आज के दौर का सबसे बड़ा फ़ितना यह है कि लोग दीन के नाम पर ही दीन से दूर होते जा रहे हैं। बहुत से लोग जाने-अनजाने में अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की मुख़ालफ़त कर रहे हैं। अल्लाह और रसूल ﷺ की साफ़ और सीधी शिक्षाओं को छोड़कर लोग अपने पीरों, बाबाओं और बुज़ुर्गों की बनाई हुई रस्मों और रिवाजों के पीछे चल पड़े हैं।
आज हालत यह हो गई है कि जब तौहीद और सुन्नत की बात की जाती है तो कुछ लोगों के चेहरे बदल जाते हैं, लेकिन जब मज़ारों, बुज़ुर्गों और परंपराओं का ज़िक्र किया जाता है तो वही लोग खुशी और उत्साह दिखाते हैं। यह सोचने की ज़रूरत है कि क्या वास्तव में यही वह दीन है जिसकी शिक्षा क़ुरआन और हदीस देते हैं?
हक़ीक़त यह है कि दीन वही है जो क़ुरआन और सहीह हदीस से साबित हो। लेकिन अफ़सोस की बात है कि बहुत से लोग अपने मज़हबी आलिमों की अंधी पैरवी को ही दीन समझ बैठे हैं। इसी वजह से आज बहुत से लोगों के लिए हक़ और बातिल में फ़र्क करना मुश्किल हो गया है।
✍️ By: Mohib Tahiri | 🕋 Islamic Articles| Hidayat Ki Roshni @mz|Qur'an ki Warning| Aakhirat ka Anjaam| 🕰 Updated:25 Mar 2026
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Allah aur Rasool ﷺ ki ita'at se muh monde wale |
ऐसे फ़ितनों के दौर में अहल-ए-तौहीद वे लोग हैं जो हर हाल में सिर्फ़ अल्लाह की इबादत और रसूल ﷺ की सुन्नत की तरफ़ बुलाते हैं, जबकि अहल-ए-बिदअत अपनी बनाई हुई रस्मों और अपने बुज़ुर्गों के अक़ीदों के लिए लड़ने-मरने तक को तैयार रहते हैं। क़ुरआन में अल्लाह तआला ने बार-बार उन लोगों को सख़्त चेतावनी दी है जो अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की मुख़ालफ़त करते हैं।
इसलिए हर मुसलमान के लिए ज़रूरी है कि वह अपने अक़ीदे और अमल को क़ुरआन और सुन्नत की रोशनी में परखे, कहीं ऐसा न हो कि हम भी अनजाने में अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की मुख़ालफ़त करने वालों में शामिल हो जाएँ।
✦ आज का हाल : दीन के नाम पर शिर्क और बिदअत
आज हमारे समाज में दीन का नाम लेकर बहुत सी ऐसी चीज़ें फैलाई जा रही हैं जो न तो अल्लाह तआला ने फ़रमाई और न ही रसूलुल्लाह ﷺ ने सिखाई। अफ़सोस की बात यह है कि लोग समझते हैं कि वो दीन की खिदमत कर रहे हैं, जबकि असल में वो शिर्क, बिदअत और खुराफ़ात को बढ़ावा दे रहे हैं। अफ़सोस यह है कि लोग अपनी जानिब से बनाई हुई रस्मों को दीन का हिस्सा मान लेते हैं, जबकि क़ुरान और हदीस में उनका कोई सबूत नहीं मिलता।
अल्लाह तआला ने ऐसों के लिए ही क़ुरआन में सख़्त अंदाज़ में चेतावनी दी है:
(सूरह अन-निसा: 115)
ये खुल्लम खुला मुखालिफत है कि साफ़ हिदायत मिलने के बाद भी हम ऐसे नाफरमानी में डूबे हैं।
हमारे समाज में बहुत से लोग दीन का चेहरा बिगाड़ कर पेश कर रहे हैं:
- पीरों और बाबाओं को अल्लाह के बराबर या उससे ऊपर समझना।
- कब्रों से मदद मांगना और उनको सजाना-संवारना।
- नबी ﷺ और औलिया के नाम पर झूठी कहानियां गढ़कर दीन बनाना।
- नई-नई रस्में और मेले, जिन्हें न क़ुरान में और न हदीस में कोई जगह है।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
"जो शख़्स हमारे इस दीन में कोई नया काम ईजाद करेगा, जो उसमें से नहीं है, वो काम रद्द है।"
(सहीह बुखारी व मुस्लिम)
✦ क़ुरान में : मुश्रिकों का असली चेहरा और हाल
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
(सूरह अज-ज़ुमर: 45)
✦ वजाहत:
जब अहले तौहीद लोगों को सिर्फ़ अल्लाह की इबादत की दावत देते हैं तो बहुत से लोग नाराज़ हो जाते हैं, उनके चेहरे बिगड़ जाते हैं। लेकिन जब वही लोग अपने पीरों, बुज़ुर्गों, बाबाओं और औलिया का नाम लेते हैं तो सब मुस्कुराने लगते हैं और उनके चेहरे खिल उठते हैं। इससे साफ़ जाहिर है कि उनका दिल अल्लाह की मोहब्बत से नहीं बल्कि इंसानों की ग़ुलामी और झूठे अक़ीदे से जुड़ा हुआ है।
इमाम इब्न कसीर (रहिमहुल्लाह) ने तफ़सीर में लिखा है कि यह आयत उन लोगों की हालत बयान करती है जो अल्लाह को छोड़कर औरों की इबादत व ताज़ीम करते हैं। अल्लाह को छोड़कर औलिया और बुज़ुर्गों को इबादत व ताज़ीम का हक़दार बना लेते हैं।ऐसे लोग तौहीद की दावत को सुनकर नफ़रत करते हैं लेकिन शिर्क और बिदअत का नाम सुनकर खुश हो जाते हैं।
✦ मोमिन की पहचान (क़ुरान व हदीस की रोशनी में)
🌿 कुरान से:
सूरह अल-मुमिनून (23:1-2):
“बेशक कामयाब हुए ईमान वाले। जो अपनी नमाज़ों में आज़ो-नम्र (ख़ुशू) इख़्तियार करते हैं।”
🌙 हदीस से:
✅ रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“मोमिनों का आपस में रिश्ता और उनकी मोहब्बत और रहमदिली एक जिस्म की तरह है; जब उसके किसी हिस्से को दर्द होता है तो पूरा जिस्म बेचैन और बुख़ारज़दा हो जाता है।”
(सहीह मुस्लिम)
✦ अहले बिदअत और शिर्क करने वालों की पहचान
“जब अकेले अल्लाह का ज़िक्र किया जाता है तो उन लोगों के दिल तंग हो जाते हैं जो आख़िरत पर ईमान नहीं रखते, और जब उसके सिवा औरों का ज़िक्र होता है तो अचानक वे खुशी से झूम उठते हैं।”
🔹 सूरह अश-शूरा (42:21):
“क्या उनके कुछ शरीक़ (बनाए हुए) हैं जिन्होंने उनके लिए दीन में वह चीज़े शरीअत बना दीं जिनका अल्लाह ने इजाज़त नहीं दी?”
🌑 हदीस से:
✅ रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
(बुख़ारी, मुस्लिम)
“जो कोई हमारे इस दीन में ऐसी चीज़ ईजाद करे जो उसमें से नहीं है, वह रद्द कर दी जाएगी।”
(बुख़ारी, मुस्लिम)
✦ अहले तौहीद बनाम अहले बिदअत
1. अहले तौहीद
- वो लोग हैं जो सिर्फ़ अल्लाह तआला को अपना मालिक और मददगार मानते हैं।
- दिन-रात अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के हक़ में आवाज़ बुलंद करते हैं।
- दीन को उसी तरह पेश करते हैं जैसे कुरान और हदीस में आया है।
- सिर्फ़ अल्लाह को मददगार और मालिक मानते हैं।
- कुरान और हदीस की रौशनी में दीन पर चलते हैं।
- शिर्क और बिदअत से रोकते हैं और लोगों को तौहीद की दावत देते हैं।
- अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के हक़ में हुज्जत करते हैं।
2. अहले बिदअत और शिर्क करने वाले
- अपने पीरों और बुज़ुर्गों को दीन का हक़दार बनाते हैं।
- औलिया और कब्रों से मदद माँगते हैं।
- कुरान और सुन्नत की बजाय अपने मज़हबी लीडरों के पीछे चलते हैं।
- अल्लाह और रसूल ﷺ के हक़ में नहीं बल्कि अपने बुज़ुर्गों के हक़ में हुज्जत करते हैं।
- दीन को उसी तरह पेश करते हैं जैसे उनके इमामों और बुजुर्गों ने फरमाया है।
“क्या उन्होंने अल्लाह को छोड़कर अपने आलिमों और राहिबों को रब बना लिया?"(सूरह तौबा: 31)
✦ हदीसों की तालीमात
रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
(सहीह अबू दाऊद, तिर्मिज़ी)
एक और हदीस में आया है:
"तुम्हारा हाल उन लोगों जैसा हो जाएगा जो तुमसे पहले थे, इंच-इंच और हाथ-हाथ बराबर, यहाँ तक कि अगर वो लोग छिपकली के बिल में घुसे तो तुम भी घुसोगे।"
(सहीह बुखारी)
👉 यानी जैसे पहले की कौमें शिर्क और बिदअत में डूब गई थीं, वैसे ही इस उम्मत में भी लोग उन्हीं की नकल करेंगे।
आज का समाज दो हिस्सों में बंटा हुआ है:
- एक वह जो सिर्फ़ अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की इताअत करता है।
- और दूसरा वह जो अपने पीरों, बाबाओं और खुराफ़ाती अक़ीदे की पैरवी करता है।
हक़ीक़त यह है कि दीन सिर्फ़ वही है जो कुरान और हदीस में आया है। शिर्क, बिदअत और खुराफ़ात अल्लाह और रसूल ﷺ की मुख़ालिफ़त है और इसकी सज़ा जहन्नम है।
इसलिए हमें चाहिए कि:
- तौहीद पर क़ायम रहें।
- हर बिदअत और शिर्क से दूर रहें।
- और लोगों को सही दीन की दावत देते रहें।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
"तुम लोग मेरी सुन्नत और मेरे बाद आने वाले हिदायतयाफ़्ता ख़ुलफ़ा की सुन्नत को मज़बूती से पकड़ लो और नये-नये ईजाद किए हुए कामों से बचो, क्योंकि हर बिदअत गुमराही है।"
(सहीह अबू दाऊद, तिर्मिज़ी)
🌟 नतीजा (Conclusion):
अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की इताअत ही सच्चा दीन है। जो लोग अल्लाह के बजाय अपने पीरों, बाबाओं और बुज़ुर्गों को रब बना लेते हैं, वो असल में गुमराही के रास्ते पर हैं। क़ुरान ने साफ़ चेतावनी दी है कि शिर्क करने वालों के लिए जन्नत हराम है और उनका ठिकाना जहन्नम है।
आज ज़रूरत इस बात की है कि हम अपने दिलों से हर तरह की ग़ुलामी मिटाएँ और सिर्फ़ अल्लाह की इबादत करें। क्योंकि अल्लाह ही हमारा मालिक है, वही मददगार है और वही हमारी दुआओं को सुनने वाला है।
👉 जो शख़्स अल्लाह और उसके रसूल ﷺ से सच्चा प्यार करता है, वह तौहीद पर क़ायम रहेगा और हर तरह की बिदअत व खुराफ़ात से दूर रहेगा।
FAQs (हिंदी + اردو)
अल्लाह और रसूल की मुखालिफत करने वाले कौन हैं?
✅ वो लोग जो शख्शियत परस्ती के शिकार हैं अल्लाह और रसूल की मुखालिफत करते हैं। वे अल्लाह और रसूल के मुक़ाबले में अपने पीरो और बुजुर्गों की बातों को पेश करते हैं और इसी को दीन समझते हैं।
✅ اردو: وہ لوگ جو شخصیت پرستی کے شکار ہیں اللہ اور رسول کی مخالفت کرتے ہیں۔ وہ لوگ اللہ اور رسول کے مقابلے میں اپنے پیروں اور بزرگوں کی باتیں پیش کرتے ہیں اور اسی کو دین سمجھتے ہیں۔
क्या पीरों और बुज़ुर्गों से मदद माँगना सही है?
✅ हिंदी: नहीं, मदद सिर्फ़ अल्लाह से माँगनी चाहिए। कुरान में है: “और अगर अल्लाह तुझे कोई तकलीफ़ पहुँचा दे तो उसके सिवा कोई उसे दूर करने वाला नहीं।” (यूनुस: 107)
✅ اردو: نہیں، مدد صرف اللہ سے مانگنی چاہیے۔ قرآن میں ہے: “اور اگر اللہ تجھے کوئی تکلیف پہنچا دے تو اس کے سوا کوئی اسے دور کرنے والا نہیں۔” (یونس: 107)
क्या बिदअत करने से दीन में कोई फ़ायदा होता है?
✅ हिंदी: बिल्कुल नहीं। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: “हर नयी ईजाद की हुई चीज़ (बिदअत) गुमराही है।” (अबू दाऊद, तिर्मिज़ी)
✅ اردو: بالکل نہیں۔ رسول اللہ ﷺ نے فرمایا: “ہر نیا ایجاد کیا ہوا عمل (بدعت) گمراہی ہے۔” (ابو داؤد، ترمذی)
अहले तौहीद और अहले बिदअत में क्या फ़र्क है?
✅ हिंदी: अहले तौहीद सिर्फ़ अल्लाह की इबादत करते हैं और कुरान व हदीस को मानते हैं, जबकि अहले बिदअत अपने पीरों और बुज़ुर्गों को हक़ से बढ़ाकर उनके लिए हुज्जत करते हैं।
✅ اردو: اہل توحید صرف اللہ کی عبادت کرتے ہیں اور قرآن و حدیث کو مانتے ہیں، جبکہ اہل بدعت اپنے پیروں اور بزرگوں کو حق سے بڑھا کر ان کے لئے حجت کرتے ہیں۔
क्या कब्रों पर चादर चढ़ाना या मेले लगाना सुन्नत है?
✅ हिंदी: नहीं, ये सब रस्में कुरान और हदीस से साबित नहीं। बल्कि यह गुमराह करने वाले काम हैं।
✅ اردو: نہیں، یہ سب رسومات قرآن و حدیث سے ثابت نہیں۔ بلکہ یہ گمراہ کرنے والے کام ہیں۔
सही दीन की पहचान कैसे होगी?
صحیح دین کی پہچان کیسے ہوگی؟
✅ हिंदी: सही दीन वही है जो कुरान और हदीस से साबित है, जिसमें न शिर्क है और न बिदअत।
✅ اردو: صحیح دین وہی ہے جو قرآن و حدیث سے ثابت ہے، جس میں نہ شرک ہے اور نہ بدعت۔

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