अक्सर इस्लाम के मुखालिफ़ इस्लाम पर कभी क़ुरआन की कोई आयत या हदीस को लेकर ऐतराज़ करते रहते हैं। उन्हीं में से एक ऐतराज़ यह भी किया जाता है कि इस्लाम में "Aurat ko Kutte Aur Gadhe Se Tulna" किया गया है। इसके लिए कुछ हदीसें पेश की जाती हैं जिनमें नमाज़ के सामने से गुजरने वाली औरत, गधा और काला कुत्ता का ज़िक्र आता है।
अगर कोई व्यक्ति केवल हदीस का एक हिस्सा पढ़े और उसके साथ मौजूद दूसरी रिवायतों को न देखे, तो उसके मन में यह सवाल पैदा होना स्वाभाविक है।
लेकिन इस मामले को समझने के लिए पूरी हदीस, हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा की इस हदीस से मुतल्लिक़ वज़ाहत और नमाज़ के सामने से गुजरने से संबंधित दूसरी सहीह हदीसों को एक साथ देखना ज़रूरी है ताकि ऐतराज़ करने वाला समझ सके कि यह बात औरत की इंसानी हैसियत या सम्मान की तुलना कुत्ते से करने के बारे में नहीं है, बल्कि नमाज़ के एक ख़ास मसले से मुतल्लिक़ है।
✍️ By: Mohib Tahiri | 🕋 Islamic Articles| Aitraz ka Jawab|Aurat ka moqam|Galt fahmi ka jawab|🕰 Updated:18 Jan 2026
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| Aurat ko Kutte Aur Gadhe se tulna |
इस आर्टिकल Aurat ko Kutte Aur Gadhe Se Tulna में हम क़ुरआन और सही हदीस की रोशनी में समझेंगे कि इस हदीस की हक़ीक़त क्या है?
सबसे पहले वह हदीस जिस पर ऐतराज़ किया जाता है
हज़रत अबू ज़र रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया कि:
जब कोई व्यक्ति नमाज़ पढ़ रहा हो और उसके सामने काठी के पिछले हिस्से के बराबर कोई आड़ (सुतरा) न हो, तो उसके सामने से गधा, औरत और काला कुत्ता गुजरे तो नमाज़ प्रभावित होती है।
सहाबी ने पूछा कि काले कुत्ते की क्या खासियत है?
जवाब में आया कि नबी ﷺ ने काले कुत्ते को शैतान बताया। यह रिवायत सहीह मुस्लिम 510a में है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझनी चाहिए:
हदीस में यह नहीं कहा गया कि “औरत कुत्ता है” या “औरत कुत्ते के बराबर है।”हदीस एक खास स्थिति में नमाज़ पर पड़ने वाले असर की बात कर रही है।
हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा की राय क्या थी?
इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण रिवायत खुद उम्मुल-मोमिनीन हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से मिलती है।
सहीह बुखारी में है कि जब उनके सामने यह बात कही गई कि नमाज़ को कुत्ता, गधा और औरत प्रभावित करते हैं, तो उन्होंने कहा:
“क्या तुमने हमें गधों और कुत्तों के समान कर दिया?”
इसके बाद उन्होंने अपनी आँखों देखी हुई बात बयान की कि रसूलुल्लाह ﷺ नमाज़ पढ़ते थे और वह उनके और क़िब्ले के बीच बिस्तर पर लेटी होती थीं। जब उन्हें किसी काम की जरूरत होती तो वह नबी ﷺ को परेशान न करने के लिए उनके पैरों की तरफ से निकल जाती थीं।
यह रिवायत सहीह बुखारी 514 में मौजूद है।
एक दूसरी रिवायत में हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने यही बात और स्पष्ट शब्दों में कही कि लोगों ने औरतों को कुत्तों के साथ जोड़ दिया है, जबकि उन्होंने स्वयं नबी ﷺ को नमाज़ पढ़ते देखा और वह उनके सामने बिस्तर पर मौजूद थीं। सहीह बुखारी 511 में यह रिवायत है।
क्या हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा की बात की अहमियत है?
जी हाँ।
क्योंकि वह नबी ﷺ की ज़ौजा मुबारकर थीं, उनके घर में रहती थीं और नबी ﷺ की नमाज़ को करीब से देखती थीं।
उनका बयान यह बताता है कि केवल “औरत” शब्द देखकर यह नतीजा निकालना सही नहीं कि इस्लाम ने औरत को कुत्ते के बराबर बताया है।
उन्होंने ख़ुद इस समझ पर ऐतराज़ की और नबी ﷺ के अमल को इसके उदाहरण के रूप में पेश किया।
नबी ﷺ की नमाज़ के दौरान हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा कहाँ होती थीं?
सहीह बुखारी की एक दूसरी रिवायत में हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा बताती हैं कि वह नबी ﷺ के सामने इस तरह लेटी होती थीं कि उनके पैर नबी ﷺ की क़िब्ले की दिशा में होते थे।
जब नबी ﷺ सजदा करते तो वह अपने पैर समेट लेतीं और जब नबी ﷺ खड़े होते तो वह उन्हें फिर फैला देतीं।
यह रिवायत सहीह बुखारी 513 में है।
इससे यह बात साफ होती है कि किसी औरत का सामने मौजूद होना अपने आप में इस अर्थ में नहीं है कि वह कोई “कुत्ते जैसी चीज़” है।
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फिर हदीस में औरत, गधा और कुत्ता एक साथ क्यों आए?
इसे समझने के लिए हदीस का पश-ए-मंज़र (background) समझना ज़रूरी है। यह बात उस दौर की है जब लोग अक्सर खुले मैदान या ऐसी जगहों पर नमाज़ पढ़ते थे, जहाँ नमाज़ी के सामने से लोगों या जानवरों के गुज़रने की संभावना रहती थी।
नमाज़ में इंसान को क़िब्ले की तरफ पूरी तवज्जो और एकाग्रता के साथ खड़ा होना चाहिए। इसी वजह से नबी ﷺ ने नमाज़ी के सामने से गुज़रने के बारे में विशेष हिदायतें दीं और सुतरा रखने की तालीम दी, ताकि नमाज़ी और उसके सामने से गुज़रने वाले के बीच एक सीमा बनी रहे।
इसी संदर्भ में कुछ हदीसों में औरत, गधा और काला कुत्ता नमाज़ी के सामने से गुज़रने के मामले में एक साथ बयान हुए हैं। इसका मतलब यह नहीं कि इस्लाम ने औरत को कुत्ते या गधे के बराबर बताया है। बात औरत की इंसानी हैसियत की नहीं, बल्कि नमाज़ के दौरान सामने से गुज़रने के एक विशेष मसले की है।
और इस बात को सबसे अच्छी तरह उम्मुल मोमिनीन हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा की हदीस स्पष्ट करती है, जिसमें उन्होंने ऐसी बात पर एतराज़ किया कि क्या हमें गधों और कुत्तों के समान कर दिया गया? फिर उन्होंने बताया कि नबी ﷺ उनके सामने मौजूद रहते हुए नमाज़ पढ़ते थे।
इसलिए इस हदीस को अकेले पढ़कर निष्कर्ष निकालना सही नहीं है। पूरे संदर्भ और दूसरी संबंधित हदीसों को साथ रखकर ही इसका सही अर्थ समझा जा सकता है।
सुतरा क्या है?
सुतरा वह आड़ या निशान है जिसे नमाज़ी अपने सामने रखता है ताकि उसके और लोगों के गुजरने की जगह के बीच एक सीमा बन जाए।
सहीह मुस्लिम में हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि:
नबी ﷺ से नमाज़ी के सुतरे के बारे में पूछा गया तो आपने उसकी ऊँचाई को काठी के पिछले हिस्से के बराबर बताया।
सहीह मुस्लिम 500a
और हज़रत तल्हा रज़ियल्लाहु अन्हु की रिवायत में नबी ﷺ ने बताया कि:
जब नमाज़ी अपने सामने काठी के पिछले हिस्से के बराबर कोई चीज़ रख ले, तो उसके पीछे से गुजरने वाले व्यक्ति के गुजरने से उसे नुकसान नहीं होगा।
सहीह मुस्लिम 499a
इससे समझ आता है कि मूल विषय नमाज़ की हिफाज़त और नमाज़ी के सामने से गुजरने की सीमा है।
नमाज़ी के सामने से गुजरने के बारे में क्या हुक्म है?
सहीह बुखारी में हज़रत अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु से रिवायत है कि नबी ﷺ ने नमाज़ी को सामने से गुजरने वाले व्यक्ति को रोकने का निर्देश दिया।
सहीह बुखारी 509 में यह घटना भी आती है कि अबू सईद रज़ियल्लाहु अन्हु सुतरे की तरफ नमाज़ पढ़ रहे थे। एक युवक उनके सामने से गुजरना चाहता था तो उन्होंने उसे रोका।
सहीह मुस्लिम 505a में भी नबी ﷺ का निर्देश है कि नमाज़ी अपने सामने से किसी को गुजरने न दे और जहाँ तक संभव हो उसे रोके।
इससे स्पष्ट है कि यहां मुख्य चर्चा “कौन अच्छा है और कौन बुरा” की नहीं, बल्कि नमाज़ी के सामने से गुजरने और नमाज़ की एकाग्रता/हिफाज़त की है।
सामने से गुजरने वाले के लिए भी चेतावनी
सहीह बुखारी 510 में नबी ﷺ ने नमाज़ी के सामने से गुजरने वाले व्यक्ति के लिए कड़ी चेतावनी दी है।
हदीस में आया है कि अगर सामने से गुजरने वाले व्यक्ति को पता हो कि ऐसा करने में कितना बड़ा गुनाह है, तो वह नमाज़ी के सामने से गुजरने की बजाय चालीस तक इंतज़ार करना पसंद करेगा।
रावी को यह निश्चित रूप से याद नहीं था कि नबी ﷺ ने चालीस दिन, महीने या साल कहा था।
इससे यह भी मालूम होता है कि मसला केवल औरत से संबंधित नहीं है।
एक और महत्वपूर्ण हदीस: जानवरों के गुजरने की बात
सहीह मुस्लिम 499b में हज़रत तल्हा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि सहाबा नमाज़ पढ़ते थे और उनके सामने जानवर गुजरते थे।
उन्होंने यह बात नबी ﷺ के सामने रखी तो आपने बताया कि यदि नमाज़ी के सामने काठी के पिछले हिस्से के बराबर सुतरा हो, तो उसके आगे से गुजरने वाले के गुजरने से कोई नुकसान नहीं होगा।
सहीह मुस्लिम 499b
इससे सुतरे की अहमियत और इस पूरे विषय का संदर्भ और स्पष्ट हो जाता है।
क्या हर स्थिति में औरत के गुजरने से नमाज़ टूट जाती है?
यहाँ एक महत्वपूर्ण फिक्ही मतभेद भी है।
एक तरफ अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु की रिवायत सहीह मुस्लिम 511 में मौजूद है जिसमें औरत, गधा और कुत्ता के सामने से गुजरने का उल्लेख है।
दूसरी तरफ हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हु ने इस समझ पर आपत्ति की और नबी ﷺ के अमल का उदाहरण दिया कि वह उनके सामने मौजूद रहती थीं जबकि नबी ﷺ नमाज़ पढ़ रहे होते थे।
इसी वजह से इस विषय की फिक्ही व्याख्या में उलमा के बीच मतभेद पाया जाता है।
इसलिए केवल एक हदीस दिखाकर यह कहना कि “इस्लाम ने औरत को कुत्ते के बराबर बताया है” इस पूरे विषय की सही और पूरी तस्वीर पेश नहीं करता।
अबू दाऊद की रिवायत के बारे में भी एक जरूरी बात
सुनन अबू दाऊद 702 में अबू ज़र रज़ियल्लाहु अन्हु वाली रिवायत आती है, जिसमें गधा, काला कुत्ता और औरत का उल्लेख है तथा काले कुत्ते के बारे में “शैतान” का शब्द आता है। इस रिवायत को अल्बानी ने सहीह कहा है।
लेकिन सुनन अबू दाऊद 704 में इसी विषय की एक दूसरी रिवायत के बारे में स्वयं इमाम अबू दाऊद ने अपने संदेह/इल्म-ए-रिवायत से संबंधित टिप्पणी की है। इसलिए अलग-अलग रिवायतों की सनद और दर्जे को एक जैसा मान लेना सही नहीं होगा।
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“औरत को कुत्ते से compare किया गया” — असल में बात क्या है?
यहाँ दो अलग चीज़ों को अलग रखना बहुत जरूरी है:
पहली बात:
क्या इस्लाम में औरत को इंसानी हैसियत में कुत्ता कहा गया है?
नहीं।
इन हदीसों का विषय औरत की इंसानी कीमत, सम्मान या चरित्र नहीं है।
दूसरी बात:
क्या कुछ हदीसों में नमाज़ी के सामने से गुजरने के संबंध में औरत, गधा और कुत्ता का उल्लेख हुआ है?
हाँ।
यह बात सहीह मुस्लिम और सहीह बुखारी की संबंधित रिवायतों में मौजूद है।
लेकिन इन दोनों बातों को एक ही अर्थ मान लेना सही नहीं है।
हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा का ऐतराज़ हमें क्या सिखाता है?
हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने इस बात को स्वीकार नहीं किया कि औरत को कुत्ते और गधे के साथ इस तरह समझा जाए जैसे उसकी इंसानी हैसियत वही हो।
उन्होंने नबी ﷺ के अपने घर के अमल को प्रमाण के रूप में पेश किया।
यह इस बात की महत्वपूर्ण मिसाल है कि सहाबा हदीसों को समझने के लिए दूसरी हदीसों और नबी ﷺ के अमल को भी देखते थे।
इसलिए किसी एक रिवायत को लेकर पूरा निष्कर्ष निकालने के बजाय सभी संबंधित रिवायतों को एक साथ देखना चाहिए।
क्या इस्लाम औरत का सम्मान करता है?
कुरआन इंसान की इज्जत और सम्मान के बारे में सामान्य सिद्धांत देता है।
अल्लाह तआला फरमाता है:
“और वास्तव में हमने आदम की संतान को सम्मान प्रदान किया।”
— सूरह अल-इसरा 17:70
यह सम्मान केवल पुरुषों के लिए नहीं बल्कि बनी आदम, यानी इंसान के लिए है।
कुरआन में ईमान और नेक अमल के मामले में पुरुष और महिला दोनों के लिए बराबर आध्यात्मिक जिम्मेदारी और पुरस्कार का उल्लेख मिलता है।
सूरह अल-अहज़ाब 33:35 में मुस्लिम पुरुषों और मुस्लिम महिलाओं, मोमिन पुरुषों और मोमिन महिलाओं, इबादत करने वाले पुरुषों और महिलाओं आदि दोनों का उल्लेख करके उनके लिए अल्लाह की मगफिरत और बड़े अज्र का बयान किया गया है।
इसलिए किसी नमाज़ से संबंधित हदीस को लेकर यह निष्कर्ष निकालना कि “इस्लाम में औरत की इंसानी कीमत कुत्ते के बराबर है” कुरआन और पूरी सुन्नत की तस्वीर से मेल नहीं खाता।
एक जरूरी निष्पक्ष बात
इस विषय में यह भी ईमानदारी से स्वीकार करना चाहिए कि संबंधित हदीसों में औरत, गधा और कुत्ता एक साथ उल्लेखित हैं।
इस तथ्य को छिपाना सही तरीका नहीं है।
लेकिन उसी तरह केवल इस हिस्से को दिखाकर यह कहना भी सही नहीं कि नबी ﷺ ने औरत को कुत्ता कहा या औरत की तुलना कुत्ते से की।
क्योंकि:
हदीस का संदर्भ नमाज़ है।
सुतरे का उल्लेख दूसरी सहीह हदीसों में है।
हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने इस समझ पर आपत्ति की।
उन्होंने नबी ﷺ को नमाज़ पढ़ते हुए अपने सामने मौजूद होने का उदाहरण दिया।
इस विषय में सहाबा की अलग-अलग रिवायतें और फिक्ही व्याख्याएँ मौजूद हैं।
Conclusion:
इसलिए सवाल “क्या इस्लाम ने Aurat ko Kutte Aur Gadhe Se Tulna की?” का सही जवाब संदर्भ के साथ देना चाहिए।
सहीह हदीस में नमाज़ के संदर्भ में औरत, गधा और कुत्ता के सामने से गुजरने का उल्लेख जरूर मिलता है।
लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना कि “इस्लाम औरत को कुत्ता समझता है” सही नहीं है।
खुद हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने ऐसी समझ पर आपत्ति की और नबी ﷺ के अमल का उदाहरण दिया कि वह उनके सामने मौजूद होती थीं जबकि आप ﷺ नमाज़ पढ़ रहे होते थे। सहीह बुखारी 511 और 514 इस विषय में बहुत महत्वपूर्ण हैं।
इसलिए किसी भी हदीस को समझने का सही तरीका यह है कि उसका संदर्भ, दूसरी संबंधित हदीसें, सहाबा की वज़ाहत और पूरे दीन की शिक्षाओं को सामने रखकर बात की जाए।
मुख्य हदीस संदर्भ
- सहीह अल-बुखारी 511 — हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा की प्रतिक्रिया।
सहीह अल-बुखारी 513 — नबी ﷺ के नमाज़ पढ़ते समय हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा का सामने मौजूद होना।
सहीह अल-बुखारी 514 — “तुमने हमें गधों और कुत्तों के समान कर दिया?” वाली रिवायत।
सहीह मुस्लिम 510a — औरत, गधा और काला कुत्ता वाली रिवायत।
सहीह मुस्लिम 511 — औरत, गधा और कुत्ता वाली रिवायत।
सहीह मुस्लिम 499a–b — सुतरे से संबंधित रिवायतें।
सहीह मुस्लिम 500a — सुतरे की ऊँचाई।
सहीह मुस्लिम 505a — नमाज़ी के सामने से गुजरने से रोकना।
सहीह अल-बुखारी 509–510 — सामने से गुजरने और उसे रोकने से संबंधित हदीसें।
सुनन अबू दाऊद 702 — अबू ज़र रज़ियल्लाहु अन्हु की रिवायत।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. क्या इस्लाम में औरत को कुत्ते के बराबर बताया गया है?
नहीं। संबंधित हदीस में नमाज़ के सामने से गुजरने के एक विशेष मसले का उल्लेख है। हदीस में यह नहीं कहा गया कि औरत कुत्ता है या उसकी इंसानी हैसियत कुत्ते के बराबर है।
2. वह कौन-सी हदीस है जिसमें औरत, गधा और कुत्ता का ज़िक्र आता है?
हज़रत अबू ज़र रज़ियल्लाहु अन्हु की रिवायत में नमाज़ी के सामने से औरत, गधा और काले कुत्ते के गुजरने का उल्लेख मिलता है। यह रिवायत सहीह मुस्लिम 510a में मौजूद है।
3. क्या हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने इस हदीस पर आपत्ति की थी?
जी हाँ। सहीह बुखारी 514 में हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा की प्रतिक्रिया मिलती है। उन्होंने पूछा कि क्या उन्हें गधे और कुत्ते के समान कर दिया गया है और बताया कि नबी ﷺ नमाज़ पढ़ते थे जबकि वह आपके सामने मौजूद रहती थीं।
4. क्या हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा नबी ﷺ के सामने नमाज़ के दौरान लेटी रहती थीं?
जी हाँ। सहीह बुखारी 513 में हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि वह नबी ﷺ के सामने लेटी रहती थीं और जब आप ﷺ सजदा करते तो वह अपने पैर समेट लेती थीं।
5. इस हदीस में “सुतरा” का क्या महत्व है?
सुतरा वह आड़ या निशान है जिसे नमाज़ी अपने सामने रखता है। सहीह मुस्लिम 499a और 500a में सुतरे से संबंधित हदीसें मौजूद हैं। इससे नमाज़ी और सामने से गुजरने वाले व्यक्ति के बीच एक सीमा निर्धारित होती है।
6. क्या नमाज़ी के सामने से गुजरना मना है?
जी हाँ। कई सहीह हदीसों में नमाज़ी के सामने से गुजरने से रोकने का निर्देश आया है। सहीह बुखारी 509–510 और सहीह मुस्लिम 505a में इससे संबंधित रिवायतें मौजूद हैं।
7. क्या हर स्थिति में औरत के गुजरने से नमाज़ टूट जाती है?
इस विषय में उलमा के बीच फिक्ही मतभेद पाया जाता है। एक तरफ अबू ज़र रज़ियल्लाहु अन्हु और अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु की रिवायतें हैं, जबकि दूसरी तरफ हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा की रिवायत है। इसलिए इस मसले को केवल एक हदीस के आधार पर समझना उचित नहीं है।
8. क्या “औरत, गधा और कुत्ता” का एक साथ उल्लेख करना औरत का अपमान है?
हदीस के शब्दों को संदर्भ से अलग करके ऐसा निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। यह हदीस नमाज़ी के सामने से गुजरने के एक विशेष फिक्ही मसले से संबंधित है, न कि औरत की इंसानी कीमत या सम्मान के बारे में।
9. क्या इस्लाम औरत की इज्जत और सम्मान को मानता है?
जी हाँ। कुरआन कहता है कि अल्लाह ने बनी आदम को सम्मान दिया है (सूरह अल-इसरा 17:70)। इसी तरह सूरह अल-अहज़ाब 33:35 में पुरुषों और महिलाओं दोनों के ईमान और नेक अमल का उल्लेख किया गया है।
10. क्या केवल इस हदीस को दिखाकर यह कहना सही है कि इस्लाम औरत को कुत्ता समझता है?
नहीं। इस निष्कर्ष के लिए हदीस के संदर्भ और दूसरी संबंधित रिवायतों को भी देखना आवश्यक है। हज़रत आयशा رضي الله عنها की रिवायत इस विषय की समझ में विशेष महत्व रखती है।
11. इस विषय की सबसे महत्वपूर्ण हदीसें कौन-सी हैं?
इस विषय में सहीह बुखारी 511, 513 और 514 तथा सहीह मुस्लिम 499a–b, 500a, 505a, 510a और 511 महत्वपूर्ण रिवायतें हैं। सुनन अबू दाऊद 702 में भी संबंधित रिवायत मौजूद है।
12. इस हदीस को समझने का सही तरीका क्या है?
किसी एक हदीस को अलग करके निष्कर्ष निकालने के बजाय उसकी पूरी रिवायत, दूसरी संबंधित हदीसें, नबी ﷺ का अमल, सहाबा की वज़ाहत और फिक्ही व्याख्याओं को एक साथ देखना चाहिए। यही तरीका इस विषय को सही संदर्भ में समझने में मदद करता है।

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