शब-ए-बरात को लेकर मुसलमानों में काफ़ी मतभेद पाए जाते हैं। और कई सारे Shab-e-Baraat Se Mutalliq Zaeef Riwayaat भी हमारे यहां मशहूर हैं। कुछ लोग इसे तक़दीर लिखी जाने की रात कहते हैं,कुछ मानते हैं कि मुर्दों की रूहें इस रात घर आती हैं,
और कहीं ख़ास नमाज़ें, हलवा, जश्न और रस्में निभाई जाती हैं।
लेकिन असल सवाल यह है: क्या ये सब बातें क़ुरआन और सहीह हदीस से साबित हैं?या फिर ये सिर्फ़ ज़ईफ़ रिवायतों और रिवाजों पर आधारित हैं?
इस लेख Shab-e-Baraat Se Mutalliq Zaeef Riwayaat में हम शब-ए-बरात से जुड़ी मशहूर ज़ईफ़ रिवायतों की हक़ीक़त को आसान भाषा में समझेंगे
ज़ईफ और मनघड़त रिवायतें बयान की जाती हैं उनके बारे में जानना और समझना ज़रूरी है!
शब-ए-बरात का शरीअत में नाम
क़ुरआन और सहीह हदीस में “शब-ए-बरात” नाम कहीं भी नहीं मिलता। न तो अल्लाह तआला ने इस नाम से किसी रात का ज़िक्र किया है और न ही रसूलुल्लाह ﷺ ने।हदीसों में इस रात को कहा गया है:
➡️ लैलतुन निस्फ़ मिन शाबान
यानी शाबान महीने की 15वीं रात।
👉 यह बात समझ लेना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि जब किसी चीज़ का नाम ही शरीअत में मौजूद नहीं, तो उससे जुड़ी रस्में, त्योहार और ख़ास इबादतें अपने आप सवालों के घेरे में आ जाती हैं।
क्या शब-ए-बरात कोई त्योहार या ख़ास इबादत की रात है?
अगर वाक़ई शब-ए-बरात का कोई त्योहार या ख़ास इबादत दीन-ए-इस्लाम में होती,तो यह नामुमकिन है कि सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम उसे छोड़ देते।
ज़रा सोचिए:
- क्या सहाबा कब्रिस्तान सजाते?
- क्या हलवा और बिरयानी पकाते?
- क्या साहब चरागाँ और आतिशबाज़ी करते?
- क्या पूरी रात मस्जिदों में जमकर ख़ास नमाज़ें पढ़ते?
क्योंकि: सहाबा दीन को सबसे ज़्यादा समझने वाले थे और रसूलुल्लाह ﷺ की हर सुन्नत पर सबसे ज़्यादा अमल करने वाले भी वही थे। अगर यह रात वाक़ई कोई ख़ास त्योहार या इबादत की रात होती,तो सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम उसमें हमसे कहीं ज़्यादा शिद्दत और जोश से शरीक होते।
लेकिन:
❌ न कब्रिस्तान सजाने का सुबूत
❌ न हलवा बनाने का सबूत
❌ न ख़ास नमाज़ों का सबूत
👉 न क़ुरआन से
👉 न सहीह हदीस से
👉 न सहाबा के अमल से
सहाबा का तरीक़ा ही सही इस्लाम है
दीन-ए-इस्लाम को सहाबा से ज़्यादा कोई नहीं जान सकता और न ही क़यामत तक कोई जान पाएगा।- उन्होंने रसूल ﷺ की हर सुन्नत को दिल से अपनाया
- हर हुक्म को सर आँखों पर रखा
- और हर बिदअत से दूर रहे
- रसूल ﷺ ने नहीं किया
- सहाबा ने नहीं किया
🎥 Shab-e-Baraat ki haqeeqat dekhen is video mein
क्या इस रात की फ़ज़ीलत साबित है?
कुछ हदीसों में आता है कि:अल्लाह तआला शाबान की आधी रात अपनी मख़लूक़ की तरफ़ रहमत की नज़र फरमाता है और मुशरिक व दिल में बैर रखने वाले के सिवा सबको माफ़ कर देता है।🔹 उलेमा कहते हैं: यह रिवायत पूरी तरह मज़बूत नहीं लेकिन कई तरीक़ों से आने की वजह से हसन लिग़ैरिही के क़रीब है
📖 इब्न माजा, हदीस 1390
📖 तिर्मिज़ी (मअनी के तौर पर)
इससे कोई ख़ास नमाज़ या रस्म साबित नहीं होती।
शब-ए-बरात से जुड़ी ज़ईफ़ रिवायतें
बनू कल्ब की बकरियों के बालों से ज़्यादा लोगों की मग़फ़िरत
हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा फ़रमाती हैं:
एक रात मैंने रसूलुल्लाह ﷺ को बिस्तर पर नहीं पाया।मैं बाहर निकली तो देखा कि आप जन्नतुल बक़ी़ में मौजूद हैं।आपने मुझे देखकर फ़रमाया: क्या तुम्हें यह डर था कि अल्लाह और उसका रसूल तुम पर ज़ुल्म करेंगे?’
मैंने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल! मुझे गुमान हुआ कि आप किसी दूसरी पत्नी के पास गए होंगे।फिर आपने फ़रमाया:
‘अल्लाह तआला शाबान की 15वीं रात आसमान-ए-दुनिया पर आता है और बनू कल्ब की बकरियों के बालों से ज़्यादा लोगों की मग़फ़िरत करता है।’”
📖 तिर्मिज़ी: 739
📖 इब्न माजा: 1389
🔍 इस रिवायत पर मुहद्दिसीन की राय
इमाम तिर्मिज़ी (रह.) ने खुद इस रिवायत को ज़ईफ़ कहा,उन्होंने अपने उस्ताद इमाम बुख़ारी (रह.) से नक़ल किया कि यह रिवायत ज़ईफ़ हैइस रिवायत की सनद में हज्जाज बिन इरतात हैं, जिनका अपने शैख़ से मिलना साबित नहीं। इसी तरह यह रिवायत दो जगह से मुनक़ते (टूटी हुई) है
📌 मुहद्दिसीन की इस्तिलाह में ऐसी रिवायत शदीद ज़ईफ़ होती है।
👉🏻 याद रखने की बात:
रसूल ﷺ का जन्नतुल बक़ी़ जाना और दुआ करना सहीह हदीस से साबित है,
लेकिन उसमें शाबान की 15वीं रात का कोई ज़िक्र नहीं है।
📖 सहीह मुस्लिम, किताबुल जनाइज़, हदीस 974
अल्लाह का शाबान की 15वीं रात आसमान-ए-दुनिया पर नुज़ूल”
एक दूसरी मशहूर रिवायत है:“जब शाबान की 15वीं रात आए तो रात में क़ियाम करो और दिन में रोज़ा रखो,
क्योंकि इस रात अल्लाह तआला आसमान-ए-दुनिया पर उतरता है…”
📖 इब्न माजा: 1388
🔍 हुक्म:
अल्लामा अल्बानी (रह.) ने इसे मौज़ू (मनगढ़ंत) कहा📖 सिलसिलतुल ज़ईफ़ा: 2132
इसके बजाय सहीह हदीस यह है कि:
“अल्लाह तआला हर रात आख़िरी तिहाई में आसमान-ए-दुनिया पर नुज़ूल फ़रमाता है…”👉यानी यह फ़ज़ीलत हर रात है,
📖 सहीह बुख़ारी: 1145
📖 सहीह मुस्लिम: 758
इसे शाबान की 15वीं रात से ख़ास करना गलत है।
शाबान की 15वीं रात की ख़ास नमाज़ें
जिसने शाबान की 15वीं रात में 12 रकात नमाज़ अदा की और हर रकअत में 30 मर्तबा सूरह इख़लास पढ़ी तो वो जन्नत में अपनी जगह देख लेता है और अपने अहेल में से 10 जहन्नमियों के बारे में बताता है इसकी सिफ़ारिश कुबुल की जाती है"(अलमोज़ुआत लिल इब्ने जोज़ी, खण्ड-2, पृष्ठ-51, 52)
Note: इमाम इब्ने जोजी र.अ. ने इस रिवायत को "अल'मोज़ुआ़त" में ज़िक्र करने के बाद लिखा है कि ये रिवायत मोज़ू (मंघड़त) है!
शब-ए-बरात की ख़ास 100 रकअत (सलातुल अल्फ़िया)
कुछ लोग इस रात 100 रकअत या ख़ास नफ़्ल नमाज़ पढ़ते हैं
जो शख़्स इस रात में 100 रकअ़त नमाज़ पढ़ता है, हर रकअ़त में सूरह फातिहा़ के बाद सूरह इख़लास 11 बार पढ़ता है अल्लाह तआ़ला उसकी हर हाजत पूरी कर देता है, अगर वो लोहे महफ़ूज़ में बद बख़्त लिख गया हो तो अल्लाह तआ़ला उसे मिटा कर उसे खुश नसीब लिख देता है...और उसके अंदर एक साल का गुनाह नहीं लिखा जाता''
(अलमोज़ुआत लिल अब्ने जोज़ी, खण्ड-2, पृष्ठ-50, 51)
अइम्मा इकराम, जैसे इमाम शोकानी, इब्ने अल जोज़ी, इब्ने हिब्बन, क़ुर्तबी, और सुयूती र.अ. वग़ैरह ने रिवायत को नक़ाबीले ऐतबार क़रार दिया है। तफ़सीलात के लिए देखें: अल'फ़वायद अल मजमुआ, तफ़सीर क़ुर्तबी, अल'मोज़ुआत लिल इब्ने जोज़ी, वग़ैरह।
➡️ सभी ने इन्हें नक़ाबिले-एतिबार बताया।
📌 इन नमाज़ों के बारे में आने वाली हदीसें ज़ईफ़ या मनगढ़ंत हैं। इमाम नववी और इब्न तैयमिया (रहिमहुमल्लाह) ने इन्हें बिदअत कहा है।
1️⃣ क्या इस रात तक़दीर लिखी जाती है?
आम तौर पर कहा जाता है कि:
“इस रात पूरे साल की तक़दीर लिखी जाती है।”
📌 यह बात ग़लत है। क्योंकि क़ुरआन ख़ुद कहता है:
“इस रात हर हिकमत वाला फ़ैसला तय किया जाता है।”
📖 सूरह दुख़ान, आयत 4
👉 उलेमा और सही अहादीस के मुताबिक़ यह आयत लैलतुल क़द्र के बारे में है,
शब-ए-बरात के बारे में नहीं।
2️⃣ क्या मुर्दों की रूहें घर आती हैं?
यह मान्यता कि:
रूहें घर आती हैं
अपने घर वालों को देखती हैं
📌 क़ुरआन और सहीह हदीस में इसका कोई सबूत नहीं।
यह सिर्फ़ लोक-कथाएँ और रिवाज हैं।
3️⃣ क़ब्रों पर चिराग़ जलाना
इस रात:
क़ब्रों पर दीप
मोमबत्ती
फूल
📌 नबी ﷺ ने क़ब्रों को सजाने और चिराग़ जलाने से मना किया।
📖 सहीह मुस्लिम, हदीस 969
➡️ यह अमल बिदअत है।
4️⃣ हलवा, जश्न और महफ़िलें
शब-ए-बरात को:
- त्योहार बनाना
- ख़ास पकवान
- जलसे-जुलूस
📌 इस्लाम में सिर्फ़ दो ईदें हैं।
नबी ﷺ ने फ़रमाया:
हर नई चीज़ बिदअत है और हर बिदअत गुमराही है।
📖 सहीह मुस्लिम, हदीस 867
Conclusion:
न ईद है, न जश्न न ख़ास नमाज़ों की रात बल्कि यह हमें याद दिलाती है, सहीह इल्म सीखने की ज़ईफ़ रिवायतों से बचने की और सुन्नत पर चलने की।
Shab-e-Baraat Se Mutalliq Zaeef Riwayaat से दूर रहें और गुमराह करने वाले उन दीन के ठेकेदारों से बचें जो महज़ अपनी पेट की खा़तिर भोली भाली अ़वाम को गुमराह करते है। अगर ये मौलवी हज़रात अ़वाम में सही दीन और सही हदीस बयान करना शुरू कर दें तो लोग दीन को समझने लगेंगे और गुमराही से बच जाएंगे।
🤲 अल्लाह हमें दीन को सही समझने, सही अमल करने और हर तरह की बिदअत से बचने की तौफ़ीक़ दे। आमीन
Frequently Asked Question:
Que : क्या इस रात में अल्लाह-तआ़ला पहले आसमान पर आते हैं और दुआ कुबूल करते हैं ?
Que: क्या इस रात में इंसान का रिज़क, उमर, मौत का वक्त लिखा जाता है
Que: क्या रात में मुर्दो की रूहें अपने परिवार से मुलाकात करने आती है...
Ans: अल्लाह सुबहा़न व तआ़ला का फ़रमान है कि इन्तेक़ाल के बाद सभी रूहें या तू इल्लिइन या सिज्ज़िन में होती हैं और क़यामत तक वहां से बाहर नहीं आ सकती तो इस रात कैसे आएंगी (सूरह मुमिनून आयत 99 -100 देखें)।
Que: क्या इस रात की कोई खास इबादत या नमाजें हैं ?
Que: क्या इस दिन का कोई ख़ास रोज़ा है ?
Ans: ये भी किसी सही हदीस से साबित नहीं है, 15 शाबान को खास कर के रोजा रखना बिदअ़त है। हर महीने के 13, 14, 15 (अय्याम ए बीध) का रोजा रखना सुन्नत है)
Que: क्या इस रात खास कर कब्रिस्तान जाना चाहिए ?

0 Comments
please do not enter any spam link in the comment box.thanks