Mazaar Par Chadar Aur Qabar Parasti | Quran O Hadith Ki Roshni Mein

ग़ौर करने की बात है की हमारी दुआओं को अल्लाह के सिवा कोई क़ुबूल करने वाला नहीं, बस अल्लाह ही हमारा माबूद है, फिर कुछ नाशुक्रे लोग अल्लाह को भूल कर उनके बनाए हुए इंसानो से फ़रियाद करते हैं और उनसे भी जो के क़ब्र के अंदर है अपनी हाजत बयान करते हैं।

हमारे मुआशरे में एक बहुत ही बड़ी शिर्क देखने को मिलती है जो एक ख़ास तबक़े के अंदर कुछ ज़्यादा ही है और वो है .. Mazaar par chadar Aur Qabar parasti.मज़ार पे कसरत के साथ जाना, वहां रौशनी करना, वहां सजदे करना और फिर मज़ार वालों से मन्नतें मांगना, उनसे अपने हाजतें बयान करना और उनके सामने झोली फैला कर माँगना जैसा के वो ही अल्लाह हों,फिर ,मन्नत पूरी हो जाने के बाद उनकी क़ब्र पे चादर चढ़ाना, वहाँ उन मज़ार वालों की तारीफ़ में कौवालियों की महफ़िल लगाना और उसमे शिर्किया कलाम पढ़ना वग़ैरह वग़ैरह !

Islam Mein Mazaar Par Chadar Aur Qabar Parasti Ki Haqiqat
Mazaar Par Chadar Chadhana Jaiz Ya Najaiz?

आज के दौर में बहुत से लोग का मजारों पर चादर चढ़ाना, फूल चढ़ाना और वहां जाकर दुआ मांगना एक आम रिवाज बन गया है। बहुत से लोग इसे इबादत समझते हैं, जबकि कुछ लोग इसे बिदअत और शिर्क के करीब अमल बताते हैं।

इसलिए जरूरी है कि हम जानें कि इस्लाम में मजार पर चादर चढ़ाना और क़ब्र परस्ती का क्या हुक्म है और इसके बारे में कुरआन, हदीस और उलमा की क्या राय है।
📖 

Islam Mein Qabar Ka Maqsad Kya Hai?

इस्लाम में क़ब्र का मकसद यह है कि इंसान मौत को याद करे और आख़िरत की तैयारी करे।
नबी ﷺ ने फरमाया:
“मैंने तुम्हें पहले क़ब्रों की ज़ियारत से रोका था, अब तुम उनकी ज़ियारत किया करो क्योंकि यह तुम्हें आख़िरत की याद दिलाती है।”
📚 (सहीह मुस्लिम)
इस हदीस से मालूम होता है कि क़ब्र की ज़ियारत सिर्फ नसीहत और दुआ के लिए है, न कि वहां कोई खास रस्में करने के लिए।

Mazaar Par Chadar Chadhana Kya Jaiz Hai?

कुरआन और हदीस में मजार पर चादर चढ़ाने का कोई सबूत नहीं मिलता। यह काम न तो नबी ﷺ ने किया और न ही सहाबा (रज़ि.) ने किया।
कुरआन में अल्लाह तआला फरमाता है:

“और मस्जिदें अल्लाह के लिए हैं, इसलिए अल्लाह के साथ किसी और को मत पुकारो।”
📖 (सूरह जिन्न 72:18)
इस आयत से पता चलता है कि इबादत और दुआ सिर्फ अल्लाह से ही करनी चाहिए।
👉 Deen me Ghuloo Karna yani kisi ko uske martabe me Hadd se badha Dena kaisa hai zarur padhen ise 

Qabar Parasti Kya Hai?

जब कोई इंसान क़ब्र वालों से मदद मांगता है, उनसे दुआ करता है या उन्हें अल्लाह की तरह पुकारता है, तो इसे क़ब्र परस्ती कहा जाता है।

यह अमल इस्लाम में बहुत बड़ा गुनाह माना गया है क्योंकि दुआ और मदद मांगना सिर्फ अल्लाह का हक़ है।

नबी ﷺ ने फरमाया:
“अल्लाह यहूद और नसारा पर लानत करे, जिन्होंने अपने नबियों की क़ब्रों को सज्दा गाह बना लिया।”
📚 (सहीह बुखारी, सहीह मुस्लिम)

Dhayan dijiye:

जब आप उन लोगों से सवाल करें के क्यों आप क़ब्र वालों से, मज़ार वालों से मांगते हो तो ये कहते हैं के हम उनसे नहीं मांगते,हम तो उनको वसीला बनाते हैं के वो (क़ब्र वाले ) अल्लाह के नज़दीकी हैं इसलिए वो हमारी बात उन तक पहुंचाएंगे तो अल्लाह हमारी दुआ कुबूल करेगा।


Allah kya farmata hai isse Mutalliq:

अल्लाह तआला ने फरमाया कि
इबादत सिर्फ उसी के लिए है, लेकिन कुछ लोग अल्लाह के सिवा औलिया बनाकर कहते हैं कि हम उनकी इबादत इसलिए करते हैं ताकि वे हमें अल्लाह के करीब कर दें। जबकि हकीकत यह है कि दुआ और मदद सिर्फ अल्लाह ही से मांगी जानी चाहिए।
📖 सूरह ज़ुमर (39:3)
अल्लाह ही बेकरार की दुआ कबूल करता है और वही तकलीफ दूर करता है।
📖 सूरह अन-नम्ल (27:62)
क़ब्रों में दफन लोग न किसी को नफा पहुंचा सकते हैं और न नुकसान, इसलिए उनसे मदद मांगना या उनसे उम्मीद लगाना सही नहीं है। मुसलमानों को चाहिए कि सिर्फ अल्लाह ही को पुकारें और उसी पर भरोसा रखें, क्योंकि उसके सिवा कोई इबादत के लायक नहीं।
📖 सूरह यूनुस (10:105-106)
मरने के बाद सबका मामला अल्लाह के सुपुर्द होता है, वो हमे नहीं सुन सकते. उन तक जब हमारी आवाज़ ही नहीं पहुंच सकती तो फिर वो हमारी दुआओं के सिफारिशी कैसे बन जायेंगे.

नबी ﷺ के फरमान

नबी ﷺ ने क़ब्रों को इबादत की जगह बनाने से सख्ती से मना किया है। 
आपने फरमाया कि मेरी उम्मत के बदतरीन लोग वे होंगे जो क़ब्रों की इबादत करेंगे।
📚 (सहीह इब्ने खुज़ैमा 789, इब्ने हिब्बान 6808, मुसनद अहमद)
एक और हदीस में नबी ﷺ ने फरमाया:
“अल्लाह यहूद और नसारा पर लानत करे, जिन्होंने अपने नबियों की क़ब्रों को सजदागाह बना लिया।”
📚 (सहीह बुखारी 435–436)

इसी तरह आपने उम्मत को ताकीद करते हुए फरमाया कि तुम क़ब्रों को इबादतगाह मत बनाना, क्योंकि पहले लोगों ने यही गलती की थी।

नबी ﷺ कि अपनी क़ब्र से मुतल्लिक़ दुआ:
ऐ अल्लाह! मेरी क़ब्र को इबादत की जगह न बना देना।”
📚 (मुवत्ता इमाम मालिक)

इन अहादीस से मालूम होता है कि क़ब्रों की इबादत करना या उन्हें सजदागाह बनाना इस्लाम में सख्त मना है।

नबी ﷺ की क़ब्र को क्यों घेरा गया?

नबी ﷺ की क़ब्र को इसलिए घेरा गया था क्योंकि उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा (रज़ि.) और सहाबा को डर था कि कहीं लोग क़ब्र को सजदागाह न बना लें। नबी ﷺ ने भी अपनी बीमारी के दौरान फरमाया:
“अल्लाह यहूद और नसारा पर लानत करे, जिन्होंने अपने नबियों की क़ब्रों को सजदागाह बना लिया।”
📚
(सहीह अल्बुखरी:1390, मुसनद अहमद :3341)
इसी डर की वजह से आपकी क़ब्र को खुला नहीं छोड़ा गया ताकि लोग वहां कोई गलत अमल न करने लगें।
लेकिन आज अगर कोई अल्लाह का नेक बन्दा वफ़ात पाता है तो कुछ लोग उनकी क़ब्रों को पक्का बना देते हैं फिर उसे मज़ार की शकल दे देते हैं.ये सीधा नबी ﷺ की मुखालिफत है। 


रसूलुल्लाह ﷺ ने अपने सामने सजदा करने से मना किया 

हज़रत मआज़ (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने एक बार रसूलुल्लाह ﷺ के सामने सजदा किया तो रसूलुल्लाह ﷺ ने अपने सामने सजदा करने से मना किया और फरमाया की अगर सजदा करने का हुक्म देता तो मैं औरतो को अपने शौहर के सामने सजदा करने का हुक्म देता।
(इब्ने मजा :- 1853)
👉 ज़रा सोचने की बात है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने अपने सामने सजदा करने से मना किया और आज के पीर और बाबा अपने सामने सजदा करवाते हैं। और कुछ मुस्लिम कम इल्मी की वजह से ऐसा करते भी हैं। जो कि शिर्क है।

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं
"ऐे मेरी उम्मत के लोगों, खबरदार हो जाओ के तुमसे पहले जो लोग गुज़रे हैं उन्होंने अपने औलिया और अम्बिया की कब्रों को अपना इबादतगाह बन लेते थे, खबरदार..तुम कबरों को इबादतगाह मत बनाना, मैं तुम्हे ऐसा करने से मना करता हूँ"(मुस्लिम 1188)

Ulama Ki Rai (उलमा की राय)

Imam Ibn Taymiyyah (रह.)

उन्होंने कहा कि क़ब्रों को सजाना, उन पर चादर डालना और वहां इबादत करना शरीअत में साबित नहीं है।

Imam Nawawi (रह.)

उन्होंने लिखा कि क़ब्रों को सजाना या उन्हें इबादत की जगह बनाना नापसंद और मना किया गया है।

Sheikh Ibn Baz (रह.)

उनका कहना था कि मजारों पर चादर चढ़ाना और उनसे मदद मांगना बिदअत है और इससे बचना चाहिए।


Qabar Ki Ziyarat Ka Sahi Tareeqa

इस्लाम में क़ब्र की ज़ियारत का सही तरीका यह है:

  • 👉 क़ब्रिस्तान जाकर मृतकों के लिए दुआ करना
  • 👉 मौत और आख़िरत को याद करना
  • 👉 वहां कोई नई रस्म या इबादत शुरू न करना

नबी ﷺ यह दुआ पढ़ते थे:

“अस्सलामु अलैकुम अहलद्दियार मिनल मोमिनीन वल मुस्लिमीन।”
📚 (सहीह मुस्लिम)

Mazaar Par Chadar Chadhane Ki Haqeeqat

असल में मज़ार या क़ब्र पर चादर चढ़ाना इस्लाम की इबादत का हिस्सा नहीं है। यह अमल न तो नबी ﷺ से साबित है और न ही सहाबा (रज़ि.) से। बाद के ज़माने में लोगों ने इसे एक रस्म बना लिया, जबकि दीन में इबादत वही मानी जाती है जो कुरआन और सुन्नत से साबित हो

कुछ लोग एक हदीस को मज़ार पर चादर चढ़ाने की दलील के तौर पर पेश करते हैं। वे कहते हैं कि हज़रत इब्ने अब्बास (रज़ि.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ की क़ब्र मुबारक पर सुर्ख रंग की चादर डाली गई थी। लेकिन जब असली हदीस पर गौर किया जाए तो बात कुछ और ही सामने आती है। सही रिवायत में यह बयान है कि रसूलुल्लाह ﷺ की क़ब्र के अंदर सुर्ख रंग की मखमली चादर रखी गई थी।
📚 (सुनन निसाई: 2011, जामे तिर्मिज़ी: 1048)

यानी हदीस में क़ब्र के ऊपर चादर चढ़ाने का नहीं, बल्कि क़ब्र के अंदर रखने का ज़िक्र है। लेकिन कुछ लोगों ने इस बात को बदल कर इसे क़ब्रों और मज़ारों पर चादर चढ़ाने की दलील बना लिया, जबकि हदीस का असली मतलब इससे बिल्कुल अलग है।

इसलिए मुसलमानों के लिए जरूरी है कि वे कुरआन और सही सुन्नत के मुताबिक ही अमल करें और उन रस्मों से बचें जो दीन में साबित नहीं हैं, क्योंकि गलत अक़ीदा और बिदअत इंसान के अच्छे अमाल को भी बर्बाद कर सकती है।



जो लोग कब्रो पर उर्स / मेला, कव्वाली व महफिले सिमाअ, ढोल व सारंगी वगैरह मुनकरात कायम करते है उनके इस अमल की दलील कुरआन और सुन्नत में मौजूद नहीं है। ये गैर-मुस्लिम कौम से मुसलमानो में रिवाज पकड़ा हुआ अमल है, दीन-ए-इस्लाम में इसकी कोई हकीकत नहीं हैं बल्कि ये सभी अमल बिदअत में शुमार है।

Conclusion:

इस्लाम हमें सिखाता है कि इबादत सिर्फ अल्लाह के लिए होनी चाहिए। क़ब्र की ज़ियारत सिर्फ नसीहत और दुआ के लिए है, न कि वहां चादर चढ़ाने या मदद मांगने के लिए।
इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि वह कुरआन और हदीस की रोशनी में सही रास्ता अपनाए और बिदअत से बचे।अब इतनी सारी दलीलों के बाद भी कोई न माने तो फिर उसका मामला अल्लाह के सुपुर्द है।

बस आप सभी से दरख़्वास्त है के जहाँ तक हो सके ऐसे शिर्किया कामों से ख़ुद को बचाएँ और सिर्फ़ अल्लाह ही से मदद मांगे
🤲 अल्लाह हम सबको क़ुरआने करीम और सुन्नते नबवी ﷺ पे अमल करने 
और हमे हिदायत के साथ सहीह और सीधी राह पर चलने की तौफीक अता फरमाए !

🤲 अल्लाह हम सबको शिर्क जैसे अज़ीम गुनाह से बचाये आमीन

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ˡᶦᵏᵉ    ᶜᵒᵐᵐᵉⁿᵗ    ˢᵃᵛᵉ      ˢʰᵃʳᵉ



Frequently Asked Questions


Ques: 1-मजार या दरगाह पर जाना कैसा है ?

Ans: मजार या दरगाह पर जाने की कोई शरई दलील नही है हां नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है की कब्रों की ज़यारत किया करो ताकि तुम्हे अपनी आखिरत और मौत की याद आए ! हां रोज़ा ए रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ज़यारत की शरई दलील है!

Ques: 2-मजार पर दुआ मांगना !

Ans: जब मजार पर जाने की कोई दलील नही है तो दुआ का सवाल ही नहीं होता! हां कब्रों पर जा कर कब्र वालों के लिए दुआए मगफिरत करने की इजाज़त है !

Ques: 3-वसीला क्या है या वसीले से दुआ मांगना ?

Ans: वसीला का मतलब है अल्लाह सुबहा़न व तआ़ला का कु़रबत तलाश करना यानी नेक अमाल या ईबादत के ज़रिए अल्लाह तक पहुंचाना ताकी अल्लाह की रहमत का साया नसीब हो.लेकिन अफसोस ! इंसान अपनी हाजत पूरी करने के लिए ऐसी चीजों को वसीला बना लेते हैं जो अल्लाह के नजदीक नापसंदिद है जैसे किसी पीर,औलिया या बुजुर्ग को अपना वसीला बनाना!

Ques: 4- जायज़ वसीला क्या है ?

Ans: जायज़ वसीलेे तीन तरह के हैं !

1: जैसा कि अल्लाह सुबहा़न व तआ़ला ने क़ुरआन के सूरत अलअ़राफ़ में फ़रमाता है की अल्लाह के बहुत अच्छे अच्छे नाम हैं, उस से उन नामों के जा़रिया से दुआ करो !
2: अपने नेक अ़माल का वासीला पेश किया जाए जैसे हदीस सहीह बुखारी और सूरत आल ईमरान में बयान हूवा है!
3: किसी जि़न्दा नेक बुजुर्ग से दुआ करवाना जो सहीह बुखारी में मौजूद है !

Ques:4-शिर्क क्या है ? क्या शिर्क की माआ़फ़ी है ?

Ans:अल्लाह सुबहा़न व तआ़ला के जा़त, सिफ़ात, ईबादत वा दुआ में किसी को शामिल करना शिर्क कहलाता है! अगर कोई गुनाहगार है और उसे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम शफ़आ़त या अल्लाह की रहमत मिल गई तो अल्लाह तआ़ला उसका हर गुनाह बख़्श देगा मआ़फ़ करदेगा लेकिन अगर कोई शिर्क करने वाला बगैर तौबह के मर गया तो सीधा जहन्नम उसकी कोई माआ़फ़ी नहीं है !

Ques: 5-क्या मजार पर हाजरी से मुश्किल का हल होता है?

Ans:मजार पर हाजरी से बेशक मुश्किल हल होगी लेकिन वो शिर्क हो जायेगा क्योंकि देने वाली अल्लाह की जात़ है लेकिन मांगने वाले की ज़हन में यह बात होती है की इस मजा़र के वसीले से मेरी परेशानी दूर हुई है.

Que : 6- रसूलुल्लाह (ﷺ) के इंतेक़ाल के बाद आप (ﷺ) की कब्रे-मुबारक घर में किस वजह से बनाई गयी?

Ans: इब्ने-जूरैज रह. से मरवी है, वो कहते है की मुझे मेरे वालिद ने यह हदीस सुनाई की जब रसूलुल्लाह (ﷺ) का इंतेक़ाल हो गया तब , नबी (ﷺ) के सहाबा को कुछ समझ नहीं आ रहा था की वो नबी (ﷺ) को कहा दफ़न करे, यहाँ तक के सैयदना अबु बकर सिद्दीक रजि. ने कहा, मेने रसूलुल्लाह (ﷺ) को यु फरमाते हुए सुना था के "हर नबी की कब्र वही बनाई जाती जहा इनका इंतेक़ाल होता है" , चुनाँचे आप (ﷺ) के बिस्तर को हटा कर इसी के नीचे वाली जगह को कब्र के लिए खोदा गया" (मुस्नद अहमद:27)
यही वजह थी की रसूलुल्लाह (ﷺ) की कब्र-मुबारक आप (ﷺ) के घर में ही बनाई गयी ।

Que: क्या सहाबा ने नबी (ﷺ) कब्र मुबारक को पक्का (पुख्ता) बनाया और कब्रे-मुबारक पर इमारत तामीर की?

Ans : सहाबा किराम रजि. ने नबी (ﷺ) की कब्र को पुख्ता नहीं बनाया और न ही इसपर इमारत तामीर की गयी क्योंकि :-

"हजरत जाबिर रजि. से रिवायत है की रसूलुल्लाह (ﷺ) ने पुख्ता कब्रे बनाने और और उनपर बैठने और इमारत तामीर करने से मना फ़र्माया है"
( Sahih Muslim 2245 (970)

इस हदीस को मद्देनजर रखते हुए सहाबा ने आप (ﷺ) की कब्र को न तो पक्का बनाया न ही उस पर इमारत बनाई बल्कि जो इमारत पहले से बनी थी यानी नबी (ﷺ) का घर, उसी के अंदर आपको दफनाया गया। सहाबा किराम ने दफनाने के बाद कब्र पर "एक्स्ट्रा" अपनी तरफ से कोई तामीरात की हो इसका कोई सबूत सहीह हदीस से नहीं मिलता हैं।

Que: पैगम्बर, औलिया अल्लाह या अन्य किसी भी शख्स की कब्र के सामने सर झुका कर खड़े होना या नमाज की तरह हाथ बांधे खड़े रहना,सज्दा करना या उनका तवाफ़ करना इस्लामी-शरीयत के मुताबिक़ कैसा अमल है?

Ans : पैगम्बर, औलिया अल्लाह या अन्य किसी भी शख्स की कब्र के सामने सर झुका कर खड़े होना या नमाज की तरह हाथ बांधे खड़े रहना,सज्दा करना या उनका तवाफ़ करना इस्लामी-शरीयत के मुताबिक़ सरासर नाजायज और हराम है।
इसकी दलील इस तरह से हैं:

जुन्दुब रजि. से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (ﷺ)ने फ़र्माया -
".........तुम से पहले के लोग अपने अम्बिया और स्वालेहीन (नेक लोग) की कब्रो को मस्जिद सज्दागाहें) बना लिया करते थे, कब्रो को मस्जिद मत बनाना,में तुम को इससे मना करता हुँ"
 Sahih Muslim 1188 (532)

Que: क्या हर वो कब्र जो शरीयत के खिलाफ ऊंची और पक्की हैं, उसे गिराना लाज़िमी हैं?

Ans : इस सवाल का जवाब यह हदीस बेहतर दे रही है :-

हजरत अली रजि. ने हजरत अबुल हय्याज असदी रजि. से फरमाया कि तुम्हें उसी काम पर मै भेजता हूँ जिस काम पर अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने मुझे भेजा था वह यह कि "किसी बडी ऊंची कब्र को बराबर किये बगैर न छोडो , न किसी मूरत को बगैर मिटाये रहने दो ”
( Sahih Muslim 2243 (969)


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