नमाज़ इस्लाम की सबसे महत्वपूर्ण इबादतों में से है। नमाज़ का तरीका हमें अपनी राय, अंदाज़े या किसी कहानी से नहीं, बल्कि रसूलुल्लाह ﷺ की सुन्नत से सीखना चाहिए।
नमाज़ से जुड़े कुछ मसाइल ऐसे हैं जिनमें मुसलमानों के बीच पुराने समय से फिक़्ही मतभेद पाए जाते हैं। उन्हीं में से एक मसअला रफ़अुल-यदैन का है—यानी Rukoo Me Jate Aur Uthte Waqt Rafa Al Yadein करना यानी दोनों हाथ उठाना।
Rukoo Me Jate Aur Uthte Waqt Rafa Al Yadein नबी ﷺ से सहीह अहादीस में साबित है। यह बात विशेष रूप से सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम की रिवायतों से स्पष्ट होती है।
लेकिन कभी-कभी रफ़अुल-यदैन के बारे में यह बात भी बयान की जाती है:
“पहले लोग अपनी बगल में छोटे-छोटे बुत लेकर नमाज़ में आते थे और उन बुतों को गिराने के लिए रफ़अुल-यदैन कराया गया।”
लेकिन सवाल यह है:
क्या यह बात कुरआन या किसी सहीह हदीस से साबित है?
✍️ By: Mohib Tahiri | 🕋 Islamic Articles| Rafa ul Yadein|Namaz e Nabvi|Nabi ﷺ ki Sunnat| Sunnat ki Pairwi 🕰 Updated:8 Oct 2026
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| Rukoo se Pahle aur baad me haath uthana Sunnat hai |
आइए, “Rukoo Me Jate Aur Uthte Waqt Rafa Al Yadein” के इस लेख में सहीह अहादीस की रोशनी में इस मसले को समझते हैं।
रफ़अुल-यदैन क्या है?
रफ़अुल-यदैन का अर्थ है:
दोनों हाथ उठाना।
नमाज़ में नबी ﷺ से अलग-अलग मौकों पर हाथ उठाना सहीह रिवायतों से साबित है। इनमें प्रमुख स्थान हैं:
नमाज़ शुरू करते समय।
रुकू में जाने से पहले।
रुकू से उठते समय।
दो रकअत के बाद तीसरी रकअत के लिए उठते समय—इसकी भी सहीह रिवायतें मौजूद हैं।
हमारे इस लेख का ख़ास टॉपिक रुकू में जाने और रुकू से उठने के समय रफ़अुल-यदैन है।
सहीह बुखारी से रफ़अुल-यदैन की दलील
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है:
“रसूलुल्लाह ﷺ जब नमाज़ शुरू करते तो अपने दोनों हाथ कंधों के बराबर उठाते। और जब रुकू के लिए तकबीर कहते तो दोनों हाथ उठाते और जब रुकू से अपना सिर उठाते तो भी दोनों हाथ उठाते।”
दलील नंबर 1:
सहीह अल-बुखारी, हदीस 735यह हदीस बहुत स्पष्ट है। इसमें तीन मौकों का बयान है:
① नमाज़ शुरू करते समय
② रुकू में जाने से पहले
③ रुकू से उठते समय
इसलिए रुकू में जाने और रुकू से उठने के समय रफ़अुल-यदैन करना नबी ﷺ की सहीह सुन्नत से साबित है।
सहीह मुस्लिम में भी रफ़अुल-यदैन की दलील
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु की यही रिवायत सहीह मुस्लिम में भी मौजूद है।
इसमें भी रसूलुल्लाह ﷺ के नमाज़ शुरू करने, रुकू में जाने और रुकू से उठने के समय हाथ उठाने का वर्णन मिलता है।
दलील नंबर 2:
सहीह मुस्लिम, हदीस 390इससे यह बात और मजबूत हो जाती है कि रफ़अुल-यदैन कोई बाद की बनाई हुई प्रथा नहीं, बल्कि नबी ﷺ के अमल से साबित है।
रफ़अुल-यदैन केवल एक सहाबी की रिवायत नहीं
यह भी समझना जरूरी है कि रफ़अुल-यदैन के बारे में केवल हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर से ही रिवायत नहीं मिलती।
हज़रत मालिक बिन हुवैरिस रज़ियल्लाहु अन्हु से भी नबी ﷺ की नमाज़ का तरीका और हाथ उठाने का वर्णन मिलता है।
दलील नंबर 3:
सहीह अल-बुखारी, हदीस 737इससे पता चलता है कि नबी ﷺ की नमाज़ का यह तरीका एक से अधिक सहाबा ने देखा और आगे बयान किया।
👉 Padhen Yahan be namazi ka Khaufnak Anjam se Mutalliq
रफ़अुल-यदैन के बारे में कुरआन का क्या उसूल है?
कुरआन हमें यह सिद्धांत देता है कि जब किसी मामले में अल्लाह और उसके रसूल ﷺ का फैसला मौजूद हो तो मुसलमान को उसे स्वीकार करना चाहिए।
अल्लाह तआला फरमाता है:
“ऐ ईमान वालों! अल्लाह की आज्ञा मानो और रसूल की आज्ञा मानो...”
दलील नंबर 4:
सूरह अन-निसा 4:59
इसलिए नमाज़ जैसी इबादत में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम देखें:
रसूलुल्लाह ﷺ ने कैसे नमाज़ पढ़ी?
न कि यह देखें कि किसी अमल के बारे में लोगों ने बाद में क्या-क्या कहानियां बयान कीं या किसी इमाम ने क्या कहा है।
“बगल में बुत” वाली कहानी क्या सहीह हदीस से साबित है?
रफ़अुल-यदैन के बारे में कभी-कभी यह कहानी सुनाई जाती है कि:
“मुशरिक लोग अपनी बगल में छोटे-छोटे बुत दबाकर नमाज़ में आते थे और रफ़अुल-यदैन इसलिए कराया गया ताकि उनके बुत गिर जाएं।”
यह बात सहीह बुखारी ,सहीह मुस्लिम या किसी भी हदीस की उस रिवायत में मौजूद नहीं है जिसमें रफ़अुल-यदैन का अमल बयान हुआ है।
इसलिए इसे नबी ﷺ की बताई हुई वजह के रूप में पेश करना सही नहीं है, जब तक इसके लिए कोई प्रमाणित सनद और विश्वसनीय हदीसी स्रोत प्रस्तुत न किया जाए।
यह कहानी तर्क की नज़रिये से भी कमजोर है
मान लीजिए कोई व्यक्ति इस कहानी को सही मानना चाहता है, तब भी कई सवाल पैदा होते हैं।
👉पहला सवाल
अगर रफ़अुल-यदैन का उद्देश्य केवल बगल में छिपाए गए बुतों को गिराना था, तो नमाज़ शुरू करते समय भी हाथ उठाने की जरूरत क्यों थी?
क्योंकि रफ़अुल-यदैन केवल रुकू से पहले और बाद में ही नहीं, बल्कि तकबीर-ए-तहरीमा के समय भी सहीह हदीस से साबित है और पहली तकबीर में ही बुत गिर जाते।
गौर कीजिए!
मान लिया जाए की तकबीर ए तहरीमा में बुत नही गिरता इस लिए रफा उल यादैन शुरू किया गया।
लेकिन यहां सोचने वाली बात है कि अगर पहली तकबीर में बुत नहीं गिरा तो रुकु में तो बिलकुल गिर जाना चाहिए क्योंकि रुकु में दोनों हाथ घुटनों पर रखने और पीठ भी सीधा रखने का हुक्म है।
इस लिए ये बुत वाली कहानी बिल्कुल बनावटी है इसी से समझ में आ रहा है।
👉दूसरा सवाल
अगर बुत गिराना ही उद्देश्य था तो इस बात की कोई सहीह हदीस क्यों नहीं मिलती कि नबी ﷺ ने सहाबा से ऐसा कारण बताया?
👉तीसरा सवाल
रफ़अुल-यदैन नबी ﷺ की नमाज़ की एक नियमित विशेषता के रूप में सहीह हदीसों में वर्णित है। लेकिन इन हदीसों में कहीं यह नहीं कहा गया कि इसका उद्देश्य किसी के छिपे हुए बुत को गिराना था।
इसलिए हदीस में जो बात है उसे स्वीकार करना चाहिए और जो कारण हदीस में नहीं है उसे नबी ﷺ की तरफ मंसूब नहीं करना चाहिए।
क्या रफ़अुल-यदैन न करने से नमाज़ नहीं होती है?
नहीं।
रफ़अुल-यदैन का मसला नमाज़ की शर्त या ऐसी चीज नहीं है कि इसे छोड़ देने से नमाज़ अपने आप बातिल हो जाए।
यह फिक़्ही मतभेद का मसला है।
कुछ विद्वानों ने रुकू से पहले और बाद में रफ़अुल-यदैन को सुन्नत माना है, जबकि कुछ फुकहा ने कुछ मौकों पर हाथ न उठाने का मत अपनाया है।
इसलिए किसी व्यक्ति के रफ़अुल-यदैन न करने मात्र से उसकी नमाज़ को बातिल कहना उचित नहीं।
लेकिन दूसरी तरफ यह कहना भी सही नहीं कि:
“रफ़अुल-यदैन नबी ﷺ से साबित ही नहीं।”
क्योंकि सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम में इसके प्रमाण मौजूद हैं कि रफ़अुल-यदैन सुन्नत है।
और सुन्नत पर अमल नबी ﷺ से मुहब्बत का इज़हार है।अब आप खुद सोचें कि आप को अपने नबी ﷺ से मुहब्बत है या अपने इमाम से। आप खुद फैसला करें।
रफ़अुल-यदैन न करने वालों की दलील
रफा उल यदेन न करने की एक और दलील
👉 ज़रा यहाँ भी गौर कीजिए
अब यहाँ एक गौर करने वाली और सोचने पर मजबूर करने वाली बात है।
कहा जा रहा है कि इमाम बुखारी के उस्ताद केवल तकबीर-ए-तहरीमा के समय रफ़अुल यदैन का ज़िक्र किया और उसके बाद रुकू से पहले और रुकू से उठते समय का जिक्र नहीं किया।
ठीक है, किसी बड़े इमाम या बुज़ुर्ग का अमल अपनी जगह सम्मान के योग्य है। लेकिन यहाँ एक सवाल पैदा होता है:
क्या किसी एक बुज़ुर्ग का किसी अमल को न करना इस बात की दलील बन सकता है कि वह अमल नबी ﷺ से साबित ही नहीं?
अगर हम यह मान भी लें कि रफ़अुल यदैन करना सही नहीं था, तो फिर कुछ बुनियादी सवाल हमारे सामने खड़े होते हैं।
- इमाम बुखारी खुद रफ़अुल यदैन क्यों करते थे और अपनी सहीह में रफ़अुल यदैन की सहीह अहादीस क्यों लाए?
- इमाम मुस्लिम ने भी इसकी हदीस अपनी सहीह में क्यों दर्ज की?
- और बड़े-बड़े मुहद्दिसीन ने अपनी किताबों में रफ़अुल यदैन की रिवायतें क्यों जमा कीं?
- और अगर रफ़अुल यदैन बिल्कुल मना था, तो शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी ने भी इसे नमाज़ की मसनून अतों में क्यों शामिल किया?
इसलिए किसी एक बुज़ुर्ग या इमाम के अमल को देखकर पूरी सुन्नत का इंकार करना सही नहीं। असल दलील यह है कि रसूलुल्लाह ﷺ से रफ़अुल यदैन का अमल सहीह अहादीस से साबित है।
इसीलिए बात सीधी है:
रफ़अुल यदैन किसी इमाम की बनाई हुई चीज़ नहीं, बल्कि नबी ﷺ से साबित सुन्नत है। इसलिए जो व्यक्ति इसे सहीह हदीस की पैरवी में करता है, वह सुन्नत पर अमल करने की नीयत से करता है।
असल मुद्दा किसी इमाम का नाम नहीं, नबी ﷺ की सुन्नत है
हमें यह समझना चाहिए कि दीन किसी व्यक्ति के अमल के नाम पर साबित नहीं होता।
- न इमाम बुखारी की वजह से रफ़अुल यदैन सुन्नत है,
- न इमाम मुस्लिम की वजह से,
- न किसी फ़क़ीह की वजह से,
- और न किसी बुज़ुर्ग की वजह से।
अगर रफ़अुल यदैन सुन्नत है, तो इसलिए कि रसूलुल्लाह ﷺ से इसकी सहीह रिवायतें साबित हैं।
रफ़अुल-यदैन करना या न करना—मुसलमान आपस में न लड़ें
रफ़अुल-यदैन के मसले को मुसलमानों के आपसी इत्तेहाद और भाईचारे में दरार डालने का ज़रिया नहीं बनाना चाहिए।
नमाज़ में रफ़अुल-यदैन करना या न करना एक फ़िक़्ही मसला है, जिसमें उलमा के बीच इख़्तिलाफ़ पाया जाता है। इसलिए इस मसले पर बहस करते हुए अदब, तहम्मुल और एक-दूसरे के लिए एहतराम का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
1. जो रफ़अुल-यदैन करता है, उसे करने दें
जो मुसलमान नमाज़ में रफ़अुल-यदैन करता है, वह सहीह हदीसों में इसकी दलील मौजूद होने की वजह से इसे नबी करीम ﷺ की सुन्नत समझकर करता है।
ऐसे व्यक्ति को अपनी समझ और दलील के मुताबिक़ इस अमल पर चलने का हक़ है। उसे इस वजह से बुरा-भला कहना, उसकी नमाज़ पर तंज़ करना या उसे ग़लत ठहराकर आपसी नफ़रत फैलाना उचित नहीं है।
2. जो रफ़अुल-यदैन नहीं करता, उसकी नमाज़ का क्या हुक्म है?
जो मुसलमान किसी मान्य फ़िक़्ही मत की पैरवी करते हुए रफ़अुल-यदैन नहीं करता, उसके बारे में भी अदब और इंसाफ़ से काम लेना चाहिए।
केवल रफ़अुल-यदैन न करने की वजह से उसकी नमाज़ को बातिल या नाजायज़ क़रार देना सही नहीं है। रफ़अुल-यदैन नमाज़ के उन मसलों में से है जिनमें फ़ुक़हा के बीच इख़्तिलाफ़ पाया जाता है।
3. लेकिन एक अहम सवाल पर ग़ौर ज़रूर करें!
जब रफ़अुल-यदैन करने के बारे में सहीह हदीसें मौजूद हैं और बहुत-से उलमा इसे नबी करीम ﷺ की सुन्नत मानते हैं, तो इस अमल को समझने, इसकी दलीलों पर ग़ौर करने और सुन्नत पर अमल करने की कोशिश क्यों न की जाए?
आख़िर हमारा मक़सद क्या होना चाहिए—अपनी राय को हर हाल में सही साबित करना या अल्लाह के रसूल ﷺ की पैरवी करने की कोशिश करना?
याद रखिए! नमाज़ का मक़सद केवल कुछ ज़ाहिरी अमल अदा करना नहीं, बल्कि अल्लाह तआला की इबादत करना, उसकी रज़ा हासिल करना और उसके रसूल ﷺ की पैरवी करना है।
Conclusion:
Rukoo Me Jate Aur Uthte Waqt Rafa ul Yadain रसूलुल्लाह ﷺ की सहीह सुन्नत से साबित है।
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर की रिवायत में साफ तौर पर आता है कि नबी ﷺ:
① नमाज़ शुरू करते समय हाथ उठाते थे।
② रुकू में जाने से पहले हाथ उठाते थे।
③ रुकू से उठते समय हाथ उठाते थे।
सहीह बुखारी: 735
सहीह मुस्लिम: 390
इसलिए रफ़अुल-यदैन करने के लिए किसी कमजोर कहानी या मनगढ़ंत कारण की जरूरत नहीं।
हम रफ़अुल-यदैन इसलिए करते हैं क्योंकि यह रसूलुल्लाह ﷺ से सहीह हदीस में साबित है।
और जो व्यक्ति इस मसले में दूसरे फिक़्ही मत पर अमल करता है, उसकी नमाज़ को केवल इस वजह से बातिल कहना भी सही नहीं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि:
सुन्नत को सुन्नत की दलील से साबित करें, और ऐसी बात को नबी ﷺ की तरफ न जोड़ें जो उनसे प्रमाणित नहीं।
🤲 अल्लाह तआला हमें अपने नबी ﷺ की सहीह सुन्नत को समझने, उस पर अमल करने और मुसलमानों के बीच अदब और भाईचारा बनाए रखने की तौफीक दे। आमीन।
(FAQs):अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. रफ़अुल-यदैन क्या है?
रफ़अुल-यदैन का मतलब नमाज़ में दोनों हाथ उठाना है। रुकू में जाने से पहले और रुकू से उठते समय हाथ उठाना नबी ﷺ की सहीह हदीसों से साबित है।
2. क्या रुकू में जाते समय रफ़अुल-यदैन करना सहीह हदीस से साबित है?
जी हाँ। अब्दुल्लाह बिन उमर رضي الله عنهما की रिवायत सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम में मौजूद है, जिसमें नबी ﷺ के रुकू में जाने से पहले हाथ उठाने का वर्णन है।
3. क्या रुकू से उठते समय भी रफ़अुल-यदैन करना चाहिए?
जी हाँ। सहीह हदीस में है कि नबी ﷺ रुकू से उठते समय भी दोनों हाथ उठाते और “सَمِعَ اللهُ لِمَنْ حَمِدَهُ” कहते थे।
4. रफ़अुल-यदैन करते समय हाथ कितने ऊँचे उठाने चाहिए?
सहीह हदीसों में कंधों के बराबर हाथ उठाने का वर्णन मिलता है और दूसरी सहीह रिवायत में कानों के बराबर उठाने का वर्णन है। इसलिए दोनों तरीकों की गुंजाइश है।
5. क्या सजदे में जाते और सजदे से उठते समय भी रफ़अुल-यदैन करना चाहिए?
नहीं। इब्न उमर رضي الله عنهما की सहीह रिवायत के अनुसार नबी ﷺ रुकू में जाने और रुकू से उठने के समय हाथ उठाते थे, लेकिन सजदे में जाते और सजदे से उठते समय ऐसा नहीं करते थे।
6. क्या रफ़अुल-यदैन नमाज़ का फ़र्ज़ है?
नहीं। रफ़अुल-यदैन नमाज़ का फ़र्ज़ या शर्त नहीं है। यह नबी ﷺ से साबित सुन्नत है। इसलिए इसे न करने मात्र से नमाज़ को बातिल कहना सही नहीं।
7. क्या “बगल में बुत लेकर आने” की वजह से रफ़अुल-यदैन शुरू किया गया था?
नहीं। यह बात किसी प्रमाणित सहीह हदीस से साबित नहीं है। रफ़अुल-यदैन नबी ﷺ से सहीह हदीसों द्वारा साबित है, लेकिन बगल में बुत गिराने को इसकी वजह बताने का विश्वसनीय प्रमाण नहीं मिलता।
8. कुछ मुसलमान रफ़अुल-यदैन क्यों नहीं करते?
यह एक पुराना फिक्ही मतभेद है। कुछ फुकहा ने रुकू से पहले और बाद में हाथ उठाने को सुन्नत माना, जबकि कुछ फिक्ही मसलकों में इसे न करने का मत मशहूर है। इसलिए इस वजह से एक-दूसरे की नमाज़ को गलत ठहराना उचित नहीं।
9. रफ़अुल-यदैन करने की सबसे मजबूत दलील क्या है?
इसकी सबसे स्पष्ट दलीलों में अब्दुल्लाह बिन उमर رضي الله عنهما की रिवायत है, जो सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम में है। इसमें नबी ﷺ के नमाज़ शुरू करते समय, रुकू में जाने से पहले और रुकू से उठते समय दोनों हाथ उठाने का वर्णन है।

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