Muharram Aur Taaziyadari |Taaziya,Maatam Aur Juloos ki Haqeeqat | Ek islahi Tahreer

मुहर्रम इस्लामी साल का पहला महीना और चार हराम (सम्मानित) महीनों में से एक है। अफसोस की बात है कि बहुत से मुसलमान Muharram Aur Taziyadari की हक़ीक़त और असल मक़सद से ना आशना हैं। इस महीने की असली फ़ज़ीलत से ज़्यादा उन रस्मों में पड़ गए हैं जिनकी न कुरआन में कोई दलील है और न सहीह हदीस में।

खास तौर पर ताज़ियादारी, मातम, सीना-कोबी, ज़ंजीर ज़नी, ताज़िया निकालना, हुसैन रज़ी: से फ़रियाद करना, मन्नतें मानना, या उन्हें पुकारना जैसी बातें दीन का हिस्सा नहीं हैं। बल्कि इनमें से कई अमल बिदअत हैं और कुछ सीधे तौर पर शिर्क तक पहुँचा देते हैं।

Taaziya,Maatam Aur Juloos ki Haqeeqat
Muharram Aur Taaziyadari ki Haqeeqat 

इस लेख "Muharram Aur Taziyadari" का मकसद किसी फिरके पर हमला करना नहीं,किसी के दिल को ठेस पहुंचाना नहीं बल्कि कुरआन, सहीह हदीस और अहल-ए-सुन्नत के उलमा की रोशनी में सही बात पेश करना है,ताकि हक़ वाज़ह हो जाए। 

Padhen Yahan: muharram ki Tareekhi Aur Sharayi haisiyat kya hai?


मुहर्रम की असली फ़ज़ीलत

अल्लाह तआला फरमाता है:

"बेशक अल्लाह के यहाँ महीनों की गिनती बारह है... उनमें से चार महीने हराम हैं।"
(सूरह अत-तौबा 9:36)
इन चार महीनों में मुहर्रम भी शामिल है।

रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
"रमज़ान के बाद सबसे अफ़ज़ल रोज़े अल्लाह के महीने मुहर्रम के रोज़े हैं।"
(सहीह मुस्लिम: 1163)
यानी मुहर्रम की सबसे बड़ी इबादत नफ़्ली रोज़े रखना है, न कि नए-नए रस्मो-रिवाज अपनाना।
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आशूरा (10 मुहर्रम) की हकीकत

रसूलुल्लाह ﷺ ने 10 मुहर्रम का रोज़ा रखा और रखने का हुक्म दिया।

फरमाया:
"मुझे उम्मीद है कि आशूरा का रोज़ा पिछले एक साल के गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन जाएगा।"
(सहीह मुस्लिम: 1162)
और यहूदियों से अलग होने के लिए फरमाया:
"अगर मैं अगले साल ज़िन्दा रहा तो नौवीं (मुहर्रम) का भी रोज़ा रखूँगा।"
(सहीह मुस्लिम: 1134)

👉 आज हमारे मुआशरे का हाल देख लें कि 10 मुहर्रम को लोग क्या करते हैं? रसूलुल्लाह ﷺ ने 10 मुहर्रम का रोज़ा रखने का हुक्म दिया और हम रोज़ा न रख कर शिर्क, बिदअत और ख़ुराफ़ात में लगे हैं और रसूलुल्लाह ﷺ के हुक्म के ख़िलाफ़ वर्ज़ी कर रहे हैं। 


कर्बला का वाक़िआ और हमारी जिम्मेदारी

हज़रत हुसैन रज़ी: की शहादत इस्लाम की तारीख़ का बहुत बड़ा और दर्दनाक वाक़िआ है।

हर मुसलमान उनसे मोहब्बत करता है क्योंकि रसूलुल्लाह ﷺ उनसे मोहब्बत करते थे।

लेकिन उनकी मोहब्बत का सही तरीका यह है कि:

  • उनके दीन पर चला जाए।
  • उनकी सुन्नत पर अमल किया जाए।
  • उनके लिए दुआ की जाए।
  • उनके सब्र और कुर्बानी से सबक लिया जाए।

न कि ऐसे काम किए जाएँ जिनकी उन्होंने या रसूलुल्लाह ﷺ ने कभी तालीम नहीं दी।


ताज़ियादारी क्या है?

ताज़ियादारी में आम तौर पर:

  • ताज़िया बनाना
  • जुलूस निकालना
  • मातम करना
  • सीना पीटना
  • ज़ंजीर मारना
  • या हुसैन रज़ी: के नाम पर नज़र-नियाज़ करना

शामिल होता है।

इनमें से किसी भी अमल की दलील कुरआन, सहीह हदीस या सहाबा से साबित नहीं है। जब कोई भी अमल साबित ही नहीं तो फिर ये सब क्यूँ?

👉 Kya bade Buzurgon Baap dada ke Deen ya tareeqe par chalna Sahi hai? Padhen Yahan Quran aur sunnat ki Roshni me 


क्या ताज़िया निकालना दीन का हिस्सा है?

नहीं।

नबी ﷺ, सहाबा, ताबेईन और इमामों में से किसी ने ताज़िया नहीं निकाला।

अगर यह नेक काम होता तो सबसे पहले वही लोग करते।

रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
"जिसने हमारे इस दीन में कोई नई बात निकाली जो उसमें नहीं है, वह रद्द है।"
(सहीह बुखारी: 2697, सहीह मुस्लिम: 1718)

👉 जब रसूलुल्लाह ﷺ ने दीन में नई चीज़ निकलने से मना कर दिया तो फ़िर ये सब करने से फ़ायदा क्या? जो गुनाह का सबब बने। ज़रा सोचें और गौर ओ फ़िक्र करें। 


मातम और सीना पीटना

रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:

"जो व्यक्ति गाल पीटे, कपड़े फाड़े और जाहिलियत की पुकार लगाए, वह हममें से नहीं।"
(सहीह बुखारी: 1294, सहीह मुस्लिम: 103)

इसलिए:

  • सीना पीटना
  • ज़ंजीर मारना
  • खुद को घायल करना

सुन्नत नहीं बल्कि नाजायज़ काम हैं।


खुद को नुकसान पहुँचाना हराम है

अल्लाह तआला फरमाता है:
"अपने आपको अपने हाथों से हलाकत में न डालो।"
(सूरह अल-बक़रह 2:195)
और फरमाया:
"अपने आप को क़त्ल मत करो।"
(सूरह अन-निसा 4:29)

जब अल्लाह और रसूलुल्लाह ﷺ ने हमे मना कर दिया कि अपने आप को नुकसान न पहुंचाओ तो फिर ऐसा करके हम अल्लाह और रसूलुल्लाह ﷺ के ख़िलाफ़ जा रहे हैं। अपने अमाल पर ध्यान दें और सोचें कि क्या ये सही है?

👉 Kya Aap jante Hain Qiyamat ke din Nabi ﷺ Allah se hamari shikayat kareng, Aakhir aisa kyun? Jane Yahan Haqeeqat 


हुसैन रज़ी: को पुकारना या उनसे मदद माँगना

अगर कोई व्यक्ति कहे:

  • या हुसैन मदद!
  • या हुसैन मेरी मुश्किल हल कर दो।
  • मेरी मन्नत पूरी कर दो।

तो यह इबादत का ऐसा हिस्सा है जो सिर्फ़ अल्लाह के लिए है।

अल्लाह फरमाता है:
"मस्जिदें अल्लाह के लिए हैं, इसलिए अल्लाह के साथ किसी और को मत पुकारो।"
(सूरह जिन्न 72:18)
और:
"तुम सिर्फ़ अल्लाह ही से मदद माँगो।"
(सूरह अल-फ़ातिहा 1:5)

मन्नत और नज़र किसके नाम की?

मन्नत (नज़र) एक इबादत है और इबादत केवल अल्लाह तआला के लिए होती है। इसलिए मन्नत केवल अल्लाह के नाम की मानी जाएगी। किसी नबी, वली, पीर या हज़रत हुसैन रज़ी: के नाम की मन्नत मानना या उनके नाम पर नज़र पेश करना शरीअत से साबित नहीं है।

अल्लाह तआला फ़रमाता है:
"वे अपनी मन्नतें पूरी करते हैं और उस दिन से डरते हैं जिसकी बुराई चारों ओर फैली होगी।"
(सूरह अल-इन्सान 76:7)
इस आयत में अल्लाह ने अपनी रज़ा के लिए मन्नत पूरी करने वाले नेक लोगों की तारीफ़ की है, जिससे मालूम होता है कि मन्नत एक इबादत है।

एक दूसरी जगह अल्लाह फ़रमाता है:
"तुम जो कुछ भी खर्च करते हो या जो कोई मन्नत मानते हो, अल्लाह उसे अच्छी तरह जानता है।"
(सूरह अल-बक़रह 2:270)
हदीस:

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
"जिसने अल्लाह की आज्ञापालन (फ़रमांबरदारी) की मन्नत मानी हो, उसे चाहिए कि वह उसे पूरा करे; और जिसने अल्लाह की नाफ़रमानी की मन्नत मानी हो, वह उसे पूरा न करे।"
(सहीह बुखारी: 6696)

इसलिए मन्नत को केवल अल्लाह के लिए मानना जायज़ है। किसी वली, पीर या हज़रत हुसैन रज़ी: के नाम की मन्नत या नज़र मानना शरीअत से साबित नहीं है, बल्कि इबादत को अल्लाह के अलावा किसी और की तरफ़ फेरना गंभीर मामला है। मुसलमान को चाहिए कि वह अपनी दुआ, नज़र, मन्नत और तमाम इबादतें केवल अल्लाह तआला के लिए ख़ालिस रखे।


क्या ग़म मनाने की कोई सीमा है?

रसूलुल्लाह ﷺ ने किसी भी मृतक पर तीन दिन से ज़्यादा ग़म मनाने से मना किया है (पति के लिए इद्दत अलग हुक्म है)।

(सहीह बुखारी: 1280, सहीह मुस्लिम: 938)

तो हर साल नए सिरे से मातम करना सुन्नत नहीं।


सहाबा ने क्या किया?

हज़रत हुसैन रज़ी: की शहादत के बाद:

  • किसी सहाबी ने ताज़िया नहीं बनाया।
  • किसी ने मातमी जुलूस नहीं निकाला।
  • किसी ने सीना नहीं पीटा।
  • किसी ने ज़ंजीर नहीं मारी।

अगर यह दीन होता तो सहाबा सबसे पहले करते।

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उलमा के अक़वाल

1. इमाम मालिक رحمه الله

"जिस चीज़ को उस दौर में दीन नहीं माना गया, वह आज भी दीन नहीं बन सकती।"

(अल-इ'तिसाम – इमाम शातिबी)


2. इमाम शातिबी رحمه الله

"बिदअत वह तरीका है जिसे दीन समझकर अपनाया जाए जबकि उसकी शरई दलील न हो।"

(अल-इ'तिसाम)


3. शैखुल इस्लाम इब्न तैमिय्यह رحمه الله

कर्बला के नाम पर मातम, जुलूस और नए धार्मिक रस्मो-रिवाज शरीअत से साबित नहीं हैं।

(मिन्हाजुस सुन्नह)


4. इब्न कसीर رحمه الله

उन्होंने कर्बला के वाक़िए का ज़िक्र करते हुए लिखा कि मुसलमानों को सब्र करना चाहिए और शरीअत के खिलाफ़ मातमी रस्में नहीं अपनानी चाहिए।

(अल-बिदायह वन-निहायह)


मुहर्रम में क्या करना चाहिए?

  • अल्लाह से तौबा करना।
  • 9 और 10 या 10 और 11 मुहर्रम के रोज़े रखना।
  • कुरआन की तिलावत।
  • ज़िक्र और दुआ।
  • सदक़ा करना।
  • हज़रत हुसैन रज़ी: और तमाम सहाबा से मोहब्बत रखना।
  • सुन्नत पर अमल करना।

किन कामों से बचना चाहिए?

  • ताज़ियादारी
  • मातम
  • सीना पीटना
  • ज़ंजीर ज़नी
  • ताज़िया निकालना
  • या हुसैन कहकर मदद माँगना
  • मन्नतें मानना
  • शिर्क और बिदअत वाले सभी अमल

नसीहत

हज़रत हुसैन रज़ी: ने अपनी जान तौहीद, हक़ और सुन्नत के लिए कुर्बान की थी। इसलिए उनकी याद मनाने का सबसे सही तरीका यही है कि हम भी कुरआन और सुन्नत को मज़बूती से थामें और हर तरह के शिर्क, बिदअत और ग़ैर-शरई रस्मों से बचें। उनसे मुहब्बत कीजिए, मुहब्बत ईमान को मज़बूत करती है लेकिन मुहब्बत में गुलु नहीं कि शिर्क बिदत को बढ़ावा मिले। 


दुआ

اللهم أرنا الحق حقًا وارزقنا اتباعه، وأرنا الباطل باطلًا وارزقنا اجتنابه، وثبتنا على التوحيد والسنة حتى نلقاك.

Roman:

Allahumma arinal-haqqa haqqan warzuqnat-tiba'ah, wa arinal-baatila baatilan warzuqnajtinabah, wa thabbitna 'alat-tawheedi was-sunnati hatta nalqak.

हिंदी अर्थ:

ऐ अल्लाह! हमें हक़ को हक़ दिखा और उस पर चलने की तौफ़ीक़ दे। बातिल को बातिल दिखा और उससे बचने की तौफ़ीक़ दे। हमें तौहीद और सुन्नत पर आख़िर दम तक क़ायम रख। आमीन।


FAQs

Q1. क्या ताज़िया निकालना सुन्नत है?
उत्तर: नहीं। इसकी कोई दलील कुरआन, सहीह हदीस या सहाबा के अमल से साबित नहीं है।

Q2. क्या मुहर्रम में मातम करना जायज़ है?
उत्तर: नहीं। नबी ﷺ ने गाल पीटने, कपड़े फाड़ने और जाहिलियत के तरीके से मातम करने से मना फ़रमाया है।

Q3. आशूरा के दिन सबसे अफ़ज़ल अमल क्या है?
उत्तर: 9-10 या 10-11 मुहर्रम के रोज़े रखना, दुआ, ज़िक्र, तौबा और नेक अमल करना।

Q4. क्या हज़रत हुसैन رضي الله عنه से मदद माँगना जायज़ है?
उत्तर: मदद के लिए पुकारना इबादत का हिस्सा है और इबादत केवल अल्लाह के लिए है।

Q5. क्या हज़रत हुसैन رضي الله عنه से मोहब्बत ईमान का हिस्सा है?
उत्तर: जी हाँ। उनसे मोहब्बत करना ईमान का हिस्सा है, लेकिन उनकी मोहब्बत का सही तरीका उनकी सीरत से सबक लेना और सुन्नत पर अमल करना है।


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