Sunnat Aur Bidat Ki Asal Haqeeqat | Tafseel Aur Daleel ke Saath

सुन्नत के हिसाब से सिर्फ़ वही चीज़ें सुन्नत नहीं हैं,जो रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने क्या किया, बल्कि ये भी होता है की रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने क्या नहीं किया , उन्हें छोड़ देना भी सुन्नत का हिस्सा है। और जिस अमल को रसूलअल्लाह और सहाबा ने नहीं किया उसे बिद्दत कहते हैं ।  

आज के दौर में सबसे ज़्यादा गलतफ़हमी सुन्नत और बिदअत को लेकर पाई जाती है।Sunnat Aur Bidat Ki Asal Haqeeqat को जानना बहुत ज़रूरी है। कई लोग हर नई चीज़ को बिदअत कह देते हैं, और कई लोग कुछ बिदअत को “अच्छी बिदअत” बताकर अपनाते हैं।

Sunnat Allah aur Rasool ki ita'at, Bidat dono ki na-farmani
Bidat gumrahi ka sabab hai 

इस आर्टिकल में हम जानेंगे:

✔ सुन्नत क्या है
✔ बिदअत क्या है
✔ क़ुरआन व हदीस की रोशनी
✔ सहाबा और उलमा के अक़वाल
✔ सही और गलत बिदअत का फ़र्क़


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    🟢 सुन्नत क्या है? (What is Sunnah)

    इस्लाम में "सुन्नत" और "बिदअत" के सही मायने समझना बहुत ज़रूरी है।अरबी भाषा में "सुन्नत" का अर्थ "तरीक़ा" होता है। यानी जो रास्ता, अमल,बात या ज़िन्दगी गुजारने का तरीक़ा पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) और उनके सहाबा (रज़ि अल्लाहु अन्हुम) ने अपनाई, या जिसकी इजाज़त / तस्दीक़ / तरगीब दी,वही सुन्नत है। सिर्फ़ वही चीज़ें सुन्नत नहीं हैं, जो उन्होंने कीं, बल्कि जो उन्होंने नहीं कीं, उन्हें छोड़ देना भी सुन्नत का हिस्सा है।


    यानी सुन्नत से मुराद है:
    👉नबी ﷺ के कहे हुए, किए हुए और जिन कामों को आपने देखकर मंज़ूरी दी — वे सभी सुन्नत कहलाते हैं। सुन्नत का पालन सीधे कुरआन और हदीस के मुताबिक होता है।

    अल्लाह तआला फ़रमाता है:
    "जो रसूल तुम्हें दें, उसे ले लो और जिससे मना करें, उससे रुक जाओ।"(सूरह अल-हश्र 59:7)

    ➡ यह आयत साबित करती है कि नबी ﷺ की सुन्नत का पालन फ़र्ज़ है।

    📜 हदीस से दलील

    नबी ﷺ ने फ़रमाया:
    "जिसने मेरी सुन्नत से मुँह मोड़ा, वह मुझसे नहीं।"(बुख़ारी: 5063)

    ➡ इससे साफ़ ज़ाहिर है कि सुन्नत छोड़ना बहुत बड़ा नुकसान है।


    🟢 सुन्नत के प्रकार – तफ़सील और दलील के साथ

    उलमा-ए-हदीस के नज़दीक सुन्नत की बुनियादी तौर पर तीन क़िस्में हैं:

    1. सुन्नत-ए-क़ौलिया – नबी ﷺ के फ़रमान
    2. सुन्नत-ए-फ़ेलिया – नबी ﷺ के अमल
    3. सुन्नत-ए-तक़रीरिया – सहाबा का काम जिसे नबी ﷺ ने रोका नहीं

    🟩 1. सुन्नत-ए-क़ौलिया (سنة قولية)

    🔹 नबी ﷺ ने जो बातें ज़बान से फ़रमाईं, हुक्म दिया या किसी चीज़ से मना किया — वह सुन्नत-ए-क़ौलिया कहलाती है।

    📜 हदीस से दलील

    नबी ﷺ फ़रमाते हैं:
    "नमाज़ वैसे पढ़ो जैसे मुझे पढ़ते देखा है।"(सहीह बुख़ारी: 631)

    ➡ यह सीधा क़ौली हुक्म है, जो क़ियामत तक के लिए सुन्नत बन गया।

    📖 क़ुरआन से दलील

    रसूल जो कुछ कहें, वह अल्लाह की वह़ी के सिवा कुछ नहीं।"
    (सूरह अन-नज्म 53:3–4)

    ➡ इससे साबित होता है कि नबी ﷺ का फ़रमान भी दीन का हिस्सा है।

     मिसालें:

    ✔ पाँच वक्त की नमाज़ का हुक्म
    ✔ रोज़े की नियत
    ✔ झूठ से मना करना
    ✔ अमानत अदा करने का हुक्म


    🧠 उलमा का क़ौल

    इमाम नववी रहिमहुल्लाह:
    "नबी ﷺ का हर फ़रमान उम्मत के लिए शरीअत है।"

    🟩 2. सुन्नत-ए-फ़ेलिया (سنة فعلية)

    नबी ﷺ का अमल
    🔹 नबी ﷺ ने जो काम ख़ुद करके दिखाया, वह सुन्नत-ए-फ़ेलिया कहलाता है।

    📜 हदीस से दलील

    हज़रत आयशा रज़ी अल्लाहु अन्हा फरमाती हैं: नबी ﷺ का अख़लाक़ क़ुरआन था।"(मुस्लिम: 746)
    ➡ यानी नबी ﷺ का हर अमल क़ुरआन की तफ़सीर था।

    📖 क़ुरआन से दलील

    "निश्चय ही रसूलुल्लाह ﷺ तुम्हारे लिए बेहतरीन नमूना हैं।"
    (सूरह अल-अहज़ाब 33:21)
    ➡ नबी ﷺ का अमल हमारे लिए उसवा (Ideal) है।

    मिसालें:

    ✔ नमाज़ का पूरा तरीक़ा
    ✔ वुज़ू करने का तरीका
    ✔ हज के अरकान
    ✔ खाने-पीने का सुन्नती अंदाज़


    ⚠️ अहम नुक्ता:

    कुछ अमल ख़ास नबी ﷺ के लिए थे (जैसे तहज्जुद का वाजिब होना),
    उन्हें आम सुन्नत नहीं कहा जाएगा।


    🟩 3. सुन्नत-ए-तक़रीरिया (سنة تقريرية)

    नबी ﷺ की मंज़ूरी
    🔹 सहाबा ने कोई काम किया, नबी ﷺ ने देखा या सुना, और मनाअ नहीं किया — यह भी सुन्नत कहलाती है।

    📜 हदीस से दलील

    एक सफ़र में सहाबा में अस्र की नमाज़ को लेकर दो राय हो गईं:

    • कुछ ने रास्ते में पढ़ ली
    • कुछ ने बनू क़ुरैज़ा पहुँचकर पढ़ी

    नबी ﷺ ने किसी को ग़लत नहीं ठहराया (बुख़ारी: 946)

    ➡ यह सुन्नत-ए-तक़रीरिया की वाज़ेह दलील है।

    📖 क़ुरआन से इशारा

    "और रसूल मोमिनों पर बहुत मेहरबान हैं।"(तौबा 9:128)
    ➡ अगर कोई ग़लत अमल होता, तो नबी ﷺ ज़रूर रोकते।

    मिसालें:

    ✔ सहाबा का कुछ तरीक़ों में इख़्तिलाफ
    ✔ खाने-पीने के अलग अंदाज़
    ✔ सफ़र में नमाज़ के तरीक़े


    🧠 उलमा का क़ौल

    इमाम इब्न क़ुदामा रहिमहुल्लाह: "नबी ﷺ की ख़ामोशी भी शरीअत है।"

    🌙 अंतिम नसीहत

    ✔ सुन्नत सिर्फ़ क़िताबों में नहीं, ज़िंदगी में उतारने के लिए है
    ✔ जो चीज़ इन तीनों में शामिल न हो — वह दीन नहीं
    ✔ सुन्नत से चिपकना ही बिदअत से बचाव है

    "मैं तुम्हारे बीच दो चीज़ें छोड़ रहा हूँ — क़ुरआन और मेरी सुन्नत।"
    (मुवत्ता इमाम मालिक)


    🌙 सुन्नत अपनाने के फ़ायदे

    ✔ अल्लाह की मोहब्बत
    ✔ नबी ﷺ की क़ुरबत
    ✔ दीन में आसानी
    ✔ आख़िरत में निजात

    📖 क़ुरआन:

    अगर तुम अल्लाह से मोहब्बत करते हो, तो मेरी पैरवी करो।"(आले इमरान 3:31)


    🔴 बिदअत क्या है? (What is Bid‘ah)

    ठीक सुन्नत के उलट, "बिदअत" है। इसका मतलब है दीन में नया काम या नई चीज़ शामिल करना है। “इस्लाम में बिदअत को बुरी और नापसंद चीज़ माना जाता है, क्योंकि यह दीन में नई बातें जोड़ देती है और इस्लाम की बुनियादी असूलों और तालीमात में बदलाव करती है। ”

    बिदअत वह नया काम, तरीका या इबादत है जो नबी ﷺ की वफ़ात के बाद दीन के अंदर इजाफ़ा (Addition) करके शामिल किया जाए। जबकि वह नबी ﷺ, सहाबा, और सलफ से साबित न हो। यह दीन में नयापन लाने जैसा है, जो इस्लाम में हराम और गुमराही मानी जाती है।

    यानी बिदअत की परिभाषा:
    ➡️ दीन में कोई ऐसा नया अमल डालना जो असल दीन का हिस्सा न हो — वह बिदअत है।
    ➡️ उसे लोग “नेकी” समझकर करें, तब भी वह बिदअत ही होती है।


    📜 हदीस से सख़्त चेतावनी

    आयशा रज़ि अल्लाहू अन्हा रिवायत करती है कि रसूलअल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया:

    🔘 "जिसने हमारे इस दीन में कोई नई चीज़ शामिल की, जो उसमें से नहीं थी, तो वह मर्दूद (अस्वीकार्य) है।"(सहीह बुख़ारी: 2697, सहीह मुस्लिम: 1718)
    🔘 "हर नई चीज़ (बिदअत) गुमराही है और हर गुमराही जहन्नम की ओर ले जाती है।"(सुन्नन इब्ने माजाह: 45, तिर्मिज़ी: 2676)

    ➡ इस हदीस में “हर” शब्द इस्तेमाल हुआ है, जो किसी भी दीन की नई इबादत को शामिल करता है।


    📖 क़ुरआन से इशारा

    अल्लाह ने फ़रमाया:
    🔘...आज में ने तुम्हारे लिए दीन को कामिल (complete) कर दिया और तुम पर अपना एहसान भरपुर कर दिया और तुम्हारे लिए इस्लाम के दीन होने पर रज़ा मंद हो गया...(सूरह अल-माइदा 5:3)

    ➡ इस आयत से साफ़ ज़ाहिर है कि इस्लाम मुकम्मल हो चुका है, इसमें किसी तरह का इज़ाफ़ा करना सही नहीं।जब दीन मुकम्मल हो चुका, तो नई इबादत की गुंजाइश नहीं बचती।

    🔘 वो हैं के जिनकी दुनिया की ज़िंदगी की तमाम तर कोशिशे बेकार हो गयी और वो इसी ग़ुमान में रहे के वो बहुत अच्छे काम कर रहे हैं।[सुरह कहफ़, आयत-104]

    🔘 और जो शख़्स अल्लाह और उस के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की ना-फ़रमानी करे और उस की मुक़र्ररा हदो से आगे निकले उसे वो जहन्नुम में डाल देगा जिस में वो हमेशा रहेगा ऐसो ही के लिए रुसवा कुन अज़ाब है।[सुरह निसा, आयत-14]

    🔘.... अपने दीन के बारे मैं हद से ना गुज़र जाओ...[सुरह निसा, आयत-171]


    ⚖ क्या हर नई चीज़ बिदअत है?

    यहाँ एक अहम नुक्ता समझना ज़रूरी है:

    🔹 दुनियावी चीज़ें (मोबाइल, माइक, इंटरनेट) — बिदअत नहीं
    🔹 दीन में नई इबादत — बिदअत है

    बिदअत सिर्फ़ इबादत और अकीदे में होती है।


    इमाम शाफ़ई रहिमहुल्लाह "जो बिदअत क़ुरआन, सुन्नत या इज्मा के ख़िलाफ़ हो — वही गुमराह करने वाली बिदअत है।"शैख़ुल इस्लाम इब्न तैमिया रहिमहुल्लाह "इबादत वही है जिसे अल्लाह और उसके रसूल ने मुक़र्रर किया हो।"

    ۞ उलेमा ए दीन का नज़रिया

    इमाम मलिक (रहिमाउल्लाह) कहते हैं :-

    जो ये सोचता है की बिदअते हसना जैसी कोई चीज़ है इस्लाम में, तो उसने रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के रिसलात पर ख़यानात का इलज़ाम लगाया क्योंकि अल्लाह क़ुरान में कहते हैं "इस दिन हमने तुम्हारे दीन को पुरा कर दिया है..."तो जो मज़हब नहीं था उस ज़माने में आज वो मज़हब नहीं बन सकता।[अल-इतिसाम अस-शतीबी 1/38]

    इमाम अबू हनीफा (रहिमहुल्लाह) ने कहा:-

    इमाम अबू हनीफ़ा (रहिमाउल्लाह) [D 769 ई. (150 E.H.)] कहते हैं: "सलफ़ (पहले के मुसलमान) के तरीक़ों को अपनाओ और होशियार रहना नई चीज़े इजाद करने से, वो सारी बिदअते है।"
    [एस-सुयूती द्वारा सावन अल-मंतक वल-कलाम में रिपोर्ट किया गया, पेज 32.]

    इब्ने हजर अल-असक़लानी (रहीमुल्ला) ने कहा:-

    इब्ने हजर अल-असक़लानी (रहीमुल्ला) (D 852H) ने कहा: "खुश वो है जो सलफ़ के तरीक़े से जुड़ा (stick) रहता है, और बचता है उस चीज़ से जिसे ख़ल्फ़ (जो सलफ़ के बाद आये) ने इजाद किया है।"
    [इब्न हजर द्वारा फतेह अल-बारी (13/267)]

    शेख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी (रहीमुल्ला) ने फ़रमाया:-

    शेख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी (रहीमुल्ला) ने फ़रमाया: “तुम्हारे ऊपर इत्तिबा लाज़िम है और नई चीज़ इजाद करना नहीं और तुम पर सलफ़ अस सालेह के मज़हब (तरीक़े) पर अमल करना लाज़िम है और वही सीधा रास्ता है जो तुम्हें अपनाना चाहिए।"[अल-फ़तेह उर-रब्बानी (पेज 35)]

    बिदअत दो तरह की होती है

    इस्लामी उलमा (विद्वानों) का मानना है कि बिदअत दो तरह की होती है।

    1️⃣ बिदअत-ए-हसना (अच्छी बिदअत)

    यह वह नई चीज़ है जो जो इस्लाम की मूल शिक्षा या शरीयत के किसी हुक्म के खिलाफ नहीं है,
    जैसे कि:
    मस्जिदों में माइक या लाउडस्पीकर का इस्तेमाल करना। क़ुरआन को किताबी शकल देना, मस्जिद पर मीनार वगैरह,इसे बिदअत माना जाता है, लेकिन हानिकारक नहीं समझा जाता क्योंकि इससे दीन की बुनियादी शिक्षा प्रभावित नहीं होती बलकि ये दीन को आसान बनाने वाली चीज़ें हैं। दीन अब भी अपनी असल शकल में मौजूद है।
    ये चीज़ें नबी ﷺ के ज़माने में नहीं थीं, लेकिन इनसे दीन को नुकसान नहीं पहुँचता, इसलिए इन्हें बुरा नहीं माना जाता।
    पर अफ़सोस! आज कल दीन और मुहब्बत के नाम पर ईद मिलाद, मुहर्रम, शब ए बारात, ग्यारहवीं, बारहवीं को बिदअत-ए-हसना के नाम पर नेकी समझ कर किया जाता है जबकि दीन में इन सब का कोई वजूद ही नहीं है।

    2️⃣ बिदअत-ए-सय्यिआ (बुरी बिदअत)

    यह वह नई चीज़ है जो इस्लाम की असल और बुनियादी तालीम और उसके नियमों के खिलाफ हो।
    जैसे:
    नई इबादतें या रस्में शुरू कर देना, वह काम करना जिसका न कुरान में और न हदीस में कोई सबूत हो और न ही कोई उसकी असल दीन में मौजूद हो। जैसे आज हमारे मुआशरे में पाया जाता है ईद मिलाद, शब ए बारात, मुहर्रम के जुलूस वगैरह वगैरह।
    ऐसी बिदअत को इस्लाम में सख़्त नापसंद किया गया है।

    उलमा की राय

    इमाम नववी और इमाम शाफई जैसे बड़े विद्वानों ने भी कहा है कि:
    👉अच्छी बिदअत कभी-कभी मान ली जाती है
    👉लेकिन बुरी बिदअत हमेशा गलत है और इसे छोड़ देना चाहिए

    Note
    :

    अच्छा और सही तरीका यही है कि दीन अपनी जगह पर पूरा और महफ़ूज़ रहे,और आप उसी दीन को नए अंदाज़ और सही तरीक़े से लोगों के सामने पेश करें।

    लेकिन अगर कोई इंसान अपनी तरफ़ से दीन के नाम पर कोई नई चीज़ पेश करता है,
    जो असल में दीन का हिस्सा ही नहीं है,
    या जो पहले से दीन में मौजूद नहीं थी —
    तो यह गलत तरीका होगा और यही दीन में बिदअत कहलाएगा।कुरान और हदीस में इसे पसंद नहीं किया गया, क्योंकि बिदअत इंसान को असली दीन से दूर कर सकती है।

    उलमा के मुताबिक़ बिदअ़त की शरई तअरीफ़

    उलमा-ए-अहले-सुन्नत की तफसीलात के मुताबिक:
    रसूल अल्लाह ﷺ के दुनिया से तशरीफ़ ले जाने के बाद, दीन की असल जड़ (बुनियाद) में किसी भी चीज़ को शामिल करना —चाहे वह अकीदा हो, कोई सोच या नज़रिया हो, या कोई अमल हो, अक़ायद या इबादात हो —उसे जायज़ समझकर किया जाए, सवाब समझकर किया जाए या बिना सवाब समझे किया जाए —दीन में ऐसी किसी भी चीज़ को शामिल करना “बिदअत” कहलाता है।


    रसूलअल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

    🔘 मेरी सुन्नत और मेरे बाद आने वाले ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन की सुन्नत को मज़बूती से पकड़ लो, और हर नई चीज़ से बचो, क्योंकि हर नई चीज़ एक गुमराही है।”(मुसनद अहमद 4/126, तिर्मिज़ी 2676)

    यह नबी ﷺ का साफ़ हुक्म है कि
    • सुन्नत को पकड़ो,नए कामों से बचो
    • क्योंकि दीन का रास्ता सुन्नत के अलावा किसी और चीज़ से पूरा नहीं होता।

    🔘 रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: "सबसे बेहतर अमर (अमल के लिए) अल्लाह की किताब है और सबसे बेहतर तरीक़ा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के तरीक़ा है सबसे बदतरीन काम दीन में नई नई बातो को पैदा करना है और हर नयी बात गुमराही है..."[सुनन इब्ने माजाह : 45]सही बुख़ारी : 382

    यानि
    • दीन का बेहतरीन रास्ता = कुरान + सुन्नत
    • और दीन में नई बातें गढ़ना = सबसे बुरा काम

    🔘 “रसूलअल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया जब भी लोग किसी बिद्दत का इजाद करते हैं तो उसमे से उतनी सुन्नत उठ जाती है। बिद्दत इजाद करने से बेहतर सुन्नत को अपनाना है।[तिर्मिज़ी : 65]

    दीन में हर नई रस्म आने से
    एक पुरानी सुन्नत लोगों की ज़िंदगी से गायब होती चली जाती है।
    इसलिए बिदअत करना नहीं, सुन्नत को ज़िंदा करना ज़रूरी है।


    🔘 “अल्लाह की किताब सबसे बेहतर है, और मुहम्मद ﷺ का तरीका सबसे बेहतरीन तरीका है। और दीन में नई बातें गढ़ना सबसे बदतरीन काम है — और हर नई बात गुमराही है।”(सुन्नन इब्ने माजाह 45)

    यह भी उसी हक़ीक़त को बहुत ज़ोर के साथ बयान करता है कि सुन्नत ही दीन का असल रास्ता है

    बिदअत की सख़्त मनाही और नबी ﷺ की वसीयत :

    🔘 “मैं तुम्हें ऐसी सीधी राह पर छोड़ कर जा रहा हूँ, जिसका दिन और रात बराबर रोशन हैं।
    जो उससे हटेगा वही हलाक़ होगा।
    जो मेरे बाद ज़िंदा रहेगा, बहुत इख़्तिलाफ़ देखेगा।”

    🔘 “तुम पर मेरा तरीका (सुन्नत) और मेरे हिदायतयाफ़्ता ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन का तरीका लाज़िम है —
    उसे दाँतों से पकड़ लेना।”

    🔘 “और हाकिम की इताअत करो, चाहे वह हब्शी गुलाम ही क्यों न हो।
    क्योंकि मोमिन ऐसा ऊँट है जिसे जिस तरफ़ मोड़ा जाए, वह उसी तरफ़ चल पड़ता है।”
    (सुन्नन इब्ने माजाह 43)

    बिदअतीयों के लिए शख्स चेतावनी 

    मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया की "जिस शख़्स ने भी किसी बिदअती की इज़्ज़त की तो फ़िर वो ऐसा है की उसने इस्लाम को गिराने में मदद की"।
    [इमाम बैहक़ी ने अपनी हदीस की किताब बैहकी में लाया है, बाब शोबुल ईमान में देखें।]

    अली इब्ने अबू तालिब रिवायत करते हैं कि रसूलअल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “अगर कोई शख़्स बिद्दत इजाद करता है (दीन में), तो वो ज़िम्मेदार होगा इसके लिए। अगर कोई शख़्स 
    बिदअत इजाद करता है या किसी बिदअती को पनाह देता है, तो उसपर अल्लाह, उसके फ़रिश्तो और सारे लोगो की लानत होती है।
    [सुनन अबु दाऊद : 4515]

    यह साबित करता है कि जो भी नया अमल इस्लाम में जोड़ा जाएगा, वह अल्लाह की नज़रों में नामंज़ूर और जहन्नम की तरफ़ ले जाने वाला होगा।


    सहाबा की राय में बिदअत

    इब्ने अब्बास (रज़ि अल्लाहु अन्हु) ने कहा:

    🔵 इब्ने अब्बास रज़ि अल्लाहु अन्हु ने फ़रमाया लोगों के इस तलबियाह और तस्बीह छोड़ने पर ताज्जुब है मेरे नज़दीक तकबीर अच्छी चीज़ है। लेकिन शैतान इंसान के पास गुनाह के दरवाज़े से आता है, जब वो इससे बच जाये तो उसके पास नेकी के दरवाज़े से आता है ताकि वो सुन्नत को छोड़ कर बिदअत को अपना ले।[मुसनद इस्हाक़ बिन रावियाह, हदीस 482]

    🔵 हर साल बिद्दती लोग कोई न कोई 
    बिदअत जारी कर देते है। और कोई ना कोई सुन्नत मिटा देते है। नतीजा यह होगा बिदअते ज़िन्दा और सुन्नते मुर्दा हो जायेगी।[इब्ने वादाह अल बिदायाह अन नहाया, हदीस - 93]

    🔵 इब्ने अब्बास रज़ि अल्लाहु अन्हु (D. 68H) कहते हैं: "बेशक, सबसे ज़्यादा ना-पसंदीदा चीज़ अल्लाह की नज़र में 
    बिदअत है।"
    [इसे अल बैहक़ी ने सुनन अल कुबरा (4/316) मैं ब्यान किया है।]

    🔵 इब्ने अब्बास रज़ि अल्लाहु अन्हु फ़रमाते है: जब 
    बिदअत की इजाद होती है तो सुन्नत मर जाती है और तब तक फ़ौत रहती है जब तक बिद्दत ज़िंदा रहती है।[तिर्मिज़ी :187]

    अब्दुल्ला इब्ने मसऊद (रज़ि अल्लाहु अन्हु) ने फ़रमाया:

    👉 की हर बिदअत जिस से इस्लाम के साथ साज़िश की जाती है अल्लाह का एक महबूब बंदा होता है जो उस (बिदअत को) रद करता है और हटाता है और उसकी निशानियो पे बात करता है इसिलिए उस मौक़े का पूरा फ़ायदा उठा कर ऐसी जगह पे जाया करो और अल्लाह पर भरोसा रखा करो।
    [इब्ने वादाह अल बिदायाह, हदीस - 4]

    👉 "पैरवी करो और नई चीज़े इजाद मत करो, क्योंकि जो तुम्हें दिया गया है वो काफ़ी है और हर 
    बिदअत एक गुमराही है।
    अबु ख़ेसमा (Khaithamah) ने किताब अल इल्म (नंबर 540) मैं रिवायत किया है और शेख़ अल्बानी ने इसे सही क़रार दिया है।

    ۞ ताबईंन

    सईद इब्ने अल मुसैयब रज़ि अल्लाहू अन्हु (ताबईंन) ने एक शख़्स को सूरज तुलु होने के बाद दो रकात से ज़्यादा पढ़ाते हुए देखा सज्दा और रुको में इज़ाफ़ा करते हुए, तो उन्होन उसे मना किया ये करने से। उस शख़्स ने जवाब दिया: 'ऐ अबा मुहम्मद, क्या अल्लाह मुझे नमाज़ पढ़ने के लिए सज़ा देगा? उन्होन कहा: 'नहीं, लेकिन वो तुम्हें सुन्नत से इख़्तिलाफ़ करने के लिए सज़ा देगा'।
    [सुनन अल-कुबरा 2/466]

    3 सहाबा का किस्सा — नबी ﷺ का रास्ता सबसे संतुलित

    आइए एक हदीस से बीदत को और अच्छी तरह से समझते हैं। अनस बिन मालिक रज़ि अल्लाहु अन्हु बयान करते हैं:तीन लोग नबी ﷺ की इबादत के बारे में पूछने आए।जब उन्हें बताया गया, तो उन्होंने समझा कि नबी ﷺ की इबादत तो बहुत हल्की है क्योंकि:
    अल्लाह ने आपके पिछले-आने वाले गुनाह माफ़ कर दिए हैं।फिर उन्होंने अपनी तरफ़ से “इबादत बढ़ाने” के फैसले किए:
    ✔ एक ने कहा — मैं सारी रात नमाज़ पढ़ूँगा
    ✔ दूसरे ने कहा — मैं हर रोज़ रोज़ा रखूँगा
    ✔ तीसरे ने कहा — मैं औरतों से दूर रहूँगा और निकाह नहीं करूँगा


    जब नबी ﷺ को पता चला तो आए और फ़रमाया:
    🔘 क्या तुमने ऐसी बातें कही हैं?अल्लाह की क़सम! मैं तुम सब से ज़्यादा अल्लाह से डरने वाला और सबसे ज़्यादा परहेज़गार हूँ,
    लेकिन…
    मैं रोज़ा रखता भी हूँ और छोड़ता भी हूँ,मैं रात को नमाज़ भी पढ़ता हूँ और सोता भी हूँ,और मैं औरतों से निकाह भी करता हूँ।

    याद रखो —
    यह मेरा तरीका है, और जो मेरे तरीके (सुन्नत) से हट जाए — वह मुझ में से नहीं है।”(बुख़ारी 62:1)

    Note: अब यहां एक खास बात गौर करने वाली है की तीनों सहाबी ने किसी नए अमल करने की बात नहीं कही बल्कि उस अमल को करने की ख्वाहिश जाहिर की जिसकी असल दीन में मौजूद थी फिर भी नबी ﷺ ने करने से मना कर दिया। क्यूं?
    क्योंकि वो इसमें अपनी तरफ़ से इज़ाफ़ा करना चाहते थे और जयादह नेकी के लिए फिर भी मना कर दिया गया। इस लिए की दीन मुकम्मल है अब इसमें किसी इज़ाफे की गुंजाइश नहीं है। और जो ऐसा करेगा उसका ताल्लुक नबी ﷺ नही है।
    तो आज जिन्हें ये लगता है कि दीन मुकम्मल नहीं है इसमें कुछ कमी है वहीं लोग दीन में इश्क़ और मुहब्बत के नाम पर bidat और ख़ुराफ़ात कर रहे हैं। 



    📝 (Conclusion):

    सुन्नत को अपनाना और बिदअत से बचना एक सच्चे मुसलमान की पहचान है। इस्लाम को किसी नई चीज़ की ज़रूरत नहीं, क्योंकि यह मुकम्मल और बेहतरीन दीन है। हमें अपनी इबादत और अमल को उसी तरीके पर रखना चाहिए, जो क़ुरआन, हदीस और सहाबा से साबित है।
    अल्लाह हम सबको सुन्नत की पैरवी करने और बिदअत से बचने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।

    ✔ सुन्नत — नबी ﷺ का रास्ता
    ✔ बिदअत — दीन में ज़्यादती
    ✔ दीन मुकम्मल है
    ✔ नजात सिर्फ़ सुन्नत में है"सबसे बेहतरीन तरीका वही है जो मुहम्मद ﷺ का तरीका है।"
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    FAQs:Frequently asked questions:

    1. सुन्नत किसे कहते हैं?

    जवाब: सुन्नत वह तरीका, आचरण और जीवनशैली है जिसे पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपनाया और जिसे उनके सहाबा (रज़ि अल्लाहु अन्हुम) ने भी अपनाया। इसमें उनके कथन, कार्य और स्वीकृति सभी शामिल हैं।

    2. बिदअत क्या होती है?

    जवाब: बिदअत उन नए कामों, इबादतों या रस्मों को कहा जाता है जो इस्लाम में बाद में जोड़ी गईं और जिनका कोई प्रमाण न क़ुरआन में मिलता है और न ही हदीस में। यह इस्लाम में बदलाव करने के समान है, जो हराम और गुमराही मानी जाती है।

    3. क्या हर नई चीज़ बिदअत है?

    जवाब: नहीं, हर नई चीज़ बिदअत नहीं होती। बिदअत केवल दीन (इबादत और धार्मिक कर्मकांड) में नए इजाफ़े को कहते हैं। दुनियावी मामलों में नई चीज़ें अपनाना बिदअत में नहीं आता, जब तक वे इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ न हों।

    4. सुन्नत और बिदअत में फर्क कैसे करें?

    जवाब:
    🔖जो काम क़ुरआन और सहीह हदीस से साबित है, वह सुन्नत है।
    🔖जो काम इस्लाम में बाद में जोड़ा गया और पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) या सहाबा ने नहीं किया, वह बिदअत है।
    🔖सुन्नत को अपनाने पर सवाब मिलता है, जबकि बिदअत को अपनाने से गुमराही और अल्लाह की नाराज़गी होती है।

    5. क्या "अच्छी बिदअत" (बिदअत-ए-हसना) भी होती है?

    जवाब: इस्लामी दृष्टिकोण से, हर बिदअत गुमराही है, जैसा कि हदीस में आता है: "हर बिदअत गुमराही है और हर गुमराही जहन्नम की ओर ले जाती है।" (तिर्मिज़ी: 2676)। इसलिए "अच्छी बिदअत" का कोई अस्तित्व नहीं है। अगर कोई चीज़ वास्तव में अच्छी होती, तो पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) और सहाबा इसे पहले ही अपना चुके होते।

    6. क्या ईद मिलादुन्नबी मनाना बिदअत है?

    जवाब: हाँ, क्योंकि यह न पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने मनाई, न उनके सहाबा ने और न ही खैरुल-कुरून (सबसे बेहतरीन पीढ़ियों) ने। यह इस्लाम में बाद में जोड़ी गई एक रस्म है, इसलिए इसे बिदअत माना जाता है।

    7. क्या बिदअत करने से हमारे आमाल कबूल नहीं होते?

    जवाब: हदीस में आता है: "जो भी ऐसा काम करेगा जो हमारे धर्म में से नहीं, वह नामंज़ूर है।" (सहीह मुस्लिम: 1718)। यानी बिदअत को अपनाने से हमारे आमाल अल्लाह के यहाँ स्वीकार नहीं होते।

    8. क्या बिदअत करने वाला भी जहन्नम में जाएगा?

    जवाब: हदीस के अनुसार, "हर बिदअत गुमराही है और हर गुमराही जहन्नम की ओर ले जाती है।" (तिर्मिज़ी: 2676)। इसका मतलब यह है कि बिदअत पर डटे रहने वाला इंसान सीधे गुमराही की तरफ बढ़ता है और अगर वह बिना तौबा किए मर जाता है, तो उसका अंजाम बुरा हो सकता है।

    9. हमें बिदअत से बचने के लिए क्या करना चाहिए?

    जवाब:
    👉हमेशा किसी भी अमल को करने से पहले यह देखें कि वह क़ुरआन और सहीह हदीस से साबित है या नहीं।
    👉किसी भी नए धार्मिक काम को अपनाने से पहले उलमा-ए-अहले सुन्नत से मशविरा करें।
    👉अपने अमल को सुन्नत के अनुसार रखें और बिना प्रमाण के किसी भी धार्मिक प्रथा को न अपनाएँ।
    👉इस्लाम को उसी रूप में अपनाएँ, जैसा कि सहाबा और ताबेईन ने अपनाया था।

    🔅Tips:

    सुन्नत पर चलना ही सही राह है और बिदअत से बचना ज़रूरी है, क्योंकि यही अल्लाह और उसके रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की तालीमात है

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