आज के दौर में दरगाहों की ज़ियारत को इस्लाम का अहम हिस्सा समझ लिया गया है। इनकी ज़ियारत करना अक्सर मुसलमानों की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। Dargaahon ki Ziyarat Karna Kaisa Hai? इसकी शरई हैसियत क्या है आज हम इसी से मुतल्लिक़ कुछ बातें क़ुरआन और हदीस की रोशनी में रखेंगे आप के सामने। लोग दूर-दराज़ से सफ़र करके औलिया की दरगाहों पर जाते हैं, चादर चढ़ाते हैं, मन्नतें मांगते हैं और अपनी दुनिया व आख़िरत की कामयाबी को उनसे जोड़ देते हैं।
लेकिन सवाल यह है ❓
क्या इस्लाम में दरगाहों की ज़ियारत जायज़ है?
क़ब्र की ज़ियारत और दरगाह की ज़ियारत में क्या अंतर है?
क्या सवाब की नीयत से दरगाह के लिए सफ़र करना सही है?
आइए, क़ुरआन और सहीह हदीसों की रोशनी में इस अहम मसले को इस आर्टिकल Dargaahon ki Ziyarat Karna Kaisa Hai? में समझते हैं।
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Islam me qabr ki ziyarat sirf ibrat aur mayyat ke liye dua ke liye hoti hai. |
क़ब्रिस्तान और क़ब्रों की ज़ियारत का इस्लामी हुक्म
इस्लाम में क़ब्रिस्तान जाकर:- मौत को याद करना
- आख़िरत से इबरत हासिल करना
- और मय्यत के लिए दुआ करना
रसूलुल्लाह ﷺ ने पहले क़ब्रिस्तान जाने से मना किया था, फिर बाद में इसकी इजाज़त दे दी।
📖 हदीस की रोशनी में दलील
हज़रत अबू हुरैरा رضي الله عنه बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ अपनी माँ की क़ब्र पर गए, ख़ुद रोए और आपके साथ सहाबा भी रो पड़े। फिर आपने फ़रमाया:मैंने अपने रब से अपनी माँ की मग़फ़िरत के लिए इजाज़त माँगी, लेकिन इजाज़त नहीं दी गई।📚 (सहीह मुस्लिम, अबू दाऊद, नसई, इब्न माजा)
और मैंने उनकी क़ब्र की ज़ियारत की इजाज़त माँगी तो इजाज़त दे दी गई।
इसलिए तुम भी क़ब्रों की ज़ियारत किया करो, क्योंकि यह मौत की याद दिलाती है।”
🔹 इस हदीस से साफ़ पता चलता है कि:क़ब्र की ज़ियारत इबरत और मौत की याद के लिए है
मरे हुए से कुछ मांगना जायज़ नहीं
- दुआ सिर्फ़ अल्लाह से की जाती है
आज की कड़वी हक़ीक़त
आज उम्मत:- क़ब्रों से मदद मांग रही है
- औलिया के सहारे जन्नत की उम्मीद लगाए बैठी है
- और शिर्क को “अक़ीदत” का नाम दे रही है
मरे हुए:
✅ बल्कि उन्हें ख़ुद ज़िंदों की दुआ की ज़रूरत होती है
क़ब्र और दरगाह में अंतर
🛑 1️⃣ दरगाह क्या बन चुकी है?दरगाह असल में एक क़ब्र ही होती है, लेकिन आज:
- उसे इबादतगाह बना दिया गया है
- सज्दा, रुकू, मन्नत, चढ़ावा
- शिर्क और ख़ुराफ़ात का अड्डा
🛑 2️⃣ असर का अंतर
- क़ब्र: मौत और आख़िरत की याद दिलाती है
- दरगाह: दुनिया, मेले, ढोल-नगाड़े, बाज़ार
🛑 3️⃣ क़ब्रों पर निर्माण से मनाही
हज़रत जाबिर رضي الله عنه से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“क़ब्रों को पक्का बनाने, उन पर निर्माण करने और उन पर बैठने से मना किया गया है।”
📚 (सुनन नसई, जामे तिर्मिज़ी – सहीह)
✈️ दरगाहों की ज़ियारत के लिए सफ़र करना कैसा है?
इस्लाम में सिर्फ़ तीन जगहों के लिए सफ़र करने की इजाज़त है:🕋 मस्जिदे हराम (मक्का)
🕌 मस्जिदे नवबी (मदीना)
🕍 मस्जिदे अक़्सा (फ़िलिस्तीन)
📖 रसूलुल्लाह ﷺ की हदीस
“सफ़र सिर्फ़ तीन मस्जिदों के लिए किया जाए:
मस्जिदे हराम, मस्जिदे नवबी और मस्जिदे अक़्सा।”
📚 (बुख़ारी 1189, मुस्लिम 1397)
इस हदीस से निकलने वाले नतीजे
1️⃣ जब इन तीन मस्जिदों के अलावा किसी चौथी मस्जिद की ज़ियारत के लिए भी सफ़र करने की अनुमति इस्लाम में नहीं दी गई है, तो फिर किसी औलिया की दरगाह की ज़ियारत के लिए सवाब की नीयत से सफ़र करना कैसे जायज़ हो सकता है?
यहाँ तक कि कोई मुसलमान केवल खास तौर पर नबी ﷺ की क़ब्र-ए-मुबारक की ज़ियारत के लिए भी मदीना का सफ़र नहीं कर सकता।
हाँ, यदि कोई व्यक्ति मस्जिद-ए-नबवी की ज़ियारत के लिए मदीना जाता है, तो साथ में नबी ﷺ की क़ब्र-ए-मुबारक की ज़ियारत करने में कोई हर्ज़ नहीं है, लेकिन इसके लिए अलग से या विशेष सफ़र नहीं किया जाएगा।
2️⃣ इस्लाम में दरगाहों का कोई धार्मिक स्थान या महत्व नहीं है। यदि होता, तो इस हदीस में अल्लाह अपने तीन पवित्र मस्जिदों के साथ-साथ किसी नबी या वली की क़ब्र की ज़ियारत के लिए सफ़र करने का हुक्म ज़रूर देता।
इसलिए दरगाह बनाना और उसकी ज़ियारत के लिए सफ़र करना हराम है और यह शिर्क में भी शामिल हो सकता है।
आज का हाल
लेकिन आज देखा जाता है कि मुसलमान दरगाहों की ज़ियारत के लिए अजमेर, गुलबर्गा, निज़ामुद्दीन और न जाने कहाँ-कहाँ जाते हैं, ठीक उसी तरह जैसे ग़ैर-मुस्लिम काशी, अमरनाथ, कन्याकुमारी, तिरुपति, पंढरपुर, तुलजापुर आदि स्थानों की यात्रा करते हैं।निष्कर्ष (Conclusion)
इस्लाम एक पवित्र, स्पष्ट और तौहीद पर आधारित धर्म है, जिसमें इबादत का हर तरीका अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की बताई हुई हिदायतों के अनुसार तय किया गया है। क़ब्रों की ज़ियारत का उद्देश्य सिर्फ़ और सिर्फ़ मौत को याद करना, आख़िरत से इबरत हासिल करना और मय्यत के लिए दुआ करना है, न कि उनसे मदद मांगना, मन्नतें मानना या उन्हें सवाब का ज़रिया समझना।
दरगाहों को इबादतगाह बना लेना, वहाँ सज्दा करना, चढ़ावा चढ़ाना और सवाब की नीयत से उनके लिए ख़ास सफ़र करना — ये सब ऐसे अमल हैं जिनकी न क़ुरआन से कोई दलील मिलती है और न ही सहीह हदीसों से। बल्कि ऐसे काम इंसान को धीरे-धीरे शिर्क और बिदअत की तरफ़ ले जाते हैं, जो अल्लाह को सबसे ज़्यादा नापसंद हैं।
हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी है कि वह अपने अक़ीदे की हिफ़ाज़त करे, इबादत को सिर्फ़ अल्लाह के लिए ख़ास रखे और अपने घर-परिवार को भी ग़लत रस्मों और गुमराह करने वाली परंपराओं से बचाए। क्योंकि जब इंसान दुनिया से चला जाता है, तो उसके लिए सिर्फ़ ईमान, नेक आमाल और ज़िंदों की सच्ची दुआएँ ही काम आती हैं — न कि दरगाहें, न चादरें और न ही मन्नतें।
Dua:
🤲अल्लाह से दुआ है कि वह हमें हक़ को हक़ समझकर अपनाने और बातिल को बातिल समझकर उससे बचने की तौफ़ीक़ अता फरमाए।
आमीन।
FAQs – अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (Hindi)
1. क्या इस्लाम में दरगाहों की ज़ियारत जायज़ है?
नहीं, इस्लाम में दरगाहों की ज़ियारत का कोई प्रमाण नहीं मिलता। क़ब्र की ज़ियारत इबरत और मौत की याद के लिए जायज़ है, लेकिन दरगाहों को इबादतगाह बनाना और उनसे मदद मांगना जायज़ नहीं।
2. क़ब्र की ज़ियारत किस नीयत से की जानी चाहिए?
क़ब्र की ज़ियारत सिर्फ़ मौत को याद करने, आख़िरत से इबरत लेने और मय्यत के लिए दुआ करने की नीयत से करनी चाहिए।
3. क्या क़ब्र पर जाकर मुरदे से दुआ या मदद मांग सकते हैं?
नहीं, मरे हुए से दुआ या मदद मांगना जायज़ नहीं है। दुआ सिर्फ़ अल्लाह से की जाती है। मुरदों को हमारी दुआ की ज़रूरत होती है, न कि हमें उनकी।
4. क्या क़ब्रों पर चादर चढ़ाना या सज्दा करना सही है?
नहीं, क़ब्रों पर चादर चढ़ाना, सज्दा करना या मन्नत मानना शिर्क और बिदअत में शामिल है।
5. क्या दरगाह की ज़ियारत के लिए सफ़र करना जायज़ है?
नहीं, इस्लाम में सिर्फ़ तीन मस्जिदों के लिए सफ़र की इजाज़त है: मस्जिदे हराम, मस्जिदे नवबी और मस्जिदे अक़्सा। दरगाह के लिए सफ़र करना जायज़ नहीं।
6. क़ब्र और दरगाह में क्या अंतर है?
क़ब्र मौत और आख़िरत की याद दिलाती है, जबकि दरगाहों पर अक्सर दुनिया, मेले, भीड़ और ख़ुराफ़ात दिखाई देती है।
7. क्या नबी ﷺ की क़ब्र की ज़ियारत के लिए ख़ास सफ़र किया जा सकता है?
नहीं, ख़ास तौर पर नबी ﷺ की क़ब्र की ज़ियारत के लिए सफ़र नहीं किया जाता। हाँ, मस्जिदे नवबी की ज़ियारत के दौरान क़ब्र की ज़ियारत की जा सकती है।
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