमों की पूजा जैसी रस्में कीं?
    • 12 रबीउल अव्वल को जश्न मनाया?
    • शहरों को सजाया?
    • डीजे, नारे और जुलूस निकाले?

    नहीं। हरगिज़ नहीं।

    उनकी मोहब्बत का तरीका केवल एक था—नबी ﷺ की हर सुन्नत पर अमल करना।


    पहले मुहर्रम कैसे मनाया जाता था? और आज क्या हाल हो गया है?

    मुहर्रम इस्लाम के चार हराम (सम्मानित) महीनों में से एक है। नबी ﷺ ने इस महीने की फ़ज़ीलत बयान की और ख़ास तौर पर 10 मुहर्रम (यौमे आशूरा) का रोज़ा रखा तथा अपनी उम्मत को भी रोज़ा रखने की तरगीब दी। यही वह अमल है जो क़ुरआन और सही हदीस से साबित है।

    लेकिन अगर हम नबी ﷺ की पूरी ज़िंदगी, सहाबा-ए-किराम रज़ी:, ताबेईन और तबा-ताबेईन के दौर का मुताला करें, तो कहीं भी यह साबित नहीं होता कि उन्होंने मुहर्रम के नाम पर मातम किया हो, ताज़ियादारी की हो, जुलूस निकाले हों, अपने शरीर को ज़ख्मी किया हो या ऐसी धार्मिक रस्में निभाई हों जो आज देखने को मिलती हैं।

    अगर ये अमल दीन का हिस्सा होते, तो सबसे पहले नबी ﷺ उन्हें अपनी उम्मत को सिखाते और सहाबा-ए-किराम रज़ी: उन पर अमल करते। लेकिन ऐसा कोई सबूत मौजूद नहीं है। इससे साफ़ होता है कि ये सब बाद की ईजाद (नई धार्मिक रस्में) हैं, जिन्हें धीरे-धीरे दीन का हिस्सा समझ लिया गया।


    अगर शुरुआत में ही रोक दिया गया होता...

    यहीं से हमें एक बहुत बड़ा सबक मिलता है।

    अगर हमारे बड़े-बुज़ुर्ग हर उस नए अमल को, जिसका क़ुरआन और सुन्नत में कोई आधार नहीं था, उसी समय रोक देते और लोगों को समझा देते कि दीन में अपनी तरफ़ से कोई नई इबादत या रस्म जोड़ना जायज़ नहीं है, तो शायद आज हालात इतने नहीं बिगड़ते।

    लेकिन जब पहली बिदअत को यह कहकर नज़रअंदाज़ कर दिया गया कि "इसमें क्या बुराई है?", तब वही छोटी-सी शुरुआत धीरे-धीरे बड़ी ख़ुराफ़ात में बदलती चली गई।

    इसीलिए उलमा कहते हैं:

    "बिदअत कभी बाँझ नहीं होती, बल्कि हर साल एक नई बिदअत और नई ख़ुराफ़ात को जन्म देती है।"

    कुछ साल पहले मुहर्रम का माहौल कैसा था?

    अगर आज से लगभग 15–20 साल पहले का समय देखें, तो मुहर्रम के महीने में बहुत-सी जगहों पर लोग ताज़िए बनाते थे। 10 मुहर्रम को ताज़िया उठाकर जुलूस निकाले जाते थे। कुछ लोग लाठी के करतब दिखाते थे, कुछ सीना पीटते थे और रास्ते में पानी व शर्बत का इंतज़ाम किया जाता था।

    हालाँकि यह सब भी क़ुरआन और सही सुन्नत से साबित नहीं था, लेकिन उस समय आज की तुलना में ख़ुराफ़ात का दायरा सीमित था।

    आज मुहर्रम का क्या हाल हो गया है?

    आज हालात पहले से कहीं ज़्यादा ग़ौर करने वाले हो गए हैं।कितने शर्म और अफ़सोस की बात है कि जिन औरतों को शरीयत ने पर्दे और घर में रहने का हुक्म दिया आज वो बेहयाई और सड़कों की ज़ीनत बनी हैं। Video dekhen👇

    क्या इसी दीन की हिफाज़त के लिए इमाम हुसैन रज़ी: और अहले-बैत ने अपनी जानों की क़ुर्बानी दी थी?

    हरगिज़ नहीं।

    हर आने वाला साल पिछले साल को शर्मिंदा करता है, नई-नई रस्में और नए-नए तरीके लेकर आता है। कहीं बहुत शोर-शराबा है, कहीं ऐसे नुमाइश किए जा रहे हैं जिनका दीन से कोई संबंध नहीं, और कुछ जगहों पर औरतें व लड़कियाँ भी मर्दों के साथ सड़कों पर शामिल होकर ऐसे कामों में भाग लेती दिखाई देती हैं जो इस्लामी हया और शरई उसूलों के ख़िलाफ़ हैं।

    कई जगहों पर ताज़ियों के साथ ऐसे मोजस्समे या तस्वीर बनाएं और सजावट किए जाने लगे हैं, जिन्हें देखकर हर दर्दमंद मुसलमान का दिल दुखता है।

    ऐसे दृश्य देखकर इंसान सोचने पर मजबूर हो जाता है—

    इमाम हुसैन रज़ी: की क़ुर्बानी का मक़सद दीन को क़ायम रखना, सुन्नत की रक्षा करना और हक़ पर डटे रहना था; न कि उनके नाम पर ऐसी रस्में शुरू कर दी जाएँ जिनका दीन में कोई सबूत नहीं।
    इसलिए हर मुसलमान को संजीदगी के साथ गौर व फ़िक्र करना चाहिए। नबी ﷺ और अहले-बैत से सच्ची मोहब्बत का सबूत जुलूसों, नारों और रस्मों में नहीं, बल्कि क़ुरआन और सही सुन्नत की पैरवी में है। हमें दीन को उसी रूप में अपनाना चाहिए जिस रूप में नबी ﷺ अपनी उम्मत के लिए छोड़कर गए थे, क्योंकि उसी में दुनिया और आख़िरत की सफलता है। और हमारी आने वाली नस्लों बर्बाद न हों। 

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    पहले ईद मीलादुन्नबी का क्या तरीका था? और आज क्या हाल हो गया है?

    नबी ﷺ से सबसे ज़्यादा मोहब्बत करने वाले लोग सहाबा-ए-किराम रज़ी: थे। उनके बाद ताबेईन और फिर तबा-ताबेईन आए। यही तीन दौर इस उम्मत के सबसे बेहतरीन दौर माने गए हैं।

    अगर 12 रबीउल अव्वल को ख़ास मज़हबी जश्न मनाना, जुलूस निकालना या इसे दीन का हिस्सा समझना अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की तरफ़ से मुक़र्रर होता, तो सबसे पहले उसी पर सहाबा-ए-किराम अमल करते। लेकिन इतिहास और सही अहादीस या किसी भी रिवायत में इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता कि उन्होंने इस दिन को किसी ख़ास मज़हबी जश्न के रूप में मनाया हो।

    इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें नबी ﷺ से मोहब्बत नहीं थी। बल्कि हक़ीक़त इसके बिल्कुल उलट है।

    उनकी मोहब्बत का सबसे बड़ा सबूत यह था कि वे नबी ﷺ की हर सुन्नत पर अपनी जान, माल और इच्छा तक क़ुर्बान कर देते थे। उनके लिए हर दिन नबी ﷺ की सुन्नत पर चलना ही सबसे बड़ा "मीलाद" था।


    कुछ साल पहले ईद मीलादुन्नबी का माहौल कैसा था?

    अगर आज से लगभग 15–20 साल पहले का समय याद करें, तो कई इलाकों में ईद मीलादुन्नबी के अवसर पर बच्चे, नौजवान और बुज़ुर्ग जुलूस निकालते थे। उस समय भी यह अमल क़ुरआन और सही सुन्नत से साबित नहीं था, और ईद मिलादुन्नबी  को 12 वफ़ात के नाम से जाना जाता था लेकिन आज के दौर का मुवाजना किया जाए तो वो सकून भरा था।

    आम तौर पर लोग नारे लगाते हुए आगे बढ़ जाते थे। न अत्यधिक शोर-शराबा होता था, न डीजे का चलन था और न ही वैसी खुली ख़ुराफ़ात दिखाई देती थी जैसी आज कई जगहों पर देखने को मिलती है।

    आज ईद मीलादुन्नबी का हाल

    आज हालात पहले से कहीं अधिक बदल चुके हैं। हमारे प्यारे नबी ﷺ का नाम लिखा हुआ है और ये बेहयाई वाले काम हो रहे हैं। ये कितनी बड़ी गुस्ताख़ी है, कौन है ज़िम्मेदार? Video dekhen 👇 

    हर साल इस अवसर पर नई-नई रस्में और नए-नए तरीके सामने आ रहे हैं। कई स्थानों पर डीजे, ऊँची आवाज़ में संगीत, नाच-गाना, दिखावा, प्रतियोगिता और तरह-तरह के ऐसे काम किए जाते हैं जिनका नबी ﷺ की सुन्नत से कोई संबंध नहीं है।

    सोचने की बात यह है कि जिस नबी ﷺ ने अपनी उम्मत को सादगी, हया, ज़िक्र, तिलावत, सुन्नत और अल्लाह की इबादत की शिक्षा दी, क्या उनके नाम पर ऐसे काम करना उनकी सच्ची मोहब्बत कहलाएगा?

    नबी ﷺ से सच्चा इश्क़ 

    अगर नबी ﷺ से सच्चा इश्क़ है, तो उसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि हम उनकी सुन्नत को अपनी ज़िंदगी में अपनाएँ, उनकी बताई हुई सीमाओं का सम्मान करें और दीन में अपनी तरफ़ से नई धार्मिक रस्में शामिल न करें। नबी ﷺ जिस दिन पैदा हुवे उस दिन तो वो रोज़ा रखा करते थे लेकिन आज उम्मत क्या कर रही है? गौर कीजियेगा ज़रूर। 

    हमें यह याद रखना चाहिए कि मोहब्बत का दावा तभी सच्चा होता है, जब उसके साथ इताअत (आज्ञापालन) भी हो। इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि वह अपने हर धार्मिक अमल को क़ुरआन और सही सुन्नत की कसौटी पर परखे। अगर कोई काम नबी ﷺ, सहाबा-ए-किराम और शुरुआती तीन बेहतरीन दौर से साबित नहीं है, तो उसे दीन का हिस्सा समझने से बचना चाहिए।

    👉 Qiyamat ke din jab sabhi hamara Saath chhod denge,jinhe hum Duniya me apna sifarasi banayen Hain wo bhi daman chhudayenge us waqt Kya Hoga hamara.jane Yahan Haqeeqat 


    आज हर साल ख़ुराफ़ात क्यों बढ़ रही है?

    आज एक कड़वी हक़ीक़त हमारे सामने है।

    Muharram ke naam par har tarah ke khurafat ho rahe hain
    Muharram me hone wale Deen ke naam par khurafat

    हर आने वाला साल पिछले साल को शर्मिंदा कर रहा है।

    • हर साल नई-नई रस्में जुड़ रही हैं।
    • जो काम पहले नहीं होते थे, आज उन्हें भी दीन का नाम दिया जा रहा है।
    • कहीं डीजे...
    • कहीं आतिशबाज़ी...
    • कहीं धार्मिक नारों के नाम पर गाली-गलौज...
    • कहीं सड़कों पर प्रदर्शन...
    • कहीं ऐसी रस्में जिनका इस्लाम से कोई संबंध नहीं।
    • ताजिया के नाम पर मूर्तियां

    और अफ़सोस!

    यह सब नबी ﷺ और उनके नवासों के नाम पर हो रहा है। 

    और इन सब के ज़िम्मेदार वो बड़े बुज़ुर्ग और दीन के रहबर हैं जिन्हों ने इश्क़ और ग़म मनाने के नाम पर आवाम को सही दीन न बता कर गुमराह किया और ये दिन दिखाया है। अगर शुरूआत में ही रोक देते तो आज ये नौबत नहीं आती। 

    आज भी अगर इन्हें ये खुराफात दिखाया जाता है तो समझने के लिए तैयार नहीं हैं।सीधा बोलते हैं आप जैसों को नबी और उनके नवासों से इश्क नहीं है।


    बिदअत कभी बाँझ नहीं होती

    यह बात हमेशा याद रखिए—बिदअत कभी बाँझ नहीं होती।

    • एक बिदअत दूसरी बिदअत को जन्म देती है।
    • फिर तीसरी...
    • फिर चौथी... फ़िर ये सिलसिला चलता रहता है 

    और देखते ही देखते पूरा दीन रस्मों में बदलने लगता है।

    आज जो बहुत-सी ख़ुराफ़ात दिखाई देती हैं, वे कुछ दशक पहले तक मौजूद ही नहीं थीं।

    अगर आज इन्हें न रोका गया तो आने वाली नस्लें इससे भी आगे निकल जाएँगी।

    अगर शुरुआत में रोक दिया जाता...

    आज जो हालात हैं, वे एक दिन में पैदा नहीं हुए।

    जब पहली बार किसी ने दीन में नई रस्म शुरू की थी, अगर उसी समय उसे क़ुरआन और सुन्नत की रोशनी में रोक दिया जाता, तो शायद आज यह नौबत न आती।

    लेकिन जब ग़लत बात को "छोटी बात" कहकर छोड़ दिया जाता है, तो वही बाद में पूरे समाज का हिस्सा बन जाती है।


    👉 Bidat kaise janam leti hai,kaise iski shuruwat Hoti hai zarur padhen ise taaki gumrahi se bach saken 


    जो रोकता है, उसी को बुरा कहा जाता है

    सबसे ज़्यादा दुख तब होता है जब कोई मुसलमान क़ुरआन और सही हदीस की दलीलों के साथ इन बिदअतों और ख़ुराफ़ात से रोकता है।

    तो उसे कहा जाता है—

    • "यह गुस्ताख़ है।"
    • "इसे अहले-बैत से मोहब्बत नहीं।"
    • "यह नबी ﷺ से इश्क़ नहीं करता।"

    जबकि हक़ीक़त यह है कि सच्ची मोहब्बत सुन्नत की पैरवी में है, न कि बिना दलील नई रस्में बनाने में।


    आखिर ज़िम्मेदार कौन?

    अब सवाल उठता है—

    आख़िर इन हालात का ज़िम्मेदार कौन है?

    क्या वे लोग जो दिन-रात क़ुरआन और सही सुन्नत की तरफ़ बुलाते हैं और बिदअत से रोकते हैं?
    या वे लोग जिन्होंने उन कामों को दीन बना दिया जिसकी नबी ﷺ, सहाबा और सलफ़-ए-सालिहीन से कोई सबूत नहीं मिलता?

    👉 इसके असल ज़िम्मेदार वो बड़े बुज़ुर्ग हैं जिन्होंने इश्क और ग़म मनाने के नाम पर आवाम को ये रास्ता दिखाया और आवाम को शिर्क , बिदअत और गुमराही की तरफ़ ढकेल दिया। 

    क्या ये ज़िम्मेदार नहीं? यह फैसला हर इंसान अपने ज़मीर से करे।

    लेकिन याद रखिए...

    अल्लाह के सामने इसका जवाब भी देना पड़ेगा। अल्लाह की अदालत में किसी का नाम, किसी का सिलसिला, किसी का खानदान या किसी का दावा काम नहीं आएगा।

    हर व्यक्ति से पूछा जाएगा कि उसने दीन में क्या जोड़ा और किस दलील पर जोड़ा।


    नबी ﷺ की साफ़ चेतावनी

    नबी ﷺ ने फ़रमाया:

    "हर नई ईजाद की गई बात बिदअत है और हर बिदअत गुमराही है।"

    जब हर बिदअत गुमराही है, तो दीन में नई मज़हबी रस्में आख़िर दीन कैसे बन सकती हैं?


    अपनी आने वाली नस्लों को बचाइए

    आज भी वक़्त है।

    अपने बच्चों को रस्में नहीं, क़ुरआन और सही सुन्नत सिखाइए।
    उन्हें दलील पर चलना सिखाइए।
    वरना आने वाली नस्लें हर नई रस्म को दीन समझ लेंगी और फिर उन्हें रोकना बहुत मुश्किल होगा। और इसका कुछ असर भी नज़र आ रहा है। आज आप खुद अपनी आंखों से देख रहे हैं दीन के नाम पर क्या क्या हो रहा जो बिल्कुल सुन्नत के खिलाफ है। 

    उस दिन पछतावे के अलावा कुछ हाथ नहीं आएगा।
    👉 Aakhirat ka wo Khaufnak aur dardnak Anjam padhen Jo Duniya me Khud gumrah the aur dusron ko bhi gumrah kiye

    Conclusion:

    आज Muharram,Eid Milad ke Naam Par Badhti Shirk,Bidat Aur Khurafat आप खुद अपनी आंखों से देख रहे हैं। नबी ﷺ से सच्ची मोहब्बत का मतलब यह नहीं कि हम उनके नाम पर ऐसे काम करें जो उन्होंने कभी सिखाए ही नहीं।

    अहले-बैत से मोहब्बत का मतलब यह नहीं कि उनके नाम पर दीन में नई-नई रस्में जोड़ दी जाएँ।
    सच्चा इश्क़ वही है जो सुन्नत की पैरवी में नज़र आए।
    आइए, हम सब मिलकर दीन को उसी रूप में अपनाएँ जिस रूप में नबी ﷺ छोड़कर गए थे।

    🤲 अल्लाह तआला हमें शिर्क, बिदअत और हर तरह की ख़ुराफ़ात से बचाए और क़ुरआन व सुन्नत आख़िरी सांस तक क़ायम रखे और हमें उसी दीन पर ज़िंदा रखे जो नबी ﷺ अपनी उम्मत के लिए छोड़कर गए। आमीन।
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    islami Blogger:Is tarah ke aur islahi aur aakhirat se mutalliq mazameen ke liye hamari website visit karte rahein.”sahih deen dusron tak pahunchayen 

    FAQs:

    Q1. Kya Deen Nabi ﷺ ke zamane mein mukammal ho chuka tha?
    Ans: Ji haan. Allah Ta'ala ne Surah Al-Ma'idah (5:3) mein elan farma diya ke Deen mukammal kar diya gaya. Isliye Deen mein apni taraf se nayi ibadat ya rasmein shamil karna jaiz nahin.

    Q2. Bid'at kise kehte hain?
    Ans: Deen mein aisi nayi baat ya ibadat shamil karna jiska Qur'an, Sahih Sunnat aur Sahaba-e-Kiram se koi saboot na ho, use Bid'at kehte hain.

    Q3. Kya har Bid'at gumrahi hai?
    Ans: Ji haan. Nabi ﷺ ne farmaya: "Har Bid'at gumrahi hai." (Sahih Muslim)

    Q4. Kya Sahaba-e-Kiram ne Muharram ke juloos ya Taziyadari ki thi?
    Ans: Nahin. Sahaba-e-Kiram se Muharram ke juloos, taziyadari ya maatam ka koi sahih saboot nahin milta.

    Q5. Kya Sahaba ne Eid Milad-un-Nabi ka jashn manaya tha?
    Ans: Nahin. Sahaba, Tabi'een aur Taba' Tabi'een se is tarah ke jashn ka koi sahih saboot nahin milta.

    Q6. Muharram mein Sunnat amal kya hai?
    Ans: Muharram ke mahine ki fazilat hai aur khas taur par 9 aur 10 ya 10 aur 11 Muharram ke roze rakhna Sunnat hai.

    Q7. Bid'at se itna khatra kyun hai?
    Ans: Kyunki Bid'at dheere-dheere Sunnat ko mita deti hai aur har saal naye naye khurafat ko janam deti hai. Isi liye ulama ne kaha hai ke Bid'at kabhi baanjh nahin hoti.

    Q8. Kya Nabi ﷺ se mohabbat ka matlab naye jashn manana hai?
    Ans: Nahin. Nabi ﷺ se sachchi mohabbat unki Sunnat ki pairawi aur unke ahkam par amal karne mein hai.

    Q9. Agar koi Bid'at se roke to uska rawayya kaisa hona chahiye?
    Ans: Hikmat, narmi aur Qur'an wa Sunnat ki daleelon ke saath nasihaat karni chahiye, kyunki hidayat Allah Ta'ala ke haath mein hai.

    Q10. Musalman ko Deen kis se lena chahiye?
    Ans: Har Musalman ko apna Deen Qur'an, Sahih Sunnat aur Sahaba-e-Kiram ke fahm ke mutabiq lena chahiye.


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