नमाज़ के कुछ मसाइल ऐसे हैं जिनमें मुसलमानों के बीच लंबे समय से अलग-अलग अमल देखने को मिलते हैं। रफ़अुल यदैन भी उन्हीं मसाइल में से एक है।रफ़अुल यदैन अक्सर बहस का मौज़ू रहा है। रफ़अुल यदैन करने की सही बुख़ारी और सही मुस्लिम के साथ साथ और भी कई सारी अहादीस में ज़िक्र है। फिर भी ऐतराज़ किया जात है कि Raf ul Yadain Se Namaz Ka Sukoon Khatam Hota Hai
कुछ लोग कहते हैं कि रुकू से पहले और रुकू से उठते समय हाथ उठाना नमाज़ के सुकून के खिलाफ है और इसके बारे में “घोड़ों की दुम की तरह हाथ हिलाने” वाली हदीस भी पेश करते है।
क्या वाकई ऐसा है और क्या सहीह हदीस में रफ़अुल यदैन से मना किया गया है?
✍️ By: Mohib Tahiri | 🕋 Islamic Articles| Namaz e Nabvi|Rafa ul Yadain|Ghodon ki Dum wali Hadees| Masnoon namaz 🕰 Updated: 9 Oct 2026
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| Raf ul Yadain aur ghodon ki dum wali hadith ki sahih tashreeh |
इस आर्टिकल "Raf ul Yadain Se Namaz Ka Sukoon Khatam Hota Hai" में सहीह अहादीस को सामने रखकर इन्हीं सवालों का जवाब तलाश करेंगे और घोड़ों की दुम वाली हदीस का भी जाइज़ह लेंगे ताकि हक़ीक़त सामने आये की रफ़अुल यदैन सुन्नत है या नमाज़ का सकून ख़त्म करने वाला अमल है।
रफ़अुल यदैन क्या है?
रफ़अुल यदैन का अर्थ है:
नमाज़ में दोनों हाथों को उठाना।
सहीह अहादीस में नबी ﷺ से कई स्थानों पर हाथ उठाना साबित है, विशेष रूप से:
नमाज़ शुरू करते समय।
रुकू में जाने से पहले।
रुकू से उठते समय।
दो रकअत पूरी करके तीसरी रकअत के लिए खड़े होते समय।
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हा से सहीह बुखारी में वर्णित है कि नबी ﷺ नमाज़ शुरू करते समय दोनों हाथ कंधों तक उठाते थे, रुकू के लिए तकबीर कहते समय भी ऐसा करते थे और रुकू से सिर उठाते समय भी हाथ उठाते थे।
क्या रफ़अुल यदैन से नमाज़ का सुकून खत्म होता है?
नहीं।
सिर्फ हाथों को उस तरीके से उठाना जिस तरह नबी ﷺ से सहीह हदीस में साबित है, नमाज़ के सुकून को खत्म करने वाला काम नहीं कहा जा सकता।
नमाज़ में सुकून का मतलब यह नहीं है कि इंसान बिल्कुल कोई हरकत ही न करे। नमाज़ में ऐसी हरकतें जो नबी ﷺ की सुन्नत से साबित हैं, वे नमाज़ का हिस्सा हैं।
मसलन:
- तकबीर कहते समय हाथ उठाना
- रुकू में जाना
- रुकू से उठना
- सजदा करना
- दो सजदों के बीच बैठना
- तीसरी रकअत के लिए खड़ा होना
ये सभी नमाज़ की निर्धारित हरकतें हैं।
इसलिए रफ़अुल यदैन को केवल हाथ उठाने की वजह से “बे-सुकूनी” कहना सही नहीं है।
“घोड़ों की दुम की तरह हाथ हिलाने” वाली हदीस किस बारे में है?
आइए पहले वो हदीस देखते हैं जो इस पूरे आर्टिकल का सबसे अहम टॉपिक है और जिसे आधार बनाकर रफ़अुल यदैन करने को मना किया जाता है कि इससे नमाज़ का सकून ख़त्म हो जाता है।
नबी ﷺ ने फ़रमाया कि:
तुम्हें क्या हुआ है कि अपने हाथों से यूं इशारह करते हो जैसे सरकश घोड़ों की दुम हो? नमाज़ में सकून अपनाओ।
👉 लेकिन अफ़सोस की बात है कि रफ़अुल यदैन के मुन्किर कभी पूरी हदीस पेश नहीं करते हैं। पूरी हदीस ये है।
सहीह मुस्लिम में जाबिर बिन समुरा रज़ियल्लाहु अन्हा से हदीस है कि सहाबा जब नबी ﷺ के साथ नमाज़ पढ़ते और सलाम फेरते समय अपने हाथों से दाएं बाएं इशारा करते थे, तो नबी ﷺ ने उन्हें ऐसा करने से रोका।
नबी ﷺ ने पूछा:
“मुझे क्या है कि मैं तुम्हें अपने हाथ उठाते हुए देखता हूँ, जैसे वे उद्दंड घोड़ों की दुमें हों? नमाज़ में सुकून अपनाओ।” (सहीह मुस्लिम:968 , सुनन अबू दाउद:998)
सहीह मुस्लिम की इस हदीस से साफ़ पता चलता है कि बात सलाम के समय हाथों से इशारा करने और नमाज़ में सुकून रखने के बारे में है।
इसलिए ध्यान रखें:
यह हदीस रुकू से पहले या रुकू से उठते समय किए जाने वाले रफ़अुल यदैन को मना नहीं करती।
बल्कि इसका ताल्लुक़ सलाम के समय हाथों से इशारा करना है।
“घोड़ों की दुम” वाली हदीस का सही मतलब
इस हदीस को समझने के लिए उसका पूरा संदर्भ देखना जरूरी है। सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम सलाम के समय हाथों से संकेत करते थे। नबी ﷺ ने इस प्रकार के हाथ हिलाने को पसंद नहीं किया और उन्हें नमाज़ में सुकून अपनाने का आदेश दिया।
इसलिए “घोड़ों की दुम” का उदाहरण उस बार-बार या इधर-उधर हाथ हिलाने वाले इशारे के लिए आया है। इसे रुकू से पहले या रुकू से उठते समय नबी ﷺ के बताए हुए रफ़अुल यदैन पर लागू करना सही नहीं है।सहीह मुस्लिम में एक दूसरी हदीस नहीं मौजूद है जिसमें नबी ﷺ के रुकू से पहले और रुकू से उठते समय हाथ उठाने का स्पष्ट वर्णन मिलता है।
नबी ﷺ से रफ़अुल यदैन की सहीह दलील
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि उन्होंने नबी ﷺ को देखा:
- जब आप नमाज़ शुरू करते तो हाथ उठाते।
- जब रुकू के लिए तकबीर कहते तो हाथ उठाते।
- जब रुकू से सिर उठाते तो हाथ उठाते।
- सजदे में जाते समय ऐसा नहीं करते थे।
यह हदीस सहीह बुखारी 735 और 736 में मौजूद है।
इससे यह बात बिल्कुल स्पष्ट होती है कि रुकू से पहले और रुकू से उठते समय रफ़अुल यदैन नबी ﷺ से सहीह सनद के साथ साबित है।
तीसरी रकअत के लिए उठते समय भी रफ़अुल यदैन
एक और महत्वपूर्ण दलील सहीह बुखारी में मिलती है।
नाफ़े बयान करते हैं कि अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हा जब दो रकअत पूरी करके तीसरी रकअत के लिए खड़े होते तो हाथ उठाते थे और वे कहते थे कि नबी ﷺ भी ऐसा करते थे।
इसलिए रफ़अुल यदैन को केवल नमाज़ की शुरुआत तक सीमित करना भी सहीह अहादीस की पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।
नमाज़ में सुकून का क्या मतलब है?
नमाज़ में सुकून का मतलब है कि नमाज़ी जल्दबाज़ी न करे और हर रुक्न को ठीक तरीके से अदा करे।
रुकू में जाए तो ठीक से रुकू करे।
रुकू से उठे तो सीधे खड़ा हो।
सजदा करे तो इत्मीनान से सजदा करे।
सिर्फ जल्दी-जल्दी हरकतें करना और हर रुक्न को अधूरा छोड़ देना नमाज़ की खूबसूरती और खशू के खिलाफ है।
लेकिन नबी ﷺ की साबित सुन्नत के अनुसार हाथ उठाना सुकून के खिलाफ नहीं है।
रफ़अुल यदैन और “घोड़ों की दुम” वाली हदीस में फर्क
इसे एक आसान उदाहरण से समझें:
रफ़अुल यदैन
रुकू से पहले या रुकू से उठते समय नबी ﷺ की सुन्नत के अनुसार दोनों हाथ उठाना।
घोड़ों की दुम वाली हदीस
सलाम के समय हाथों से इधर-उधर संकेत करना और उन्हें हिलाना।
दोनों चीजों को एक समझना सही नहीं है।
एक अमल नबी ﷺ से सहीह हदीस में साबित है, जबकि दूसरी हरकत से नबी ﷺ ने रोका।
यही इस मसले की असल बात है।
क्या रफ़अुल यदैन करना अनिवार्य है?
रफ़अुल यदैन को नमाज़ की शर्त या फ़र्ज़ समझना सही नहीं है।
यह नमाज़ के फ़र्ज़ अरकान में से नहीं है।
लेकिन नबी ﷺ से इसका अमल सहीह अहादीस में साबित है, इसलिए जो व्यक्ति इसे सुन्नत समझकर करता है, उसके पास मजबूत हदीसी दलील मौजूद है।और सुन्नत पर अमल वही करते हैं जिन्हें नबी ﷺ से मुहब्बत है।
इसलिए इस मसले को नमाज़ सही या गलत होने का झगड़ा बना देना उचित नहीं। लेकिन जो नहीं करते हैं वो ख़ुद सोचें कि वो किनकी पैरवी कर रहे हैं, नबी ﷺ की या अपने ईमाम की।
सबसे महत्वपूर्ण बात: हदीस को उसके संदर्भ में समझें
इस विषय से हमें एक बहुत बड़ा उसूल सीखने को मिलता है:
किसी हदीस का फैसला केवल उसके एक वाक्य को देखकर नहीं करना चाहिए।
उसका:
- संदर्भ क्या है?
- किस घटना के बारे में है?
- सहाबी ने क्या देखा?
- नबी ﷺ ने किस चीज से रोका?
- दूसरी सहीह अहादीस उस विषय में क्या बताती हैं?
इन सभी बातों को देखना जरूरी है।
“घोड़ों की दुम” वाली हदीस का संदर्भ सलाम के समय हाथों से इशारा करना है, जबकि रुकू से पहले और रुकू से उठते समय रफ़अुल यदैन की स्पष्ट दलील सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम में मौजूद है।
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Conclusion:
रफ़अुल यदैन को “घोड़ों की दुम की तरह हाथ हिलाना” समझना सही नहीं है। रुकू से पहले और रुकू से उठते समय दोनों हाथ उठाना नबी ﷺ की सहीह सुन्नत से साबित है, इसलिए इसे नमाज़ के सुकून के खिलाफ कहना उचित नहीं।
वहीं “घोड़ों की दुम” वाली हदीस का संबंध तशह्हुद में बैठकर सलाम फेरते समय हाथों से इशारा करने से है। नबी ﷺ ने उस तरह हाथों को इधर-उधर हिलाने से मना किया और नमाज़ में सुकून अपनाने की हिदायत दी।
इसलिए दोनों अमलों को एक-दूसरे से मिलाना सही नहीं है। रफ़अुल यदैन एक साबित सुन्नत है, जबकि सलाम के समय हाथों से इशारा करना वह अमल है जिससे नबी ﷺ ने रोका।
हमें चाहिए कि किसी भी हदीस को केवल एक वाक्य देखकर नहीं, बल्कि उसके पूरा संदर्भ और दूसरी सहीह अहादीस के साथ समझें। मतभेद के ऐसे मसाइल में एक-दूसरे की नमाज़ को गलत ठहराने के बजाय कुरआन और सहीह सुन्नत की दलील को समझना और आपस में अदब बनाए रखना ही बेहतर रास्ता है।
🤲 अल्लाह तआला हमें अपने प्यारे नबी मुहम्मद ﷺ की सही सुन्नत को समझने, उस पर अमल करने और दूसरों तक सही तरीके से पहुँचाने की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन।
FAQs
1. रफ़अुल यदैन क्या है?
रफ़अुल यदैन का अर्थ नमाज़ में दोनों हाथों को उठाना है। नबी ﷺ से नमाज़ शुरू करते समय, रुकू से पहले और रुकू से उठते समय हाथ उठाना सहीह अहादीस में साबित है।
2. क्या रफ़अुल यदैन करने से नमाज़ का सुकून खत्म होता है?
नहीं। नबी ﷺ से साबित निर्धारित तरीके से हाथ उठाना नमाज़ के सुकून के खिलाफ नहीं है।
3. घोड़ों की दुम वाली हदीस किस बारे में है?
यह हदीस सलाम के समय हाथों से इधर-उधर संकेत करने के बारे में है। सहीह मुस्लिम में इसका संदर्भ स्पष्ट है।
4. क्या रफ़अुल यदैन सहीह हदीस से साबित है?
जी हाँ। अब्दुल्लाह बिन उमर की हदीस सहीह बुखारी में मौजूद है और सहीह मुस्लिम में भी रफ़अुल यदैन का वर्णन आया है।
5. क्या रफ़अुल यदैन नमाज़ का फ़र्ज़ है?
नहीं। इसे नमाज़ का फ़र्ज़ कहना सही नहीं। यह नबी ﷺ से साबित एक सुन्नत अमल है।
6. क्या रफ़अुल यदैन करने वाले की नमाज़ गलत है?
नहीं। इसके लिए सहीह हदीसी दलील मौजूद है। इस मसले को मुसलमानों के बीच झगड़े का कारण नहीं बनाना चाहिए।
7. क्या हाथ उठाते समय शरीर को भी हिलाना चाहिए?
नहीं। रफ़अुल यदैन का मतलब केवल निर्धारित तरीके से हाथ उठाना है, शरीर को झटकना या हाथों को बार-बार हिलाना नहीं।

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